देवनागरी वर्णमाला का प्रथम व्यंजन। कंठ्य और स्पर्श वर्ण।
सिंभु भव के पत्र वन दो बजे चक्र अनूप। देव कं को छत्र छावत सकल सोभा रूप।
तज्यौ तेल तमोल भूषन अंग बसन मलीन। कंकना कर बाम राख्यौ गढ़ी भुज गहि लीन - ३४५१।
हड्डियों का ढाँचा, ठठरी, अस्थिपंजर।
किंगरी बजाकर भीख माँगनेवाली जाति।
शीतल चीनी की जाति का एक वृक्ष।
युधिष्ठिर का कल्पित नाम जो उन्होंने राजा विराट के यहाँ रखा था।
छोटा टुकड़ा, पत्थर का टुकड़ा, रोड़ा।
कड़ा या चूड़ा नामक आभूषण जो कलाई में पहना जाता है।
एक धागा जिसमें सरसों की पुटली, लोहे का छल्ला आदि बाँधकर दुलहिन और दूल्हे के हाथ में पहनाते हैं। विवाह के पश्चात दूल्हा दुलहिन का और दुलहिन दूल्हे का कंकण खोलती है।
कलाई में पहनने का एक आभूषण, कंगन, चूड़ा।
तेरो भलो मनैहौं झगरिनि, तू मत मनहिं डरै। दीन्हौं हार गर, कर कंकन, मोतिनि थार मरे - १०-१७।
एक धागा जिसमें सरसों की पुटली, लोहे का छल्ला आदि बाँधकर दुलहिल और दूल्हे के हाथ में बाँधते हैं। विवाह के पश्चात दूल्हा दुल्हिन का कंकन खोलता है और दुलहिन दूल्हे का खोलती है।
कर कंपै, कंकन नहिं छूटै। राम-सिया-कर परस मगन भए, कौतुक निरखि सखी सुख लूटैं-६-२५।
पक्षियों के गले में पड़ने वाली रंग-बिरंगी रेखा।
गले का एक गहना जिसमें सोने, मोती आदि के मनके होते हैं।
कुरते अदि पहनावों का गले पर पड़नेवाला भाग।
माला जो छोटी छोटी गुरियों की बनी हो।
वह वर्ण जिसका उच्चारण कंठ से हो।
लक्ष्मी की बड़ी बहन, दरिद्रा।
[सं. कमला=लक्ष्मी- +अग्रजा=बड़ी बहन]
लक्ष्मीपति विष्णु के अवतार श्री रामचंद्र।
तीनि जाम अरु बासर बीते, सिंधु गुमान भरयौ। कीन्हौ कोप कुँवर कमलापति, तब कर धनुष धरयौ–९ - १२२।
हमसों कठिन भए कमलापति काहि सुनावौ रोई - २८८१।
कमलों की पाँति, कमल-समूह।
विकसत कमलावली, चले प्रपुंज-चंचरीक, गुंजत कलकोमल धुनि त्यागि, कंज न्यारे - १० - २०५।
(जमीन पर) आ पड़े, गिर पड़े।
यह सुनत तब मातु धाईं, गिरे जानि झहरि-१०-६७।
जो गिरने को हो, जो गिर रहा हो, गिरनेवाला।
कनक-मृग मारीच मारयौ, गिरयौ लषन सुनाइ-९६०।
वह जो निगल ले या भक्षण कर ले।
शरीर के संधि स्थानों की गाँठ।
शरीर के संधि स्थानों का सूजा हुआ भाग जो गाँठ के आकार का हो जाता है।
मन में रखना, प्रकट न करना।
जो बहुत मुलायम या कोमल हो।
एक छोटा जंतु, गिलाई, चिखुरी।
निगल कर, बिना दाँतों से चबाये गले में उतार कर।
नष्ट हो गयी, प्रभावरहित हो गयी।
बेनु के राज मैं औषधी गिलि गईं, होइहैं सकल किरपा तुम्हारी-४-११।
मन ही मन में रखेगी, प्रकट न करेगी।
की धौं हमहिं देखि उठि हमकौं मिलिहै कीधौं बाति उघारि कहैगी की मन ही गिलिहै–१२६५।
गुल्ली डंडे के खेल की छोटी गुल्ली।
(क) आजु जसोदा जाइ कन्हैया महा दुष्ट इक मारयौ। पन्नग-रूप गिले सिसु गोसुत, इहिं सब साथ उबारयौ-४३३।
खरिकहू नहिं मिलै कहै कह अनभले करन दै गिले तू दिननि थोरी।
मिट्टी की छोटी गोली जो गुलेल से फेकी जाती है।
पान या मलाई का बीड़ा जो तिकोना-चौकोना होता है।
ताके मन उपजी गिल्यान। मैं कीन्ही बहु जिय की हान।
मोसना, दबाना, मलना, मसलना।
गीत गाना- बड़ाई करना।
अपना ही गीत गाना- अपनी ही हाँके जाना।
(क) वेद, पुरान, भागवत, गीता, सबकौ यह मत सार -१-६८।
(ख) समुझति नहीं ग्यान गीता कौ हरि मुसुकानि अरे-३११०।
(क) चर-अचर-गति बिपरीत। सुनि बेनु-कल्पित गीति - ६२३।
(ख) सूर बिरह ब्रज भलो न लागत जहीं ब्याहु तही गीति-३१९३।
रूपक जिसमें गद्य कम और पद्य अधिक हो।
जटायु पक्षी जिसको भगवान ने तारा था।
जानि जु पाए हौं हरि नीकैं। चोरि चोरि दधि माखन मेरौ, नित प्रति गीधि रहे हौ छींकैं-१०-२८७।
बग-बगुली अरु गीध-गीधिनी आई जन्म लियौ तैसी-२-२४।
(क) इंद्री लई नैन अब लीने स्यामहिं गीधे भारे--पृ. ३२०। (ख) अब हरि कौन के रस गीधे-३२३६। (ग) लोचन लालच ते न टरे। हरि सारँग सों सारँग गीधे दधि सुत काज अरे -सा. उ. ६।
परच गया, ललचा गया, लिप्त रहा।
(क) गीध्यौ दुष्ट हेम तस्कर ज्यों, अति आतुर मतिमंद - १-१०२। (ख) धोखैं ही धोखैं डहकायौ। समुझि न परी, विषय-रस गीध्यौ हरि-हीरा घर माँझ गँवायौ-१-३२६।
(ग) स्याम रूप में मन गीध्यौ भलो बुरौ कहौ कोई-१४६३।
लंका फिरि गई राम दोहाई। कहति मंदोदरि सुनि पिय रावन, तैं कहा कुमति कमाई - ९ - १४०।
भानु भानुसुत सी सुभान मम सबहित सरस कमाई–सा. - १६।
(क) कुबुधि-कमान चढ़ाई कोप करि, बुधि-तरकस रितयौ १ - ६४ (ख) पिय बिन बहत बैरिन बाय। मदन बान कमान ल्यायौ करषि कोप चढ़ाय - सा. ३२।
(क) पग द्वै चलति ठठकि रहै ठाढ़ी मौन धरे हरि के रस गीली–१३०९।
(ख) कुच कुंकुम कंचुकि बँद टूटे लटक रही लट गीली-१८४६।
जो बोल न सके, मूक, गूँगा।
भक्ति बिन बैल बिराने ह्वैहौ। पाउँ चारि, सिर सृंग गुंग मुख, तब कैसैं गुन गैहौ - १-३३१।
बोलै गुंग, पंगु गिरि लंघै अरु आवै अंधौ जग जोइ-१-९५।
गूँगे की तरह अस्पष्ट शब्द निकालना।
(क) नित प्रति अलि जिमि गुंज मनोहर, उड़त जु प्रेम-पराग-२-२२।
(ख) गये नवकुंज कुसुमनि के पुंज अलि करैं गुंज सुख हम देखि भई लवलीन- सा. उ.-४८।
अति बिलच्छन्न गुंज जोग मति लाए–२९९१।
घुँघची की लता या उसका फल।
गुनगुनाते हैं, भनभनाते हैं।
जहँ सनक-सिव हंस, मीन मुनि, नख रवि प्रभा प्रकास। प्रफुलित कमल, निमिष नहिं ससि-डर, गुंजत निगम सुबास -१-३३७।
मधुर या नद-ध्वनि निकालना, कलरव करना।
(भौरे) गूँजते हैं, भनभनाते हैं।
गूँगी बातनि यौं अनुरागति, भँवर गुंजरत कमल मौं बंदहिं-१०-१०७।
बोलते हैं, ध्वनि करते हैं, गरजते हैं।
गर्जत गगन गयंद गुंजरत अरु दादुर किलकार-२८९३।
भौरों का गूँजना या भनभनाना।
ज्यौं कपि सीतहतन-हित गुंजा सिमिट होत लौलीन। त्यौं सठ बृथा तजत नहिं कबहूँ, रहत बिषय-आधीन-१-१०२।
जनम साहिबी करत गयौ। काया-नगर बड़ी गुंजाइस, नाहिंन कछु बढ्यौ-१-६४।
गूँजता या ध्वनि करता हुआ।
जहँ बृंदाबन आदि अजिर जहँ कुंजलता बिस्तार। तहँ बिहरत प्रिय प्रियतम दोऊ निगम भृंग-गुंजार।
भौरों आदि की गुंजार से युक्त।
(भौंरे) भनभनाते या गुनगुनाने हैं।
बृथा बहति जमुना तट खगरो वृथा कमल फूलैं अलि गुंजैं–२७२१।
राग रागिनी सँचि मिलाई गावैं गुंड मलार-२२७९।
[हिं. गुंडा+ अई (प्रत्य.)]
(तागों, बालों आदि का) उलझना।
बाजीपति अग्रज अंबा तेहिं, अरक थान सुत माला गुंदहिं-१०-१०७।
(आँटे आदि का पानी से) साना या माड़ा जाना।
गूँधने का काम कराना या इसकी प्रेरणा देना।
गूँधने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
गोल सूजन जो चोट लगने से सिर या माथे पर आ जाय।
टरति न टारे वह छबि मन में चुभी।...। सूरदास मोहन मुख निरखत उपजी सकल तन काम गुँभी -१४४६।
गुआर, गुआरि, गुआरी, गुआलिन
पत्ती, या किसी चीज का समूह।
कर्म संचय किया, कर्म किया।
(क) जोग-जज्ञ जप तप नहिं। कीन्हौं, बेद बिमल नहिं भाख्यौ। अति रस-लुब्ध स्वान जूठनि ज्यौं, अनत नहीं चित राख्यौ। जिहिं जिहिं जोनि फिरयौ संकट बस, तिहिं तिहिं यहै कमायौ। (ख) कहा होत अब के पछिताएँ, पहिलैं पाप कमायौ - १ - ३३५।
निर्वाह होना, निभना, काम चलना।
प्रार्थना, निवेदना, विनय।
[सं. गुह्य, प्रा. गुच्झ + सं. आवर्त]
स्त्रियों की नाभि के आसपास का भाग।
[सं. गुह्य, प्रा. गुच्झ + सं. आवर्त]
गुझा इलाचीपाक अमिरती-३९६।
[सं. गुहयक, प्रा. गुज्झअ, गुज्झा]
[सं. गुहयक, प्रा. गुज्झअ, गुज्झा]
एक सिद्धि जिसमें गोली मुँह में रखने पर साधक सब जगह जा सके और कोई उसे देख न पावे।
बेकार या निकम्मा हो जाना।
गुड़ की चाशनी में उबाली हुई कच्चे आम की फाँकें।
(क) रस लै लै औटाइ करत गुड़ (गुर) डारि देत हैं खोई। फिर औटाये स्वाद जात है, गुड़ तैं खाँड़ न होई-१-६३। (ख) दानव प्रिया सेर चालीसो सुरभी रस गुड़ सीचो -सा. ९०।
कुल्हिया में गुड़ फूटना- (१) गुप्त रूप से काम होना। (२) छिपाकर पाप होना।
गुड़ भरा हँसिया- ऐसा काम जिसे न करने से जी ललचाये और करने से संकोच हो।
जो गुड़ खायगा सो कान छेदायेगा- जिसे लाभ होगा, उसे कष्ट भी सहना पड़ेगा।
गुड़ खायगा, अँधेरे में आयगा- जिसे लाभ होगा वह कष्ट सहकर भी समय-कुसमय काम करेगा।
गुड़ दिखाकर ढेला मारना- कुछ लालच देने के बाद रूखा या कठोर व्यवहार करना।
गुड़ दिये मरे तो जहर क्यों दे- जब सीधे से काम चल जाय तो कठोर बर्ताव क्यों किया जाय।
गुड़ खाना गुलगुलों से परहेज (घिनाना)- कोई बड़ी बुराई करना पर उसी ढंग की छोटी बुराई करने में संकोच करना।
गूँगे का गुड़- विषय या वस्तु का अनुभव करना परन्तु उसे शब्दों में उचित ढंग से समझा न पाना।
चोरी का गुड़- छिपाकर पाया हुआ बेमेहनत का माल। उ.- मिसरी सूर न भावत घर की चोरी को गुड़ मीठो–सा. ९०।
जहाँ गुड़ होगा, चीटियाँ (मक्खियाँ) आ जायँगी- पास में धन या दूसरों के लाभ की चीज होगी तो लाभ उठाने वाले बिना बुलाये अपने आप जुट आयँगे।
वह शब्द जो बन्द चीज (जैसे पेट, हुक्का) में हवा के चलने से होता है।
मिठाई जो भुने हुए गेहुँओं को गुड़ में पागने से बनती है।
एक वृक्ष जिसकी पत्तियाँ चबाने के बाद गुड़ का स्वाद ही नहीं आता।
कपड़े, मोम आदि की बनी छोटी पुतली जिससे बच्चे खेलते हैं।
गुड़िया सी- छोटी और सुन्दर।
गुड़ियों का खेल- बहुत सरल काम।
(क) बँधी दृष्टि यों डोर गुडी बस पाछे लागति धावति - १४३१। (ख) परबस भई गुड़ी ज्यों डोलति परति पराये कर ज्यों-पृ. ३३२।
[हिं. गुड़+ ईला (प्रत्य.)]
[हिं. गुड़+ ईला (प्रत्य.)]
कपड़े, मोम आदि का बना पुतला जिससे बच्चे खेलते हैं।
गुड्डा बाँधना- बुराई या निन्दा करना।
(क) अति आधीन भई संग डोलति ज्यों गुड्डी बस डोर-पृ. ३३३।
(ख) हम दासी बिन मोल की ऊधो ज्यों गुड्डी बस डोर–३३२०।
गढ़-गढ़ाकर, ठीक ठाक करके।
कन्हैया हालरु रे। गढ़-गुढ़ि ल्यायौ बाढ़ई धरनी पर डोलाई बलि हालरु रे -१०-४७।
गौरी के समान सौभाग्यवती स्त्री।
एक व्रत जो सौभाग्यवती स्त्रियाँ चैत की चौथ को करती हैं।
गुण या गुणी का आदर करनेवाला।
गुण गाना- प्रशंसा करना।
गुण मानना- अहसान मानना।
एक प्रत्यय जो संख्यावाची शब्दों के अंत में रहता है।
वह अंक जिससे किसी अंक को गुणा किया जाय।
(क) कहा कमी जाके राम धनी - १ - ३९।
(ख) तुमही कहौ कमी काहे की नवनिधि मेरैं धाम - ३७६।
शिवजी का धनुष तोड़नेवाले राम
वह नाटकीय अनुष्ठान जो नट कार्यारम्भ के पूर्व विघ्न शांति के लिए करते हैं।
वह संख्या जो गुणा करने पर निकले।
गुणों का समुद्र, गुणनिधि।
वह संज्ञीतज्ञ जो कामोद राग गाता हो।
बेगि चलौ बलि कुँअरि सयानी। समय बसंत बिपिन रथ हय गय मदन सुभट नृपफौज पलानी। .....। बोलत हँसत चपल बंदीजन मनहुँ प्रसंसित पिक बर बानी। धीर समीर रटत बर अंलिगन मनहुँ कमोदिक मुरलि सुठानी।
मिट्टी का चौड़े मुँह का पात्र जिसमें दूध, दही रखा जाता है।
मिट्टी का चौड़े मुँह का बर्तन जिसमें दूध-दही रखा जाता है, मटका।
(क) माखन भरी कमोरी देखत, लै लै लागे खान। ......। जौ चाहौ सब देउँ कमोरी, अति मीठौ कत डारत - १० - २६५। (ख) मीठौ अधिक, परम रुचि लागै, तौ भरि देउँ कमोरी - १० - २६७। (ग) हेरि मथानी धरी माट तैं, माखन हो उतरात। आपुन गई कमोरी माँगन हरि पाई ह्याँ घात। .....। आइ गई कर लिए कमोरी, घर तैं निकसे ग्वाल - १० - २७०।
(घ) कहि धौं मधुर बारि मथि माखन काढ़ि जो भरो कमोरी - ३०२८।
नीर छीर ज्यों दोउ मिलि गये। न्यारे होत न न्यारे कये ११ - ६।
कर जोरे- (१) प्रार्थना करती हुई। (२)अनुनय-विनय करती हुई। उ. - मैं अपराध किये सिसु मारे कर जोरे बिललाई - सारा, ३८६। (३) प्रणाम करती हुई। (४) सविनय, विनम्र होकर, सेवा के लिए तत्पर। उ. - अष्टसिद्धि नवनिधि कर जोरे द्वारें रहत खरी - १० - ७६।
कर देति - (१) हाथ पकड़ती है, सहारा देती है। उ. - सूच्छम चरन चलावत बल करि। अटपटात कर देति सुन्दरी उठत तबै सुजतन तन-मन धरि - १० - १२०। (२) रोकती है, मना करती है।
कर पसारौं - (किसी से कुछ) माँगूँ, याचना करूँ, कुछ देने के लिए विनती करूँ। उ. - अब तुम मोकौं करौ अजाँची जो कहुँ कर न पसारौं - १० - ३७।
कर मारै- हाथ मलता है, झुंझलाता है, निराश या दुखी होता है। उ. - केस पकरि ल्यायौ दुस्सासन, राखी लाज मुरारे। ......। नगन न होति चकित भयौ राजा, सीस धुनै, कर मारै - १ - २५७।
कर मीड़त - हाथ मलता है, पछताता है, निराश या दुखी होता है। उ. - (क) हरि दरसन कौं तड़पत अँखियाँ। झाँकति झपति झरोखा बैठी कर मीड़त ज्यौं मखियाँ - २७६६। (ख) सूरदास प्रभु तुमहिं मिलन कौं कर मीड़त पछितात - ३३५०।
कर मीड़ै - दुखी होता है, पछताता है। उ.- सुदामा मन्दिर देखि डरयौ। सीस धुनै, दीऊ कर मीड़ै अंतर साँच परयौ -१० उ. --१६८।
कर मीजै- हाथ मलकर, दुखी या निराश होकर। उ.- सूरदास बिरहिनी बिकल मति कर मीजै पछिताइ-२७१८।
देखि सखी हरि-अंग अनूप। ........। कबहुँ लकुट तैं जानु फेरि लै, अपने सहज चलावत। सूरदास मानहु करभी कर बारंबार डुलावत - ६३२।
प्रजा की आय या उपज से लिया गया राज का भाग।
जिनके क्रोध पुहुमि नभ पलटै सूखै सकल सिंधु कर पानी - ९ - ११६।
दुरजोधन कैं कौन काज जहँ आदर-भाव न पइयै। गुरुमुख नहीं, बड़े अभिमानी, कापै सबे करइयै - १ - २३९।
[हिं. करना' का प्रे. कराना’]
(क) नसै धर्म मन बचन काम करि, सिंधु अचंभौ करई - ९ - ७८। (ख) इतनी कहत गगनबानी भई, हनू सोच कत करई - ९ - ६६। (ग) बिधु बैरी सिर पर बसे निसि नींद न परई। हरि सुर भानु सुभट बिना यहि को बस करई - २८६१।
झाड़ी, कंजा नाम की कटीली झाड़ी।
भटकत फिरत पात द्रुम बेलनि कुसुम करंज भये। सूर बिमुख पद अंबु न छाँडे बिपैनि बिष बर छये - २९९२। (२) एक पेड़।
हथियार तेज करने का पत्थर।
सहज रूप की रासि नागरी भूपन अधिक बिराजै...नासा नथ मुक्ता बिंबाधर प्रतिबिंबित असमूच। बीध्यौ कनक पास सुक सुन्दर करक बीच गहि चूंच।
शरीर पर रगड़ से पड़ने वाला चिन्ह।
जोश, उमंग या आवेश में आना।
युद्ध के अवसर पर गाये जाने वाले वीरोत्तेजक गीत।
उत्तेजना, बढ़ावा, जोश, लाग-डाँट।
नैननि होड़ बदी बरखा सों राति दिवस बरसत झर लाये दिन दूना करखा सों - ३४५७।
एक बाजा जिससे ताल दी जाती है।
उरज करज मनो सिव सिर पर ससि सारंग सुधागरी–२१११।
(क) सिय अन्देस जानि सूरज प्रभु लियौ करज की कोर। टूटत धनु नृप लुके जहाँ-तहँ ज्यों तरागन भोर - ९ - २३। (ख) करज मुद्रिका, कर कंकन छवि, कटि किंकिन नूपुर छबि भ्राजत। (ग) बलिहारी वा बाँसबंस की बंसी-सी सुकुमारी। सदा रहत है करज स्याम के नेकहु होत न न्यारी - ३४१२।
कंठ फूटना - (१) बच्चों का स्वर साफ होना। (२) युवावस्था में स्वर-परिवर्तन। (३)पक्षियों के गले में रेखा पड़ना।
कंठ लाइ- गले लगाकर। उ. - ध्रुव राजा के चरननि परयौ। राजा कंठ लाइ हित करयौ–४ ६।
जो गले में अटका हो, जो निकलने को हो।
प्राण कंठगत होना- मरने लगना।
गले का एक रोग जिसमें बहुत सी गाँठे पड़ जाती हैं।
वह गहना जिसमें नजरबट्ट, बाघनख, और दो चार ताबीज गूँथ कर बच्चे को इसलिए पहनाते हैं कि उसे नजर न लगे और अन्य आपत्तियों से वह रक्षित रहे।
[हिं. - कंठ +ला (प्रत्य.)]
सोने का एक जड़ाऊ गहना जो गले में पहना जाता है, कंठी।
कंठाग्र, जो जबानी याद हो।
सूर सगुन बँटि दियो गोकुल में अब निर्गुन को बसेरो। ताकी छटा छार कँठहरिया जो ब्रज जानो दुसेरो - ३१५४।
करि अवारजा प्रेम प्रीति कौ, असलत हाँ खतियावै। दूजे करज दूरि करि दैंयत नैंकु न तामै आवै - १ - १४२।
काम का कर्ता, कार्यकर्ता।
(क) बिनु बदलैं उपकार करत हैं, स्वारथ बिना करत मित्राई - १ - ३।
(ख) हौं कहा कहौं सूर के प्रभु के निगम करत जाकी क्रीति - १० उ. - १७५।
करत (रैनि)- रात करते हो, रात तक बाहर रहते हो, देर लगाते हो। उ. - जसुमति मिलि सुत सौं कहत रैनि करत किहिं काज - ४३७।
देखौ आइ पूत के करतब, दूध मिलावत पानी १० - ३३७।
करतल-सोभित बान धनुहियाँ - ९ - १६।
करने योग्य कार्य या धर्म।
(क) नर के किएँ कछु नहिं होइ। करता-हरता आपुहिं सोइ - १ - २६१। (ख) मैं हरता करता संसार - ५ - २। (ग) येई हैं श्रीपति भुवनायक, येई करता हैं संसार - ४६७। (२) विधाता, ईश्वर। (३) एक कारक।
धर्मपुत्र तू देखि बिचार। कारन करनहार करतार - १ - २६१।
हाथ से ताली बजाने की क्रिया।
दोनों हथेलियों के परस्पर बजाने का शब्द, ताली।
दै करताल बजावति, गावति राग अनूप मल्हावै - १० - १३०।
एक बाजा जो लकड़ी या काँसे का होता है। इसका एक जोड़ा हाथ में लेकर बजाते हैं।
गावत हँसत, गॅंवाय हँसावत, पटकि पटकि करतालिका–८०६।
रही ग्वालि हरि कौ मुख चाहि। कैसे चरित किए हरि अबहीं बार-बार सुमिरहि करताहि - १० - ३१६।
[सं. कर्ता+हि (हिं. प्रत्य.)]
करति बयारि निहारति हरि-मुख चंचल नैन बिसाल - ३९७।
पकाती है, बनाकर तैयार करती है।
नंदधाम खेलत हरि डोलत। जसुमति करति रसोई भीतर आपुन किलकत बोलत १० - १११।
(क) जग जानै करतूति कंस की, बृष मारयौ, बल-बाहीं - २ - २३। (ख) सब करतूति कैकेई कैं सिर, जिन यह दुख उपजायौ - ९ - ५०। (ग) कहा कठिन करतूति न समुझत कहा मृतक अबलनि सर मारति - २८४९।
(काम) चलाता, संपादित करता, करता।
(क) भक्ति बिना जौ कृपा न करते, तौ हौं आस न करतौ - १ - २०३। (ख) जौ तु हरि कौ सुमिरन करतौ। मेरैं गर्भ आनि अवतरतौ - ४ - ९।
कमर में पहनने का एक गहना। बच्चों के लिए यह घुँचरूदार होता है; जब वे चलते हैं तब इसके घुँघरु बजते हैं।
तनक कटि पर कनक-करधनि छीन छबि चमकाति - १० - १८४।
कमर में पहनने का सोने-चाँदी का एक गहना जिसमें बच्चों के लिए घुँघरु लगाये जाते हैं।
[सं. कटि+आधाना। सं. किंकिणी]
कई लड़ों का सूत जो करधनी की तरह कमर में पहनने के काम आता है। इस सूत का रंग प्रायः काला होता है।
[सं. कटि+आधाना। सं. किंकिणी]
करधर की धरमैर सखी री की सृक सीपज की बगपंगति की मयूर की पीड़ पखी री।
[सं. कर =वर्षोपल+धर = धारण करनेवाला]
कुंती का सबसे बड़ा पुत्र जो उसके कन्य काल में ही सूर्य से उत्पन्न हुआ था।
करन-मेघ- बान- बूँद भादौं-झरि लायौ। जित-जित मन अर्जुन कौ तितहिँ रथ चलायौ - १ - २३।
(क) पारथ-तिय कुरुराजसभा मैं बोलि करन चहै नंगी। स्रवन सुनत करुनासरिता भये बाढ़ै बसन उमंगी–१ - २१।
पकाना, बचाना, तैयार करना।
जेवन करन चली जब भीतर छींक परी तों आजु सबारे - ५९५।
करने योग्य, जिसका संपादन करना संभव हो।
दयानिधि तेरी गति लखि न परै। धर्म अधर्म, अधर्म धर्म करि, अकरन करन करै - १ - १०४।
भजि मन नंद-नंदन चरन। परम पंकज अति मनोहर सकल सुख के करन - १ - ३०८।
छल-पल राउरे की आस। करन नाव सुपंच संज्ञा जान के सब नास - सा. उ ४१।
हाथ की छेटी उँगली का नाखून।
वर-नख पर धारी- हाथ की छोटी उँगली पर उठान, बहुत थोड़े परिश्रम से उठाना। उ. - राख्यौ गोकुल बहुत विघन तैं, कर नख पर गोबर्धन धारी - १ २२।
माधो कीजिए बिस्राम। उदौ चाहत लेन बैरी करन-पितु हितु जाम - सा. ८८।
कान में पहनने का सोने-चांदी का एक गहना जो सादा और जड़ाऊ, दोनों तरह का होता है, तरौना, काँप।
जिन स्रवनन ताटंक खुमी अरु करनफूल खुटिलाऊ। तिन स्रवनन कस्मीरी मुद्रा लै लै चित्र झुलाऊ - ३२२१।
बच्चों का एक संस्कार जिसमें कान छेदे जाते हैं, कर्णछेदन संस्कार।
तब भीषम नृप सौं यौं कहयौ। धर्मपुत्र तू देखि बिचार कारन करनहार करतार - १ - २६१।
[सं करण + हिं. हार (प्रत्य.)]
(काम को) चलाना या संपादित करना।
(क) काहूँ कह्यौ मंत्र जप करना। काहूँ कछु, काहूँ कछु बरना - १ - ३४१। (ख) तातैं संत-संग नित करना। संत-संग सेवौ हरिचरना - ५ - २।
पकाना, रींधना, तैयार करना।
अलप, घात, विपत्ति, आपत्ति।
(क) ढोटा एक भयौ कैसैहुँ करि, कौन कौन करबर बिधि भानी - ३६८।
(ख) कौनकौन करबर हैं टारे। जसुमति बाँधि अजिर लै डारे ९१।
(ग) आनँद बधावनो मुदित गोप गोपीगन आजु परी कुसल कठिन करबर तैं।
(घ) बड़ी करबर टरी साँप सों ऊबरी, बात के कहत तोहि लागत जरनी।
(ङ) जबते जनम भयौ हरि तेरौ कितने करबर टरे कन्हाई।
कोपि करबार गहि कह्यौ लंकाधिपति, मूढ़ कहा राम कौं सीस नाऊँ - ९ - १२६।
(क) देखि सखी हरि अंग अनूप।.......। कबहुँ लकुट तैं जानु फेरि लै, अपने सहज चलावत। सूरदास मानहुँ करभा कर बारंबार चलावत - ६३२। (ख) चरन की छबि देखि डरप्यो अरुन गगन छपाइ। जानु करभा की सबै छबि निदरि लई छड़ाइ - १० - २३४।
सुकृत्य, कार्य, कर्म, महिमा।
(क) करनी करुनासिंधु की मुख कहत न आवै - १ - ४। (ख) गनिका तरी आपनी करनी नाम भयौ तोरो - –१ - १२२। (ग) सूरदास प्रभु मुदित जसोदा पूरन भई पुरातन करनी - १० - ४४। (घ) मुरली कौन सुकृत-फल पाये।…..लघुता अंग, नहीं कुछ करनी, निरखत नैन लगाये ६६१। (ङ) लिखी मेटै कौन, करै करता जौन, सोइ ह्वै है जु होनहारि करनी - ६९८। (च) देखो करनी कमल की, कीनो जल सों हेत। प्रान तज्यौ प्रेम न तज्यौ, सूख्यौ सरहि समेत।
करतूत (हीनता या उपेक्षा सूचक प्रयोग)।
मृतक-क्रिया या संस्कार, अन्तेष्ठि कर्म।
दीवार पर गारा लगाने की कन्नी।
मंदाकिनितट फटिक सिला पर, मुख-मुख जोरि तिलक की करनी। कहा कहौं, कछु कहत न आवै, सुमिरत प्रीति होइ उर अरनी - ९ - ११०।
मानो ब्रज ते करनी चली मदमाती हो। गिरधर गज पै जाइ ग्वारि मदमाती हो। कुल अंकुस मानै नहीं मदमाती हो। संका बढ़े तुराइ मदमाती हो - २४०१।
मेरी कैंती बिनती करनी। पहिले करि प्रनाम, पाइनि परि, मनि रघुनाथ हाथ लै धरनी - ९ - १०१।
रंग के आधार पर किये गये घोड़ों के भेदों में एक।
एक पौधा जिसमें सफेद फूल लगते हैं, सुदर्शन।
जाही जूही सेवती करना अनिआरी। बेलि चमेली मालती बूझति द्रुमडारी–१८२२।
किया हुआ काम, करनी, करतूत।
सुदर्शन के पौधों का समूह जिनमें सफेद फूल लगते हैं।
कमल बिकच करनावली मुद्रिका बलय पुट भुज बेलि शुकचारी - २३०९।
कार्य, कर्म, करनी, करतूत।
(क) बिनती करत डरत करुनानिधि, नाहिँन परत रह्यौ। सूर करनि तरु रच्यौ जु निज कर, सो कर नाहिं गह्यौ - १ - १६२। (ख) सुनहु सूर वह करनि कहनि यह, ऐसे प्रभु के ख्याल - ५९८। (ग) सुनहु सूर ऐसेउ जन-जग में करता करनि करे - पृ. ३३२।
गूदेदार और बिना रेशे की जड़
विहल भई जसोदा डोलतदुखित नंद उपनंद। धैनु नहीं पय स्रवति रुचिर मुख चरति नाहिं तृंन कंद - २७६०।
(क)सज्जा पृथ्वी करी विस्तार। गृह गिरि - कंदर करे अपार - २ - २०। (ख) अहो विहंग, अहो पन्नन- नृप, या कंदर के राइ। अबकैं मेरी विपति मिटावौ, जानकि देहु बताइ - ६ - ६४।
कर भूषन तन हेरन लागी गयो देख मन चोरे - सा. १००।
हाथी की सूड़ की तरह चिकनी और सुडौल जाँघ।
पृथु नितंब करभोरु कमल-पद-नख-मनि चंद्र अनूप। मानहु लुब्ध भयो बारिज दल इंदु किये दस रूप।
करम का टेढ़ा या तिरछा होना - भाग्य फूटना, किस्मत खोटी होना। उ.- पालागौं छाँड़ौ अब अंचल बार-बार बिनती करौं तेरी। तिरछो करम भयो पूरब को प्रीतम भयो पाँय की बेरी।
करम के ओछे - भाग्य हीन, अभागा। उ.- कौन जाति अरु पाँति बिदुर की ताहीं कैं पग धारत। भोजन करत माँगि घर उनकैं राज मान-मद टारत। ऐसे जन्मकरम के ओछे ओछनि हूँ ब्योहारत। यहै सुभाव सूर के प्रभु कौ, भक्त-बछल प्रन पारत - १ - १२।
करम कौ मारौ- भाग्यहीन, अभागा। उ.- जौ पै तुमहीं बिरद बिसारौ। तौ कहौ कहाँ जाइ करुनामय कृपिन करम कौ मारौ - १ - १५७।
कर्म करने में आनन्द लेने वाला।
वह मूरति द्वै नयन हमारे लिखी नहीं करमात। सूर रोम प्रति लोचन देतो बिधिना पर तर मात १४१८।
कर्म में आनंद लेनेवाला, कर्मनिष्ठ।
एक पौधा जिसके बीजों से तेल निकलता है जिससे मोमजामा बनाया जा सकता है।
चरमर या मरमर शब्द करके टूटना।
ऊधो तनिक सुपस स्रौनन सुन। कंचन काँच कपूर कररि रस, सम दुख-सुख गुन-औगुन–३००१।
[सं. करवर्त, प्रा. करवट्ट]
प्रयाग, काशी आदि स्थानों में जो आरे या चक्र होते थे, वे करवट कहलाते थे। इनके नीचे लोग सुफल की आशा से प्राण देते थे। काशी-करवट लेना विशेष फलदायक समझा जाता था।
[सं. करपत्र, प्रा. करवत्त]
प्रयाग, काशी आदि स्थानों में करवत रहते थे जिनके नीचे प्राण देने से सुफल मिलने की आशा होती थी।
(क) कहा कहौं कोउ मानत नाहीं इक चंदन औ चंद करासी। सूरदास प्रभु ज्यों न मिलैंगे लेहौं करवत कासी। (ख) गोपी ग्वाल-बाल वृन्दाबन खग मृग फिरत उदासी। सबई, पान तत्यौ चाहत है को करवत को कासी - ३४२२।
[सं. करपत्र, प्रा. करवत्त]
अलप, विपत्ति, संकट, कठिनाई।
(क) त्राहि त्राहि कहि ब्रज-जन धाए, अब बालक क्यौं बचै कन्हाई। .......। करवर बड़ी हरी मेरे की, घर घर आनंद करत बधाई - १० - ५१। (ख) मैं नहिं काहू को कछु घाल्यौ पुन्यनि करवर नाक्यौ–२३७३।
[सं. कलरव, हिं. करवर, कलबल]
रिषि नृप सौँ जग-बिधि करवाई। इला सुता ताकैं गृह जाई - ६ - २।
राजनीति मुनि बहुत पढ़ाई गुरु सेवा करवाये - सारा. ५३८।
दिन दस लौं जलकुम्भ साजि सुचि, दीप-दान करवायौ - ९ - ५०।
सिद्ध किया, संपादित किया।
करि दिग्विजय विजय को जग में भक्त पक्ष करवायौ - सारा, ८४१।
दामिनि करवार करनि कंपत सब गात उरनि जलधर समेत सेन इन्द्र धनुष साजे - २८१६।
संपादन कराती है, (कार्य आदि) कराती है, (कर्म आज्ञापालन आदि) करने को प्रवृत्त करती है।
कोमल तन आज्ञा करवावति, कटिटेढ़ी ह्वै आवति - ६५५।
चेदि देश का एक प्राचीन नगर जहाँ के राजा शिशुपाल ने कृष्ण-बलराम से युद्ध किया था।
करील, टेंटी का पेड़, कचरा।
कुमुद कदब कोविद कनक आदि सुकंज। केतकी करवील बेलउँ बिमल बहुबिधि मंत - २८२८।
[हिं. करना+वैया (प्रत्य.)]
करषत सभा द्रुपद-तनया कौ अंबर अछय कियौ। सूर स्याम सरबज्ञ कृपानिधि, करुना मृदुल हियौ - १ - १२१।
खीचती है, तानती है, घसीटती है।
दिन थोरी, भोरी, अति गोरी, देखत ही जु स्याम भए चाढ़ी। करषति है दुहु करनि मथानी, सोभा-रासि भुजा सुभ काढ़ी -१० - ३००।
खीचना, खीचने का प्रयत्न करना।
हरष हरष करषन चित चाहत तेहितें का प्रतिनीक - सा. ५८।
खींचते हैं, आकर्षित करते हैं।
आकर्षण करके, समेट या बटोर कर।
(क) छिन इक मैं भृगुपति प्रताप बल करषि हृदय धरि लीनौ ९ - ११५। (ख) सकुचासन कुल सील करषि करि जगत बंध कर बंदन। मौनअपबाद पवन आरोधन हित क्रम काम निकंदन–३०१४।
(क) पिय बिनु बहत बैरिन बाय। मदनबान कमान ल्यायो करषि कोपि चढ़ाय - सा. ३२। (ख) केस गहि करषि जमुना धार डारि दै सुन्यौ नृप नारि पति कृष्न मारयौ - २६१८। (ग) इन औरन अमरन सुख दीनों करषि केस सिर कंस - ३०१८।
आकर्षण किये, समेटे, इकट्टा किटे, बटोरे, खीचे।
अंकम भरि भरि लेत स्याम कौं ब्रैज नर-नारि अतिहिँ मन हरषे। सूर स्याम संतन सुखदायक दुष्टन के उर सालक करषे - ६०७।
खींचती है, आकर्षित करती है, घसीटती है, तानती है।
(क) मंजुल तारनि की चपलाई, चित चतुराई करषै री - १० - १३७।
(ख) जसुमति रिसकरि करि रजु करषै - १० - ३४२।
समेटती है, बटोरती है, इकट्टा करती है।
सूरदास गोपी बड़भागिनि हरि-सुख क्रीड़ा करषै हो - २४००।
आकर्षित किया, समेट लिया, बटोर लिया।
जिहिँ भुज परसुरराम बल करष्यौ, ते भुज क्यौँ न सँभारत फेरी १ - ९ - ९३।
खीचा, एकाग्र किया, लगाया।
जब पूरी सुनि हरि हरष्यौ। तव भोजन पर मन करष्यौ - १० - १८३।
अंकुस राखि कुंभ पर करष्यौ हलधर उठे हँकारी - २५९४।
पहिलेहिं रोहिनि सौं कहि राख्यौ, तुरंत करहु ज्योनार - ३९५।
एक बड़ी चिड़िया जो पानी के किनारे रहती है।
जुवा-जुवती खेलाइ कुल-व्यवहार सकल कराइबो। जननि मन भयौ सूर आनँद हरषि मंगल गाइबो - १० उ. - १२४।
(क) गावैं सखी परस्पर मंगल, रिषि अभिषेक कराई - ९ - १७।
(ख) कर परनाम देवगुरु द्विज को जल सुस्नान कराई–सारा. २१४।
धेनु नहिं देखियत कहुँ नियरैं, भोजन ही मैं साँझ कराई–४७१।
मुख मुखी सिर पखौआ बन-बन धेनु चराई। जे जमुना-जल रंग रॅंगे हैं ते अजहूँ नहिं तजत कराई।
तब तनु परसि काम दुख मेरो जीवन सफल कराऊँगो - १९४३।
कराने से, (किसी काम आदि में) लगने से।
कहा होत पय-पान कराएँ, विष नहिं तजत भुजंग - १ - ३३२।
[हिं. ‘करना’ का प्रे. ‘कराना’]
करने को प्रवृत्त करना, करने में लगाना।
(क) असुर जोनि ता ऊपर दीन्ही, धर्म-उछेद करायौ - १ - १०४।
(ख) जानि एकादस बिप्र बुलाए, भोजन बहुत करायो - ९ - ५०।
किये, बनाये, अंगीकार किये, माने।
कही कथा दत्तात्रय मुनि की गुरु चौबीस करायो - सारा. ८४३।
चकित देखि यह कहैं नर-नारी। धरनि अकास बराबरि ज्वाला झपटति लपट करारी - ५१८।
[हिं. पुं. कड़ा, कर्रा करारा]
(क) सूर सुजस-रागी न डरत मन, सुनि जातना कराल - १ - १८९ (ख) उचटत अति अँगार फुटत झर, झपरत लपट कराल - ६१५।
चारि पहर दिन चरत फिरत बन, तऊ न पेट अवैहौ। टूटे कंधऽरु फूटी नावनि, कौ लौं धौं भुस खैहौं - १ - १३१।
तू भुल्यौ दससीस बीउ भुज, मोहि गुमान दिखावत। कंध उपारि डारिहौं भूतल, सूर सकल सुख पावत - ९ - १३३।
तने का ऊपरी भाग जहाँ से शाखाएँ फूटती हैं।
गले और मोढ़े के बीच का भाग।
कहो कपि कैसे उतरयौ पार। दुस्तर अति गंभीर बारिनिधि सत जोजन बिस्तार। राम प्रताप सत्य सीता को यहै नाव कंधार। बिन अधार छन में अवलंघयौ आवत भई न बार - ९ - ८७।
मैं तौ स्याम-स्याम कै टेरैति कालिंदी के करार - २७६९।
[सं. कराल-ऊँचा। हिं. कट=करना+सं. आर=किनारा]
कर्कश स्वर करता है, (कौवा) काँ काँ बोलता है।
कुँवरि ग्रसित श्री खंड अहि भ्रम चरन सिलीमुख लाग। बानी मधुर जानि पिक बोलत कदम करारत काग - १८२६।
कर्कश शब्द करना, कौए का काँ काँ बोलना।
कराते हैं, करने में प्रवृत्त करते हैं।
सूरदास संगति करि तिनकी, जे हरि सुरति करावत - १ - १७।
तुमसौं कपट करावति प्रभु जू , मेरी बुद्धि भरमावै - १ - ४२।
[हिं. कराना (‘करना’ का प्रे.)]
सूरदास स्वामी तिहिं अवसर पुनि-पुनि प्रगट करावते - २७३५।
कराने के लिए, संपादित करने के उद्देश्य से।
पूतना पयपान करावन प्रेम-सहित चलि आई - सारा. ७४६।
कराओ, करने को प्रवृत्त करो।
तुब मुख-चंद्र, चकोर-दृग, मधुपान करावहु - १० - २३२।
कराता है, करवाये या करवावै।
असरन-सरन सूर जाँचत है, को अब सुरति करावै - १ - १७।
[हिं. ‘करना' का प्रे. रूप]
करो, करवाओ, करने को प्रवृत्त करो।
अरी, मेरे लालन की आजु बरष-गाँठि, सबै सखिनि कौं बुलाई मंगल-गान करावौ - १० - ९५।
पीड़ा या कसक सूचक दुखभरा शब्द।
सारंग स्यामहिं, सुरति कराई। पौढ़े होंहि जहाँ नँदनंदन ऊँचे टेर सुनाइ। गए ग्रीषम पावस रितु आई सब काहू चित चाइ। तुम बिनु ब्रजबासी यौं जीवैं ज्यौं करिया बिनु नाइ - २८४४।
पतवार या कलवारी थामने वाला।
या देही कौ गरब न करियै, स्यार काग, गिद्ध खैहैं - १ - ८६।
बंधू, करियौ राज सँभारे। राजनीति अरु गुरु की सेवा गाइ-बिप्र प्रतिपारे - ९ - ५४।
पीड़ा या कसक सूचक शब्द करना, आह-आह या हाय-हाय करना।
(इच्छा आदि) पूर्ण करें, करावें।
यह लालसा अधिक मेरैं जिय, जो जगदीस कराहिं। मो देखत कान्हा यहि आँगन, पग द्वै धरनि धराहिं—१० - ७५।
घरी इक सजन-कुटुंब मिलि बैठैं, रुदन बिलाप कराहीं - १ - ३१९।
बकी कपट करि मारन आई, सो हरि जू बैकुंठ पठाई - १ - ३।
सुन्दर गऊ रूप हरि कीन्हौ। बछरा करि ब्रह्मा संग लीन्हौं–७ - ७।
तैं कैकई कुमंत्र कियौं। अपने कर करि काल हँकारयौ, हठ करि नृप अपराध लियौ - ९ - ४८।
बाला बिरह दुसह सबहीं कौं जान्यौ राजकुमार। बान बृष्टि स्रोनित करि सरिता, ब्याहत लगी न बार–९–१२४।
जिनका मुँह हाथी का सा है, गणेश।
(क) अब यह बिथा दूरि करिबे कौं और न समरथ कोई - १ - ११८। (ख) सूर सु भुजा समेत सुदरसन देखि बिंरचि भ्रम्यौ। मानौ आन सृष्टि करिबे कौ, अंबुज नाभि जम्यौ - १ - २७३। (ग) थकित बिलोकि सारदा बर्नन करिबे बहुत प्रसंग –सारा. ९९६।
रचने (को), बनाने (के लिए)
दियो बरदान सृष्टि करिबे को अस्तुति करि प्रमान–सारा. ५२।
सूर सुकमलन के बिछुरे झूठो सब जतननि को करिबो - २८६०।
सूधी निपट देखियत तुमकौं तातैं करियत साथ। –६७४।
उपमा काहि देऊँ, को लायक, मन्मथ कोटिं वारने करिया - ६८८।
पतित-पावन-बिरद् साँच कौन भाँति करिहौ - १ - १२४।
स्रुति पढ़िकै तुम नहिं उद्धरिहौ, बिद्या बेंचि जीविका करिहौ–४ - ५।
(क) ऐसी को करी अरु भक्त काजैं। जैसी जगदीस जिय धरी लाजैं—१ - ५। (ख) अबलौं ऐसी नाहीं सुनी। जैसी करी नंद के नंदन अद्भुत बात गुनी - सा. १०४। उ. - पावक जठर जरन नहिं दीन्हौ, कंचन सी मम देह करी - १ - ११६।
पाइ पियादे धाइ ग्रह सौं लीन्हौ राखि करी - १ - १६।
(क) अब मोपै प्रभु कृपा करीजै। भक्ति अनन्य आपुनी दीजै ३ - १३। (ख) साधु-संग प्रभु मोकौँ दीजै। तिहि संगति निज भक्ति करीजै - ७ - २।
एक तरह की झाड़ी जिसमें पत्तियाँ नहीं होतीं, केवल गहरे हरे रंग की पतली-पतली डंठले फूटती हैं। ब्रज में करील बहुत होते हैं। इसका फल कसैला होता है जिसे टेंटी कहते हैं।
जिहिँ मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ, क्यौं करीलफल भावै - १ - १६८।
गोबर जो जंगलों में पड़े-पड़े सूख जाता है और जलाने के काम आता है।
सूर बुलाइ पूतना सौं कह्यौ, करु न बिलम्ब घरी - १० - ४८।
करिहाँ, करिहाँउँ, करिहाँव, करिहैंयाँ
करेंगे, निबटाएँगे, संपादित करेंगे।
काके हित श्रीपति ह्याँ ऐहैं, संकट रच्छा करिहैं ? - १ - २९।
(नंद जू) आदि जोतिषी तुम्हारे घर कौ पुत्र-जन्म सुनि आयौ। लगन सोधि सब जोतिष गनिकै, चाहत तुम्हहिं सुनायौ। …..। ऊँच-नीच जुवती बहु करिहैं, सतएँ राहु परे हैं - १० - ८६।
जो घट अंतर हरि सुमिरै। ताकौ काल रूठि का करिहै, जो चित चरन धरै - १ - ८२।
उ. - तैं हूँ जो हरि-हित तप करिहै। सकल मनोरथ तेरौ पुरिहै - ४ - ९।
पुनि हरि चाहै, करिहै सोइ - ७ - २।
बहुत दयालु, करुणानिधि, करुणा की खानि।
नरहरि रूप धरयौ करुनाकर छिनक माहिं उर नखनि बिदारयौ - १ - १४।
जिसका हृदय दया से युक्त हो, दयालु।
जिसका हृदय दया से भरा हो, दयालु, करुणा से युक्त।
जिसका हृदय करुणा से भरा हो, दयालु।
ध्रुव बिमाता-बचन सुनि रिसायौ। दीन के द्याल गोपाल, करुनामयी मातु सौं सुनि, तुरत सरन आयौ - ४ - १०।
थक्यौ बीच बिहाल, बिहवल, सुनौ करुनामूल - १ - ९९।
दया की नदी, जिसके हृदय में करुणा की धारा-सी प्रवाहित हो, अत्यंत दयालु।
पारथ-तिय कुरुराज सभा मैं बोलि करन चहै नंगी। स्रवन सुनत करुनासरिता भए, बढ़यौ बसन उमंगी - १ - २१।
दया के समुद्र, बड़े दयालु।
करुणा का समुद्र, जिसकी करुणा का भाव समुद्र के समान अथाह हो, अत्यंत दयालु।
दुखी का दुख दूर करने के लिए अंत:करण की प्रेरण, दया।
कछुक करुना करि जसोदा करति निपट निहोर। सूर स्याम त्रिलोक की निधि, भलैंहि माखन चोर–३६४।
करुना करति मँदोदरि रानी। चौदह सहस सुंदरी उमहीं, उठे न कंत महाअभिमानी - ९ - १६०।
कहि राधा किन हार चोरायो। ब्रजजुवतिन सबहीं मैं जानति घर घर लै लै नाम बतायौ। ......। रत्ना कुमुदा मोहा करुना ललना लोभा नूप - १५८०।
सुंदर नंद महर के मंदिर प्रगट्यौ पूत सकल सुख कंदर - १० - ३२।
(क) कहन लगे सब अपुनमें सुरभी चरै अघाइ। मानहुँ पर्वतकंदरा, मुख सब गए समाइ - ४३१। (ख) स्याम बलराम गये धनुषसाला। लियौ रथ तें उतरि रजक मारयौ जहाँ कंदरा तें निकसि सिंह-बाला - २५८५।
ब्रज का एक तीर्थ। श्री कृष्ण यहाँ गेंद खेलते थे; अतएव उनके उपासकों के लिए यह दर्शनीय स्थान है।
[हिं. काँदौ+ला (प्रत्य.)]
कडुवा लगने पर मुँह बनाना।
जिसका स्वाद कडुआपन लिए हुए हो, कडुई।
(क) सुनत जोग लागत हमैं ऐसौ ज्यों करुई ककरी - ३३६०। (ख) फलन माँझ ज्यों करुई तोमरि रहत घुरे पर डारी। अब तौ हाथ परी जंत्री के बाजत राग दुलारी - २९३५।
सूरदास प्रभु त्रिय मिली, नैन प्रान सुख भयौ चितए करुखिअनि अनकनि दिये - २०६९।
(क) जब तैं ब्रज अवतार धरयौ इन, कोउ नहिं घात करैया–४२८। (ख) तुमसौं टहल करावति निसिदिन, और न टहल करैया - ५१३।
एक दिना हरि लई करोटी सुनि हरषीं नँदरानी। बिप्र बुलाइ स्वस्तिवाचन करि रोहिनि नैन सिरानी - सारा. ४२१।
एक संख्या जो सौ लाख के बराबर होती है।
वै अति चतुर प्रबीन कहा कहौं जिनि पठई तोको बहरावन। सूरदास प्रभु जिय की होनी की जानति काँच करोती में जल जैसे ऐसे तू लागी प्रगटावन – २२०४।
कड़ीचोटें, थपेड़े, प्रहार।
सूर रसिक बिन को जीवति है निर्गुन कठिन करेरन - ३२७७।
एक कँटीली बेल जिससे परबल के बराबर फल लगते हैं जो खाने में बहुत कड़ुए होते हैं।
एक बेल जिसमें गुल्ली की तरह लंबे हरे-हरे कडुए फल लगते हैं जो तरकारी के काम आते हैं।
बने बनाइ करेला कीने। लोन लगाइ तुरत तलि लीने - २३२१।
छोटे-छोटे जंगली करेले जो बहुत कड़ुए होते हैं।
हरद अच्छत दूब दधि लै तिलक करैं ब्रजबाल - १० - २६।
सूरदास जसुदा कौ नंदन जो कछु करै सो थोरी - १० - २९३।
पद देता है, बनता है, पद पर प्रतिष्ठित करता है।
उग्रसेन की आपदा सुनि सुनि बिलखावै। कंस मारि, राजा करै, आपहु सिर नावै - १ - ४।
करेगा, काम चलाएगा, संपादित करेगा।
(क) जब जम जाल-पसार परैगौ, हरि बिनु कौन करैगौ धरहरि - १ - ३१२। (ख) बदन दुराइ बैठि मंदिर में बहुरि निसापति उदय करैगो - २८७०।
कड़ुआ लगने का सा मुँह बनाते हैं।
षटरस के परकार जहाँ लगि लै लै अधर छुवावत। बिस्संभर जगदीस जगतगुरु, परसत मुख करुवावत - १० - ८९।
अप्रिय, चुभने वाले, जो भला न लगे।
करुवौ बचन स्रवन सुनि मेरौ, अति रिस गही भुवाल - ९ - १०४।
सज्जा पृथ्वी करी बिस्तार। गृह गिरि-कंदर करे अपार - २ - २०
मैं तो जे हरे हैं ते तौ सोवत परे हैं, ये करे हैं कौनैं आन, अँगुरीनि दंत दै रह्यौ–४८४।
अबकै जब हम दरस पावैं देहिं लाख करोर – ३३८३।
कंचन की पिचकारी छूटति छिरकति ज्यौं सचु पावै गोरी। अतिहि ग्वाल दधि गोरस माते गारी देत कहौ न करोरी - २४३६।
(क) लाल निठुर ह्वै बैठि रहे। प्यारी हा हा करति न मानत पुनि पुनि चरन गहे। नहिं बोलत नहिं चितवत मुख तन धरनी नखन करोवत- पृ० ३१२। (ख) मैं जानी पिय मन की बात। धरनी पग नख कहा करोवत अब सीखे ए घात – २०००।
नीची दृष्टि करी धरनी नखनि करोवति एहो पिया तब हौं एक एक घूँघट तन चितै रही आहि कहा हो करो अब सोऊ - २२४०।
संपादित करूँ, पूर्ण करूँ।
रसना एक अनेक स्याम-गुन कहँ लगि करौं बखानौं – १ - ११।
रचूँ, बनाऊँ, निर्माण करूँ।
एक छोटा सुंदर फल जो कुछ सफेद और कुछ लाल होता है। इसका स्वाद खट्टा होता है और यह अचार-चटनी के काम आता है।
[सं. करमर्द्द, पा. करमद्द, पुं. हिं. करवँद]
हल्की स्याही लिये हुए लाल रंग का।
बनाओ, स्वीकार करो, प्रतिष्ठित करो।
अब तुम बिस्वरूप गुरु करौ। ता प्रसाद या दुख कौं तरौ - ६ - ५।
बनाओ, रचाओ, जन्माओ, पैदा करो।
माधौ मोहिं करौ बृंदावन रेनु जिहिं चरननि डोलत नँदनंदन दिनप्रति बन-बन चारत धेनु - ४८९।
सूर राधिका कहत सखिन सौं बहुरि आइ घर काज करौगी - १२८९।
काँच का छोटा पात्र या बरतन, शीशी।
(क) जाहीं सो लगत नैन, ताही खगत बैन, नख सिख लौं सब गात ग्रसति। जाके रँग राँचे हरि सोइ है अतरं संग, काँच की करौती के जल ज्यौं लसति। (ख) वे अति चतुर प्रबीन कहा कहौं जिन पठई तो को बहराबन। सूरदास प्रभुजी की होनी की जानति काँच करौती में जल जैसे ऐसे तू लागी प्रगटावन।
हाँक या हकवा देनेवाला, शिकारी।
बारह राशियों में से चौथी राशि।
झगड़ा करनेवाली, कटु या कठोर बोलनेवाली।
कुंती का सबसे बड़ा पुत्र जो उसके कन्याकाल में सूर्य से उत्पन्न हुआ था।
अद्भुत राम-नाम के अंक। जनममरन-काटन कौं कर्तरि तीछन बहु बिख्यात - १ - ९०।
जो (बात, शब्द या अक्षर) सुनने में कटु या अप्रिय लगे।
बालकों के कान छेदने का संस्कार, कनछेदन।
एक राग जो मेघ राग का दूसरा पुत्र माना जाता है और जो रात के पहले पहर में गाया जाता है।
एक रागिनी जो मालवा या दीपक राग की पत्नी मानी जाती है और रात में दूसरे पहर की दूसरी घड़ी में गायी जाती है।
मुरली बजाऊ रिझाऊँ गिरिधर गाऊँ न आज सुनाऊँ। तेइ तेइ तान तुम सी गीत गावत जेइ कर्णाटी गौरी मैं गाय सुनाऊँ - पृ. ३११।
चादर या दुपट्टा जो कंधे पर डाला जाय।
[हिं. कंधा+आवर (प्रत्य.)]
साड़ी का वह भाग जो स्त्रियां कंधे पर डालती हैं।
[हिं. कंधा+एला (प्रत्य.)]
क्रृपासिंधु पै केवट आयौ, कंपत करत सो बात। चरन-परसि पाषान उड़त है, कत बेरी उड़ि जात - ९ - ४१।
हा हा करति लि घोष कुमारि। सीत तें तन कँपत थर-थर बसन देहु मुरारि. - ७८९।
थर- थर अंग कपतिँ सुकुमारी - ७९९।
असी-इक कर्म बिप्र कौ लियौ। रिषभ ज्ञान सबही कौ दियौ - ५ - २।
[सं. कर्मन् का प्रथमा रूप]
कर्तव्यमूढ़, कर्तव्यविमूढ़
घबड़ाहट के कारण जो कार्य को न समझ सके।
हर्त्ता-कर्त्ता आपै सोइ। घट-घट ब्यापि रह्यौ है जोइ– ७ - २।
[सं. ‘कर्तृ' की प्रथमा का एक.]
[सं. ‘कर्तृ' की प्रथमा का एक.]
[सं. ‘कर्तृ' की प्रथमा का एक.]
[सं. ‘कर्तृ' की प्रथमा का एक.]
[सं. ‘कर्तृ' की प्रथमा का बहु.]
[सं. ‘कर्तृ' की प्रथमा का बहु.]
सूर्य का एक पुत्र, छाया से उत्पन्न होने के कारण जिनका ‘कर्दम' नाम पड़ा। इसकी पत्नी का नाम देवहूति और पुत्र का कपिलदेव था।
दच्छ प्रजापति कौं इक दई। इक रुचि, इक कर्दम-तिय भई। कर्दम कैं भयौ कपिलऽवतार–३ - १२।
रंग के आधार पर किये गये घोड़े के भेदों में एक।
भिखारी, भिखमंगा जो गूदड़ पहने-ओढ़े।
[सं. हिं. कर्पद=चिथड़ा=गुदड़ा]
विहित और निषिद्ध कार्य जिनका फल जाति, आयु और भोग माने जाते हैं।
[सं. कर्मन् का प्रथमा रूप]
वह कार्य या क्रिया जिसका करना कर्तव्य है।
[सं. कर्मन् का प्रथमा रूप]
(क) पग पग परत कर्म-तम-कूपहिं, को करि कृपा बचावै–१ - ४८। (ख) जाकौं नाम लेत भ्रम छूटै, कर्म-फंद सब काटे– ३४६।
[सं. कर्मन् का प्रथमा रूप]
मृत-संस्कार, क्रिया-कर्म।
जब तनु तज्यौ गीध रघुपति तब कर्म बहुत बिधि कीनी। जान्यौ सखा राय दशरथ कौ तुरतहिं निज गति दीनी। (६) व्याकरण में दूसरा कारक।
[सं. कर्मन् का प्रथमा रूप]
यज्ञ तथा अन्य धर्म के काम।
वह शास्त्र या ग्रंथ जिसमें धर्म-कर्म की चर्चा हो।
यज्ञ आदि करानेवाला व्यक्ति।
वह स्थान जहाँ काम किया जाय।
संसार जहाँ कर्म करना पड़ता है।
काम करने में आनंद लेनेवाला, उद्योगी, कर्मठ।
कर्मों का, भाग्य, प्रारब्ध।
जैसोई बोइयैं तैसोइ लुनिऐ, कर्मन भोग अभागे - १ - ६९।
(क) मैं तौ राम-चरन चित दीन्हौं। मनसा, बाचा और कर्मना, बहुरि मिलन कौं आगम कीन्हौं - ९ - २। (ख) मनसा बाचा कहत कर्मना नृप कबहूँ न पतीजै–१० - ९। (ग) मनसि बचन अरु कर्मना कछु कहति नाहिंन राखि–३४७५।
कर्मनि की मोटी- अत्यंत भाग्यशालिनी, अच्छे कर्मों का सुख लूटने की अधिकारिणी। उ - दोउ भैया मैया पै माँगत, दै री मैया माखन-रोटी।.........। सूरदास मन मुदित जसोदा, भाग बड़े, कर्मनि की मोटी - १० - १६५।
धर्म-कर्म तथा संध्या, अग्निहोत्र- आदि में निष्ठा रखनेवाला।
पूर्व जन्म के कर्मों का फल भोगना।
जो कहौ कर्मभोग जब करिहैं, तब ये जीव सकल निस्तरिहैं। –७ - २।
चित्त की शुद्धि के लिए किए जानेवाले शास्त्र-सम्मत कर्म।
(क) कर्म योग पुनि ज्ञान उपासन सबही भ्रम भरमायौ। श्री बल्लभ गुरु तत्व सुनायौ लीला भेद बतायौ–सारा. ११ ०२। (ख) तपसी तुमको तप करि पावै। सुनि भागवत गुही गुन गावै। कर्मयोग करि सेवत कोई। ज्यौं सेवै त्योंही गति होई - १० उ - १२७।
काम के लिए नियुक्त, काम करनेवाला।
किसी विभाग में काम करनेवाला।
किये हुए पाप-पुण्य से उत्पन्न।
वह मनुष्य जो नियमित रूप से धर्म-कर्म करे।
[सं. कर्णन् का तृतीय एक.]
काम करनेवाली इंद्रियाँ। ये पाँच हैं-हाथ, पैर, वाणी, गुदा और उपस्थ।
द्रुपद सुता की तुम पति राखी अंबर-दान करयौ - १ - १३३।
कर्म के फल की चाह न करना।
जिसके सामने कर्म किया गया हो।
वे नौ देवता–सूर्य, चन्द्र, यम, काल,पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश–जो प्राणी को कर्म करते देखते रहते हैं।
जो शुभ कर्म करने में समर्थ न हो।
मंदमति हम कर्म हीनी दोष काहि लगाइए। प्रानपति सौं नेह बाँध्यौ कर्म लिख्यौ सो पाइए।
जज्ञ करत बैरोचन कौ सुत, बेद-बिहित-बिधि-कर्मा। सो छलि बाँधि पताल पठायौ, कौन कृपानिधि धर्मा - १ - १०४।
कर्म में आनंद लेनेवाला, कर्मण्य, कर्मनिष्ठ।
कर्म के फल की इच्छा करनेवाला।
सिद्धि-असिद्धि को समान समझ कर कर्म करना।
भाग्य का लेखा, तकदीर का लिखा।
वाको न्याउ दोष सब हमको कर्मरेख को जानै। गोरस देखि जो राख्यौ गाह्क बिधिना की गति आनै—३४४१।
चित्त की शुद्धि के लिए किया जानेवाला शास्त्रसम्मत कर्म।
कर्मवाद थापन को प्रगटे पृश्निगर्भ अवतार। सुधापान दीन्हो सुरगन को भयौ जग जस बिस्तार–३२१।
कर्म को प्रधान माननेवाला।
शास्त्रसस्मत कर्म नियमित रूप से करनेवाला।
पूर्वजन्म के कर्मों का भलाबुरा फल।
सिद्धि-असिद्धि को समान समझ कर कर्म करनेवाला।
कलि के आदि अंत कृतयुग के है कलँकी अवतार - सारा. ३२०।
खेमें का अँकुड़ा जिस पर रेशम या कपड़ा लिपटा रहता है।
(क) पलित केस, कफ कंठ बिरुध्यौ, कल न परति दिन-राती - १ - ११८। (ख) डेढ़ ल ल कल लेत नाही प्रान प्रीतम प्रान - सा. २१। (ग) जसुमति बिकल भई छिन कल ना। लेहु उठाई पूतना-उर तैं, मेरौ सुभग साँवरो ललना - १० - ५४। (घ) एक बार कुलदेवी पूजत भयो दरस सखि मोहिं। ता दिन ते छिन कुल न परत है सत्य कहत हौं तोहिं। - सारा,२२१।
अरुन अधर छवि दास बिराजत। जब गावत कल मंदन– ४७६।
बहेलियों की बाँस की पतली तीलियाँ जिनमें लासा लगाकर वे चिड़ियों को फँसाते हैं।
हिलाते हो, हिलाकर धमकाते हो।
तुम्हरे डर हम डरपत नाहिंन कहा कॅंपावत बेत - सारा. ८६२।
मनौ मेघनायक रितु- पावस, बान वृष्टि करि सैन कँपायौ - ९ - १४१।
मो देखत मो दास दुखित भयौ, यह वलंक हौं कहाँ गॅंवैहौं– ७०५।
हरि करिहैं कलंक अवतार - १२.३।
यों होइहै कलंकि अवतार - १२ - ३।
का पटतरयौ चंद्र कलंकी घटत बढ़त दिन लाज लजाई - २२२७।
[सं. कल्य—प्रत्यूष, प्रभात]
[सं. कल्य—प्रत्यूष, प्रभात]
[सं. कल्य—प्रत्यूष, प्रभात]
राधे आज मदनमद माती। सोहत सुन्दर संग स्याम के खरचत कोट काम कल थाती—सा. ५०।
सुंदर, मधुर या कोमल ध्वनि।
विशेष ज्ञान प्राप्त करना।
‘काला' का संक्षिप्त रूप जो यौगिक शब्दों के शुरू में जुड़ता है।
राँगे का लेप जिसके चढ़ाने से बरतन में रखी हुई चीजें कसाती नहीं, मुलम्मा।
वह लेप जो किसी वस्तु पर रंग चढ़ाने के लिए लगाया जाय।
कलई आई उघरि- कलई खुल गयी, सच्चा रूप सामने आ गया, वास्तविकता ज्ञात हो गयी। उ. - (क) कीन्ही प्रीति पुहुप शुंडा की अपने काज के कामी। तिनको कौन परैखो कीजै जे हैं गरुड़ के गामी। आई उघरि प्रीति कलई सी जैसी खाटी आमी - ३०८०। (ख) देखो माधौ की मित्राई। आई उघरि कनक कलई सी दै निज गये दगाई - २७१८।
जिसका स्वर मीठा, कोमल या सुंदर हो।
जल के गिरने या बहने का शब्द।
नारी गारी बिनु नहिं बोलै पूत करै कलकानी। घर में आदर कादर कोसौं सीझत रैनि बिहानी।
मधुर या कोमल ध्वनि करनेवाली।
विलाप करता है, विलखता है, दुखी होता है।
प्रभु तेरौ बचन भरोसौ साँचौ। पोषन भरन बिसंभर साहब जो कलपै सो काँचौ - १ - ३२।
(क) अलप दसन, कलबल करि बोलनि, बुधि नहिं परत बिचारी। बिकसित ज्योति अधर-बिच, मानौ बिधु मैं बिज्जु उज्यारी - १० - ६१। (ख) स्याम करत माता सौं, झगरौ, अटपटात कलबल करि बोल - १० - ६४। (ग) गहि मनि-खंभ डिंभ डग डोलैं। कलबल बचन तोतरे बोलैं - १० - ११७।
लगे हुलसन मेघ मंगल भरे बिथक सजोर। करन चाहत राख रोके काम कलबल छोर - सा. ६१।
किसी पेड़-पौधे की वह मुलायम और नयी टहनी जो दूसरी जगह या पेड़ में लगाने के लिए काटी जाय।
वह पौधा जो कलम से तैयार हो।
अंग या शरीर का इधर-उधर हिलना-डोलना।
शरीर के अंग इधर - उधर हिलते - डोलते हैं, कुलबुलाते हैं।
कौन कौन की दसा कहौं सुन सब ब्रज तिनते पर। निसि दिन कलमलात सुन सजनी सिर पर गाजत मदन अर–२७६४।
दुखी होना, सोचना, खिन्न होकर विचारना।
ब्रह्मादिक सनकादि महामुनि, कलपत दोउ कर जोर। बृन्दाबन ए तृन न भये हम लगत चरन के छोर–४७७।
एक वृक्ष जो समुद्र से निकले चौदह रत्नों में माना जाता है और जो सभी इच्छाएँ पूरी करता है।
सूरदास यह सब हित हरि को रोप्यौ द्वार सुभगति कलपतर - १० उ. - ७०।
[सं. कल्पना=(दुख की) उद्भावना करना]
[सं. कल्पना=(दुख की) उद्भावना करना]
उद्भावना, अनुमान, कल्पना।
जौ पै यहै बिचार परी। तौ कत कलि-कल्मष लूटन कौं, मेरी देह धरी - १ - २११।
इसलाम के मूलमंत्र का वाक्य।
नूपुर-कलरव मनु हंसनि सुत रचे नीड़, दै बाछँ बसाए - १० - १०४।
[सं. कल्यपाल, प्रा. कल्लवाल]
कनक कलश कुच प्रगट देखियत आनँद कंचुकि भूली २५६१।
मंदिर-महल आदि का शिखर या कँगूरा।
ऊँचे मंदिर कौन काम के, कनक-कलस जो चढ़ाए। भक्त-भवन मैं हौं जु बसत हौं, जद्यपि तृन करि छाए - १ - २४३।
हरि पर सर सरबर पर कलसा कलसा पर ससि भान - २१९१।
हिलाता-डुलाता (है), कपित करता (है)।
मुँह सम्हारि तू बोलत नाहीं, कहत बराबरि बात। पावहुगे अपनौ कियौ अबहीं, रिसनि कॅंपावत गात - ५३७।
[हिं, कँपना’ का प्रे. कॅंपना]
काँपता हुआ, अस्थिर, चलायमान।
छोभित सिंधु, सेष सिर कंपित, पवन भयौ गति पंग - ९ - १५८।
काँपता या हिलता डोलता है।
(क) कंपै भुव, बर्षा नहिं होइ - १ - २८६।,
(ख) कर कंपै, कंकन नहिं छूटै - ६ - २५।
(ग) जसुदा मदन गुपाल सुवावै। देखि सपन - गति त्रिभुवन कंपै, ईस विरंचि भ्रमावै - १० - ६५।
रिपिन कह्यौ, तुव सतम जज्ञ आरम्भ लखि, इन्द्र कौ राज-हित कॅंप्यौ हीयौ–४ - ११।
ऊन का बना मोटा कपड़ा जो ओढ़ने-बिछाने के काम आता है।
कंबु- कंठधर, कौस्तुभ- मनि-धर, वनमालाधर, मुक्तमाल-धर - ५७२।
मंदिर का छोटा शिखर या कँगूरा।
(क) काहे कौं कलह नाध्यौ, दारुन दाँवरि बाँध्यौ, कठिन लकुट लै तैं त्रास्यौ मेरैं भैया - ३७२। (ख) सुनत स्याम कोकिल सभ बानी निकसे अति अतुराई (हो)। माता सौं कछु करत कलह हे रिस डारी बिसराई (हो) - ७००।
निरखि नैन रसरीति रजनि रुचि काम कटक फिरि कलह मच्यौ - पृ० ३५० (६७)।
[सं. कलह+हिं. कारी (स्त्री.)]
कलहनी-पति-पिता-पुत्री तकत बनत न आज। कौन जानत रहे यह बिनु संभवन को काज - सा. ३८।
[सं. कलहिनी=(शनि की स्त्री का नाम)+ पति (कलहिनी का पति=शनि) + पिता (शनि का पिता=सूर्य) + पुत्री (सूर्य की पुत्री= यमुना)]
वह नायिका जो पहले तो नायक का तिरस्कार करे, फिर पछताने लगे।
कोक-कला वितपन्न भई हौ कान्हरूप तनु आधा - १४३७।
अग्निमंडल के दस भागों में एक।
करतूत, करनी, कौतुक, लीला (व्यंगात्मक)।
माधौ, नेकु हटकौ गाइ। ….। छहौं रस जौ धरौं आगैं, तउ न गंध सुहाइ। और अहित अभच्छ भच्छति कला बरनि न जाइ - १ - ५६।
(क) अब मैं नाच्यौ बहुत गुपाल। •••••। माया कौं कटि फेंटा बाँध्यौ, लोभ तिलक दियौ भाल। कोटिक कला काछि दिखराई जल-थल सुधि नहिं कालः - १ - १५३। (ख) ना हरि भक्ति, न साधु समागम, रह्यौ बीच ही लटकैं। ज्यौं बहु कला काछि दिखरावै, लोभ न छूटत नट कैं - १ - २९२।
(ग) अज, अबिनासी अमर प्रभु जनमै मरै न सोइ। नट वत करत कला सकल बूझै बिरला कोइ - २ - ३६।
रचि-प्रचि सोंचि सँवारि सकल अँग चतुर चतुराई ठानी। दृष्टि न दई रोम रोमनि प्रति इतनहिं कला नसानी - १३२१।
रहेउ दुष्ट पचिहार दुसासन कछू न कला चलाई - सारा. ७६९।
हथेली से जुड़ा हुआ हाथ का भाग, मणिबंध, गट्टा, पहुँचा।
हाथी की गर्दन का वह भाग जहाँ महावत बैठता है, कलावा, किलावा।
कलहा, कुही, मूष रोगी अरु काहूँ नैंकु न भावै - १ - १८६।
वह हास जिसमें कोमल ध्वनि हो।
एक प्राचीन बाजा जिसपर चमड़ा चढ़ा रहता था।
धनुष कलास सही सब सिखि कै भई सयानी गानति। सूर सुन्दरी आपुही कहा तू सर संधानति - २९५१।
एक पर्वत जिससे जमुना नदी निकलती है।
उर कलिंद ते धँसि जल धारा उदर धरनि परबाह। जाति चली धारा ह्वै अध कौं, नाभी हृद अवगाह - ६३७।
कलिंद पर्वत से निकलने वाली जमुना नदी।
कलियुग, चार युगों में चौथा युग, इसमें ४३२००० वर्ष होते हैं। ईसा के ३१०२ वर्ष पूर्व से इसका आरम्भ माना जाता है। प्राच्य पौराणिक विचारानुसार अधर्म और पाप की इस युग में प्रधानता रहती है।
बिना खिला फूल, बोंडी, कलिका।
जानु जंघ त्रिभंग सुंदर कलित कंचन दंड–१ - ३०७।
अँकुरित तरु पात,उकठि रहे जे गात, बनबेलि प्रफुलित कलिनि कहर के - १० - ३०।
यह भव-जल कलिमलहिं गहे हैं, बोरत सहस प्रकारौ। सूरदास पतितनि के संगी, बिरदहिं नाथ सम्हारो - १ - २०९।
कलियाँ निकलना, कलियों से युक्त होना।
मथुरा का अत्याचारी राजा जो उग्रसेन का पुत्र और श्रीकृष्ण का मामा था। इसने अपनी बहिन देवकी को पति-सहित जेल में डाल रखा था। इसके अत्याचार से जब त्राहि-त्राहि मच गयी तब श्रीकृष्ण ने इसे मार कर अपने माता-पिता का उद्धार किया और नाना उग्रसेन को गद्दी पर बैठाया।
कंसताल कठताल बजावत सृंग मधुर मुँहचंग।
मथुरा का अत्याचारी राजा जो अपने अत्याचारों के कारण असुर समझा जाता था।
बुद्धि या चित्त का विकार, दोष।
असरन-सरन नाम तुम्हारौ, हौं कामी, कुटिल निमाउँ। कलुषी अरु मन मलिन बहुत मैं सेंत-मेंत न बिकाउँ - १ - १२८।
(क) प्रभु, मोहिं राखियै इहिं ठौर। केस गहत कलेस पाऊँ, करि दुसासन जोर - १ - २५३। (ख) जलपति-भूषन उदित होत ही पारत कठिन कलेस - सा. २७। (ग) सूर स्याम सुजान संग ह्वै चली बिगत कलेस–सा. ५६।
अजहूँ कह्यौ मानि री मानिनि उठि चलि मिलि पिय को जिय लैहै। सूर मान गाढ़ो त्रिय कीन्हो, कहै बात कोउ कोटि कलै - २२१०।
वह गाय जो बरदाई या ब्याई न हो।
आमोद-प्रमोद, क्रीड़ा, आनन्द।
(क) बिद्याधर-किन्नर कलोल मन उपजावत मिलि कंठ अमित गति - १० - ६। (ख) मिलि नाचत, करत, कलोल, छिरकत हरद दही। मनु बरषत भादौं मास, नदी घृत दूध दही –१० २४। (ग) दोउ कपोल गहि कै मुख चूमति, बरष-दिवस कहि करति किलोल - १० - ९४।
आनंद करना, मौज उड़ाना, क्रीड़ा या विहार करना।
इन द्योसनि रूसनो करति हौ करिहौ कबहिं कलोलै - २२७५।
[हिं. काला+औंस (प्रत्य.)]
(क) करि मनुहारि कलेऊ दीन्हौ, मुख चुपरयौ अरु चोटी - १० - १६३। (ख) उठिए स्याम कलेऊ कीजै - १० - २११। (ग) तिनहिं कह्यो तुम स्नान करौ ह्याँ हमहिं कलेऊ देहु - २५५३। (घ) चारो भ्रात मिल करत कलेऊ मधु मेवा पकवान - सारा. १७१।
चरचित चंदन, नील कलेवर, बरषत बूँदनि सावन - ८ - १३।
प्रातः काल का हल्का भोजन, जलपान।
कमल नैन हरि करौ कलेवा। माखन-रोटी, सद्य जम्यौ दधि भाँति-भाँति के मेवा– १०.२१२।
[सं. कल्यवर्त्त, प्रा. कल्लवट्ट]
यात्रा के लिए साथ लिया हुआ भोजन, पाथेय, संबल।
[सं. कल्यवर्त्त, प्रा. कल्लवट्ट]
विवाह के दूसरे दिन वर का सखाओं सहित ससुराल जाकर भोजन करने की प्रथा, खिचड़ी, बासी।
[सं. कल्यवर्त्त, प्रा. कल्लवट्ट]
विष्णु के दसवें अवतार का नाम जो संभल (मुरादाबाद) में एक कुमारी कन्या के गर्भ से होगा।
बासुदेव सोई भयौ, बुद्ध भयो पुनि सोइ। सोई कल्की होइहै, और न द्वितिया कोइ - २ - ३६।
काल का एक विभाग जो ४ अरब ३२ करोड़ वर्ष का होता है और ब्रह्मा का एक दिन कहलाता है।
एक वृक्ष जो समुद्र से निकले चौदह रत्नों में गिना जाता है। प्राणी की इच्छा पूरी करने के लिए यह प्रसिद्ध है।
तेरे चरन सरन त्रिभुवनपति मेटि कल्प तू होहि कल्पतरु - २२६६।
एक वृक्ष जो समुद्र से निकले चौदह रत्नों में माना जाता है।
जौ मन कबहुँक हरि कौ जाँचै।......। निसि दिन स्याम सुमिरि जस गावै, कल्पन मेटि प्रेम रस माँचै - २ - ११।
जैसी जाकैं कल्पना तैसहि दोउ आए। सूर नगर नर-नारि के मन चित्त चोराए - २५७६।
एक वस्तु में अन्य का आरोप।
एक वृक्ष जिसकी गिनती समुद्र से निकले चौदह रत्नों में है। यह प्राणियों की इच्छा पूरी करता है और इसका नाश कभी नहीं होता।
रचा हुआ, निकला हुआ, उद्भूत।
चर-अचर-गति बिपरीत। सुनि बेनु-कल्पित गीत - ६२३।
एक राग जो श्रीराग का सातवाँ पुत्र माना जाता है और जो रात के पहले पहर में गाया जाता है।
सूरदास प्रभु मुरली धरे आवत राग कल्याण (कल्यान) बजावत - २३४७।
आपुनौ कल्यान करि लै, मानुषी तन पाइ–१ - ३१५।
एक राग जो रात के पहले पहर में गाया जाता है।
सूर स्याम अति सुजान गावत कल्यान तान सपत सुरन कल इते पर मुरलिका बरषी री - २३६२।
[सं. कड् या कल्= संज्ञाहीन होना]
[सं. कड् या कल्= संज्ञाहीन होना]
वह नदी जिसमें तरंग या लहरें हों।
[हिं. कड़ाह+ना (प्रत्य.)]
युद्ध में पहनने की लोहे की पोशाक, जिरहवकतर।
बीरा हार चीर चोली छबि सैना सजि सृङ्गार। परन बचन सल्लाह कवच दै जोरौ सूर अपार–१५९६।
तोहिं कवन मति रावन आई - ९ - ११७।
सुधाधर मुख पै रुखाई धौ कवन कह थाप–सा. ३६।
कंचन को मृग कवने देख्यौ किन बाँध्यौ गहि डोरी - ३०२८।
कबहूँ कवर खात मिरचन की लागी दसन टकोर। भाज चले तब गहे रोहिनी लाई बहुत निहोर–सारा. - ९०८।
(क) गति मराल अरु बिंब अधर छबि, अहि अनूप कवरी - ६ - ६३। (ख) अति सुदेस मृदु चिकुर हरत चित गूँथे सुमन रसालहिं। कवरी अति कमनीय सुभग सिर राजति गोरी बालहिं। (ग) सुंदर स्याम गही कवरी कर मुक्तामाल गही बलवीर - १० - १६१। (घ) अरुन नैनमुख सरद निसाकर कुसुम गलित कवरी - २१०६।
कविता करनेवाला, काव्य रचनेवाला।
लाल गोपाल बाल-छबि बरनत कविकुल करिहै हास री - १० - १३६।
एक प्रसिद्ध छन्द जिसमें ३१ अक्षर होते हैं।
दूसरे को दुखी देखकर स्वयं दुखी होना, सहानुभूति।
दर्द करता (है), सालता (है), टीसता (है)।
नाही कसकत मन, निरखि कोमल तन, तनिक से दधि काज, भली री तू मैया - ३७२।
जसुदा तोहिं बाँधि क्यों आयौ। कसक्यौ नाहिं नैकु मन तेरौ, यहै कोखि को जायौ–३७४।
कसने या बाँधने की डोरी, ररसी।
सूर प्रभु हँसत, अति प्रभु प्रीति उर में बसत इन्द्र को कसत हरि जग धाता।
[सं. कर्षण, प्रा. कस्सण]
[सं. कर्षण, प्रा. कस्सण]
[सं. कर्षण, प्रा. कस्सण]
[सं. कर्षण, प्रा. कस्सण]
बंधन खिंच जाना, जकड़ जाना।
कसैली वस्तु का पुट देने के लिए उसमें डुबोना।
आन देव की भक्ति-भाइ करि, कोटिक कसब करैगौ। सब वे दिवस चारि मनरंजन, अंत काल बिगरैगौ - १ - ७५।
अच्छी तरह बाँधकर, जकड़कर।
(क) तजौ बिरद के मोहिं उधारौ, सूर कहै कसि फेंट - १ - १४५ (ख) कसि कंचुकि, तिलक लिलार, सोभित हार हिये - १० - २४।
किरनि कटाक्ष बान बर साँधे भौंह कलंक समान कसी री - १८९८।
अब कछू हरि कसरि नाहीं, कत लगावत बार ? सूर प्रभु यह जानि पदवी, चलत बैलहिं आर - १ - १९९।
श्रीधर बाँभन करम कसाई। कह्यौ कंस सौं बचन सुनाई। प्रभु, मैं तुम्हरौ आज्ञाकारी। नंद-सुवन कौं आवौं मारी - १० - ५७।
खट्टी चीज का कसैला हो जाना।
भुना आटा जिसमें चीनी मिला दी गयी हो, पँजरी।
हाथ में पहनने का एक गहना, कड़ा, कंकण।
भुखमरा, गरीब, बहुत लालची।
छिगुनी, उँगली, छोटी उँगली।
जैसी तान तुम्हारे मुख की तैसिय मधुर उपाऊँ। जैसे फिरत रंध्र ममु कँगुरी तैसे मैंहुँ फिराऊँ - पृ. ३११।
राम दिन कइक ता ठौर अवरो रहे आइ वल्पवअ तहाँ दुई दिखाई - १० उ. - १८०।
हल्के हरे रंग की महीन वास जो जल या सील में होती है।
अब इह बरषा बीति गई।…..घटी घटा सब अभिन मोह मद तमिता तेज हई। सरिता संयम स्वच्छ सलिल जल फाटी काम कई - २८३३।
एक बेल जिसमें पतले-पतले पर लंबे फल लगते हैं।
[सं. कर्कटी, पा. कक्कड़ी]
एक बेल जिसमें धारीदार बड़े खरबूजे की तरह के फल लगते हैं और ‘फूट' कहलाते हैं।
[सं. कर्कटी, पा. कक्कड़ी]
हाथ का कॅंगूरेदार चूड़ीनुमा गहना।
एक पक्षी जिसके गाने से घोसले में आग लग जाती है और वह स्वयं जल मरता है।
एक तरह की लता जिसके फल मछलियों और कौओं के लिए मादक होते हैं।
कुसुम के फूलों के रंग में रँगा हुआ।
बाँधे हुए, जकड़कर बाँधे हुए।
अलख-अनंत-अपरिमित महिमा, कटि-तट कसे तूनीर - ९ - २६।
फूलकाँसे आदि के बरतन ढालने-बेचनेवाला।
[हिं. काँसा+एरा (प्रत्य.)]
परखने, जाँचनेवाला, पारखी।
जिसके स्वाद में कसैलापन हो।
[हिं. कसाव+ऐला (प्रत्य.)]
जिय अति डरयौ, मोहि मति सापै ब्याकुल बचन कहंत। मोंहिं बर दियौ सकल देवनि मिलि, नाम धरयौ हनुमंत - ९ - ८३।
जाँचक पैं जाँचक कह जाँचै, जौ जाँचै तौ रसनाहारी - १ - ३४।
कहने में, वर्णन करने में।
अबिगत गति कछु कहत न आवै। ज्यौं गूंगे मीठे फल कौ रस अंतरगत हीं भावै–१ - २।
[सं. कथन, प्रा. कहन, हिं. कहना]
जग जानत जदुनाथ जिते जन निज भुज स्रम सुख पायौ। ऐसौ को जु न सरन गहे तैं कहत सूरउतरायौ - १ - १५।
[सं. कथन, प्रा. कहन, हिं. कहना]
बकी जु गई घोष मैं छल करि, जसुदा की गति कीनी। और कहति स्रुति वृषभ व्याध की जैसी गति तुम कीनी - १ - १२२।
वर्णन करती, शब्दों में अभिप्राय बताती।
जो मेरी अखियनि रसना होती कहती रूप बनाइ री - १० - १३९।
बिहवल मति कहन गए, जोरे सब हाथा - ९ - ९६।
कहन सुनन को- केवल कहने भर को, नाम मात्र को। उ. - सतजुग लाख बरस की आइ। त्रेता दस सहस्र कहि गाइ। द्वापर सहस एक की भई। कलिजुग सत संबत रह गयी। सोऊ कहन सुनन कौं रही। कलि मरजाद जाइ नहिं कही - १ - २३०।
बोलना, अभिप्राय प्रकट करना।
कसौटी, सोना परखने का पत्थर।
तनिक कटि पर कनक-करधनि, छीन छबि चमकाति। मनौ कनक कसौटिया पर, लीक-सी लपटाति - १० - १८४।
एक काला पत्थर जिसपर रगड़ कर सोने की परख की जाती है। शालग्राम इसी पत्थर के होते हैं।
उ. - गोरस मथत नाद इक उपजत , किंकिनि धुनि सुनि स्रवन रमापति। सूर स्याम अँचरा धरि ठाढ़े, काम कसौटी कसि दिखरावति - १० - १४९। (ख) प्रीति पुरातन मोरी उनसों नेह कसौटी तोलै –३०९१।
कस्तूरि, कस्तूरिका, कस्तूरी
मृग विशेष की नाभि से निकलनेवाला एक सुगंधित द्रव्य।
उज्ज्वल पान कपूर कस्तूरी। आरोगत मुख की छबि रूरी - ३९६।
एक प्रजापति जो सुरों और असुरों के पिता थे।
(क) सुचि करि सकल बान सूधे करि, कटि-तट कस्यौ निपंग - ९ - १५८। (ख) सूर प्रभु देखि नृप क्रोध पुरी धरी कस्यौ कटि पीतपट देव राजै - २६१२।
[सं. कर्षण, प्रा. कस्सण, हिं. कसना]
के लिए। (अवधी में यह द्वितीया और चतुर्थी का चिन्ह है)।
रसना एक, अनेक स्याम-गुन कहँ लगि करौं बखानी - १ - ११।
बनावटी बातें करके भुलावे में डालना।
तृन की आग बरत ही बुझि गई हँसि हँसि कहत गोपाल। सुनहु सूर वह करनि, कहनि यह, ऐसे प्रभु के ख्याल - ५९८।
हवा के बंद हो जाने पर बढ़नेवाली गर्मी, उमस।
कहने की क्रिया दूसरे से कराना।
अब मोकौं उनसौं कहवनि है कछु मैं गई बुलावन। आपुहिं काल्हि कृपा यह कीन्ही अजिर गये करि पावन - २१६४।
(क) सूरजबंसी सो कहवाए। रामचंद्र ताही कुल आए - ९ - २।
(ख) राजा उग्रसेन कहवाए - २६४३।
सुनहु सखी राधा कहनावति। हम देखे सोई इन देखे ऐसेहि ताते कहि मन भावति–१६२९।
(हिं. कहना+आवत (प्रत्य.)]
कहाँ स्याम मिलि बैठी कबहूँ कहनावति ब्रज ऐसी। लूटहिं यह उपहास हमारौ यह तौ बात अनैसी - पृ. ३२४।
(हिं. कहना+आवत (प्रत्य.)]
मोह विपिन में पड़ी कराहति हौं नेह जीव नहिं जात। सूरस्याम गुन सुमिरि सुमिरि वै अंतरगति पछितात - पृ. ३२६।
पीड़ा से ‘आह' करना, कराहना।
कहा जाता है, समझा जाता है, माना जाता है।
बीरा लैं आयौ सन्मुख तैं, आदर करि नृप कंस पठायो, जारि करौं परलय छिन भीतर, व्रज बपुरौ केतिक कहवायौ - ५९१।
(क) सुदर कमलन की सोभा चरन कमल कहवावत - १९७५।
(ख) ऐसेहि जगतपिता कहवावत ऐसे घात करै सो दाता - १४२७।
(ग) मधुकर अब भयौ नेह बिरानी। बाहर हेत हतो कहवावत भीतर काज सयानी - ३३७५।
(क) सिव सनकादि अंत नहिं पावैं, भक्त-बछल कहवावै - ४८२। (ख) वे हैं बड़े महर की बेटी तौ ऐसी कहवावै - १५९६।
राधा-कान्ह कथा ब्रज घर घर ऐसे जनि कहवैयौ - - १४९६।
पैदा होने वाले बच्चे का शब्द।
कथन, बात, आज्ञा, उपदेश, कहना।
[सं. कथन, प्रा. कहन, हिं. कहना]
रूप देखि तुम कहा भुलाने मीत भए वनयाते - २५२८।
कलानिधान सकल गुन सागर, गुरु धौं कहा पढ़ाये (हो) - १ - ७।
कहा हो - क्या है, तुलना में कुछ नहीं है, तुच्छ है।
उ. - तुम जो प्यारी मोही लागत चंद्र चकोर कहा री हो। सूरदास स्वामी इन बातन नागरि रिझई भारी हो - १५६६।
कहाकर, कहलाकर, प्रसिद्ध होकर।
(क) बेष धरि- धरि हरयौ परधन साधु-साधु कहाइ - १ - ४५। (ख) हौं कहाइ तेरौ, अब कौन कौ कहाऊँ - १ - १६५।
(क) हौं कहाइ तेरौ, अब कौन कौ कहाऊँ - १ - १६६। (ख) जो तुम्हरे कर सर न गहाऊँ गंगासुत न कहाऊँ - सारा. ७८०।
तुम मोसे अपराधी माधव, केतिक स्वर्ग पठाए | (हो)। सूरदास-प्रभु भक्त-बछल तुम, पावन- नाम कहाए (हो) - १ - ७ |
झूठी या गढ़ी बात, अद्भुत बात।
(क) कुटिल कुचाल जन्म की टेढ़ी सुंदरि करि घर आनी। अब वह नवन बधू ह्वै बैठी ब्रज की कहत कहानी - ३०८६। (ख) सिंह रहै जंबुक सरनागति देखी सुनी न अकथ कहानी - पृ. , ३४३ (२०)।
एक शूद्र जाति जो पानी भरने और डोली उठाने का काम करती है।
[सं. कं.=जल+हार अथवा सं. स्कंधभार]
कहलाते हैं, प्रसिद्ध हैं।
(क) कहावत ऐसे त्यागी दानि। चारि पदारथ दिए सुदामहिं अरु गुरु के सुत आनि - १ - १३५। (ख) इन्द्रीजित हौं कहावत हुतौ, आपकौं समुझि मन माहिं ह्वै रह्यौ खीनौ - ८ - १०।
(ग) रूप-रसिक लालची कहावत सो करनी कछु वैन भई - २५३७।
अनुभव की बात जो सुंदर ढंग से कही जाने के कारण प्रसिद्ध हो जाय।
मृत्यु का संदेश या सूचना।
(क) साँचौ सो लिखहार कहावै। काया-ग्राम मसाहत करि कै, जमा बाँधि ठहरावै–१ - १४२। (ख) कामिनी धीरज धरै को सो कहावै री - ६२९।
(क) ऐसे लच्छन हैं जिन माहिं। माता, तिनसौं साधु कहाहिं - ३ - १३।
(ख) स्याम हलधर सुत तुम्हारे और कौन कहाहिं - २९२८।
कहना, कहने में समर्थ होना।
कहि परति- कह सकना, वर्णन कर सकना। उ.- काहू के कुल तन न बिचारत। अबिगत की गति कहि न परति है, ब्याध अजामिल तारत - १ - १२।
कहि आयौ - कह सका, मुँह से निकल गया। उ.- करत बिवस्त्र द्रुपद-तनया कौं, सरन सब्द कहि आयौ। पूजि अनंत कोटि बसननि हरि अरि को गर्व गँवायौं - १ - १९.।
कहि न जाइ- कहा नहीं जा सकता, वर्णन नहीं किया जा सकता। उ.- हरष अक्रूर हदय न भाइ। नेम भूल्यौ ध्यान स्याम बलराम कौ हृदय आनन्द मुख कहि न जाय - २५५६।
कहना जाकर बताना, कह देना।
बिजै अधोमुख लेन सूर प्रभु कहिअहु बिपति हमारी–सा. उ. ३५।
सखा भीर लै पैठत घर मैं आपु खाइ तौ सहिऐ। मैं जब चली सामुहैं पकरन, तब के गुन कहा कहिऐ - १० - ३२२।
धिक तुम धिक या कहिबे ऊपर - १ - २८४।
कहिबे के अनुमानैं- केवल कहने के लिए, कहकर अपना मन बहला लेने के लिए उ.- कहियै जो कुछ होई सखी री, कहिबे के अनु मानैं। सुंदर स्याम निकाई कौ सुख, नैना ही पै जानै - ७३०।
कहना, समाचार देना, बताना।
ऊधौ और कछु कहिबै कौ। मनमानैं सोंऊ कहि डारौ पालागैं हम सुनि सहिबे कौ - ३००४
(क) तुम सौं प्रेम कथा कौ कहिबौ मनहु काटिबों घास - ३३३६। (ख) हम पर हेतु किये रहिबो। या ब्रज कौ व्यवहार सखा तुम हरि सौं सब कहिबो - ३४१४।
कहलाते हैं, प्रसिद्ध हैं।
(क) वै रघुनाथ चतुर कहियत हैं, अंतरजामी सोइ। या भयभीत देखि लंका मैं, सीय जरी मति होइ - ९ - ९९। (ख) सूरदास गोपिन हितकारन कहियत माखन-चोर ४७७।
कहते हैं, वर्णन करते हैं।
राम-कृष्ण अवतार मनोहर भक्तन के हित काज। सोई सार जगत में कहियत ... सुनो देव द्विजराज - सारा. ११३।
रघुकुल-कुमुद चंद चिंतामनि प्रगटे भूतल महिमाँ। आए ओप देन रघुकुल कौं, आनंदनिधि सब कहियाँ - ९ - १६।
(क) ककरी कचरी अरु कचनारयौ। सुरस निमोननि स्वाद सँवारयौ–२३२१।
(ख) सुनत जोग लागत हमैं ऐसो ज्यों करुई ककरी - ३३६०।
प्रारंभिक बातें, साधारण ज्ञान।
एक तरह की कपास जिसकी रुई कुछ लाल होती है।
मोसौं बात सकुच तजि कहियै - १ - १३५।
कह्यौ मयत्रेय सौं समुझाइ। यह तुम बिदुरहिं कहियौ ज़ाइ - ३ - ४।
तब कहियौ नाम (बलराम) - जो कुछ मैं कह रहा हूँ वह पूरा न हो तो मेरा नाम नहीं, मेरा कहा ठीक न हो तो मेरा नाम नहीं। उ. - मोहिं दुहाई नंद की, अबहों आवत स्याम। नाग नाथि लै आइहैं, तब कहियौ बलराम - ५८९।
ऊधव कह्यौ, हरि कह्यौ जो ज्ञान। कहिहैं तुम्हें मयत्रेय आन - ३ - ४।
रोवत चले श्रीदामा घर कौं, जसुमति आगैं कहिहौं जाइ - ५३९।
किसी ऐसी जगह जिसका पता न हो।
मैं तो अपनी कही बड़ाई - १ - २.७।
यह सुनि ग्वाल गये तहँ धाई। नंद महर की कही सुनायी - १००४।
जो जस करै सो पावै तैसौ, बेद-पुरान कहीन्यौ - ८ - १५।
अब तुम मोकौं करौ अजाचीं, जौ कहुँ कर न पसारौं - १० - ३७।
बग-बगुली अरु गीध-गीधनी, आइ जनम लियौ तैसौ। उनहूँ कैँ गृह, सुत, दारा हैं उन्हैं भेद कहु कैसौ - २ - १४।
(क) हरि चरनारबिंद तजि लागत अनत कहूँ तिनकी मति काँची - १ - १८।
(ख) मेरे लाड़िले हो तुम जाउ न कहूँ - १० - २९५।
कहूँ की कहूँ- कहीं की कहीं, एक सीधे प्रसंग से हटाकर किसी अन्य दूर के संबंध में जोड़ लेना, दूर का अर्थ निकालना। उ.- कहा करौं तुम बात कहूँ की कहूँ लगावति। तरुनिन इहै सोहात मोहिं यह कैसे भावति - १०७१।
मेरे कहे में कोऊ नाहीं - ११९५।
नव स्कंध नृप सौं कहे श्रीसुकदेव सुजान - १० - १।
कहैं तात के पंचवटी बन छाँड़ि चले रजधानी - १० - १९९।
(क) चलत पंथ कोउ थाक्यौ होइ। कहैं दूरि, डरि मरिहै सोइ - ३ - १३। (ख) तनक सी बात कहै तनक तनकि रहे - १० - १५०।
(ग) जिनकौ मुख देखत दुख उपजत, तिनकौ राजा-राय कहै - १ - ५३।
नंद सुनि मोहिं कहा कहैंगे देखि तरु दोउ आइ - ३८७।
कहेगा, बोलेगा, अभिप्राय प्रकट करेगा।
कब हँसि बात कहैगौ मोसौं जा छबि तैं दुख दूरि हरै - १० - ७६।
कहलायँगे, प्रसिद्ध होंगे।
नंदहुं तैं ये बड़े कहैहैं फेरि बसैहैं यह ब्रजनगरी - १० - ३१९।
(क) हृदय कठोर कुलिस तैं मेरौ, अब नहिं दीनदयाल कहैहौं–७ - ५। (ख) काटि दसौ सिर बीस भुजा तब दसरथ-सुत जु कहैहौं–९ - ११३।
कहा कहौं हरि केतिक तारे पावन-पद परतंगी। सूरदास, यह बिरद स्रवन सुनि, गरजत अधम अनंगी - १ - २१।
जब मोहि अंगद कुसल पूछिहै, कहा कहौंगो वाहि - ९ - ७५।
सूर अधम की कहौ कौन गति, उदर भरे, परि सोए - १ - ५२।
बहकाओगे, बातों में भुलाओगे, बनावटी बातें करोगे।
लरिकनि कौं तुम सब दिन झुठवत, मोसौं कहा कहोगे। मैया मैं माटी नहिं खाई, मुख देखैं निबहौगे - १० - २५३।
नृपति कह्यउ मेरे गृह चलिये करो कृतारथ मोय - सारा. ८००।
‘कहना' क्रिया के भूत कालिक रूप ‘कहा' का ब्रजभाषा का रूप, कहा, कहे।
(क) का न कियौ जन-हित जदुराई। प्रथम कह्यौ जो बचन दयारत तिहिं बस गोकुल गाय चराई - १ - ६। (ख) हरि कह्यौ-जज्ञ करत तहँ बाम्हन - ८००
(ग) सूरदास प्रभु अतुलित महिमा जो कछु कह्यौ सो थोड़ा - १० उ. - ५१।
(क) अजहूँ चेति, कह्यौ करि मेरौ, कहत पसारे बाहीं–१ - २६९। (ख) बरजि रहे सब, कहयौ न मानत, करि-करि जतन उड़ात - २ - २४। (ग) तिन तौ कह्यौ न कीन्हौ कानी। तब तजि चली बिरह अकुलानी - ८००।
जो बहुत चालाकी। दिखाये, धूर्त।
घरी इक सजन-कुटुँब मिलि बैठे, रुदन बिलाप कराहीं। जैसैं काग काग के मूऐं काँ काँ करि उड़ि जाहीं - १ - ३१९।
इच्छा या चाह रखनेवाला, अभिलाषी।
जनेऊ की तरह दुपट्टा डालने का ढंग।
[हि. काँख+सं. श्रोत्र, प्रा. सोत]
चाहनेवाला, इच्छा रखनेवाला।
सुक भागवत प्रगट करि गायौ कछू न दुविधा राखी। सूरदास ब्रजनारि संग हरि माँगी करहिं नहीं कोऊ काँखी - १८५६।
(सं. काँच) एक प्रकार का शीशा, पारदर्शक शीशा।
(क) कंचन-मनि खोलि डारि, काँन गर बँधाऊँ - १ - १६६। (ख) सूरदास कंचन अरु काँचहिं एकहिं धगा पिरोयौ - १.४३।
धोती का पीछे खोंसा जानेवाला भाग।
मृदु पद धरत धरनि ठहरात न, इत-उत भुज जुग लै लै भरि भरि। पुलकित सुमुखी भई स्याम-रस ज्यौं जल मैं काँची गागरि गरि - १० - १२०।
काँची मति- खोटी समझ, कच्ची बुद्धि। उ.- हरिचरनारबिंद तजि लागत अनत कहूँ तिनकी .... मति काँची - १ - १८।
साँप की केंचुल (केंचुली)।
को है सुनत कहत कासौं हौ कौन कथा अनुसारी। सूर स्याम सँग जात भयौ मन अहि काँचुली उतारी - ३२९१।
[सं. कंचुलिका,हिं. काँचली]
कच्चा, दुर्बल, जो किसी विषय में दृढ़ न हो, अस्थिर।
ऊधौ स्याम सखा तुम साँचे। फिर कर लियौ स्वाँग बीचहिं ते वैसेहि लागत काँचे।
काँचे मन- मन में दृढ़ता न होना।
प्रेम योग रस कथा कहो कंचन की काँचे - ३४४३।
यह ब्रत धरे लोक मैं बिचरै, सम करि गनै महामनि काँचे - २ - ११।
प्रभु तेरौ बचन भरोसौ साँचौ। पोषन भरन बिसंभर साहब, जो कलपै सो काँचौं - १ - ३२।
जब तैं आँगन खेलत देख्यौ मैं जसुदा कौ पूत री। तब तैं गृह सौं नातौ टूट्यौ जैसे काँचौ सूत री - १० - १३६।
जो औटाया या पकाया न गया हो, ताजा दुहा हुआ।
काँचौ दूध पियावति पचि पचि देत न माखन रोटी - १० - १७५।
पानी में पिसी राई का घोल जो दो तीन दिन रखने से खट्टा हो गया हो।
कटीली, प्रभावित करनेवाली, मुग्ध करनेवाली।
भौहैं काँट कटीलियाँ सखि बस कीन्ही बिन मोल - १४६३।
पेड़-पौधों के नुकीले अंकुर, कंटक।
नाक में पहनने की कील, लौंग।
ग्रंथ का वह भाग जिसमें एक विषय पूरा हो।
खेखसा या ककरौल नामक तरकारी।
[सं. कर्कोटक, पा, कक्कोडक]
कुँदरू और ककोरा कौंरे। कचरी चार चचेड़ा सौरे - २३२१।
[सं. कर्कोटक, प्रा. कक्कोडक, हिं. ककोड़ा]
[सं. कंडन (कडि=भूसी अलग करना]
कूट कर चावल की भूसी अलग करना।
[सं. कंडन (कडि=भूसी अलग करना]
[सं. कंडन (कडि=भूसी अलग करना]
गोरे भाल बिंदु बंदन मनु इन्दु प्रात-रवि कांति ७०१।
एक प्रकार का बढ़िया लोहा।
[सं. कर्त्री, प्रा. कत्ती, हिं. काती]
[सं. कर्त्री, प्रा. कत्ती, हिं. काती]
[सं. कर्त्री, प्रा. कत्ती, हिं. काती]
कोउ ब्रज बाँचत नाहिन के पाती। कत लिखि लिखि पठवत नँदनंदन कठिन बिरह की काँती - २९८०।
[सं. कर्त्री, प्रा. कत्ती, हिं. काती]
बदन काँति बिलोकि सोभा सकै सूर न बरनि - ३५१।
(क) काँध कमरिया हाथ लकुटिया, बिहरत बछरनि साथ - ४८७। (ख) कहत न बनै काँध कामरि छबि बन गैयन को घेरन - ३२७७। (ग) बन बन गाय चरावत डोलत काँध कमरिया राजै - ७४१ सारा.।
[सं. कृष्ण, प्रा. व कण्ह]
डर से काँपते हैं, थर्राते हैं।
(क) उछरत सिंधु, धराधर काँपत, कमठ पीठ अकुलाइ। सेष सहसकन डोलन लागे, हरि पीवत जब पाइ - १० - ६४। (ख) मंदर डरत सिंधु पुनि काँपत फिरि जनि मथन करै - १० - १४३।
पूँछ राखी चाँपि, रिसनि काली काँपि देखि सब साँपि अवसान भूले - ५५२।
काँपन लागी धरा पाप तैं ताड़ित लखि जदुराई। आपुन भए उधारन जग के, मैं सुधि नीकैं पाई - १० - २०७।
थर्राने लगी, डर से काँपने लगी।
काँपी भूमि कहा अब ह्वै है, सुमिरत नाम मुरारि - ९ - १५८।
हिलता-डुलता है, थर्राता है।
(क) चितवनि ललित लकुटलासा लट काँपै अलक तरंग - पृ. ३२५।
(ख) ग्वालनि देखि मनहिं रिस काँपैं - ५८५।
(युद्ध) ठानते या मचाते हैं।
जाकी बात कही तुम हम सौं सोधौं कहौ को काँधी। तेरो कहो सो पवन भूस भयौ बहो जात ज्यौं आँधी - ३०२१।
(क) तिहिं सौं भरत कछू नहिं कह्यौ। सुख- आसन काँधे पर गह्यौ– ५ - ३। (ख) ग्वाल के काँधे चढ़े तब लिए छींके उतारि - १० - २८९। (ग) और बहुत काँवरि दधि-माखन अहिरनि काँधे जोरि - ५८३। (घ) ग्वाल-रूप इक खेलत हो सँग लै गयौ काँधै डारि - ६०४।
(युद्ध) ठानना, संग्राम करना।
स्वीकार करना, अंगीकार करना।
कान में पहनने का एक गहना, करनफूल।
डर से काँपता था, थर्राता था।
हौं डरपौं, काँपौं अरु रोवौं, कोउ नहिं धीर धराऊ। थरसि गयौ नहिं भागि सकौं, वै भागे जात अगाऊ - ४८१।
काँपा, डरा, भयभीत हुआ, थर्राया।
(क) काल बली तैं सब जग काँप्यौ, ब्रह्मादित हूँ रोए - १.५२। (ख) उर काँप्यौ तन पुलकि पसीज्यौं बिसरि गये मुख-बैन –७४९।
बहँगी जिसके दोनों सिरों पर लंबे छींके होते हैं।
धेनु चरावन चले स्यामघन ग्वाल मंडली जोर। हलधर संग छाक भरि काँवर करत कुलाहल सोर - ४७१ सारा.।
[हिं. काँध+ आव (प्रत्य.)]
बहँगी, जिसके सिरे पर सामान ले जाने के लिए लंबे छींके होते हैं।
(क) सहस सकट भरि कमल चलाये।...। और बहुत काँवरि दधि माखन, अहिरनि काँधे जोरि। नृप कैं हाथ पत्र यह दीजौ बिनती कीजौ मोरि ५८३। (ख) ओदन भोजन दै दधि काँवरि भूख लगे तैं खैहौं - ४१२।
किसी कामना से तीर्थ-यात्रा करनेवाला।
(क) लटकि जात जरि-जेरि द्रम-बेली, पटकत बाँस, काँस, कुस ताल - ५९४। (ख) डासन काँस कामरी ओढ़न बैठन गोप सभा ही - २२७५।
ताँबे और जस्ते के मिश्रण से बनी एक धातु।
संबंध या षष्ठी का चिन्ह या विभक्ति।
(क) का न कियौ जन-हित जदुराई –१ - ६। (ख) देखौं धौं का रस चरननि मैं मुख मेलत करि आरति - १० - ६४।
ब्रजभाषा में 'किस' या 'कौन' का विभक्ति लगने से पूर्व रूप। जैसे काको, कासौं।
एक वृक्ष जिसकी छाल दवा के काम आती है।
कूट काइफल सोंठ चिरैता कटजीरा कहुँ देखत - ११०८।
जल पर जमनेवाली एक प्रकार की महीन घास जो हलके हरे रंग की होती है।
कौए की आँख की पुतली जो केवल एक होती है और दोनों आँखों में आती-जाती रहती है।
कौए के दाँत की तरह अविश्वसनीय बात।
बालों के पट्टे जो दोनों ओर कानों और कनपटियों के ऊपर रहते हैं, जुल्फ, कुल्ला।
(क) कटि तट पीत पिछौरी बाँधे, काकपच्छ धरे सीस - ९ - २०। (ख) कर धनु, काकपच्छ सिर सोभित, अंग-अंग दोउ बीर - ९ - २६।
एक चिन्ह जो छूटे हुए अंश का स्थान बताने के लिए लगाया जाता है
वह स्त्री जो केवल एक संतान उत्पन्न करे।
राम का भक्त एक ब्राह्मण जो लोमश ऋषि के शाप से कौआ हो गया था।
(क) काकी ध्वजा बैठि कपि किलकिहि, किहिं भय दुरजन डरिहै - १ - २९।
(ख) तिन पूछ्यौ तू काकी धी है - ४ - १२
(ग) बूझत स्याम कौन तू गोरी। कहाँ रहत काकी है बेटी देखी नहीं कहूँ ब्रज खोरी–६७३।
व्यंग्य, ताना, चुटीली बात।
चल्यौ न परत पग गिरि परी सूधे मग भामिनि भवन ल्याई कर गहे कखिआँ - २३६६।
सन, रुई आदि से बना हुआ लिखने का पत्र।
तनु जोबन ऐसे चलि जैहै जनु फागुन की होरी। भीजि बिनसि जाई छन भीतर ज्यौं कागज की चोली री - २०४०।
(क) चित्रगुप्त जमद्वार लिखत हैं, मेरे पातक झारि। तिनहुँ चाहि करी सुनि औगुन, कागद दीन्हे डारि - १ - १६७।
(ख) विचारत ही लागे दिन जान। सजल देह, कागद तैं कोमल, किहिं बिधि राखै प्रान - १ - ३०४।
एक ब्राह्मण जो शाप से कौआ हो गया था।
(क) तुम्हरे देस कागर-मसि खूटी। प्यास अरु नींद गई सब हरि कै बिना बिरह तन टूटी। (ख) रति के समाचार लिखि पठए सुभग कलेवर कागर - २१२८।
चढ़ावै कागर- कागज पर लिख ले, टाँक ले। उ.- अब तुम नाम गहौ मन नागर। जातैं काल अगिनि तैं बाँचौ, सदा रहौ सुख-सागर। मारि न सके, बिघन नहिं ग्रासै, जम न चढ़ावै कागर १ - ९१।
नाव कागर की - शीघ्र डूब जाने या नष्ट हो जानेवाली चीज, अधिक समय तक न टिकनेवाली चीज। उ.- जेइ निर्गुन गुनहीन गनैगौ सुनि सुंदरि अलसात। दीरघु नदी नाउ कागर की को देखो चढ़ि जात - ३२८२।
एक अलंकार जिसमें शब्दों की ध्वनि से ही अर्थ समझा जाय।
कनपटी पर लटकते हुए लंबे बाल, जुल्फें।
काके हित श्रीपति ह्याँ ऐहैं, संकट रच्छा करिहैं ? - १ - २९
काकैं सत्रु जन्म लीन्यौ है, बूझौ मतौ बुलाई - १५ - ४।
[सं. कः, हिं. का(कौन)+कैं (विभक्ति)]
काकौ बदन निहारि द्रौपदी दीन दुखी संभरिहै - १ - २९।
आतम ब्रह्म लखावत डोलत घर घर ब्यापक जोई। चापे काँख फिरत निर्गुन गुन इहाँ गाहक नहिं कोई - ३०२२।
सुक भागवत प्रगट करि गायौ कछू न दुबिधा राखी। सूरदास ब्रजनारि संग हरि बाकी रह्यो न कोऊ काखी - १८५६।
[सं. काँक्षी, हिं. काँखी]
फागु रंग करि हरि रस राख्यौ। रह्यौ न मन जुवतिन के काख्यौ - २४५९।
ब्याध, गीध, गनिका जिहिं कागर, हौं तिहिं चिठि न चढ़ायौ - १ - १९३।
सबेरे के समय छानी जानेवाली भाँग।
कौओं की काँव-काँव की तरह होने वाला शोर।
[हिं. काग=कौआ+रौल =रोर=शोर]
कंस के एक दैत्य का नाम जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था।
तृनावर्त से दूत पठाये। ता पाछे कागासुर धाये - ५२१।
श्राद्ध में भोजन का वह भाग जो कौए के लिए निकाला जाता है।
काच पोत गिरि जाइ नंदघर गथौ न पूजै - ११२७।
जिसका मन पक्का न हो, कायर।
कच्चे फल। पिसे हुए चावल या साबूदाने के सुखाये हुए टुकड़े जो घी में तलकर खाये जाते हैं।
पापर बरी मिथौरि फुलौरी। कूर बरी काचरी पिठौरी - ३९६।
ज्यौं भुजंग काचरी बिसरात फिरि नहिं ताहि निहारत | तैसेहिं जाइ मिले इकटक ह्वै डरत लाज निरवारत - पृ. ३२१।
[सं. कंचुलिका, हिं. काँचली]
जो झूठा हो, जो नष्ट हो जाय, मिथ्या, अनित्य।
जिसका व्रत या निश्चय ट्टढ़ न हो, भक्ति या प्रीति में जो कच्ची हो।
(क) दीन बानी स्रवन सुनि सुनि द्रए परम कृपाल। सूर एकहु अंग न काँची धन्य धनि ब्रजबाल - पृ० ३४२ - १७।
(ख) सूर एकहुं अंग न काँची मैं देखी टकटोरी—३४६८।
झूठी, बनावटी, टालमटोल को, हँसने योग्य।
कहे बनै छाँड़ौ चतुराई बात नहीं यह काची। सूरदास राधिका सयानी रूपरासि-रसखानी - १४३८।
कच्चे, अकुशल, नौसिखिया, अदृढ़।
भले ही जु जाने लाल अरगजे भीने मोल केसरि तिलक भाल मैंन मंत्र काचे - २००३।
कच्चे, शीघ्र टूट जानेवाले।
प्रेम न रुकत हमारे बूते। किहि गयंद बाँध्यौ सुन मधुकर पद्यमनाल के काचे सूते - ३३०५।
धोती का भाग जो पेड़ू से जाँघ के कुछ नीचे तक रहता है।
(क) सोई हरि काँधे कामरि, काछ किए नाँगे पाइनि, गाइनि टहल करैं - ४५३।
(ख) कटि तट काछ बिराजई पीताबंर छबि देत - २३५०। (२) पेड़ू से जाँघ के कुछ नीचे तक का भाग।
स्वाँग बनाते हैं, वेष धरते हैं, रूप धरते हैं, चाल चलते हैं।
स्याम बनी अब जोरी नीकी सुनहु सखी मानत तोऊ हैं। सूर स्याम जितने रंग काछत जुवती-जन-मन के गोऊ हैं - ११५९।
काछनी कटि पीत पट दुति, कमल केसर खंड - १ - ३०७।
मूर्तियों का चुन्नटदार पहनावा जो प्रायः जाँघिए के ऊपर पहना जाता है।
धोती जो कसकर पहनी जाय और जिसकी दोनों लाँगों को ऊपर खोंसा जाय, कछुनी।
(क) माया को कटि फेटाँ बाँध्यौ, लोभ-तिलक दियौ भाल। कोटिक कला काछि दिखराई जल-थल-सुधि नहिं काल - १.१५३। (ख) कीन्हें स्वाँग जिते जाने मैं, एक तौ न बच्यो। सोधि सकल गुन काछि दिखायौ, अंतर हो जो सच्यौ - १ - १७४।
[सं. कक्षा, प्रा. कच्छ, हिं. कच्छ]
तरकारी बोने-बेचने वाली एक जाति।
बनाये हुये, सँवारे हुए, पहने हुये।
तीन्यौ पन मैं ओर निबाहे इहै स्वाँग कौं काछे। सूरदास कौं यहै बड़ो दुख, परति सबनि के पाछे - १ - १३६।
[सं. कक्षा, प्रा. कच्छ, हिं. कोछना]
ताहि कह्यौ सुख दे चलि हरि कौ मैं आवति हौं पाछे। वैसहिं फिरी सूर के प्रभु पै जहाँ कुंज गृह काछे।
तब केसी ह्वै बर बपु काछयो लै गयौ पीठि चढ़ाई। उतरि परे हरि ता ऊपर तैं कीन्हौं युद्ध अघाइ - २३७७।
कार्य, काम, कृत्य, सेवा-कार्य।
पाइँ धोइ मंदिर पग धारे काज देव के कीन्हे - १० - २६०।
काज बिगारत- काम बिगड़ता है, नष्ट करता है। उ.- ज्ञानी लोभ करत नहिं कबहूँ, लोभ बिगारत काज।
काज बिगारयौ- काम या मामला बिगाड़ दिया; सब चौपट कर दिया। उ.- रसना हूँ कौ कारज सारयो। मैं यौं अपनौं काम बिगारयौ - ४ - १२।
काज सँवारे- काम बना दिया।उ. - (क) कहा गुन बरनौ स्याम तिहारे। कुबिजा, बिदुर, दीन द्विज, गनिका सब के काज सँवारे - १ - २५। (ख) जो पद-पदुम रमत पांडव-दल दूत भये सब काज सँवारे - १ - ६४।
(क) नृप कह्यौ सुरनि कैं हेतु मैं जग्य कियौ इंद्र मम अस्व किहिं काज लीन्हौ - ४ - ११। (ख) गोपालहिं राखौ मधुबन जात। लाज गये कछु काज न सरि है बिछुरत नँद के तात - २५३१।
काज सरत- उद्देश्य पूरा हो, अर्थ सिद्ध हो। उ.- अबिहित बाद-बिबाद सकल मत इन लगि भेष धरत। इहिं बिधि भ्रमत सकल निसि-दिन गत, कछू न काज सरत - १ - ५५।
(इनहीं, तुमहीं) काज- (इनके, तुम्हारे) लिए, हेतु, निमित्त। उ. - (क) गाउँ तजौं कहुँ जाउँ निकसि लै, इनहीं काज पराउँ - ५२८। (ख) पूछौ जाइ तात सौं बात। मैं बलि जाउँ मुखारबिंद की, तुमहीं काज कंस अकुलात - ५३०।
काज परयौ- काम पड़ा, मतलब अटका, प्रयोजन पड़ा, आवश्यकता हुई। उ. - बोलि-बोलि सुत-स्वजन-मित्रजन, लीन्हौ सुजस सुहायौ। परयौ जु काज अंत की बिरियाँ तिनहु न अनि छुड़ायौ - २.३०।
काजल जो आँख में लगाया जाता है, कालौंछ।
कुमकुम कौ लेप मेटि, काजर मुख ल्याऊँ - १ - १६६।
अघासुर मुख पैठि निकसे बाल-बच्छ छुड़ाई। लिख्यौ काजर नाग द्वारैं स्याम देखि डराई - ४९८।
वह गाय जिसकी आँखों पर काले रंग का घेरा हो।
वह मथुरा काजल की कोठरि जे आवहिं ते कारे।
(उन) काजा- (उनके) लिए (उनके) हेतु या निमित्त। उ.- तातैं सकुवत हौं उन काजा। बालक सुनत होति जिय लाजा - २४५९।
सूर मिलै मन जाहि जाहि सौं ताको कहा करै काजो - २६७८।
जो अधिक समय तक काम न आ सके।
(काम) के लिए, (काम) के हेतु या निमित्त।
इन लोभी नैनन के काजे परबस भई जो रहौं - २७७४।
(काज) के लिए, (काम) के हेतु।
(क) ऐसी को करी अरु भक्त काजैं। जैसी जगदीस जिय धरी लाजैं - १ - ५।
(ख) नाचत त्रैलोकनाथ माखन के काजै - १०.१४६।.
(ग) तेरे ही काजैं गोपाल, सुनहु लाड़िले लाल, राखे हैं भाजन भरि सुरस छहूँ - १० - २६५।
हाथ-पाइँ बहुतनि के काट। आइ नवायौ सिवहिं ललाट - ४.५।
[सं. कर्त्तन, प्रा. कट्टन, हिं. काटना]
तिरछी, टेढ़ी, कटीली, तेज, काट करनेवाली।
भौंहें काट कटीलियाँ मोहिं मोल लई बिन मोल - ८९३।
दूर करते (हो), नष्ट करते (हो), मिटाते (हो)।
जन के उपजत दुख किन काटत - १ - १०७।
काटने के लिए टुकड़े करना।
काटन दै दस सीस बीस भुज अपनौ कृत येऊ जो जानहि - ९.९५।
[सं. कर्त्तन, प्रा. कट्टन, हिं. काटना]
दूर करने या मिटाने के लिए।
जिहिं जिहिं जोनि जन्म धारयौ, बहु जोरयौ अघ कौ भार। तिहिं काटन कौं समरथ हर कौ तीछन नाम कुठार - ६८।
[सं. कर्त्तन, प्रा. कट्टन, हिं. काटना]
[सं. कर्त्तन, प्रा. कट्टन]
[सं. कर्त्तन, प्रा. कट्टन]
[सं. कर्त्तन, प्रा. कट्टन]
[सं. कर्त्तन, प्रा. कट्टन]
[सं. कर्त्तन, प्रा. कट्टन]
[सं. कर्त्तन, प्रा. कट्टन]
नष्ट करना, दूर करना, मिटाना।
[सं. कर्त्तन, प्रा. कट्टन]
[सं. कर्त्तन, प्रा. कट्टन]
[सं. कर्त्तन, प्रा. कट्टन]
अनुचित या असत्य ढंग से ले लेना।
[सं. कर्त्तन, प्रा. कट्टन]
[सं. कर्त्तन, प्रा. कट्टन]
[सं. कर्त्तन, प्रा. कट्टन]
किसी जीव का सामने से निकल जाना।
[सं. कर्त्तन, प्रा. कट्टन]
(किसी की बात या राय का) खंडन करना।
[सं. कर्त्तन, प्रा. कट्टन]
बुरा लगना, कष्ट पहुँचाना।
[सं. कर्त्तन, प्रा. कट्टन]
आनँद-मगन राम-गुन गावै, दुख-संताप की काटि तनी–१ - ३९.।
ऊधो, मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं। हंस सुता की सुंदर कगरी अरु कुंजन की छाहीं।
जसुमति तेरो बारो अतिहि अचगरो। दूध दही माखन लै डारि दयौ सगरो। लियो दियो कछु सोऊ डारि देहु कगरो - १०५६।
किसी जीव का सामने से निकले जाना।
मंजारी गई काटि बाट, निकसत तब बाइन - ५८९।
तुमसौं प्रेम-कथा को कहिबो मनहु काटिबो घास - ३३३६।
सूरदास-प्रभु इक पतिनी ब्रत, काटी नाक गई खिसियाई - ९ - ५६।
टुकड़े-टुकड़े कर दिया, चूर-चूर कर दिया।
जोजन-बिस्तार सिला पवनसुत उपाटी। किंकर करि बान लच्छ अंतरिच्छ काटी - ९.९६।
धड़ से अलग कर दिये, टुकड़े किये।
जिहि बल रावन के सिर काटे कियौ विभीषन नृपति निदान - १० - १२७।
जद्यपि मलय वृक्ष जड़ काटै, कर कुठार पकरै। तऊ सुभाव न सीतल छाँड़ै, रिपु-तन-ताप हरै - १ ११७।
जाकौ नाम लेत भ्रम छूटे, कर्म-फंद सब काटै - ३४६।
मुक्त करो, छुड़ाओ, छाँटो।
कर जोरि सूर बिनती करै, सुनहु न हो रुकुमिनि-रवन। काटौ न फंद मो अंध के, अब बिलंब कारन कवन - १ - १८० |
काटा, मुक्ति दी, (बंधन से) छुड़ाया।
हा करुनामय कुंजर टेरयौ, रह्यौं नहीं बल थाकौ। लागि पुकार तुरत छुटकायौ, काट्यौ बंधन ताकौ - १ - ११३।
बिछुरन कौ संताप हमारौ, तुम दरसन दै काट्यौ - ९.८७।
मांडव ऋषि जब सूली दयौ। तब सो काठ हरौ ह्वै गयौ - ३ - ५।
ताको जननी की गति दीन्हीं परम कृपालु गुपाल। दीन्हो फूँक काठ तन वाको मिलिके सकल गुवाल - ४१८ सारा.।
घोड़ा, ऊँट आदि की पीठ पर की जानेवाली जीन या गद्दी जिसमें काठ लगा रहता है।
खींचा जाता (है), खोला जाता है, आवरण रहित किया जाता (है), निकालता है।
(क) भीषम, द्रोन, करन दुरजोधन, बैठे सभा- बिराज। तिन देखत मेरौ पट काढ़त, लीक लगै तुम लाज - १ - २५५। (ख) फाटे बसन सकुच अति लागत काढ़त नाहिंन हाथ - ८१८ सारा.।
बाल बनाता है, कंधे से बाल सवाँरता है।
तू जो कहति बल की बेनी ज्यौं ह्वै है लाँबी-मोटो। काढ़त-गुहत न्हवाहत जैहै नागिन सी भुईं लोटी - १० - १७५।
किसी पदार्थ में पड़े हुए कीड़े-पतंगे निकालता है।
मैं अपने मंदिर के कोनै राख्यौ माखन, छानि। ....। सूर स्याम यह उतर बनायौ चोंटी काढ़त पानि - १० - २८०।
(रेख आदि) खीचती है, चित्रित करती है।
अपनी अपनी ठकुराइनि की काढ़ति है भुव रेख - पृ. ३४७ (५६)।
निकालने के लिए,(भीतर की चीज को) बाहर करने के लिए।
देखत हौं गोरस मैं चींटी, काढ़न कौं कर नायौ - १० - २७९।
किसी वस्तु को भीतर से बाहर निकालना।
पानी में उबाल कर निकाला हुआ ओषधियों का रस।
किसी वस्तु के भीतर से बाहर करना, निकालना।
(क) परयौ भव-जलधि मैं हाथ धारि काढ़ि मम दोष जनि धारि चित काम - १ - २१४। (ख) स्याम, भुज गहि काढ़ि लीजै, सूर व्रज कैं कुल - १.९९।
निकाल देना, अश्रय न देना, शरण में न लेना, ठुकरा देना।
बड़ी है राम नाम की ओट। सरन गऐं प्रभु काढ़ि देते हैं, करत। कृपा कैं कोहा।
तैयार की है, प्रस्तुत की है,बनायी है।
(क) चकित भई देखें ढिग ठाढ़ी। मनौ चितरैं लिखि लिखि काढ़ी - ३९१। (ख) रही जहाँ सो तहाँ सब ठाढ़ी। हरिके चलत देखियत ऐसी मनहुँ चित्रि लिखि काढ़ी - २५३५।
कोई वस्तु दूसरी से अलग की।
सब हेरि धरी है साढ़ी। लई ऊपर ऊपर काढ़ी - १० - १८३।
निकालो, (भाव या विचार) दूर करो।
गृह नछत्र अरु बेद अरध करि खात हरष मन बाढ़ो। तातें चहत अमरपन तन को समुझ समुझ चित काढ़ों - सा. ६५।
किसी वस्तु को बाहर करो, निकालो।
जिन लोगनि सौं नेह करत है, तेई देखि घिनैहैं। घर के कहत सबारे काढ़ौ, भूत होइ धरि खैहैं - १ - ८६।
[सं. कर्षण, प्रा. कडूढण, हिं. काढ़ना]
तान लिये, खड़े किये, निकाल कर ताने।
बिषधर झटकीं पूछ फटकि सहसौ फन काढ़ौ। देख्यौ नैन उघारि, तहाँ बालक इक ठाढ़ो - ५८९।
[सं. कर्षण, प्रा. कडूढण, हिं. काढ़ना]
(क) कंचन कलस विचित्र चित्र करि, रचि पचि भवन बनायौ। तामैं तैं ततछन ही काढ़यौ, पलभर रहन न पायौ - १ - ३०। (ख) अघ बक बच्छ अरिष्ट केसी मथि जल तें काढ़यौ काली - २५६७।
खीचा, निकाला, प्राप्त किया।
यह भुवमंडल कौ रस काढ़यौ भाँति भाँति निज हाथ - ८४ सारा.।
[सं. कर्त्तन, प्रा. कत्तन]
भक्त बिरह-कातर करुनामय, डोलत पाछैं लागे। सूरदास ऐसे स्वामी कौं देहिं पीठि सो अभागे - १ - ८।
बाँस काटने की छुरी, छुरी।
[सं. कर्तृ, कर्त्तृ; प्रा. कत्ता]
[सं. कर्त्री, प्रा. कत्ती]
ऊधौ कुलिस भई यह छाती। मेरे मन रसिक नंदलालहिं झषत रहत दिन राती। तजि व्रज लोग पिता अरु जननी कंठ लाइ गए काती - ३११६।
[सं. कर्त्री, प्रा. कत्ती]
(क) जुग जुग बिरद यहै चलि आयो टेरि कहत हौं यातैं। मग्यित लाज पाँच पतितनि मैं, हौं अब कहौ घटि कातैं - १ - १३७।
(ख) हम तुम सब बैस एक कातैं को अगरो - १० - ३३६।
[सं. कः= हिं. का+तैं (प्रत्य.)]
भगवा वस्त्र पहननेवाली विधवा।
(क) भगत बिरह की अतिहीं कादर, असुर-गर्ब-बल नासत - १ - ३१, (ख) देखि देखि डरपत ब्रजबासी अतिहिं भये मन कादर.. - ९४९।
श्रवणेंद्रिय, श्रवण, श्रुति।
कान कटाई- जगहँसाई होना, अपमान होना। उ. - (क) कीजै कृष्ण दृष्टि की बरषा, जन की जाति लुनाई। सूरदास के प्रभु सो करियै, होइ न कान कटाई - १ - १८५ (ख) सूर स्याम अपने या ब्रज की इहिं बिधि कान कटाई - ३०७७।
करी न कान - ध्यान नहीं दिया। उ. - जब तोसौं समुझाइ कही नृप तब तैं करी न कान - १ - २६९।
कान दै- ध्यान देकर, एकाग्र चित्त होकर, एक ही ओर ध्यान लगाकर। उ. - (क) तू जानति हरि कछू न जानत, सुनत मनोहर कान दै। सूर स्याम ग्वालिनि बस कीन्हौं, राखति तन-मन-प्रान दै - १० - २७४। (ख) तब गदगद बानी प्रभु प्रगटी सुन सजनी दै कान - १९८४ | (ग) सुनौ धौं दै कान अपनी लोक लोकनि क्रांत - ३४७६।
कान लगि कह्यौ- चुपके से कहना, धीरे से सलाह देना। उ.- कान लगि कह्यो जननि जसोदा वा घर में बलराम। बलदाउं कौं आवन दैहौं श्रीदामा सौं काम -10-240।
कान में पहनने का एक गहना।
(क) तोहि अपने लाल प्यारो हमैं कुल की कान - सा. ११४। (ख) मोरि प्रतिज्ञा तुम राखी है मेटि बेद की कान - ७८५ सारा.।
(क) हौं चाहे तासों सब सीखब रसबस रिझबो कान - सा. ६८।
(ख) कूदो कालीदह में कान - सा. ७३। (ग) रथ को देखि बहुत भ्रम कीन्हों धों आये फिर कान - ५६१ सारा.।
लोक-लाज, मर्यादा, मर्यादा का ध्यान।
जिन गोपाल मेरौ प्रन राख्यौ, मेटि बेद की कानि - १ - २७९।
लिहाज, दबाव, संकोच, संबंध का विचार।
(क) ब्रह्मबान कानि करी बल करि नहिं बाँध्यौ - ६.९७।
(ख) जसुदा कहँ लौं कीजै कानि। दिन प्रति कैसैं सही परति है, दूध-दही की हानि - १०. २८० |
(ग) लागे लैन नैन जल भरि भरि, तब मैं कानि न तोरी - १० - २८६।
(घ) ल्खा परस्पर मारि करौं, कोउ कानि न मानै - ५८९।
लोकलाज, मर्यादा का ध्यान।
(क) कान्हहिं बरजति किन नँदरानी। एक गाउँ कैं बसत कहाँ लौं, करौं नंद की कानी - १० - ३११। (ख) लोक-बेद कुल-धर्म केतकी नेक न मानत कानी हो - २४००।
कंस करत तुम्हरी अति कानी - १००३।
जिसकी एक आँख फूटी हो, एक आँखवाली।
बकुची खुमी आँधिरि काजर कानी नकटी पहिरै बेसरि। मुँडली पटिया पारि सँवारे कोढ़ी लावै केसरि - ३०२६।
न कीन्हौ कानी- कान न किया, सुना नहीं, सुनकर ध्यान नहीं दिया। उ. - तिन तौ कह्यौ न कीन्हौ कानी। तन तजि चली बिरह अकुलानी - ८००।
क्वारी कन्या से उत्पन्न।
वह पुत्र जो क्वारी कन्या से उत्पन्न हुआ हो।
न कीन्हौ काने- कान नहीं किया, नही सुना, सुनकर ध्यान नहीं दिया। उ. - तिन तो कह्यौ न कीन्हों काने - ८६६
वृहस्पति का पुत्र जो दैत्यगुरु शुक्राचार्य के पास संजीवनी-विद्या सीखने गया था।
एक छोटा पेड़ जो सुन्दर फूलों और कलियों के लिए प्रसिद्ध है।
ककरी कचरी अरु कचनारयौ। सुरस निमोननि स्वाद सँवारयौ - २३२१।
बहुत सी चीजों को गचपच करके थोड़े से स्थान में रखना।
छोटे - छोटे तारों का गुच्छा या समूह, कृतिका नक्षत्र।
निर्गुन बचन कहहु जनि हमसौं ऐसी करहिं न कानै - ३३६६।
स्वान कुब्ज, कुपंगु, कानौ, स्रवन-पुच्छ-बिहीन। भग्न भाजन कंठ, कृमि सिर, कामिनी आधीन १ - ३२१।
अपनैं ही अज्ञान-तिमिर मैं बिसरयौ परम ठिकानौं। सूरदास की एक आँखि है, ताहू मैं कछु कानौ - १ - ४७।
एक प्राचीन प्रांत जो वर्तमान कन्नौज के आसपास था।
मो देखत कान्हर इहि आँगन पग है धरनि धराहिं - १० ७५।
एक राग जो रात को गाया जाता है।
सुर साँवत भूपाली ईमन करत कान्हरो गान–१० १३ सारा.।
[सं. कर्णाट, हिं. कान्हड़ा]
ऐसी रिस करौ न कान्हा। अब खाहु कुँवर कछु नान्हा - १००१८३।
कान्हैं लै जसुमति कोरा तैं रुचि करि कंठ लगाए - १० - ५३।
[सं. कृष्ण, प्रा. कण्ह, हि. कान्ह]
सुनु री सखी कहति डोलति है या कन्या सौं कान्है - १० - ३१५।
जितना चाहिए हो उतना ; पर्याप्त।
[सं. कर्बुर, प्रा. कब्बुर]
रेत मिली भूमि, दोमट, खाभर।
अरब में मक्के का वह स्थान जहाँ मुहम्मद साहब रहते थे। यह मुसलमानों का तीर्थ है।
एक रंग जिससे मिट्टी के कच्चे बर्तने रँगे जाते हैं।
काढ़ौ कोरे कापरा (अरु) काढ़ौ घी के भौन। जाति पाँति पहिराइ कै (सब) समदि छतीसौ पौन - १० - ४०।
[सं. कर्पट=वस्त्र, प्रा. कप्पड़]
शैव मत के साधु जो कपाल या खोपड़ी में मांसादि खाते हैं।
एक बाजा जो मुँह से बजता था।
बाँस की पतली तीलियाँ जिनमें लासा लगाकर चिड़ियाँ फँसायी या पकड़ी जाती हैं।
मुरली अधर चंप कर कापा मोर मुकुट लट वारि - २७१७।
बृन्दाबन ब्रज कौ महत कापै बरन्यौ जइ - ४६२।
(क) सूरदास प्रभु अंतरजामी कीन्हौ पूरन काम - ६७९। (ख) चिरजीवौ जसुदानन्द पूरन काम करी - १ - २४।
(ग) किये सनाथ बहुत मुनि कुल को बहु विधि पूरे काम - २४७ सारा.
(क) सूरदास प्रभु अंग अंग नागरि मनो काम किये रूप बयोरी - सा. उ. १८। (ख) सूर हरि की निरखि सोभा कोटि काम लजाइ - ३५२।
इंद्रियों की विलास की प्रवृत्ति।
(क) मुख देखत हरि कौ चकित भई तन की सुधि बिसराई। सूरदास प्रभु कैं रसबस भई काम करी कठिनाई - ७२९। (ख) भ्रम-मद-मत्त काम-तृष्ना-रस-बेग न क्रमै गह्यौ - १.४९।
अथ धर्म अरु काम मोक्ष फल चारि पदारथ देइ गनी - १ ३९।
कठिन कार्य, कौशलयुक्त क्रिया।
(क) अन्त के दिन कौं हैं घनस्याम। माता पिता बन्धु सुत तौ लगि जौ लगि जिहिं कौं काम - १ - ७६। (ख) कान लागि कह्यौ जननि जसोदा वा घर में बलराम। बलदाऊ कौं आवन दैहौं श्रीदामा सौं काम - १० - २४०।
काम परयौ- अवश्यकता हुई, प्रयोजन हुआ, दरकार हुई।
काम बनावै- मतलब निकालता है, स्वार्थ पूरा करता है। उ. - मूक, निंद, निगोड़ा, भोड़ा, कायर काम बनावै - १ - १८६।
काम सरै- काम बनता है, उद्देश्य की सिद्धि होती है, मतलब निकलता है। उ. - सब तजि भजिए नंदकुमार। और भजे तैं काम सरै नहिं, मिटे न भव जंजार - १ - ६८।
काम परयौ- पाला पड़ना, वास्ता होना, व्यवहार या सम्बन्ध होना। उ.- परयौ काम सारँग बासी सौं राखि लियौ बलबीर–१ - ३३। (ख) नर हरि ह्वै हिरनाकुस मारयौ काम परयौं हो बाँकौ। गोपीनाथ सूर के प्रभु कैं बिरद न लाग्यौ टाँकौ - १ - १२३। (ग) अब तौ आनि परयौ है गाढ़ौ सूर पतित सौं काम - १ - १७९।
काम आवैं- (१) साथ दें, सहारा दें, सहायक हों, आड़े आवें। उ.- (क) धन-सुत-दारा कान न आवैं, जिनहिं लागि अपुनपौ हारौ - १ - ८०। (ख) आवत गाढ़ै काम हरि, देख्यौ सूर विचारि - २ - २९। (ग) हरि बिन कोऊ काम न आयौ - २ - ३० (२) उपयोगी हुई, व्यवहार में आयी। उ. - काया हरि कैं काम न आई। भावभक्ति जहँ हरि-जस सुनियत, तहाँ जात अलसाई - १ - २९५।
काम-ग्रंथ-अरि-गुन-रिपु-सुत
काम ग्रन्थ-अरि गुन रिपु-सुत-सम गति अति नीक विचारी–सा. १०३।
[सं. कामग्रंथ (कोक=चक्रवाक) + अरि (चक्रवाक का शत्रु=रात; क्योंकि रात को चकवा-चकवी को अलग होने से दुख मिलता है।+ गुन (रात का गुण = अन्धकार) + रिपु (अंधकार का शत्रु=दीपक) + सुत (दीपक का सुत= अजन=दिग्गज= गज=हाथा)]
काम या वासना को जीतनेवाला।
चित्रकूट का एक पर्वत जहाँ श्रीराम ने वास किया था।
कामदेव को भस्म करनेवाले शिवजी।
स्त्री-पुरुष-संयोग का प्रेरक एक देवता जो बहुत सुन्दर माना गया है। रति इसकी स्त्री, सखा वसंत, वाहन कोकिल, अस्त्र फूलों का धनुष-बाण है।
ब्रजधर गयीं गोप कुमारि। नेकहूँ कहुँ मन न लागत काम धाम बिसारि।
मछली जो कामदेव की ध्वजा पर अंकित है।
लाभ थान पंचमी कामधुज गृहनिध गृह में आई। मान लेहु मन अपने भू सब हरो भार इन भाई - सा. ८१।
समुद्र से निकली गाय जो चौदह रत्नों में एक है और जो सभी अभिलाषाएँ पूरी करती है।
वह जो कामदेव की ध्वजा पर अंकित है, मछली।
कामधेनु जो समुद्र के रत्नों के साथ निकली थी।
कामनाधेनु पुनि सप्तरिषि कौं दई, लई उन बहुत मन हर्ष कीन्हे - ८ - ८।
ब्रजमंडल के अंतर्गत एक वन।
कामदेव के पाँच वाण - मोहन, उन्मादन, संतपन, शषण और निश्चेष्टकरण। कामदेव के वाण फूलों के भी कहे जाते हैं, वे फूल ये हैं - लाल कमल, अशोक, आम, चमेली और नील कमल।
(क) सूरदास कारी कामरि पे, चढ़त न दूजौ रंग - १ - ३३२। (ख) सोई हरि काँधे कामरि, काछ किए, नाँगे पाइनि, गाइनि टहल करैं - ४५३।
कान्ह काँधे कामरिया कारी, लकुट लिए कर धरै हो - ४५२।
एक दूध, फल, एक झगरि चबेना लेत निज निज कामरी के आसननि कीने - ४६७।
वह विद्या जिसमें स्त्री-पुरुष-प्रसंग का सविस्तार वर्णन हो।
जो कामवासना की प्रबलता के करण उचित-अनुचित का ज्ञान न रख सके।
फैंट छाँड़ि मेरी देहु श्रीदामा। काहे कौं तुम रारि बढ़ावत, तनक बात कैं कामा - ५३६।
तबहिं असीस दई परसन ह्वै सफल होहु तुम कामा १० उ. - ६६।
(क) इंदा बिंदा राधिका स्यामा कामा नारि - ११०१।
(ख) स्थामा कामा चतुरा नवला प्रमुदा सुमदा नारि - १५८०।
(ग) स्याम गये उठि भोर हीं बृन्दा के धाम। कामा के गृह निसि बसे पुरयौ मन काम - २१२६।
काम या संभोग की इच्छा से व्याकुल।
भज्यौ मोहिं कामातुरनारी - ७९९।
वैवस्त मनु की पत्नी श्रद्धा का एक नाम।
भोग-विलास में लिप्त रहनेवाला, कामुक।
पुहुप पराग परस मधुकरगन मत्त करत गुंजार। मानो कामि जन देख जुवति जन बिषयासक्ति अपार - १०४४ सार.।
अंतर गहत कनक-कामिनि कौं, हाथ रहैगौ पचिबौ - १.५९।
यहै जिय जानि कै अंध भव-त्रास तैं, सूर कामी कुटिल सरन आयौ - १ - ५।
कीन्हीं प्रीति पहुँष शुंडा की अपने काज के कामी - ३०८०।
चमकीली टिकलियाँ या बुँदे जिन्हें स्त्रियाँ माथे पर लगाती हैं।
चमकीले बुंदे या बिंदियाँ जिन्हें स्त्रियाँ माथे या गाल पर लगाती हैं, सितारा, चमकी।
[सं. कच्चरण-बुरी तरह चलना]
[सं. कच्चरण-बुरी तरह चलना]
खरबूजा या ककड़ी का कच्चा फल।
ककड़ी की तरह की एक बेल जिसे सुखाकर और तलकर खाया जाता है। कहीं-कहीं इसकी चटनी भी बनती है।
(क) पापर बरी फुलौरी कचौरी। कुरबरी कचरी औ मिथौरी।
(ख) ककरी कचरी अरु कचनारयौ। सुरस निमोननि स्वाद सँवारयौ - २३२१।
काट कर सुखाये हुए फल- मूल आदि जो आगे तरकारी बनाने के लिए सुखाकर रख लिये जाते हैं।
कुँदरू ककोड़ा कौरे। कचरी चार चचेंडा सौरे - २३२१।
बंदन दासपनौ सो करै। भक्तनि सख्य-भाव अनुसरै। काय-निवेदन सदा बिचारै। प्रेम-सहित नवधा विस्तारै–५८९५।
वृक्ष जिसकी छाल दवा के काम आती है।
लोहे जैसी धातुओं से सोना बनानेवाला, कीमियागर।
वाक्य में संज्ञा सर्वनाम की अवस्था जो क्रिया के साथ संबंध प्रकट करती है।
मूकु, निंद, निगोड़ा, भोंड़ा, कायर, काम बनावै - १ - १८६।
जिसने दूसरे का तर्क स्वीकार कर लिया हो।
जनम साहिबी करत गयौ। काया नगर बड़ी गुंजाइस, नाहिंन कछु बढ़यौ - १ - ६४।
ओषधों के प्रयोग और नियम-संयम से वृद्ध और रोगी शरीर सशक्त और स्वस्थ करने की क्रिया।
शरीर या रूप बदल डालने की क्रिया।
व्यापारिक वस्तु-निर्माण का स्थान।
अच्छी तरह काम करनेवाला, मुस्तैद।
मम आयसु तुम माथैं धरौ। छल-बल करि मम कारज करौ - १० - ५८।
कारज सरी- काम बन जायगा, उद्देश्य की सिद्धि होगी, इच्छा पूरी होगी। उ. - सूर प्रभु के संत बिलसत सकल कारज सरी - १० ३०२।
कारज सरै- उद्देश्य सिद्ध हो, मतलब निकले, काम बने। उ.- किए नर की स्तुती कौन कारज सरै, करै सो आपनौ जन्म हारै - ४ - ११।
कारज सारथौ- काम बनाया, इच्छा पूरी की। उ.- रसना हूँ कौ कारज सारयौ, मैं यौं अपनौ काज बिगारयौ - ४ - १२।
ऐसे हैं ये स्वामि-कारजी तिनकौ मानत स्याम–पृ. ३२०।
कारणों की श्रेणी, अनेक संबंधित कारण।
एक अर्थालंकार जिसमें किसी कारण के फलस्वरूप कार्य से संबंधित पुनः किसी कार्य के होने का वर्णन हो।
कर्मचारी से संबंध रखने वाला।
सूरदास सारँग किहि कारन सारँगकुलहिं लजावत - सा. उ० ३९।
(क) बलि बल देखि, अदिति सुत-कारन त्रिपद- ब्याज तिहुँ पुर फिरि आई - १ - ६। (ख) अधर अरुन, अनूप नासा निरखि जन-सुखदाई। मनौ सुक फल बिंब कारन लेन बैठ्यौ आइ - १० - २३४।
(ग) मो कारन कछु आन्यौ है बलि, बन- फल तोरि कन्हैया - ४१८।
सब हित कारन देव, अभयपद नाम प्रताप बढ़ायौ - १ - १८८।
कारन अंत-अंत ते घटकर आदि घटत पै जोई। मद्ध घटे पर नास कियौ है नीतन में मन भोई - सा. ५।
उपादान कारण और सृष्टि का करनेवाला निमित्त कारण, सृष्टि का मूल तत्व, ईश्वर
(क) कारन-करन, दयालु दयानिधि, निज भय दीन डरै। इहिं कलिकाल-ब्याल मुख-ग्रासित सूर सरन उबरै - १. ११७। (ख) माया प्रगति सकल जग मोहै। कारन करन करै सो सोहै - १०३।
एक अर्थालंकार जिसमें किसी कारण से होनेवाले कार्य से फिर किसी कार्य के होने का वर्णन हो।
सोतन हान होन चाहत है बिना प्रानपति पाये। कर संका कारन की माला तेहि पहिराउ सुभाये - सा. ४८।
प्रेरणा करनेवाली, प्रेरक।
बुद्धि या विचार पलटनेवाला।
(क) सखियन सुख देखन कारने रंग हो हो होरी - १४१०।
(ख) दह्यौ बह्यौ के कारने कहहि बढ़ावति रारि - ११०८।
(ग) तुम सौं अब दधि कारने कौन बढ़ावै रारि - ११२३।
जो दूसरे की ओर से काम करे, गुमाश्ता।
श्लोक-रूप में की गयी किसी सूत्र की व्याख्या।
जो कारिख तन मेटो चाहत तौ कमल बदन तनु चाहि - ३३९०।
(क) अनत सुत गोरस कौं कह जात। घर सुरभी कारी धौरी कौ माखन माँगि न खात - १० - ३२६।
(ख) गगनै घहराइ जुरी घटा कारी–६८४।
(ग) स्याम सुखरासि रसरासि भारी।…..। सील की रासि जस रासि आनंदरासि, नव जलद छबि बरन कारी–१३४०।
होतपीरी काली- काली-पीली होना, गुस्सा दिखाना, झुँझलाना। उ.- ज्यों ज्यों मैं निहोरे करौं त्यौं त्यौं यौं बोलत है री अनोखी रूसनहारी। बहियाँ गहत कौन पर मगधरी उँगरी कौन पै होत पीरी कारी - २०४७।
करनेवाला (प्रत्य. रूप में)
(क) गरजत कारे भारे जूथ जलधर के १० - ३४।
(ख) डसी स्याम भुअंगम कारे - ७४७।
कारे कोसनि- बहुत दूर। उ.- तातैं अब मरियत अपसोसनि। मथुरा हू ते गये सखी री अब हरि कारे कोसनि - १० उ०.८८।
मोरन के सुर सरस सम्हारत पय सुरतिया बीच रुचकारे - सं. ९१।
(क) ताकी माता खाई कारैं। सो मरि गयी साँप के मारे - ७ - ८।
(ख) एक बिटिनियाँ सँग मेरे ही, कारैं खाई ताहि तहाँरी - ६९ - ७।
(ग) क्यौंरी कुँवरि गिरी मुरझाई १ यह बानी कही सखियन आगैं, मोकौं कारैं खाई–७४१।
सूरस्याम सुजान पाइन परो कारो काम–सा. २१।
कारौ अपनौ रंग न छाँड़ै, अनसँग कबहुँ न होई–१ - ६३।
तीनौं पन मैं भक्ति न कीन्हीं, काजर हूँ तैं कारो - १ - १७८।
सहस्रार्जुन जिसके हजार हाथ थे। यह कृतवीर्य का पुत्र था। इसे परशुराम ने मारा था।
कृतिका नक्षत्र में जन्में स्कंद जी जिनके ६ मुख माने जाते हैं।
[हिं. कचकच = वादविवाद + हरी (प्रत्य.)]
[हिं. कचकच = वादविवाद + हरी (प्रत्य.)]
[हिं. कचकच = वादविवाद + हरी (प्रत्य.)]
[हिं. कचकच = वादविवाद + हरी (प्रत्य.)]
काम की व्यवस्था या प्रबंध।
हरि सौं मीत न देख्यौ कोई। बिपति-काल सुमिरत, तिहिं औसर आनि तिरीछौ होई - १ - १०।
काल अवधि जब पहुँची आइ। तब जम दीन्हें दूत पठाइ - ६ - ४।
(क) ग्रस्यो गज ग्राह लै चल्यौ पाताल कौं, काल कैं त्रास मुख नाम आयौ। छाँड़ि सुखधाम अरु गरुड़ तजि साँवरौ पवन के गवन तैं अधिक धायौ - १ - ५।
(ख) कहत हे, आगैं जपिहैं राम। बीचहिं भई और की औरै परयौ काल सौं काम - १ - ५७।
बीता हुआ दिन, आनेवाला दिन।
समय का हेर-फेर या परिवर्तन।
कच्चा भराव जो मेहराब बनाने के लिए किया जाता है, छैन।
एक दानव जो देवताओं को पराजित करके स्वर्ग का अधिकारी बन बैठा था। अपने शरीर को चार भागों में बाँट कर यह सारा शासन-कार्य करता था। अंत में विष्णु द्वारा यह मारा गया और यही दूसरे जन्म में कंस हुआ।
कालिंदी के कूल बसत इक मधुपुरी नगर रसाला। कालनेमि अरु उग्रसेन कुल उपज्यौ कंस भुआला - १० - ४।
एक राक्षस जो रावण का मामा था।
एक यवन राजा जो जरासंध के साथ मथुरा पर चढ़ाई करने गया था। श्रीकृष्ण ने चालाकी से मुचकंद की कोपदृष्टि से इसे भस्म करा दिया था।
तब खिसियाइ कै (जरासंध) कालयवन अपने सँग ल्यायौ - १० उ० - ३।
वह साँप जिसका डसा हुआ बचता नहीं।
घन तन स्याम सुरेस पीत पट सीस मुकुट उर माला। जनु दामिनि घन रवि तारागन प्रगट एक ही काला - २५६६ और १० उ. - ४।
काला साँप जो बड़ा विषैला होता है।
कलिंद पर्वत से निकली हुई नदी यमुना।
(क) हरि सुमिरन कालिंदी कीन्हौ। हरि तब जाइ दरस तेहि दीन्हों। पानिग्रहन पुनि ताकौं कीन्हौ - १० उ. - २८।
(ख) तहँ कालिंदी बन में व्याही अति सुन्दर सुकुमार - ६५४ सारा.।
बलराम जो हल से यमुना नदी को वृंदावन खींच लाये थे।
आगामी दिवस, आने वाला दिन।
बल-मोहन तेरे दुहुँनि कौं, पकरि मँगाऊ कालि। पुहुप बेगि पठऐं बनै, जौ रे बसौ व्रजपालि - ५८९।
आजु दीपति दिव्य दीपमालिका। मनहु कोटि रवि-चंद्र कोटि छबि, मिटि जु गई निसि कालिका - ८०९।
काली नाम का सर्प जो यमुना में व्रज के समीप रहता था और जिसे श्रीकृष्ण ने वश में किया था।
कलिमल-हरन, कालिमा टारन, रसना स्याम न गायौ - १ - ५८।
बिधु बैरी सिर पर बसै निसि नींद न परई ...। घटै बढ़ै यहि पाप ते कालिमा न टरई - २८६१।
एक सर्प जिसे श्री कृष्ण ने नाथा था।
एक कुंड जो वृन्दावन में जमुना में था और जहाँ काली नामक नाग उहता था।
ग्वाल-सँग मिलि गेंद खेलत आयो जमुना तीर। काहु लै मोहिं डारि दीन्हौ, कालियादह-नीर - ५८०।
एक नाग का नाम जो वृंन्दावन में जमुना के एक कुंड या दह मैं रहता था और जिसे श्रीकृष्ण ने नाथा था।
(क) अघ अरिष्ट, केसी, काली मथि दावानलहिं पियौ - १ - १२१। (ख) अघ बक बच्छ अरिष्ट केसी मथि जल तैं काढ़यौ काली - २५६७।
जब राजा तिहिं मारन लग्यौ। देवी काली मनडगमग्यौ–५ - ३।
अग्नि की सात जिह्वा में पहली।
वृंदावन में जमुना का एक कुंड जिसमें काली नामक नाग रहा करता था।
तृषावंत सुरभी बालकगन, कालीदह, अँचयौ जल जाइ। निकसि आइ सब तट ठाढ़े भए, बैठि गए जहँ तहँ अकुलाइ - ५०१।
[सं. कालीय + हिं. दह= कुंड]
[हिं. काला+औंछ (प्रत्य.)]
[हिं. काला+औंछ (प्रत्य.)]
काल्हि जाइ अस उद्यम करौं। तेरे सब भंडारनि भरौं - ४ - १२।
[सं. कल्य=पत्यूष, प्रभात; हिं. कल]
सरस, सुरुचिपूण और आनंददायक वाक्य-रचना, कविता।
उत्तरप्रदेश का एक प्रसिद्ध तीर्थ, बनारस, वाराणसी।
काशी के अंतर्गत एक स्थान जहाँ पूर्व समय में आरे से कटकर मरना या प्राण त्याग करना बड़े पुण्य का कार्य समझा जाता था।
[सं. काशी+करपत्र, प्रा. करवत]
हल्दी की जाति का एक पौधा।
मुकुलित केस सुदेस देखियत नीलबसन लपटाये। भरि अपने कर कनक कचोरा पीवति प्रियहि चुखाये - १० उ. - १३८।
[हिं. काँसा + ओरा (प्रत्य.)]
मोटी पूरी जिसमें उरद या और किसी दाल की पीठी भरी जाती है।
पूरि सपूरि कचौरी कौरी। सदल सु उज्जवल सुन्दर सौरी - २३२१।
जो (फल आदि) पका न हो, अपक्व।
जो आँच पर अच्छी तरह पका या सिका न हो।
जिसका पूरा विकास न हुआ हो
वह भूमि जिस पर खेती करने का अधिकार हो।
कसैली वस्तुओं में रँगा हुआ।
कसैली वस्तुओं में रंगा हुआ वस्त्र।
अधिक से अधिक ऊँचाई या उन्नति।
(क) दिसि अति कालिंदी अति कारी। •••••। बिगलित कच कुच कास कुलिन पर पंक जु काजल सारी - २७२८।
(ख) अमल अकास कास कुसुमिन छिति लच्छन स्वाति जनाए - २८५४।
एक पौधा जिसमें नीले रंग के फूल होते हैं।
एक पकवान जो प्रायः कथा के अवसर पर बाँटा जाता है।
काशी नामक प्रसिद्ध नगर जिसकी गणना श्रेष्ठ तीर्थ स्थानों में है।
ऊधौ यह राधा सौं कहियौ। •••••••। मोपर रिस पावत बेकारन मैं हौं तुम्हरी दासी। तुमहीं मन मैं गुनि धौं देखौ बिन तप पायौ कासी - २९३७।
काशी के अंतर्गत काशी-करवट नामक तीर्थस्थान में जाकर आरे से गला कटाना या अन्य किसी तरह से प्राण देना बड़ा पुण्य समझा जाता था।
सूरदास प्रभु जौ न मिलैंगे लेहौं करवत कासी - २८४३।
(क) कासे कहो समूचे भूषन सुमिरन करत बखानी - सा. ५५।
(ख) सूरदास पुकार कासे करै बिन घन मोर - सा. ११०।
तेरो कासों कीजै ब्याह ? तिन कह्यौ मेरौ पति सिव आह - ५ - ७।
कह्यौ प्रिया अब कीजै सोइ ? देखौं नृपति, काह धौं होइ - ४ - २२।
यह बिपदा कब मेटहिं श्री पति अरु हौं काहिं पुकारौं - १० - ४।
[सं. कः, हिं. का+हिं (प्रत्य.)]
[सं. कः, हिं. का+हिं (प्रत्य.)]
तुमहिं समान और नहिं दूजौ काहि भजौं हौं दीन - १ - १११।
[सं. कः, हि. वा+ हिं. (प्रत्य.)]
कह्यौ तुम एक पुरुष जो ध्यायौ। ताकौ दरसन काहु न पायौ - ४ - ३।
[सं. कः, हिं. का+हू (प्रत्य.)=काहू]
(क) माधौ, नैकु हटकौ गाइ।.......। ढीठ, निठुर, न डरति काहूँ, त्रिगुन ह्वै समुहाइ - १ - ५६। (ख) वा घट मैं काहूँ कैं लरिका मेरौ माखन खायौ - १० - १५६।
[सं. कः, हिं. का+हूँ (प्रत्य.)]
तुम कब मोसौं पतित उधारयौ। काहे कौं हरि बिरद बुलावल, बिन मसकत को तारयौ - १ - १३२।
किससे, किस साधन से, क्यों।
हौं कुटुंब काहै प्रतिपारौं, वैसी मति ह्वै जाई–९ - ४०।
[सं. कथं, प्रा. कहं, हिं. काहे]
एक जाति के राक्षस जो हनुमान जी द्वारा मारे गये थे।
जिसे कर्तव्य न सूझ पड़े, भौचक्का।
किंकिणि सब्द चलत ध्वनि रुनझुन ठुमक-ठुमक गृह आवै - २५४९।
मनौ मधुर मराल-छौना किंकिनी-कल-राव- १० - ३०७।
किंकिरिनि की लाज धरि ब्रज सुबस करहु निटोल - ३४७५।
भृंगी री, भजि स्याम-कमल-पद, जहाँ न निसि कौ त्रास।….। जहँ किंजल्क भक्ति नव-लच्छन, कामज्ञान-रस एक - १ - ३३९।
‘करना' क्रिया के भूतकालिक रूप ‘किये या किया' का बहुवचन, बनाये, लगाये।
चंदन की खौरि किए नटवर कछि काछनी बनाइ री - ८८२।
पूरा जोर लगाने के लिए दाँत पर दाँत जमाना।
हिं ‘विभक्ति का’ का स्त्री. 'की'।
सूर पतित, तुम पतित उधारन, बिरद कि लाज धरे - १.१९८।
रूप-रेख-गुन-जाति-जुगति-बिनु निरालंब कित धावै - १ - २
(क) ऐसौ नीप-बृच्छ बिस्तारा। चीर हार धौं कितक हजारा–७९९। (ख) हरि मुख बिधु मेरी अँखियाँ चकोरी। राखे रहति ओट पट जतननि तऊ न मानत कितक निहोरी - पृ. ३२८।
कितना, बहुत थोड़ा, बिलकुल साधारण।
(क) कितक बात यह धनुष रुद्र कौं सकल विश्व कर लैहौं। आज्ञा पाय देव रघुपति की छिनक माँझ हठ जैहौं - २२४ सारा.। (ख) अमित एक उपमा अव लोकत जिय में परत बिचार। नहिं प्रवेस अज सिव, गनेस पुनि कितक बात संसार–९९९ सारा.।
किस परिमाण, मात्र या संख्या का; बहुत अधिक।
किस मात्रा या परिमाण में ? कहाँ तक।
नैकु नहिं घर रहति, तोहिं कितनौ कइति, रिसन मोहिं दहति, बन भई हरनी - ६९८।
रे रे मधुप कितव के बंधू चरन परस जिन करिहौं। प्रिया अंक कुंकुम कर राते ताही को अनुसरिहौं - ५६६ सारा.।
कपड़े की काट-छाँट या कतर-ब्योंत।
जो प्रामाणिक तोल या नाप से कम हो।
नासमझ, जो कुशल या चतुर न हो।
(क) राघौ जू, कितिक बात, तजि चिंत। - ९ - १०७।
(ख) कर गहि धनुष जगत कौं जीतैं, कितिक निसाचर जूथ - ९ - १४७।
(ग) सतभामा सौं इती बात जबतें न कही री। कितिक कठिन सुरतरु प्रसून की या कारन तू रूठि रही री - १० उ. - २८।
काल-बितीत कितिक जब भयौ। गाई चरावन कौं सो गयौ - ९.१७३।
मन, तोसौं किती कही समुझाइ - १ - ३१७।
मैया कबहिं बढ़ेगी चोटी। किती बार मोहिं दूध पियति भई यह अजहूँ है छोटी - १० - १७५।
किते दिन हरि..सुमिरन बिनु खोए - १.५२।
[सं. कियत्, हिं. कित्ता या कित्ते]
पावँ अबार सु धारि रमापति, अजस करत जस पायौ। सूर कूर कहै मेरी बिरियाँ बिरद कितै बिसरायौ - १ - १८८।
(क) सूर कितौ सुख पावत लोचन, निरखत। घुटुरुनि चाल - १० - १४८। (ख) मानैं नहीं कितौ समुझाई - ३९१।
कितोक बीच बिरह परमारथ जानत हौ किधौ नाहीं - ३ ०७४।
[सं. कीर्ति, प्रा. कित्ति]
(क) ह्वै अंतरधान हरि, मोहिनी रूप धरि, जाइ बन माहिं दीन्हे दिखाई। सूर-ससि किधौं चपला परम सुन्दरी, अंग भूषननि छबि कहि न जाई - ८ - १०। (ख) किधौं यह प्रतिबिंब जल में देखत किधौं निज रूप दोऊ है सुहाए - २५७०।
(क) पुनि पाछैं अघ-सिंधु बढ़त है, सूर खाल किन पाटत - १ - १०७। (क) बिनु हरि भक्ति मुक्ति नहिं होई। कोटि उपाय करो किन कोई।
(ख) तौ लगि बेगि हरौ किन पीर। जौ लगि आन न आनि पहुँचै, फेरि परैगी भीर - १ - १९१।
किसी वस्तु की लंबाई चौड़ाई का सिरा।
हाशिया, बार्डर। बगल, पार्श्व।
किनि बहकाइ दई है तुमकौं, ताहि पकरि लै जाँहि - ७५३।
देवताओं का एक वर्ग जो पुलस्त्य ऋषि का वंशज माना जाता है। किन्नरों का मुख घोड़े के समान होता है और ये संगीत में निपुण होते हैं।
एक बीना, एक किन्नर, एक मुरली, एक उपंग एक तुंमर एक रबाब भाँति सौ दुरावै–५२४२।
(क) झँझ झालरी किन्नरी रँग भीजी ग्वालिनि - २४०५।
(ख) ताल मुरज रबाब बीना किन्नरी रस सार - पृं ३४६ (४५)।
(ग) बाजत बीन रबाब किन्नरी अमृत कुंडली यंत्र - १०७३ सारा.।
कम खर्च करनेवाला, मितव्ययी।
कोक कोटि करम सरसि कहरि सूरज बिबिध कल माधुरी किमपि नाहिंन बची - २२६८।
कैसे, किस प्रकार, किस तरह।
बिदुखि सिंधु सकुचत, सिव सोचत, गरलादिक किमि जात पियौ - १० - १४३।
निर्भय किय लंकेस बिभीषन राम लखन नृप दोय - २९५ सारा.
सिंचाई के लिए बनाये गये खेतों के छोटे छोटे भाग।
बागबगीचों की नाली की तरह या गोल-तिकोनी खुदी पंक्तियाँ जिन में अलग अलग पेड़ लगाये जाते हैं, क्यारी।
‘करना’ क्रिया के भूतकालिक रूप ‘किया' का ब्रजभाषा रूप, किया।
(क) रोर कै जोर तैं सोर घरनी कियौ, चल्यौ द्विज द्वारिका-द्वार ठाढ़ौ - १ - ५। (ख) का न कियौ जन-हित जदुराई - १ - ६।
(ग) चरित अनेक किये रघुनायक अवधपुरी सुख दीन्हो—३०८ सारा.।
गर्व करत गोबर्द्धन गिरि कौ। पर्वत माँह आह वह किरका - १०४३।
कण या धूल जो आँखों में पढ़ कर दुख देती है।
जिसमें महीन गर्द मिली हो।
धूल या तिनके का कण, किनका।
शान में बट्टा लगाना, अप्रतिष्ठा।
शरीर की वह वायु जिससे झींक आती है।
(काँच आदि का) छोटा नुकीला टुकड़ा।
छाँड़ि कनक-मनि रतन अमोलक, काँच की किरच गही - १ - ३२४।
[सं. कृति=कैंची (अस्त्र)]
प्रकाश या ज्योति की रेखाएँ, रश्मि, मयूख।
ज्योति या प्रकाश की रेखाएँ, किरण।
ज्योति-रेखाएँ, मयूख, रश्मि, मरीचि।
तरनि किरन महलनि पर झाँई इहै मधुपुरी नाम - २५५९।
कर जोरे बिनती करी दुरबल-सुखदाई। पाँच गाउँ पाँचौ जननि किरपा करि दीजै। ये तुमरे कुल वंस हैं, हमरी सुनि लीजै - १ - २३८।
धर बिधसि नर करत किरषि हल,बारि, बीज बिथरै। सहि सन्मुख तउ सीत-उष्न कौं, सोई सुफल करै - १ - ११७।
लड़ाई का मैदान ठीक करनेवाली सेना जो सब से आगे जाती है।
काँच आदि का नुकीला टुकड़ा।
लोक लज्जा काँच किरिचक स्याम कंचन खानि।
(क) सुंदर तन, सुकुमार दोउ जन, सूर-किरिन कुम्हिलात - ९ - ४३। (ख) अनतहि बसत अनत ही डोलत आवत किरिन प्रकास - - २०१८।
माथे पर बाँधने का एक भूषण जिसके ऊपर कभी कभी मकुट भी पहना जाता था।
किलकने या हर्ष ध्वनि करने की क्रिया।
गरज किलक आघात उठत, मनु दामिनि पावक झार - ९ - १२४।
हँसते हैं, हर्षध्वनि करते हैं, किलकारी मारते हैं।
(क) निरखि जननी-बदन किलकत त्रिदसपति दै तारि - १० - ७१। (ख) हरि किलकत जसुदा की कनियाँ - १० - ८१।
किलकारी मारना, हर्षध्वनि करना।
पुन्य फल अनुभवति सुतहिं बिलोकि कै नँद-घरनि। सूर प्रभु की उर बसी किलकनि ललित लरखरानि - १० - १०९।
किलकते हैं, हर्ष ध्वनि करते हैं।
बिहरत बिबिध बालक सँग।….। चलत मग, पग बजति पैजनि, परस्पर किलकात। मनौ मधुर मराल-छौना बोलि बैन सिहात - १०.१८४।
स्रवनन सुनत रहत जाको नित सो दरसन भये नैन। कंचन कोट कँगूरन की छबि मानहु बैठे मैन - २५५६।
गहनों में शिखर की तरह की बनावट।
घुटने के ऊपर चढ़ा कर पहनी हुई छोटी धोती।
(क) कोउ निरखि कटि पीत कछनी मेखला रुचिकारि। कोउ निरखि हृद- नाभि की छबि डारयौ तन-मन-बारि - - - ६३४। (ख) खेलत हरि निकसे ब्रज खोरी। कटि कछनी पीताम्बर बाँधे, हाथ लए भौंरा, चक, डोरी - ६७२।
विष्णु के चौबीस अवतारों में से एक।
सुरनि-हित हरि कछपरूप धारयौ। मथन करि जलधि, अंमृत निकारयौ - - ८ - ८।
मिट्टी का चौड़े मुँह का एक पात्र जिसकी अवँठ ऊँची और दृढ़ होती है।
[सं. क = जल + क्षरण = गिरना]
घुटने से ऊँची धोती पहनना।
नदी या अन्य जलाशय के किनारे की नीची और तर भूमि, खादर, दिवारा।
थोड़ी संख्या या मात्रा का, जरा, थोड़ा, टुक।
[सं. किंचित्, पा. किंची, पू. हिं. किछु, हिं. कुछ]
ऊधो जो तुम बात कही। ताको कछुअ न उत्तर आवै समुझि बिचारि रही - ३३७०।
एक जल-जन्तु जिसकी पीठ बड़ी कड़ी होती है। यह जमीन पर भी चल सकता है।
चकित सकल परस्पर बानर बीच परी किलकार। तहँ इक अद्भुत देखि निसिचरी सुरसामुख-बिस्तार - ९ - ७४।
किलकते हैं, ध्वनि करते हैं।
गर्जत गगन गयंद गुजरत अरु दादुर किलकार - २८२०।
किलकारी भरते हैं, हर्षध्वनि करते हैं।
गावत, हाँक देत, किलकारत, दुरि देखत नंदरानी। अति पुलकति गदगद मुख बानी, मन-मन महरि सिहानी - १० - २५३।
उत्साह दिखाना, हर्षध्वनि करना।
(क) द्रुम गहि उपाटि लिए, दै दै किलकारी। दानव बिन प्रान भए, देखि चरित भारी - ९९६।
(ख) रीछ लंगूर किलकारि लागे करन, आन रघुनाथ की जाइ फेरी - ९ - १३८।
संयोग शृंगार का एक हाव जिसमें एक साथ कई भाव नायिका प्रकट करती है।
किलकारी मारकर, हर्षध्वनि करके, आनंद प्रकट करके।
(क) आपु गयौ तहाँ जहाँ प्रभु परे पालनै, कर गहे चरन अँगुठा चचोरैं। किंलकि किलकत हँसत, बाल सोभा लसत, जानि यह कपट, रिपु आयौ भोरैं - १० - ६२। (ख) हँसे तात मुख हेरिकै, करि पग - चतुराई। किलकि झटकि उलटे परे, देवन-मुनि राई - १० - ६६।
मछली-खानेवाली एक छोटी चिड़िया जो पानी से आठ दस हाथ ऊपर उड़ती हुई बड़ी सतर्कता से मछली को देखती है।
जैसैं मीन किलकला दरसत, ऐसैं रहौ प्रभु डाटत - १ - १०७।
चिल्लाता हुआ, भयंकर शब्द करता हुआ।
रावन, उठि निरखि देखि, आजु लंक घेरी। ••••••। गहगरात किलकिलात अंधकार आयौ। रबि कौ रथ सूझत नहिं, धरनि गगन छायौ - ९.१३९।
किलकारी मारेगा, हर्षध्वनि करेगा।
काकी ध्वजा बैठि कपि किलकिहि, किहिं भय दुरजन डरिहैं - १ - २९।
किलकारी भरी, हर्षध्वनि की।
सुपने हरि आये हौं किलकी - २७८६
किलकता है, किलकारी भरता है, हर्षध्वनि करता है।
आँनंद प्रेम उमंगि जसोदा खरी गोपाल खिलावै। कबहुँक हिलके-किलकै जननी-मन-सुख-सिंधु बढ़ावै - १० - १३०।
बहुत से कीड़ों या छोटे छोटे जंतुओं का थोड़ी जगह में हिलना-डोलना, चंचल होना।
तंत्र-मंत्र से भूत-प्रेत की बाधा रुकाना।
दीन्हे रहत किवार- द्वार बंद रखता है। उ.- गढ़वै भयौ नरकपति मोसो, दीन्हे रहत किवार। सेना साथ भाँति भाँतिन की, कीन्हें पाप अपार - १ - १४१। लाइ किवार- किवाड़ लगाकर, द्वार बंद करके। उ.- सूर पाप कौ गढ़ दृढ़ कीन्हौ, मुहकम लाई किवार - १ - १४४।
लंक गढ़ माहिं आकास मारग गयो, चहूँ दिसि बज्र लागे किवारा - ९ - ७६।
११ से १५ वर्ष की अवस्था का बालक।
मैसूर प्रदेश का प्राचीन नाम।
किष्किंध देश की एक पर्वत श्रेणी।
‘कौन’ का विभक्तिरहित रूप।
सुखाया हुआ छोटा अंगूर, किशमिश।
(कोई) का वह रूप जो विभक्ति लगने पर प्राप्त होता है।
महा मधुर प्रिय बानी बोलत, साखामृग, तुम किहि के तात - ९ - ६९।
हिं. विभक्ति ‘क’ का स्त्री।
बासुदेव कौ बड़ी बड़ाई। जगतपिता जगदीस जगतगुरु, निज भक्तनि की सहत ढिठाई - १ - ३।
हिं, ‘करना’ के भूत कालिक रूप ‘किया' का स्त्री,।
अब भ्रम-भँवर परयौ व्रजनायक निकसन की बस विधि की। - १ - २१३।
मगध-प्रदेश का प्राचीन नाम।
हर्ष-भय में ‘की की' शब्द करना।
११ वर्ष से १५ वर्ष तक की अवस्था का।
११ वर्ष से १५ वर्ष तक की अवस्था का बालक।
नयौ नेह, नयौ गेह, नयौ रस, नवल कुँवरि वृषभानु किसोरी - ६८५।
किहिं भय दुरजन डरिहै - १ - २९।
कूक, कीक, चिल्लाहट, चीत्कार।
सूरदास प्रभु भलैं परे फँद, देउँ न जान भावते जी कैं। भरि गंडूक, छिरक दै नैननि, गिरिधर भाजि चले दै कीकै १० - २८७।
(क) सुनि सुनि साधु-बचन ऐसौ सठ, हठि औगुननि हिरानौ। धोयौ चाहत कीच भरौ पट, जल सौं रुचि नहिं मानौ - १ - १९४। (ख) भाजन फोरि दहीं सब डारयौ माखन कीच मचायौ - १० - ३४२।
(ग) कुमकुम कज्जल कीच बहै जनु कुच जुग पारि परी - २८१४।
राजा विराट का साला जो उसका सेनापति भी था। पांडवों के अज्ञातवास काल में इसने द्रौपदी पर कुदृष्टि डाली थी। इसलिए भीम ने इसे मार डाला था।
करते हैं, (कार्य) संपादन करते हैं।
(क) जो कछु करन कहत सोई सोइ कीजत अति अकुलाए - १ १६३।
(ख) मोहन तेरे आधीन भये री। इति रिस कबते कीजत री गुनआगरी नागरी - २२५०।
किसी काम के संपादन के लिए निवेदन करना, करिए।
अब मोहिं कृपा कीजिए सोइ। फिर ऐसी दुरबुद्धि न होइ - ४ - ५।
(क) मैं-मेरी कबहूँ नहिं कीजै, कीजै पंच-सुहायौ - १ - ३०२।
(ख) दीन-बचन संतनि-सँग दरस-परस कीजै - १ - ७२।
(ग) हरि को दोष कहा करि दीजै जो कीजै सो इनको थोर - पृ. ३३५।
अवसर गऐं बहुरि सुनि सूरज कह कीजैगी देह। बिछुरत हंस बिरह कैं सूलनि, झूठे सबै सनेह - ८०१।
नृप कै हाथ पत्र यह दीजौ, बिनती कीजौ मोरि - ५८३।
उड़ने या रेंगनेवाले छोटे-छोटे जंतु।
क्रीड़ी तनु ज्यों पाँख उपाई- चिउँटी के पंख निकलना। इस तरह इतराना, क्रोध या गर्व करना कि अंत में मरना ही पड़े। उ.- गिरिवर सहितै ब्रजै बहाई। सूरदास सुरपति रिस पाई। कीड़ी तनु ज्यौं पाँख उपाई - १०४१।
अथवा, किधौं, कैंधौं, या, या तो।
(क) निसि के उनींदे नैन, तैसे रहे ढरि ढरि। कीधौं कहूँ प्यारी को लागी टटकी नजरि - ७५२। (ख) हँसत कहत कीधौं सतभाव - १२४०। (ग) कीधौं कौन कार्य को आये सो पूँछत हौं तोहि - ८१३ सारा.।
नदी या जलाशय के किनारे की जमीन, कछार।
विष्णु के २४ अवतारों में से एक।
हरि जू की आरती बनी। अति विचित्र रचना रचि राखी, परति न गिरा गनी। कच्छप अध आसन अनूप अति, डाँडी सहस फनी - २ - २८।
(क) दुष्टनि दुख, सुख संतनि दीन्हौ, नृप-व्रत पूरन कीन - ९ - २६। (ख) मुकुट कुंडल किरनि रवि छबि परम बिगसित कीन - २३५८।
(ग) सूरदास प्रभु बिन गोपालहिं कत बिघनै एई कीन - २७६८।
रची, लिखी, बनायी, संपादित की।
नंदनंदनदास हित साहित्यलहरी कीन - सा. १०९।
(क) बरज्यौ आवत तुम्हैं असुर-बुद्धि इन यह कीनी - ३ - ११।
(ख) एक मीन ने भक्ष कियो तब हरि रखबारी कीनी–६९३ सारा.।
बाम बाम जिन सजनी कीनी। तिनकौ ऊधौ कहाँ बात बढ़ हम हित जोग जुगुत चित चीनी - सा. ५९।
अहुँठ पैग बसुधा सब कीनी - १० - १२५।
थकित भए कछु मंत्र न फुरई, कीन मोह अचेत - १ - २९।
भूत. ‘किया’ का व्रज, प्रयोग, किया, संपादित किया।
नर तैं जनम पाइ कह कीनौ - १ - ६५।
जो मेरैं लाल खिझावै। सो अपनो कीनौ पावै - १० - १८३।
बाँधन गए, बँधाए आपुन, कौन सयानप कीन्यौ - ८.१५।
‘करना' क्रिया के भूतकालिक रूप ‘किया' का ब्रजभाषिक स्त्रीलिंग, की।
भक्तनि हित तुम कहा न कियौ ? गर्भ परिच्छित इच्छा कीन्ही अम्बरीष-ब्रत राखि लियौ - १.२६।
करना' क्रिया के भूतकालिक रूप ‘किये' का ब्रजभाषा बहुवचन अथवा आदर-सूचक रूप, कार्य संपादित किये।
(क) मागध हत्यौ, मुक्त नृप कीन्हें, मृतक बिप्र-सुत दीन्ह्यौ - १ - १७। (ख) कीन्हें केलि बिबिध गोपिन सों सबहिन कौं सुख दीन्हें - ८६७ सारा.।
कीन्हें गुरु चौबीस सीख लै जदु को दीन्हो ज्ञान - ६२ सारा.।
‘करना’ क्रिया के भूतकालिक रूप ‘किया' का ब्रजभाष रूप, किया।
(क) रघुकुल राघव कृष्न सदा ही गोकुल कीन्हीं थानौ - १ - ११। (ख) कौरौ-दल नासि नासि कीन्हौं जन-भायौ- १- २३।
बहुत जन्म इहिं बहु भ्रम कीन्ह्यौ - ४.११।
राम-कृष्ण लीला के भजन, गीत या कथा।
स्रवन, कीर्तन, स्मरनपाद, रत अरचन बंदन दास - ११६ सारा.।
राम-कृष्ण की लीला को गानेवाला, कीर्त्त करनेवाला।
[सं. कीर्तन+इया (प्रत्य.)]
तेरो तनु धनरूप महागुन सुन्दर स्याम सुनी यह कीर्ति - २२२३।
बनाये, चुने, स्थापित या नियुक्त किये।
आठों लोकपाल तब कीये अपन अपन अधिकार २० सारा.।
नंदनंदन की कीरत सूरज संभावन गावै - सा. ६३।
जाके गृह मैं हरि-जन जाइ। नामकीरतन करै सो गाइ - ६ - ४।
राम कृष्ण-लीला संबंधी भजन या गीत।
किसी की किर्त्ति की स्मृति-रक्षा में निर्मित स्तंभ।
वह कार्य या वस्तु जिससे किसी की कीर्त्ति की स्मृति-रक्षा की जाय।
नाक में पहनने का एक छोटा आभूषण, लौंग।
मंत्र का प्रभाव नष्ट करना।
चक के बीच की कील या धुरी जिस पर वह घूमता है।
रीछ कीस बस्य करौं, रामहिं गहि ल्याऊँ - ९ - ११८।
(हिं. कुँअर+एटा (प्रत्य.)]
प्रतिष्ठित पदाधिकारी या धनी की पुत्री।
ठाढ़ी कुँअरि राधिका लोचन मोचत तहँ हरि आए ६७५।
[सं. कुमुदिनी, प्रा. कुउई]
लाख का पोला गोला, कुंकुमा।
लाख का पोला गोला जिसमें गुलाल भर कर मारते हैं।
सिकुड़ने या सिमटने की क्रिया।
कुंचित अलक, तिलक, गोरोचन, ससि पर हरि के ऐन - १० - १०३।
धर्मवीर कुलकानि कुंची कर तेहि तारौ दै दूरि धरयौ री - १४४८।
स्थान जो लतादि से मंडप की तरह ढका हो।
जहँ वृन्दावन आदि अजिर जहँ कुंजलता बिस्तार। तहँ बिहरत प्रिय प्रीतम दोऊ निगम भृंग गुंजार।
कुंजकी खोरी - कुंजगली, पतली गली।
सूरदास प्रभु सकुचि निरखि मुख भजे कुंज की खोरी - १० - ६६७।
अन्तःपुर में आने-जाने का अधिकारी द्वारपाल या चोबदार, कंचुकी।
लताओं-बेलों से छायी हुई पगडंडी।
कुंजों में विहार करनेवाला।
(क) अगम अगोचर, लीलाधारी। सो राधा-बस के कुंजबिहारी - १० - ३।
(ख) जबते बिछुरे कुंजबिहारी। नींद न परै घटै नहिं रजनी ब्यथा बिरह ज्वर भारी - २७८२।
तरकारी बोने-बेचनेवाली एक जाति।
कुंजों में विलास करने वाले।
इहि घट प्रान रहत क्यों ऊधौ विछुरे कुंजबिलासी–३३०५।
ज्यों सिवछति दरसन रवि पायौ जेहि गरनि गरयौ। सूरदास प्रभु रूप थक्यौ मन कुंजल पंक परयौ - १४८९।
कुंज में विहार करनेवाला पुरुष।
(क) जबै आवौं साधु-संगति कछुक मन ठहराइ - १ - ४५। (ख) सूर कहौ क्यौं कहि सकै, जन्म - कर्म-अवतार। कहे कछुक गुरु-कृपा तें श्री भागवतऽनुसार - २ - ३६।
कछुक कही नहिं जात- दुविधा या असमंजस के कारण कुछ कहा नहीं जाता। उ. - स्रवन सुनत अकुलात साँवरो कछुक कही नहिं जात - सारा० - ९४९।
(क) तुम प्रभु अजित, अनादि, लोकपति, हौं अजान मतिहीन। कछुव न होत निकट उत लागत, मगन होत इत दीन - १ - १८१। (ख) जोग-जुक्ति हम कछुव न जानैं ना कछु ब्रह्मज्ञानो - ३०६४।
(क) जय अरु विजय कथा नहिं कछुवै, दसमुख बध-बिस्तार - १ - २१५। (ख) बालापन खेलत ही खोयौ, जोबन जोरत दाम। अब तो जरा निपट नियरानी, करयो न कछुवै काम-१-५७।
(ग) तीरथ ब्रत कछुवै नहिं कीन्हौ, दान दियौ नहिं जागे----१-६१।
[सं. कश्चित्, पा. कोचि, हिं. कुछ]
जौ सुरपति कोप्यौ ब्रज ऊपर, क्रोध न कछू सरै–१ - ३७।
[सं. कश्चित्, पा. कोचि, हिं. कुछ]
घुटने के ऊपर तक पहनी हुई धोती, कछोटी, ऊपर चढ़ायी हुई धोती।
जो तेज न हो, गुठला, कुंद।
जिसकी बुद्धि तेज न हो, सूर्ख।
हिचक, कुंठित होने की क्रिया।
अग्निहोत्र आदि करने का गढ़ा अथवा मिट्टी या धातु का पात्र जिसमें आग जलायी जाती है।
(क) जज्ञ पुरुष प्रसन्न सब गए। निकसि कुंड तैं दरसन दए - ४ - ५। (ख) आहुति जज्ञकुंड़ में डारि। कह्यौं पुरुष उपजै बल भारि।
लपेटी हुई रस्सी या कपड़ा, इँबा, गेंड़ुरी।
जन्म के ग्रहों की स्थिति बतानेवाला चक्र
एक पटह एक गोमुख एक आवझ एक झालरी एक अमृत एक कुंडरी एक एक डफ कर धारे - २४२५।
कानों में पहनने का सोने-चाँदी का एक आभूषण।
परम रुचिर मनिकंठ किरनिगन, कुंडल-मुकुटा-प्रभा न्यारी - १ - ६९।
गोरखनाथ के अनुयायियों का कान में पहनने का गोल आभूषण।
वह मंडल जो बदली में चंद्रमा या सूर्य के किनारे दिखायी देता है।
(साँप की) फेरों में सिमटकर बैठने की स्थिति।
शरीर का एक कल्पित अंग जो मूलाधार में सुषुम्ना नाड़ी के नीचे साढ़े तीन कुंडली में घूमा माना गया है।
दोहे और रोला के योग से बनानेवाला एक छंद।
ज्योतिष के अनुसार वह चक्र जो जन्मकाल में ग्रहों की स्थिति सूचित करने के लिए बनाया जाता है।
साँप के गोलाकार बैठने का ढंग।
दरवाजे की बड़़ी कुंडी, साँकल।
तसले या कंडलदार थाली की तरह का बड़ा गहरा बर्तन।
पूँगी फलजुत जल निरमल धरि, आनी भरि कुंडी जो कनक की। खेलत जूप सकल जुवतिनि मैं, हारे रघुपति, जिती जनक की - ९ - २५।
ठौर ठौर अभ्यास महाबल करत कुंत-असि-बान - ९ - ७५।
(क) कुंतल कुटिल, मकर कुंडल, भ्रुव नैन बिलोकनि बंक - १०.१५४। (ख) स्रवन मनि ताटंक मंजुल कुटिल कुंतल छोर।
वेश बदलनेवाला पुरुष, बहुरूपिया।
राजा पांडु की स्त्री। यह शूरसेन यादव की कन्या और वसुदेव की बहन थी। इस नाते श्रीकृष्ण की यह बुआ थी। भोज देश के राजा कुंतिभोज इसके चाचा थे और उन्होंने इसे गोद लिया था। दुर्वासा ऋषि की सेवा करके इसने पाँच मंत्र प्राप्त किये थे जिनके द्वारा यह देवताओं का आह्वान कर पुत्र उत्पन्न करा सकती थी। मंत्रों की सत्यता जाँचने के लिए इसने कुमारी अवस्था में ही सूर्य से 'कर्ण’ को उत्पन्न किया था। विवाह के बाद धर्म, पवन और इंद्र द्वारा कमशः युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन इसके उत्पन्न हुए थे।
एक पौधा जिसमें मीठी सुगंध वाले सफेद फूल लगते हैं। इसकी कलियों से दाँतों की उपमा दी जाती है।
(क) अति ब्याकुल भई गोपिका ढूँढ़ति गिरिधारी। बूझति हैं बन बेलि सौं देखे बनवारी ...। खुझा मरुवा कुंद सों कहैं गोद पसारी। बकुल बहुलि बट कदम पै ठाढ़ी ब्रजनारी - १८२२।
(ख) चिबुक मध्य मेचक रुचि उपजत राजति बिंब कुंद रदनी - पृ. ३१६।
स्वच्छ स्वर्ण, बढ़िया सोना।
आसन एक हुतासन बैठी, ज्यों कुंदन-अरुनाई। जैसैं रवि इक पल धन भीतर बिनु मारुत दुरि जाई - ९ - १६२।
विदर्भ देश का एक नगर जिसके राजा भीष्मक की कन्या रुक्मिणी को श्रीकृष्ण हर लाये थे।
कुंदनपुर को भीषम राई - १० उ. - ७।
लकड़ी का वह छोटा टुकड़ा जिस पर रखकर लकड़ी गढ़ी जाती है।
कपड़ों को मुगरी से कूटना।
[हिं. कुँदेरना+एरा (प्रत्य.)]
स्रम-स्वेद सीकर गुंड मंडित रूप अंबुज कोर। उमँगि ईषद यौं स्रम तज्यौ पीयूष कुंभ हिलोर - पृ. ३१०।
हाथी के सिर के दोनों ओर का उभड़ा हुआ भाग।
(क) बाज सौं टूटि गजराज हाँकत परयौ मनौ गिरि चरन धरि लपकि लीन्हे। बारि बाँधे बीर चहुँधा देखत ही बज्र सम थाप बल कुंभ दीन्हे - २५९०। (ख) तब रिस कियौ महावत भारी••••••। अंकुस राखि कुंभ पर करष्यौ हलधर उठे हँकारी - २५९४।
प्राणायाम के तीन भागों में एक।
एक पर्व जो प्रति बारहवें वर्ष होता है।
प्राणायाम के तीन भागों में से एक जिसमें साँस लेकर वायु को शरीर के भीतर रोका जाता है।
जोग बिधि मधुबन सिखि आई जाइ…..। सब आसन रेचक अरु पूरक कुंभक सीखे पाइ - ३१३४।
एक राक्षस का नाम जो रावण का भाई और बड़ा बली था। प्रसिद्धि है कि यह छह महीने सोता था।
रावण का भाई जो छः महीने तक सोता था।
कुंभज, कुंभजात, कुंभयोनि, कुंभसंभव
अगस्त्य ऋषि जिनकी उत्पत्ति घड़े से हुई थी।
कांति मलीन होना, सुस्त हो जाना, उदासी छाना।
(क) हरबराइ उठि धाइ प्रात ते बिथुरीं अलक अरु बसन मरगजे तैसीये कुँभिलानी मात - ११८३।
(ख) प्रफुलित कमल गुंजार करत अलि पहु फाटी कुमुदिनि कुँभिलानी - २२४८।
उदास हो गयी, सुस्त हो गयी।
(ख) निठुर बचन सुनि स्याम के जुवती बिकलानी।….। मनो तुषार कमलन परयौ ऐसे कुँभिलनी - पृ. ३४१।
(ग) ऊधौ जिय जानी मन कुभिलानी कृष्न संदेस पठाये - ३४४१।
कुम्हला गया, उदास हो गया, प्रभाहीन हो गया।
अति रिसि कृस ह्वै रही किसोरी करि मनुहारि मनाइए। …..। छूटे चिहुर बदन कुँभिलानौ सुहथ सँवारि बनाइए - १६८८।
सूख जाती है, मरझा जाती है।
जल में रहहि जलहि ते उपजहि जल ही बिन कुँभिलाहि - २७५७।
एक नरक जिसमें मांसाहारी व्यक्ति खौलते हुए तेल में डाला जाता है।
हस्तिनापुर का एक नाम, पुरानी दिल्ली।
इक दिन नृपति सुरुचि-गृह अयौ। उत्तम कुँवर गोद बैठायौ - ४ - ९।
राजकन्या,प्रतिष्ठित व्यक्ति की कन्या।
(क) गुप्त प्रीति न प्रगट कीन्ही, हृदय दुहुनि छिपाइ। सूंर प्रभु के बचन सुनि-सुनि रही कुँवरि लजाइ - ६७६। (ख) नयौ नेह, नयौ गेह, नयौ रस, नवल कुँवरि बृषभानु-किसोरी - ६८५।
सूरदास बलि-बलि जोरी पर, नंद-कुँवर बृषभानु कुँवरिया–६८८।
एक गीत जो बरसात में गाया जाता है।
कुँवरी अहि जसु हेमखंभ लगि ग्रीव कपोत बिसारी - २३०४।
[हिं. कुँवर+एटा (प्रत्य.)]
[सं. कुमार, प्रा. कुँवार]
एक उपसर्ग जो शब्द के आदि में जुड़कर 'नीच', ‘बुरा' आदि का अर्थ देता है, जैसे कुपुत्र, कुसंग।
[प्रा. कुँमार, हिं. क्वार]
सिकुड़ जाना, संकुचित होना।
[सं. कुक्कट, पुं. हिं. कुकड़ा]
संभु की सपथ, सुनि कुकपि कायर कृपन, स्वास आकास बनचर उड़ाऊँ - ९ - १२९।
बुरा या खोटा काम, दुष्कर्म।
बुरा कवि, पापी कवि, ऐसा कवि जिसने कोई पुण्य कार्य न किया हो।
सूरदास बहुरौ बियोग गति कुकवि निलज ह्वै गावत - ३३९२।
[हिं. कुक्कुर=कुत्ता+मूत]
[सं. कुक्कुभ, प्रा. कुक्कुह]
चारों ओर ब्यास खगपति के झुंड झुंड बहु आये। ते कुखेत बोलत सुनि सुनि के सकल अंग कुम्हिलाये।
[सं. कुक्षेत्र, प्रा. कुखेत]
हंस काग को भयौ संग।...। जैसे कंचन काँच संग ज्यौं चंदन संग कुगंध। जैसे खरी कपूर दोउ यक मय यह भइ ऐसी संधि - २९१२।
वह हठ या आग्रह जो उचित न हो।
बार बार कौंचना या चुभाना।
सिकुड़न, सिमिटना, संकुचित होना।
जिसकी नीति ठीक न हो, दुष्ट, अन्याय, अत्याचारी।
जिनि हति संकट, प्रलंब, तृनावृत, इंद्र-प्रतिज्ञा टाली। एते पर नहिं तजत अघोड़ी कपटी कंस कुचाली - २५३७।
बुरी या अशुभ बात, अमंगलसूचक समाचार।
कहो कैसे मिले स्याम संघाती। कैसे गए सुवंत कौन बिधि परसे हुते बस्तर कुचिल कुजाती - १० उ. - ७२।
मैले वस्त्रवाला, मैला-कुचैला, मलिन।
(क) हौं कुचील, मतिहीन सकल बिधि, तुम कृपालु जगजान - १ - १००। (ख) कज्जल कीच कुचील किये तट अंचर, अधर कपोल। थकि रहे पथिक सुयश हित ही के हस्त चरन मुख बोल - ३४५४।
(ग) कुटिल कुचील जन्म की टेढ़ी सुंदरि करि धर आनी–३०८६।
(घ) दुर्बल बिप्र कुचील सुदामा ताको कंठ लगाये - ८१८ सारा.।
मैले-कुचैलों से, मलिन लोगों से।
साधु-सील, सद्रूप पुरुष कौ, अपजस बहु उच्चरतौ। औघड़-असत-कुचीलनि सौं मिलि, मायाजल मैं तरतौं - १ २०३।
[सं. कुचेल, हिं. कुचील+नि (प्रत्य.)]
मैले या गंदे वस्त्रवाला।
पट कुचैल, दुरबल द्विज देखत, ताके तंदुल खाये (हो)। संपति दै वाकी पतिनी कौं, मन-अभिलाष पूराए (हो) - १.७।
[सं. किंचित, पा. किंची, पू. हिं. किछु]
कोई (वस्तु), थोड़ी (वस्तु)।
जब वह विप्र पढ़ावै कुछ कुछ सुनके चित धरि राखै - ११० सारा.।
कोई (विशेषता या बड़ी बात)।
जो कुछ करै सो थोरा- सब कुछ करने की सामर्थ्य है, शक्ति या सामर्थ्य इतनी अधिक है कि बड़े से बड़ा काम करना भी उनके लिए साधारण बात होगी। उ. - इतनी सुनत घोष की नारी रहसि चली मुख मोरी। सूरदास जसुदा कौ नंदन, जो कछु करै सो थोरी - १० - २९३।
भाल बिसाल ललित लटकन मनि, बालदसा के चिकुर सुहाए। मानौ गुरु सनि-कुज आगैं करि, ससिहिं मिलन तम के गन आए - १० - १०४।
(कु=पृथ्वी) पृथ्वी का पुत्र नरकासुर।
पतित या नीच, दीन-दुखी या अनाथ।
कहौ कैसे मिले स्याम संघाती। कैसे गये सु कंत कौन बिधि परसे हुए बस्तर कुचिल कुजाती - १० उ. - ८७।
बुरा मेल या संबंध, कुसंग।
ता दिन तें कजरा मैं देहौं। जो दिन नँदनंदन के नैनन अपने नैन मिलैहौं - २७७६।
बैल जिसकी आँखें काली हों।
जिस (नेत्र) में काजल लगा हो, अंजनयुक्त।
[हिं. काजल+आरा (प्रत्य.)]
[हिं. काजल+आरा (प्रत्य.)]
(क) कजरी कौ पय पियहु लाल जासौ तेरि वेनि बढ़ै - १० - १७४। (ख) अपनी अपनी गाइ ग्वाल सब आनि करौ इक ठौरी। …...| पियरी, मौरी, गोरी, गैनी, खैरी, कजरी जेती - ४४५। (ग) कजरी, धौरी, सेंदुरी, धूमरि मेरी गैया - ६६६।
एक त्योहार जो कहीं सावन की पूर्णिमा को और कहीं भादों बड़ी तीज को मनाया जाता है। इस दिन से कजली गाना बंद कर दिया जाता है।
मिट्टी के कुज्जे में जमाई हुई मिश्री।
एक जंगली वृक्ष, कुरैया, कर्ची।
कुटज कुमुद कदंब कोविद कनक आरि सुकंज। केतकी करवील बेलउ बिमल बहु बिधि मंत - २८२८
नायक की दूती। झगड़ा करनेवाली।
(क) साँचे सूर कुटिल ये लोचन ब्यथा मीन छबि छानि लयी - २५३३।
(ख) मल्लयुद्ध प्रति कंस कुटिल मति छल करि इहाँ हँकारे - २५६९।
(ग) रिपु भ्राता जान्यो जु विभीषन निसिचर कुटिल सरीर - २९० सारा.।
कुटिल भ्रू पर तिलक रेखा सीस सिखिनि सिखंड - १ - ३०७।
लला हौं वारी तेरैं मुख पर। कुटिल अलक मोहन मन बिहसनि, भृकुटी बिकट ललित नैननि पर - १० - ९३। (ख) कुटिल कुंतल मधुप मिलि मनु कियौ चाहत लरनि - ३५१।
पर्णशाला, कुटिया, झोपड़ी।
तुम लछिमन या कुंज-कुटी मैं देखौ जाइ निहारि। कोउ इक जीव नाम मम लै लै उठत पुकारि-पुकारि - ९ - ६५।
सूरदास स्वामी अरु प्यारी बिहरत कुंज कुटीर - १५६१।
परिवार या कुटुम्ब के अन्य प्राणी।
उग्रसेन सब कुटुम लै ता ठौर सिधायौ - १० उ. - ३।
नैनन यह कुटेव पकरी। लूटत स्याम रूप आपुन ही निसि दिन पहर घरी - पृ. ३३०।
[सं. कु=बुरा+हिं. टेव= आदत]
सुख-विलास के समय स्त्रियों का दुख या कष्ट का बनावटी भाव जो विशेष प्रिय लगता है।
यह सब कलियुग कौ परभाव, जौ नृप कौ मन गयौ कुठाँव।
संकट में, विपत्ति के स्थान में।
जौ हरि ब्रत निज उंर न धरैगौ। तौ को अस त्राता जु अपन करि, कर कुठावँ पकरैगौ - १ - ७५।
बुरा विचार, प्रबंध या आयोजन।
लकड़ी काटने की कुल्हाड़ी।
जद्यपि मलय-बृच्छ जड़ काटै, करकुठार पकरै। तऊ सुभाव न सीतल छाँड़ै, रिपु-तन-ताप हरै १ - ११०।
वह जिसके हाथ में परशु या फरसा हो, परशुराम।
सोना-चाँदी गलाने की घरिया।
[सं. कु=बुरा+हिं. ठाहर=जगह]
[सं. कु=बुरा+हिं. ठाहर=जगह]
मिट्टी का बड़ा बरतन जिसमें अनाज रखा जाता है।
मन ही मन कुढ़ना या क्षुब्ध होना।
नदी के घुमाव के बीच की जमीन।
जो काम का ढङ्ग न जाने, उजड्ड।
बुरी चाल का, जिसका आचरण ठीक न हो।
[सं. क्रुद्ध, प्रा. कुड्ढ]
दुखी होना, मन मसोसकर रह जाना।
बुरा स्वभाव, बुरी प्रकृति।
वह डंडा, जिससे भाँग घोटी जाय।
सेस न पायौ अंत जाकी फनवारी। पवन बुहारत द्वार सदा संकर कुतवारी - ११२८।
पुलिस का एक बड़ा कर्मचारी जिनके अधीन कई थाने और थानेदार रहते हैं, कोतवाल।
दगाबाज कुतवाल काम रिपु, सरबस लूटि लयो - १ - ६४।
[सं. कोटपाल, हिं. कोतवाल]
क्रीड़ा, आनंद, आमोद-प्रमोद।
(क) उर मेले नंदराई कै गोप-सखनि मिलि हार। मागध-बंदी-सूत अति करत कुतुहल बार - १० - २७।
(ख) साँझ कुतूहल होत है जहँ तहँ दुहियत गाय - ४९२।
सफेद भेड़ जिसकी आँख के बाल काले होते हैं।
एक गीत जो बरसात में गाया जाता है।
एक त्योहार जो कहीं सावन की पूर्णिमा को और कहीं भादों बड़ी तीज को मनाया जाता है। इस दिन से कजली का गीत गाना बन्द कर दिया जाता है।
वे हरे अंकुर जिन्हें कजली का त्योहार मनाकर स्त्रियाँ अपने संबंधियों को बाँटती हैं।
[हिं. काजल+औटा (प्रत्य.)]
(क) कामी, कृपिन, कुचील, कुदरसन, को न कृपा करि तारयौ। तातैं कहत दयाल देवमनि, काहैं सूर बिसारयौ।–१ १०१। (ख) कामी, कुटिल, कुचील कुदरसन, अपराधी, मतिहीन - १ - १११।
जो देखने में अच्छा न लगे।
दाँवघात करनेवाला, छलीकपटी।
बुरा या अनुचित (धन का) दान।
तनु गिरि जानि अनि अवनी इहि उडि भीत रहे। गमन कान्ह छन छन तु काम ससि किरनि कुदार गहे - २८९८।
जमीन खोदने या गोड़ने का औजार।
वह दिन जब कष्टदायक घटना हो।
खरोदने या खुरचने पर निकलनेवाला चुरा।
खरोदने या खुरचने की क्रिया।
वृन्दा बन हरि बैठे धाम। काहे को गथ हरयौ सबन को काहे अपनो कियो कुनाम - १८८१।
हरि, हौं महा अधम संसारी। आन समुझ मैं बरिया ब्याही, आसा कुमति कुनारी - १ - १७३।
बजता हुआ, झनकारता हुआ, शब्द करता हुआ।
(क) कनक-रतन-मनिरचित कटि-किंकिनि कुनित पीतपट तनियाँ - १० - १०६। (ख) किंकिनी कटि कुनित कंकन, काचुरी झनकार। हृदय चौकी चमक बैठो सुभग मोतिनहार।
(ग) सखि हरषि झूले बृषभानुनंदिनी सोभि सँग नंदलालनो। मनिमय नूपुर कुनित कंकन किंकिनी झनकारनो - २.२८०।
स्वान कुब्ज, कुपंगु, कानौ, स्रवन-पुच्छ-विहीन। भग्न भाजन कंठ, कृमि सिर, कामिनी आधीन - १ - ३२१।
हानिकारी भोजन करने की क्रिया।
जो हुती निकट मिलन की आसा सो तो दूर गयी। जथा योग ज्यों होत रोगिया कुपथी करत नयी--२९०१।
वह आहार-विहार जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारी हो।
जीरन पट कुपीन तन धारि। चल्यौ सुरसरी, सीस उघारि-१-३४१।
काटकपट करना, छिपा कर निकाल लेना।
छाँड़ि राजमारग यह लीला कैसे चलहिं कुपैड़े-३०६९।
राजपंथ तैं टारि बतावत उज्ज्वल कुचल कुपैड़ो -३३१३।
वस्तु, पद या अधिकार का अनुचित प्रयेाग।
(२) इसलाम धर्म के विरूद्ध बात।
जिसके शरीर का कोई अंग खंडित हो।
कंस की एक दासी जो श्रीकृष्ण से प्रेम करती थी।
मोटी छड़ी जिसका सर झुका हो।
कंस की कबड़ी दासी जो श्रीकृष्ण से प्रेम करती थी।
कुबलयदल कुसमय सैय्या रचि पंथ निहारत तोर---९२६ सारा.।
कुबलयापीड़ नामक कंस का हाथी जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था।
महाराज, तुम तौ हौ साध। मम कन्या तैं भयौ अपराध। या कन्या कौं प्रभु तुम बरौ। कटक–सूल किरपा करि हरौ - ९ - २। स्याम बलराम जब कंस मारयौ। सुनि जरासंध बृतांत अस सुता तें युद्ध हित कटक अपनौ हँकारयौ - १० उ. - १।
हरि करि कृपा करी पटरानी कुबिज मिटायौ डारि-२६४०।
कुब्जा नामक कंस की दासी जो श्रीकृष्ण से प्रेम करती थी।
जिसकी बुद्धि भ्रष्ट हो, दुर्बुद्धि, मूर्ख।
जिसकी बुद्धि भ्रष्ट हो, मूर्ख।
तजो हरिबिमुखन कौ संग। जिनकैं संग कुबुधि (कुमति) उपजति है, परत भजन मैं भंग --- १-३३।
आवहु कान्ह, साँझ की बेरिया। गाइनि माँझ भए हौ ठाढ़े, कहति जननि यह बड़ी कुबेरिया-१०-२४६।
[सं. कुवेला, हिं. कुबेला]
बुरी या अशुभ बात कहनेवाला।
अप्रिय या कटु बात कहनेवाली।
जिसकी पीठ टेढ़ी हो, कुबड़ा।
स्वान कुब्ज, कुपंगु, कानौ, स्रवन-पुच्छ-विहीन। भग्न भाजन कंठ, कृमि सिर, कामिनी आधीन-१-३२१।
कंस की एक बड़ी दासी जो श्रीकृष्ण से प्रेम करती थी और प्रसिद्धि है कि जिसे उन्होंने अपना लिया था।
कैकेयी की मन्थरा नामक दासी जे कुबड़ी थी।
यह सब कलिजुग कौ परभाउ। जो नृप कैं मन भयउ कुभाउ-१-२९०।
बुरा, अनुचित या अशुभ विचार।
पेड़ की पतली और लचीली टहनी।
बुरी सलाह, बुरी सलाह के अनुसार अनुचित कार्य।
तैं कैकई कुमंत्र कियौ। अपने कर करि काल हँकारयौ, हठकरि नृप-अपराध लियौ--९४८।
(क) कुमकुम कौ लेप मेटि, काजर मुख लाऊँ--- १-१६६। (ख) तहाँ स्याम घन रास उपायौ। कुमकुम जल सुख वृष्टि रमायौ
(ग) उनै उनै घन बरसत चख उर सरिता सलिल भरी। कुमकुम कज्जल कीच बहै जनु कुचयुग पारि परी---२८१४।
लाख के बने पीले गोले जो अबीर गुलाल भरकर एक दूसरे को होली के दिनों में मारते हैं।
काँच के बने छोटे-बड़े गोले।
(क) मलयज पंक कुमकुमा मिलिकै जल जमुना इक रंग --१८४२।
(ख) मृगमद मलय कपूर कुमकुमा सींचति आनि अली--२७३८।
अदभुत राम नाम के अंक। अंधकार-अज्ञान हरन कौं रबि-ससि जुगल-प्रकास। बासर-निसि दोऊ करैं प्रकासित महा कुमग अनयास-१-९०।
बाजि मनोरथ, गर्ब मत्त गज, असत-कुमत रथ-सूत--१ १४१।
मेरी कही न मानत राधै। ए अपनी मत समुझत नाहीं कुमत कहाँ पन नाधे-सा. ६५।
मंत्री काम कुमति दीबे कौं, क्रोध रहत प्रतिहारी-१-१४४
पुरंजन नामक एक प्राचीन राजा की रानी का नाम।
तन पुर, जीव पुरंजन राव। कुमति तासु रानी कौं नाँव-४.१२।
निष्ठुरता, कठोरता, निर्दयता, अनुचित व्यवहार।
यह कुमया जौ तब ही करते। तौ कत इन ये जिवत आजु लौं या गोकुल के लोग उबरते–२७३८।
पाँच वर्ष की आयु का बालक।
सब तज भजिए नंद-कुमार-१-६८।
किशोर, वह जो किशोरावस्था का हो।
बालमीकि मुनि बसत निरंतर राम मंत्र उच्चार। ताकौ फल मोंहिं आजु भयौ, मोहि दरसन दियौ कुमार।
वह मार (कामदेव) जो शत्रु का सा कठोर व्यवहार करे।
व्रज में आजु एक कुमार। तपनरिपु चले तासु पति हित अंत हीन बिचार–सा. ३०।
जिसका विवाह न हुआ हो, कुआँरा।
श्री रघुनाथ-रमनि, जग-जननी, जनक-नरेस कुमारी- ९-६५।
बारह वर्ष तक की अवस्था की कन्या।
रिषि कह्यौ ताहि, दान रति देहि। मैं बर देहुँ, तोहिं सौ लेहि। तू कुमारिका, बहुरौ होइ। तोकौं नाम धरै नहिं कोई--१-२२९।
वह कन्या जिसकी अवस्था बारह वर्ष से अधिक न हो।
जिस कन्या का विवाह न हुआ हो।
वह देवी-पूजा जिसमें कुमारियों का पूजन किया जाता है।
प्रसिद्ध मीमांसक जो जाति के भट्ट थे।
पाप की रीति या चाल, अधर्म।
कुत्सित मृत्यु पानेवाला व्यक्ति।
कहा जाने कैवाँ मुवौ, (रे) ऐसैं कुमति कुमीच। हरि सौं हेत बिसारि कै, (रे) सुख चाहत है नीच---- १-३२५।
रावण पक्ष का एक वीर जिसका नाम दुर्मुख था।
बुरे या अनुचित शब्द कहनेवाला।
एक लाल कमल जो चंद्रमा को देखकर (या रात्रि में) खिलता है।
आँगन खेलैं नंद के नंदा। जदुकुल-कुमुद- सुखद चारु चंदा-१०-११७।
राम-पक्ष के एक बन्दर का नाम।
वह स्त्री जो अनुचित बातों में आनन्द ले।
कत मो सुमन सो लपटात।…..कुमुदनी संग जाहु करके केसरी कौ गात - सा. ७१।
(क) आजु चरावन गाइ चलौ जू, कान्ह, कुमुदबन जैऐ। सीतल कुंज कदम की छहियाँ, छाक छहूँ रस खैहै - ४४५। (ख) मधुबन और कुमुदबन सुंदर बहुलाबन अभिराम–१०८८ सारा.।
राधा की एक सखी का नाम जो श्रीकृष्ण से प्रेम करती थी।
कहि राधा किन हार चोरायौ….। रत्ना कुमुदा मोहा करुना ललना लोभां नूप। इतनीन में कहि कौने लीन्हौ ताको नाउ बताउ - - १५८० (ख) रहे हरि रैनि कुमुदा गेह - - २१६०।
कुईं, कोईं जो रात में खिलती है और दिन में मुँद जाती है।
कुमुदिनि सकुची बारिज फूले - १० - २३३।
स्याही लिये लाल रंग का मजबूत और तेज घोड़ा।
निकसे सबै कुँअर असवारी उच्चैःश्रवा के पोर। लीले सुरंग कुमैत स्याम तेहि पर दे सब मन रंग - - १० उ० - ६।
घोड़े का स्याही लिये लाल रंग।
वह घोड़ा जिसका रंग स्याही लिये लाल हो।
एक बेल जिसमें बड़े बड़े गोल फल लगते हैं।
[सं. कूष्मांड, पा. कुम्हंड, प्रा. कुमंड]
[सं. कूष्मांड, पा. कुम्हंड, प्रा. कुमंड]
(क) ललित कन - संजुत कपोलनि लसत कज्जल अंक। मनहु राजत रजनि, पूरन कलापति सकलंक - ३५३। (ख) उनै उनै घन बरषत चष उर सरिता सलिल भरी। कुमकुम कज्जल कीच बहै जनु कुच जुग पारि परी - २८१४१
जिस नेत्र में काजल लगा हो, आँजा हुआ।
नरकट की घास या उसकी बनी चटाई।
खस की घास या उसकी बनी टट्टी।
पीठी में कुम्हड़े के टुकड़े मिला कर बनायी हुई बरी।
कांति या शोभा फीकी पड़ना।
मिट्टी के बरतन बनानेवाला।
[सं. कुंभकार, प्रा. कुंभार]
पानी पर फैलने, फूलने और फलनेवाला एक पौधा |
लोचन सपने के भ्रम भूले।…….। निदरे रहत मोहिं नहिं मानत कहत कौन इम तूले। मोते गये कुम्ही के जर ज्यौं ऐसे वे निरमूले। सूर स्याम जल रासि परे अब रूपरंग अनुकूले।
प्रफुल्लतारहित हुई, कांतिहीन हो गयी।
सुता लई उर लाइ, तनु निरखि पछिताइ, डरनि गइ कुम्हिलाइ, सूर बरनी - - पृ. - ६९८।
ससि उर चढ़त प्रेम पावक परि बंक कुसुम्भ रहे कुम्हिलाई - सा. उ. १९।
कुम्हला गये, कांति या शोभाहीन हो गये।
(क) काहैं आजु अबार लगायी कमल बदन कुम्हिलाए - ५ ११।
(ख) चारो ओर ब्यास खगपति के झुंड झुंड बहु आए। ते कुखेत बोलत सुनि सुनि के सकल अंग कुम्हिलाए - - सा. १०२।
कांतिहीन होता है, प्रफुल्लतारहित हो जाता है।
सुंदर तन सुकुमार दोउ जन, सूर-किरिन कुम्हिलात - - - ९ - ४३।
बाटिका बहु बिपिन जिनकै एक वै कुम्हिलानि–३३५५।
कुम्हला गया, मलिन हुआ, प्रफुल्लतारहित हो गया।
(क) है निरदई, दया कछु नाहीं, लागि रही गृह काम। देखि छुधा तैं मुख कुम्हिलानौ, अति कोमल तन स्याम - - ३६१। (ख) देखियत कमल बदन कुम्हिलानौ, तू निरमोही बाम - - - ३६७।
प्रात:काल हैं बाँधे मोहन, तरनि चढ्यौ मधि आनि। कुम्हिलानौ मुख चंद दिखावति, देखौ धौं नँदरानि - ३६५।
कांतिहीन होगा, प्रफुल्ल रहित हो जायगा।
(क) तजि वह जनकराज-भोजन-सुख, कल तृन-तलप, बिपिन-फल खाहु। ग्रीषम कमल बदन कुम्हिलैहै, तजि सर निकट दूरि कित न्हाहु- ९ - ३४।
(ख) तुम्हरौ कमल-बदन कुम्हिलैहै, रेंगत घामहिं माँझ–४११।
स्याही लिये लाल रंग का घोड़ा।
कस्तूरी जो हिरन (कुरंग) की नाभि से निकलती है, मुश्क।
एक पौधा जिसके फूल सफेद होते हैं।
खरी चीजों के टूटने का शब्द।
जिसे तोड़ने पर कुरकुर शब्द हो।
जिसे तोड़ने में कुरकुर शब्द हो।
पानी के पास रहनेवाला कराँकुल नामक जल-पक्षी।
जिसका स्वर कटु या कठोर हो।
एक जगह बहुत सी ढेर लगा देना।
राधा हरि की गरब गहीली।......। धरनी। नख चरनन कुरवारति सौतिन भाग सुहाग डहीली - - १३०९।
अपने कर नखनि अलक कुरवारही कबहुँ बाँधे अतिहिं लगत लोभा - १५६३।
ऊँचा-नीचा गड्ढा और तंग रास्ता।
चिड़ियों का पंख खुजलाकर सुखी होना।
अब राधे नाहिंन व्रजनीति। नृप भयौ कान्ह काम अधिकारी उपजी है ज्यौं कठिन कुरीति - - - २२२३।
एक चंद्रवंशी राजा जिनके वंश में पांडु और धृतराष्ट्र हुए थे।
कुरु के वंश में जन्मा व्यक्ति।
बाँस या मूँज की छोटी डलिया।
एक प्राचीन तीर्थ जो सरस्वती नदी के किनारे था। यह अंबाले और दिल्ली के बीच में स्थित है। महाभारत के प्रसिद्ध युद्ध के अतिरिक्त कई बड़े युद्ध यहाँ हुए थे। ग्रहण और कुम्भ के अवसर पर यहाँ बड़ा मेला लगता है।
जो मुँह बनाये हो, कुपित, क्रुद्ध।
थकित सुमन दृग अरुन उनींदे कुरुख कटाक्ष, करत मुख थोरी। खंजन मृग अकुलात घात उर स्याम ब्याध बाँधे रति डोरी।
या रथ बैठि बंधु की गर्जहिं पुरवै को कुरुखेत–१ - २९।
अम्बाले और दिल्ली के बीच में स्थित एक प्रसिद्ध प्राचीन तीर्थ जहाँ महाभारत का युद्ध हुआ था।
असुंदर, बेडौल, बेढंगा, बदसूरत।
एक पेड़ जिसके फूल सुंदर होते हैं।
पानी के किनारे रहनेवाली एक चिड़िया जिसका सिर लाल होता है और शरीर मटमैला।
(क) राम भक्त बत्सल निज बानौं। जाति, गोत, कुल, नाम गनत नहिं, रंक होइ कै रानौं - १.११।
(ख) भुव पर नहिं राखौ उनकौ कुल - १०४३।
जरासंध बन्दी करैं नृप-कुल जस गावै - १ - ४।
कूट कायफर सोठि चिरैता कटजीरा कहुँ देखत। आल मजीठ लाख सेंदुर कहुँ ऐसेहिं बुधि अवरेखत - ११०८।
कटते हैं, खंड खंड होते हैं।
परिवारियों को कष्ट देने वाला।
वह व्यक्ति जो अपने कुल में दाग लगाये।
वंश की मर्यादा, कुल की लज्जा।
जन की और कौन पति राखै। जाति-पाँति कुल-कानि न मानत, बेद पुराननि साखै - - - १ - १५।
[सं. कुल+हि. कानि=मर्यादा]
ऑंतें कुलकुलाना- भूख लगना।
वंश को चन्द्रमा के समान स्वकीर्ति से प्रकाशित करनेवाले।
सोई दसरथ कुलचन्द अमित बल, आए सारँगपानी - ९ - ११५।
कै हौं कुटिल, कुचील, कुलच्छनि, तजी कंत तबहीं - ९ - ९१।
कुल में उत्पन्न, वंश का।
[सं. कुल+हि. लाज=लजानेवाला]
निर्धिन, नीच, कुलज, दुर्बुद्धी भोंदू, नित कौ रोऊ। तृष्ना हाथ पसारे निसि दिन, पेट भरे पर सोऊ - - - १ - १८६।
अनेक स्त्रियों से गुप्त प्रेम-सम्बन्ध स्थापित करनेवाला, व्यभिचारी।
तब चित चोर भोर व्रजबासिनि प्रेम नेक व्रत टारे। लै सरबस नहिं मिले सूर-प्रभु कहिये कुलट बिचारे।
अनेक पुरुषों से गुप्त प्रेम सम्बन्ध रखनेवाली, व्यभिचारिणी।
अनेक पुरुषों से गुप्त प्रेम करनेवाली।
(क) अहो सखी तुम ऐसी हो। अब लौं कुलटी करि जानति मोकौं री सब तैसी हो १५३६। (ख) उत होरी पढ़त ग्वार इत गारी गावति ए नंद नाहिं जाये तुम महरि गुनन भारी। कुलटी उनतै को है नंदादिक मन मोहै बाबा बृषभानु की वै सूर सुनहु प्यारी - २४२६।
वंश को अपने आचरण से पवित्र करने या तारनेवाला।
[सं. कुल+ हिं. तारक या तारन]
परंपरा से जिस देवता की पूजा कुल में सभी शुभ अवसरों पर की जाती हो, कुलदेवता। विश्वास है कि सभी संकटों से कुलपरिवार की ये रक्षा करते हैं।
साँझहिं तैं अतिहीं बिरुझानौ, चंदहि देखि करी अति आरति। बार-बार कुलदेव मनावति, दोउ कर जोरि सिरहिं लै धारति - - १० - २००।
वह देवी जिसकी पूजा कुल में बहुत समय से होती आयी हो।
परिवार की रीति या परंपरा।
अध्यापक जो शिक्षा देने के साथ साथ विद्यार्थियों का भरण-पोषण भी करे।
जिस (व्यक्ति) का मान कुल के स्त्री-पुरुष, छोटे-बड़े, सभी करते हों।
लोचन लालची भये री। सारँगरिपु के हरत न रोके हरि सरूप गिधए री। काजर कुलुफ मेलि में राखे पलक कपाट दये री - पृ. ३३५ और सा. उ. ७।
टीन का पात्र जिसमें दूध की बरफ जमाते हैं।
मान-मर्यादा से रहनेवाली स्त्री।
अपने आचरण से वंश की मान-मर्यादा मिटाने वाला।
वंश की मान-मर्यादा, कुल की लाज।
लोचन लालची भये री।……..। ह्वै आधीन पंच तै न्यारे कुललज्या न नये री - - पृ० ३३५ और सा. उ. ७।
मान-मर्यादा से रहनेवाली वधू।
हमारे हिरदै कुलसै (कुलिसै) जीत्यौ - २८८४।
शिकारी चिड़ियों की आँख पर पहनाया जाने वाला टोपी की तरह का ढक्कन।
(क) स्याम बरन पर पीत झगुलिया, सीस कुलहिया चौतनियाँ - - - १०.१३२।
(ख) कुलहि लसत सिर स्याम सुभग अति बहु बिधि सुरंग बनाई–१० - १४८ |
चौकड़ी भरना, छलाँग मारना।
वह रीति नीति जो किसी वंश में प्रचलित रही हो।
[सं. कुल=समूह+आधि=रोग, दोष]
लोहे का छल्ला जो दरवाजे को चौखटों से जकड़े रहता है।
जैसैं स्वान कुलाल के पाछैं लगि धावै - २ - ९।
ऊधो भली भई अब आये। विधि कुलाल कीन्हें काचे घट ते तुम आनि पकाये -। ’६१।
अस्व देखि कहयौ, धावहु-धावहु। भागि जाहि मति, बिलँब न लावहु। कपिल कुलाहल सुनि अकुलायौ। कोपि-दृष्टि करि तिन्हैं जरायौ - ९ - ९। (ख) जा जल सुद्ध निरखि सन्मुख ह्वै, सुन्दरि सरसिज-नैनी। सूर परस्पर करत कुलाहल, गर सृग पहिरावैनी - ९ - ११।
(ग) आपुस में सब करत कुलाहर धौरी धूमरि धेनु बुलाये - ४७।
(घ) हलधर संग छाक भरि काँवर करत कुलाहल सोर - ४७१, सारा.।
कुलीन वंश में उत्पन्न व्यक्ति।
ईश्वरावतारों (राम, कृष्ण आदि) के चरणों का वज्र-आकार का एक चिन्ह।
हृदय कठोर कुलिस तैं मेरौ–७४।
उत्तम कुल में उत्पन्न, अच्छे वंश का।
नैना न रहैं री मेरे हटकै। कछु पढ़ि दिये सखी यहि ढोटा घूँघर वारे लटकै। कज्जल कुलुफ मेलि मंदिर में पलक सँदूक पट अटकै।
मुलजिम जोरे ध्यान कुल्ल कौ, हरिसौं तहँ लै राखै। निर्भय रूपै लोभ छाँड़िकै, सोई बारिज राखै–१ - १४।
[फ़ा. काकुल। (सं. कुंतल)]
मिट्टी का पुरवा, चुक्कड़।
लकड़ी कटने या चीरने का एक औजार।
पेड़ काटने या लकड़ी चीरने का एक औजार, कुल्हाड़ा।
पाउँ कुल्हारौ मारौ- अपने आप अपनी हानि करना। उ.- इद्री स्वाद-बिवस निसि बासर, आपु अपुननै हारौ। जल औंड़े मैं चहुँ दिनि-पैरयौ, पाउँ कुल्हारौ मारौ - १ - १५२।
कंस का एक हाथी जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था |
कुवलिया मल्ल मुष्टिक चानूर से कियौ मैं कर्म यह अति उदासा - २५५१।
नष्ट या दूर होते हैं, छीजते हैं।
(क) जे पद - पदुम - परस - जल - पावन - सुरसरिदरस कटत अघ भारे–१ - ९४। (ख) कमल नैन की लीला गावत कटत अनेक बिकार - २ - २।
काट कर नष्ट करने की क्रिया।
(किसी नोक आदि से) कट फट जाना।
(किसी अंश या भाग का) अलग हो जाना।
जो बात कहने योग्य न हो, गंदी।
एक देवता जो विश्रवस् ऋषि के पुत्र और रावण के सौतेले भाई थे। इलविला इनकी माता थी। विश्वकर्मा से कहकर सोने की लंका इन्होंने ही बनवायी थी। जब शिव के वर से शक्तिशाली होकर रावण ने इनसे लंका छीन ली तो इन्होंने तप करके ब्रह्मा को प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने इन्हें इंद्र का भंडारी और समस्त संसार के धन का स्वामी बना दिया। इनके एक आँख, तीन पैर और आठ दाँत हैं। इनका पूजन नहीं होता।
बुरी वेश-भूषा, मैले-कुचैले वस्त्र।
बातैं बूझतियौं बहभवति। सुनहु स्याम वै सखी सयानी पावस रितु राधहिं न सुनावति।...। कबहुँक प्रगट पपीहा बोलत कहि कुवेष करतारि बजावत - ३४८५।
एक घास जो पवित्र मानी जाती है और जिसका प्रयोग प्रायः कर्मकांड तथा तर्पण में होता है, दाभ, डाभ।
सात द्वीपों में से एक जो चारो ओर घृत-समुद्र से घिरा है।
सातों द्वीप कहे सुझ मुनि ने सोइ कहत अब सूर। जंबु, प्लक्ष, कौंच, शाक, शाल्मलि, केश, पुष्कर भरपूर - ३४ सारा.।
कुश का बना हुआ छल्ला जो कर्मकांड आदि के अवसर पर पहना जाता है।
न्हात बार न खसै इनको कुशल पहुँचैं धाम - २५६५।
मेरौ कह्यौ सत्य के जानौ। जौ चाहौ व्रज की कुशलाई तौ गोबर्धन मानौ - - - ९१५।
कुशलक्षेम-समाचार, मंगल-सूचना।
(क) मधुकर ल्याये जोग सँदेसो। भली स्याम कुशलात (कुसलात) सुनाई सुनतहिं भयो अँदेसो - ३२६३। (ख) दुहूँ की कुशलात कहियो तुमहिं भूलत नाहिं - २९ २८।
(ग) ऊधो जननी मेरी को मिलिहौ अरु कुशलात कहोगे–२९३२।
क्षेम या कुशल सूचक समाचार।
कहि कहि उधौ हरि कुशलातैं।...। कहि कुशलातैं साँची बातैं आवन कह्यौ हरि नाथै - ३४४१।
एक वन जो गोकुल के पास है।
कुश की नोक-सा तेज, तीव्र।
एक राजा जिनके पुत्र गाधि थे और पौत्र विश्वामित्र।
धातुओं को फूँककर बनाया हुआ चूर्ण।
बुरी वासना, वातावरण का बुरा प्रभाव।
एक प्रकार की घास जिसका प्रयोग यज्ञों में होता था और जो अब भी पवित्र समझी जाती है।
दुरवासा दुरजोधन पठयौ पांडव अहित बिचारी। साक पत्र लै सबै अघाए, न्हात भजे कुस डारी १ - १२२।
असगुन, कुलक्षण, बुरा सगुन।
फटवत स्रवन स्वान द्वारै पर, गररी करत लराई। माथे पर ह्वै काग उड़ान्यौ, कुसगुन बहुतक पाई - ५४१।
[सं. कु= बुरा (उप.)=हिं. सगुन]
मधुर मल्लिका कुसमित कुंजन दंपति लगत सोहाये - १००३ सारा.।
(क) सुनि राजा दुर्जोधना, हम तुम पैं आए। पांडव सुत जीवत मिले, दै कुसल पठाए। छेम-कुसल अरु दीनता दंडवत सुनाई १ - २३८। (ख) प्रभु जागे, अर्जुन तन चितयौ, कब आए तुम, कुसल खरी - १ - २६८।
परम कुसल कोबिद लीला नट मुसुकनि मन हरि लेत - १० - १५४।
[सं. कुशल+हिं. ई (प्रत्य.)]
[सं. कुशल+हिं. आई (प्रत्य.)]
[सं. कुशल+हिं. आई (प्रत्य.)]
(क) सबै दिन एकै से नहिं जात। सुमिरन-भजन कियौ करि हरि कौ, जब लौं तन कुसलात - २ - २२। (ख) कहौ कपि, जनकसुता-कुसलात - ९ - १०४।
(ग) सूर सुनत सुग्रीव चले उठि, चरन गहे, पूछी कुसलात - ९ - ६६।
(घ) सूरज आलस जथासंख कर बूझी सखी कुसलात - सा.५२।
गोझा या पिराक नामक पकवान।
ऐसो माई एक कोद को हेतु। जैसे बसन कुसुम रँग मिलिकै नेक चटक पुनि स्वेत–३३०९।
(क) दीजै कान्ह काँधे हूँ को वंमर। नान्ही नान्ही बूँदन बरषन लागौ भीजत कुसुंभी अंबर - १५६६। (ख) स्याम अङ्ग कुसुंभी सारी फल गुंजा का भाँति। इत नागरी नीलांबर पहिरे जनु दामिनि घन काँति - पृ. ३१३।
ससि उर चढ़त प्रेम पावक परि बंक कुसुंम रहे कुम्हिलाई - सा. उ. १९।
सुनि सीता सपने की बात।... कुसुम विमान बैठी बैदेही देखी राघव-पास - ९ - ८३।
सब कुसुमनि मिलि रस करैं, (पै) कमल बँधावै आप। सुनि परिमिति पिय प्रेम की, (रे) चातक चितवन पारि–१ - ३२५।
[सं. कुसुम+हिं. नि (प्रत्य.)]
कुसुमसर रिपुनन्द बाहन हरषि हरषित गाउ - २७१५।
कुसुमांजलि बरषत सुर ऊपर, सूरदास बलि जाई - ६२६।
ठौर ठौर झिल्ली ध्वनि सुनियत मधुर मेघ गुंजार। मानो मन्मथ मिलि कुसुमाकर फूले करत बिहार - १०४१ सारा.।
मधुर मल्लिका कुसुमित कुंजन दंपति लगत सोहये - १००३ सारा.।
फूलों की कोमलता से युक्त, फूलों के समान सुखदायी सरल और सीधा-सादा।
कुसुमित धर्म कर्म कौ मारग जउ कोउ करत बनाई। तदपि बिमुख पाँती सो गनियत, भक्ति हृदय नहिं आई–१ - ९३।
[सं. कु+सूत्र, प्रा. सुत्त]
[सं. कु+सूत्र, प्रा. सुत्त]
राजिव दल इंदीवर सतदल कमल कुसेसय (कुसेसै) जाति। निसि मुदित प्रातहिं ए बिगसत ए बिगसत दिन राति - १३४९।
एक प्राचीन नगर जो विदर्भ देश में था। यहाँ भीष्मक राज करते थे, जिनकी पुत्री रुक्मिणी को श्रीकृष्ण हर ले गये थे।
कंचनराज को काज सँवारयौ भूपन को यह काज १० उ.-१०८।
एक प्रकार का कवच जो घुटने तक होता था।
(क) कसि कंचुकि, तिलक लिलार, सोभित हार हियै-१०-१४।(ख) कोउ केसरि कौ तिलक बनावति, कोउ पहिरति कंचुकी सरीर - १०-३५। (ग) कबहिं गुपाल कंचुकि फारी, कब भये ऐसे जोग–७७४। (घ) कनक-कलस कुच प्रकट देखियत आनन्द कंचुकि भूली - २५६१।
(सूची से नाम) हटा दिया जाना।
[सं. कीट अथवा हिं. कटना+नाश]
पक्षियों का मीठे स्वर में बोलना, पीकना, कलरव करना।
वह स्थान जहाँ विवाह के अवसर पर कुलदेवता स्थापित किये जाते हैं।
कहा कहैं छबि आज की मुख-मंडित खुर-धूरि। मानौ पूरन चंद्रमा कुहर रह्यौ आपूरि - ४३७।
जमी हुई भाप के कण जो वायु में मिले रहते हैं, कोहरा।
बिछुरन कौ संताप हमारौ तुम दरसन दै काट्यौ। ज्यों रबि तेज पाइ दमहूँ दिसि दौष कुहर कौ फाटयों - ९ - २७।
इंद्री स्वाद बिबस निसि बासर आपु अपुनपौ हारी। जल औड़े मैं चहुँ दिसि पैरयौ, पाउँ कुहारो (कुल्हारौ) मारौ - १ - १५२।
[सं. कुठार, हिं. कुल्हाड़ा]
मूकू, निंद निगोड़ा, भोड़ा, कायर काम बनावै। कलहा, कुही, मूषक रोगी अरु काहूँ नैंकु न भावै - १ - १८६।
[हिं. कोह=कोध, कोही, क्रोधी]
पक्षियों, विशेषतः कोयल और मोर का मधुर स्वर।
पक्षियों, विशेषतः कोयल और मोर का मधुर स्वर में बोलना।
[हिं. कुहुक+ना (प्रत्य.)]
एक तरह का वाण जिसे चलाते समय कुछ शब्द निकलता है।
पक्षियों का मधुर स्वर में बोलना।
ज्यों कोइ लखत काग जिवाए भक्ष अभक्ष कहाइ। कुहुकुहानि सुनि रितु बसंत की अन्त मिले कुल अपने जाइ - ३०५३।
दामिनी थिर घनघटा बर कबहुँ ह्वै एहि भाँति। कबहुँ दिन उद्योत कबहूँ होत अति कुहुराति - सा. उ. ५।
(क) सूरदास रसरासि बरषि कै चली जनौ हरतिलक कुहू उग्यौ री - ६९१। (ख) सदा सरद ऋतु सकल कला लै सनमुख रहै जन्हाइ। सो सित पच्छ कुहू सम बीतत कबहुँ न देत दिखाइ - ३४८६।
(ग) नँद नंदन बृन्दाबन चंद।...। जठर कुहू ते बहिर बारिनिधि दिसि मधुपुरी सुछंद - १३ ३१।
अमावस्या की अधिष्ठात्री देवी।
मोर या कोयल को मीठी बोली।
कुहूकुहू ‘कुहू’ ‘कुहू' का शब्द।
चूना पोतने की मूँज की कूँची।
कुंजी या कुंडी जो दरवाजे में उसे बंद करने के लिए लगी रहती है।
सहज कपाट उघरि गए ताला कूँची टूटि - २६२५।
(क) ऊधव कोकिल कूँजत कानन। तुम हमकौ उपदेस करत हौ भसम लगावन आनन। (ख) पपिहा गुंज, कोकिल बन कूँजत, अरु मोरनि कियौ गाजन - ६२२।
बातैं बूझत यौं बहरावति। सुनहुँ स्याम वै सखी सयानी पावस-रितु राधहिं न सुनावति। घन गर्जत मनु कहत कुसलमति कूँजत गुहा सिंह समुझावति - ३४८५।
लोहे की टोपी जो लड़ाई के समय पहनी जाती है।
कुएँ से पानी निकालने का टोपीनुमा बरतन।
शीशे की बड़ी हाँडी जिसमें रोशनी जलायी जाती है।
कबूतरों का ‘गुटूरगूँ’ करना।
कमल की तरह का एक पौधा जो जल में होता है और चाँदनी रात में खिलता है, कोकाबेली, कुमुदिनी।
सोवत लरिकनि छिरकि मही सौं हँसत चलै दै कुक - १० - ३१७।
यह सुनत रिस भरयौ दौरिबे को परयौ सूड़ि झटकत पटकि कुक पारयौ - २५६२।
मोर या कोयल की सुरीली बोली।
ऊधौ, कहा हमारी चूक। वै गुन-अवगुन सुनि सुनि हरि के हृदय उठत है कूक।
लंबी सुरीली ध्वनि निकालना।
उदर भरयौ कूकर-सूकर लौं, प्रभु कौं नाम न लीनौ - १ - ६५।
यात्रा करना, जाना, प्रस्थान।
देवता कूच कर जाना- बहुत भयभीत होना।
(क) कनक किंकिनी, नूपुर कलरव, कूजत बोल मराल। (ख) उपजत छबिकर अधर संख मिलि सुनियत सब्द प्रसंसा। मानहु अरुन कमल मंडल में कूजत हैं कल हंसा - २५६६।
कोमल शब्द या ध्वनि करना, बोलना, कलरव करना।
मिट्टी का पुरवा या कुल्हड़।
मिट्टी के पुरवे में जमायी हुई मिश्री।
कुजा, मरुओ, मोगरो मिलि झूमक हो।
पक्षियों के कलरव से युक्त।
मधुर शब्द करती है; कोमल स्वर से बजती है।
(क) पाइनि नूपुर बाजई, कटि किंकिनि कूजै - - - १० - १३४।
(ख) चरन रुनित नूपुर कटि किंकिनि काल कूजै - ६६२।
एक पेड़ जिनमें बड़े-बड़े फल लगते हैं।
[सं. कंठकिफल, हिं. काठ+फल)
वह रचना जिसका अर्थ सरलता से न स्पष्ट हो।
कूट काइफल सोंठि चिरैता कटजीरा कहुँ देखत - - ११०८।
दाँव-पेंच की चाल जिसका भेद दूसरे न पा सकें।
कूटि करेंगे बलभैया अब हमहीं छोड़ि किनि देहु - २४ ०८।
बिनु कन दुस कौं कूटैं - - २ - २०
संख्या, परिमाण आदि का अनुमान।
संख्या, परिमाण आदि का अनुमान या अंदाज करना।
उछलने-कूदने की क्रिया या भाव।
कूदते ही, उछलता फाँदता है।
सुनि कै सिंह-भयान अवाज। मारि फलाँग चली सो भाज। कूदत ताकौ तन छुटि गयौ - - - ५ - ३।
नाचन-कूदन मृगिनी लागी, चरन-कमल पर बारी - - - १ - २२१।
किसी के बीच में दखल देना।
जैसैं केहरि उझकि कूप-जल, देखत अपनी प्रति। कूदि परयौ, कछु मरम न जान्यौ, भई आइ सोइ गति - १ - ३००।
कूदो, कालीदह में कान - सा. ७३
(क) सँदेसनि मधुबन कूप भरे। (ख) परो कूप पुकार काहू सुनी ना संसार - - सा. ११८.।
नरक-कूपनि जाई जमपुर परयौ बार अनेक - १ - १०६।
[सं. कूप+हिं. नि. (प्रत्य.)]
कुएँ में ही रहनेवाला, मेढक।
संसार की बहुत कम जानकारी रखने वाला, अनुभवहीन व्यक्ति।
पग पग परत कर्म-तम-कूपहिं को करि कृपा बचावै–१ - ४८।
किसी चीज का उभाड़ या टेढ़ापन।
कुब्जा नामक कंस की एक दासी जिसकी पीठ पर कूबड़ था। श्रीकृष्ट से इसको बड़ा प्रेम था और भक्तों का विश्वास है कि उन्होंने भी इसे अपना लिया था।
जिसमें दया न हो, निर्दयी, कठोर।
(क) तौ जानौं जौ मोहिं तारिहौ, सूर कूर कवि ढोट - १ - १३२। (ख) साँचे कूर कुटिल ए लोचन वृथा मीन छबि छीन लईं - २५२७।
(ग) सूरबरी लैजाहु तहाँ जहँ कुबजा कूर रई - सा. ३१।
विष्णु का दूसरा अवतार कछुआ।
हरि जू अपनौ बिरद सँभारयौ। सूरज प्रभु कूरम तनु धारयौ - - ८ - ७।
[सं. कूट, प्रा. कूड़ = ढेर]
[सं. कूट, प्रा. कूड़ = ढेर]
(क) पूरनता ए नैनन पूरे।…...| ए अलि चपल में दरस लंपट कटु संदेस कथत कत कूरे - ३०४२। (ख) सूर नृप क्रूर अक्रूर कूरै (कूरे) भयो धनुष देखन कहत कपटी महा है - २५०३।
विष्णु का दूसरा अवतार जो पौष शुक्ल द्वादशी को कछुए के रूप में हुआ है।
कूर्म कौ रूप धरि, धरयौ गिरि पीठि पर - ९ - ८।
कमर में पेडू के दोनों तरफ निकली हुई हड्डियाँ।
रथ का एक भाग जिस पर जूआ बाँधा जाता है।
कंधे और गले की जोड़, घाँटी।
इस पेड़ का फल जिसके ऊपरी मोटे छिलके पर नुकीले कँगूरे होते हैं।
[सं. कंठकिफल, हिं. काठ+फल)
कौन कौन कौ बिनय कीजिए कहि जेतिक कहि आई। सूर स्याम अपने या ब्रज की इहि बिधि कान कटाई - ३०७७।
काटकर बनाये हुए बेल-बूटे।
काट लो, काटने का काम करो।
पालनौ अति सुन्दर गढ़ि ल्याउ रे बढ़ैया। सीतल चंदन कटाउ धरि खराद रंग लाउ, बिबिध चौकरी बनाउ, धाउ रे बढ़ैया - १० - ४१।
एक व्रत जिसमें पंचगव्य (गाय से प्राप्त होनेवाले पाँच द्रव्य–दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र) खा कर दूसरे दिन उपवास किया जाता है।
(क) मन-कृत-दोष अथाह तंरगिनि, तरि नहिं सक्यौ, समायौ - - - - १.६७। (ख) और कहाँ लौं कहौं एक मुख या मन के कृत काज - १ - १०२।
तू कृत मम जस जो गावैगो सदा रहै मम साथ - ११०४ सारा.।
संबंध रखने वाला, तत्संबंधी।
(क) बड़ी बेर भइ अजहुँ न आए गृह-कृत कछु न सुहाइ - ५८७। (ख) अपने कृत तैं हों नहिं बिलमत सुनि कृपाल वृजराई - १ - २०७।
जिसने अपने प्रयत्न में सफलता प्राप्त कर ली हो।
जिसकी इच्छा पूरी हो चुकी हो।
जिसको अपने कार्य में सफलता मिल चुकी हो।
जिसका काम पूरा हो चुका हो।
जिसका कार्य या उद्देश्य सफल हो चुका हो, सफल-मनोरथ।
किये हुए उपकार को न मानने वाला, अकृतज्ञ।
जो दूसरे का उपकार न माने, अकृतज्ञ।
दूसरे का किया हुआ उपकार न मानने का भाव।
किये हुए उपकार को न मानने का भाव।
महा कठोर सुन्न हिरदै कौ, दोष देन कौं नीकौ। बड़ौ कृतघ्नी और निकम्मा, बेधन, राकौफीकौ - - - १ - १८६।
मधुबन के सब कृतज्ञ धर्मीले। अति उदार परहित डोलत हैं बोलत बचन सुसीले - ३०५५।
दूसरों के उपकार को मानने का भाव, निहोरा मानना।
गोपन सखा भाव करि देखे दुष्ट नृपति कृतदंड। पुत्र भाव बसुदेव देवकी देखे नित्य अखंड।
जो किये हुए उपकार को न माने।
कृतयुग धम भये त्रेता में पूरन रमा प्रकास - - - ३०६ सारा।
किसी विद्या या कला का पूर्ण ज्ञाता, पंडित।
दूसरे का उपकार माननेवाला।
(क) सूरदास जो सरबस दीजै कारे कृतहिं न मानै - ३४०४। (ख) तिनहिं न पतीजै री जे कृतहिं न मानै - - - २७८९।
[सं. कृति+ हिं. हिं (प्रत्य.)]
शुद्ध आत्मावाला, महात्मा।
(क) बन मैं करी तपस्या जाइ, रह्यौ हरि चरननि सौं चित लाइ। या बिधि नृपति कृतारथ भयौ - - ९ - १७४। (ख) नृपति कह्यौ मेरे गृह चलिये करौ कृतारथ मोय - ८०० सारा।
दूसरे के उपकार से प्रसन्न।
(क) निज कृति-दोष बिचारि सूर, प्रभु तुम्हारी सरन गयौ - १ - २९८। (ख) यह हित मनै कहत सूरज प्रभु इहि कृति कौ फल तुरत चखैहौं - ७ - ५।
(ग) नैन उघारि बिप्र जौ देखै, खात कन्हैया देख न पायौ। देखौ आइ जसोदा, सुत कृति, सिद्ध पाक इहि आइ जुठायौ - १० - २४८।
जिसने महान कार्य किया हो।
सत्ताइस नक्षत्रों में तीसरा जिसमें छः तारे हैं। इनका आकर अग्नि-शिखा के समान होता है। यह चंद्रमा की पत्नी मानी जाती है और अग्नि इसकी अधिष्ठात्री है।
महादेव का एक नाम जो गजासुर को मारने के बाद उसकी खाल ओढ़ लेने के कारण पड़ा था।
वे काम जिनका करना धर्म की दृष्टि से आवश्यक हो।
सूर स्याम के कृत्य जसोमति ग्वाल- बाल कहि प्रगट सुनावत - ४८०।
भयंकर कार्य कर सकनेवाली साहसी स्त्री।
एक राक्षसी जिसे तांत्रिक अपने अनुष्ठान से उत्पन्न करके विपक्षी का नाश करने के लिए भेजते हैं।
(क) रिषि सक्रोध इक जटा उपारी। सो कृत्या भइ ज्वाला भारी–९.५। (ख) तब सिव ने उन कृत्या दीन्हीं बाढ़ो क्रोध अपार - ७०७ सारा.।
तंत्र-मंत्र से साधे गये घातक कर्म।
वह शब्द जो धातु में ‘कृत' प्रत्यय लगने से बनता है, जैसे भोक्ता।
(क) कृपानिधान सूर की यह गति, कासौं कहै, कृपन इहिं काल - - १ - १२९
(ख) स्याम अछय निधि पाइकै तउ कृपन (कृपण) कहावै - - - पृ० ३२२।
(ग) कीजै कहा कृपन की संपति बिन भोजन बिन दान - - - २०५१।
(घ) हम निसिदिन करि कृपन की सम्पति कियो न कबहू भोग - - २७९३।
निस्वार्थ भाव से दूसरे की भलाई करने की भावना या इच्छा। अनुग्रह, दया।
भक्त-बछल, कृपाकरन, असरन-सरन, पतित उद्धरन कहैं बेद गाई - - ८ - ९।
ये गौतम के पौत्र और शरद्वत के पुत्र थे। इन्होंने कौरवों और पांडवों को शस्त्र-विद्या सिखायी थी।
कृपा के भांडार, अत्यन्त कृपालु।
वह व्यक्ति जो दया का अधिकारी हो।
दया के भंडार, बहुत दयालु।
जो तुम जानत तत्व कृपाला मौन रहौ तुम घर अपने - ३२१२।
सूरदास प्रभु कृपावंत ह्वै लै भक्तनि मैं डारौं १ - १७८।
काटने के काम में लगाना या नियुक्त करना।
काटकर बनाये गये बेल-बूटे।
भैंस का बछड़ा जिसके सींग निकलते हों।
सूरदास जो संतन कौं हित, कृपावंत मेटत दुख-जालहिं - - - १ - ७४।
कहा कृपिन की माया गनियै, करत फिरत अपनी अपनी - - - १ - ३९।
कृपिणता, कृपिनता, कृपिनाई
द्रोणाचार्य की पत्नी जो कृपाचार्य की बहन थी। इसी के गर्भ से अश्वत्थामा का जन्म हुआ था।
(क) कृष (कृश या कृस) कटि सबल डंड बंधन मनो विधि दीन्हो बंधान - १९९७। (ख) लई जाइ जब ओट अटन की चीर न रहत कृष गात - २५३९।
ते खोजत-खोजत तहँ आए। जहँ जड़ भरत कृषी मैं छाए - ५ - ३।
यदुवंशी वसुदेव के पुत्र जो कंस के कारागृह में देवीकी के गर्भ से जन्मे थे। मथुरा के अत्याचारी राजा कंस को मार कर प्रजा को इन्होंने सुखी किया था। द्वारका में यादवों का राज्य स्थापित करने वाले ये ही थे। महाभारत के भयंकर युद्ध में ये पांडव-पक्ष में रहे। एक बहेलिये का तीर लगने से इनकी मृत्यु हुई। ये विष्णु के आठवें अवतार माने जाते हैं।
वेदव्यास जो पराशर के पुत्र थे।
वह पक्ष जिसमें चंद्रमा घटता है। अँधियारा पक्ष।
कहि राधा किनि हार चोरायो। …..। दर्वा रंभा कृष्णा ध्याना मैना नैना रूप। इतनिन में कहि कौने लीन्हौ ताको नाउ बताउ - १५८०।
वह नायिका जो अँधेरी रात में प्रिय से मिलने संकेत-स्थल पर जाय।
भादों के कृष्णपक्ष की अष्टमी जिस दिन श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है।
कृष्ण-स्वरूप, कृष्ण- लक्षण, कृष्ण की आकृति।
सुनि सानंद चले बलिराजा, आहुति जज्ञ बिसारी। देखि सरूप सकल कृष्नाकृति, कीनी चरन जुहारी - ८ - १४।
कहाँ लगि सहौं रिस, बकत भई हौं कृस, इहिं सिस सूर स्याम-बदन चहूँ - १० - २९५।
सुन-कृसानु-सुत प्रबल भए मिल चार ओर ते आये - सा. ११।
एक कीड़ा जो प्रायः बरसात में जन्मता है और मिट्टी खाता है।
[सं. किंचिलिक, प्रा. केचुओ]
सर्प जैसे कीड़ों के शरीर के ऊपर की वह झिल्ली जो प्रतिवर्ष अपने आप अलग होकर गिर जाती है।
केंचुरि, केंचुलि, केंचुली
(क) नैन बैन मुख नासिका ज्यों केंचुलि तजै भुजंग - ११८२। (ख) ज्यों भुजंग तजि गयौ केंचुली सो गति भई हमारी - ३०५९।
किसी घेरे के ठीक बीच का बिंदु।
मुख्य स्थान जहाँ से दूर-दूर फैले कार्यों का संचालन हो।
अधिक समय तक रहने का स्थान।
केंद्र-स्थान में इकट्ठा किया हुआ।
शक्तियों-अधिकारों आदि को केंद्र में एकत्र करना।
जिसका सम्बन्ध केंद्र से हो।
तहाँ कमल केंवरो फूले जहाँ केतकी कनेर फूले संतन हित ही फूल डोल - २४०६।
सम्बन्ध सूचक ‘का’ विभक्ति का बहुवचन रूप। एक वचन प्रयोग भी होता है जब सम्बन्ध वान् के आगे कोई विभक्ति होती है।
छाँड़ि सुखधाम अरु गरुड़ तजि साँवरौ पवन के गवत तैं अधिक धायौ - १ - ५।
राजा दशरथ की छोटी रानी जो भरत की माता थी।
उत्तरी भारत का एक प्राचीन देश जो वर्तमान काश्मीर में है।
इस देश का निवासी या राजा।
राजा दशरथ की रानी जो भरत की माता थी।
केकी-पच्छ-मुकुट सिर भ्राजत, गौरी राग मिलै सुर गावत - ५०६।
एक राक्षस का कबंध। यह राक्षस समुद्र-मंथन के समय अमृत-पान करते करते विष्णु द्वारा मारा गया था। इसका धड़ राहु कहाता है। सूर्य और चन्द्रमा ने इसे पहचाना था; इसीलिए ग्रहण-काल में यह उन्हीं को ग्रसता माना जाता है।
राम-नाम बिनु क्यों छूटोगे, चंद्र गहै ज्यौं केत - १ - २९६।
एक छोटा झाड़ या पौधा जिसके सफेद फूल बहुत सुगंधित होते हैं। प्रसिद्धि है कि इसके फूल पर भौंरा नहीं बैठता।
लोचन लालच तें न टरैं।….। ज्यों मधुकर रुचि रच्यौ केतकी कंटक कोटि अरै। तैसोई लोभ तजत नहिं लोभी फिरि फिरि फिरी फिरै - - - - २७७०।
रामकली गुनकली केतकी सुर सुघराई गायौ। जैजैवंती जगतमोहिनी सुर सों बीन बजायौ - १०१७ सारा.।
हौं अलि केतने जतन विचारों - सा. ६७।
(क) तुम मोते अपराधी माधव, केतिक स्वर्ग पढ़ाए (हो) - १ - ७। (ख) कहौ बात अपने गोकुल की केतिक प्रीति ब्रजबालहिं।
(ग) केतिक दूरि गयौ रथ माई - २५८०।
(घ) आगैं दै पुनि ल्यावत घर कौं तू मोहिं जान न देति। सूर स्याम जसुमत मैया सौं हा हा करि कहै केति–४२४।
एती केती तुमरी उनकी कहत बनाइ-बनाई - ३३३४।
चंचलता निर्तनि कटाक्ष रस भाव बतावत नीके - सा. उ. - ८।
लीला या अभिनय के अवसर पर पात्रों के नेत्रों के बाहरी कोरों पर खींची जानेवाली पतली काली रेखाएँ।
(क) नमो नमो हे कृपानिधान। चितवत कृपाकटाच्छ तुम्हारी, मिटि गयौ तम-अज्ञान - २ - ३३। (ख) कृपा-कटाच्छ कमल-कर फेरत सूर-जननि सुख देत - १० - १५४।
काली बिषगंजन दह आइ। देखे मृतक बच्छ बालक सब लये कटाच्छ जिवाइ - ५७८।
तिरछी चितवन या नजर, कटाक्ष।
कबहिं करन गयौ माखन चोरी। जानै कहा कटाच्छ तिहारे, कमलनैन मेरौ इतनक सो री - १० - ३०५।
भृकुटी सूर गही कर सारँग निकर कटाछनि चोट–सा. उ. - १६।
[हिं. काटना + आन (प्रत्य.)]
एक राक्षस का कबन्ध, जो नौ ग्रहों में माना जाता है।
पुच्छल सारा जिसकी पूँछ से प्रकाश निकलता है।
रावा निसि केते अन्तर ससि, निमिष चकोर न लावत - १ - २१०।
कह्यौ, विषय सौं तृप्ति न होइ। केतौ भोग करौ किन कोई - - ९.८।
(ख) मोहन हमारौ भैया केतो दधि पियतौ - ३७३।
खग पर कमल कमल पर केदलि केदलि पर हरि ठान। हरि पर सर सरवर पर कलसा कलसा पर ससि भान - - २१९१।
हिमालय पर्वत का एक शिखर और प्रसिद्ध तीर्थ जहाँ केदार नामक शिवलिंग है।
अस्व मेध जज्ञहु जौ कीजै, गया बनारस-अरु केदार। राम नाम-सरि तऊ न पूजै, तनु गारौ जाइ हिवार - २ - ३।
एक राग जो रात्रि के दूसरे पहर में गाया जाता है।
रागरागिनी साँचि मिलाई गावैं सुघर गुंड मलार। सुहवी सारँग टोडी भैरवों केदार - २२७९।
वृक्ष के नीचे का थाला, थाँवला।
श्रीराम की सेना का एक बंदर।
कपि सोभित सुभर अनेक संग। ज्यौं पूरन ससि सागर तरंग। सुग्रीव बिभीषन जामवंत अंगद सुषेन केदार संत - - - ९ - १६६।
हिमालय का एक पर्वत जिस पर केदारनाथ नामक शिवलिंग है।
मेघराग का चौथा भेद जो रात के दूसरे पहर में गाया जाता है।
(क) मधुरैं सुर गावत केदारौ, सुनत स्याम चित लाई। सूरदास प्रभु नंदसुवन कौं नींद गई तब आई - - - - - १० - २४२। (ख) ऊँछ अड़ाने के सुर सुनियत निपट नायकी लीन। करत बिहार मधुर केदारो सफल सुरन सुख दीन - १०१४ सारा.
वह अन्न जो साग-भाजी लेने पर बदले में दिया जाता है।
बाँह में पहनने का एक अभूषण; अंगद, भुजबंद, भुजभूषण।
अंग अभूषनि जननि उतारति। दुलरी ग्रीव माल मोतिनि की, लै केयूर भुज स्याम निहारति - - ५१२।
जो केयूर नामक अलंकार धारण किये हो।
संबंध सूचक विभक्ति। अवधी भाषा में 'का' के लिए इसका प्रयोग होता है।
खारिक, दाख, खोपरा, खीरा। केरा, आम, ऊख रस सीरा - १० - २११।
(क) नाहीं सही परति मोपै अब, दारुन त्रास निसाचर केरी - ९९३।
(ख) सूर स्याम तुमको अति चाहत तुम प्यारी हरि केरी - - १४५७।
[सं. कृत, हिं. 'केर' अथवा 'के' विभक्ति का स्त्री. रूप]
(क) गाउँ हमारो छाँड़ि जाइ बसिहौ केहि केरे - - - १०१५।
(ख) बहुरि तातो कि यो डारि तिन पर दियो आय लपटे सुतहु नंद केरे - २५९०
[सं. कृत, हिं. ‘केर' का बहु. रूप]
अजान जानिकै अपनो दूत भयो उन केरो - ३४३१।
हाथ में तलवार, कटारी आदि लेकर नाचनेवाले लोग।
एक पेड़ जिसके पत्ते खूब लंबे और गूदेदार फल मीठे होते हैं।
आउ धाम मेरे लाल कैं आँगन बाल-केलि कौं गावति है - १० - ७३।
क्रीड़ा, आनंद, विनोद, रंजन।
मधुकर हम न होहिं वै बेली। जिन भजि तजि तुम फिरत और रँग करत कुसुम रस केली - २९९४।
क्षत्रिय पिता और वैश्या माता से उत्पन्न एक वर्ण संकर जाति जिसके लोग प्रायः नाव चलाते हैं।
जासु महिमा प्रगटि केवट, धोइ पग सिर धरन - १ - ३०८।
[सं. कैवर्त्त, प्रा. केवट्ट]
जिसमें दूसरी बात या चीज की मिलावट न हो।
केशी नामक दैत्य जो कंस का सेवक था।
एक राक्षस जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था।
एक असुर जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था।
केस खसै- बाल बाँका हो, कष्ट पड़े। उ.- जाकौं मनमोहन अंग करै। ताकौ केस खसै नहिं सिर तैं, जौ जग बैर परै - १ - ३७।
केस नहिं टारि सके- बाल बाँका न कर सके, कुछ हानि न पहुंचा सके। उ.- जाकी कृपा पपित ह्वै पावन पग परसत पाहन तरै। सूर केस नहिं टारि सकै कोउ, दाँति पीसि जौ जग मरै - १ - २३४।
बरना भख कर में अवलोकत केसपास कृतबंद - - - ९८९ सारा.।
बाल की तरह पतली सीकें जो फूलों के बीच में होती हैं।
एक प्रकार के फूल का केसर जिसका रंग लाल होता है, पर पीसने पर पीला हो जाता है।
घोड़े, सिंह आदि की गरदन के बाल, अयाल।
केसर के रंग का, पीले रंग का।
केसरि चीर पर अबीर मानो परयौ खेलत फागु डारयौ खिलारी - २५९५।
हनुमान जी के पिता का नाम।
नल-नील द्विविद-केसरी-गवच्छ। कपि कहे कछुक हैं बहुत लच्छ - ९ - १६६।
गये कटि नीर लौं नित्य संकल्प करि करत स्नान इक भाव देख्यौ - २५५४।
गरमी-सरदी के आधार पर किये हुए पृथ्वी के पाँच भाग।
कमर में पहनने का वस्त्र, साड़ी।
श्रीकृष्ण का एक नाम, केशवराय।
कर गहि छीर पियावत अपनौ, जानति केसवराई - १० - ५२।
कंस का दरबारी एक राक्षस जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था।
बकी बका सकटा त्रिन केसी बछ वृष भये समै अलि बिन गोपाल इति बैर कीन - सा.उ. ३९।
कठुला-कंठ, बज्र केहरि नख, राजत रुचिर हिए - १० - ९९।
ब्रह्मा सिव स्तुति न सकैं करि मैं बपुरो केहि माहीं - १० उ. - १३२।
लच्छागृह तैं काढ़ि कैं पांडव गृह ल्यावै–१ - ४।
कर्म, संप्रदान और अधिकरण का विभक्ति-प्रत्यय, के, के यहाँ।
(क) जैसें गैया बच्छ कैं सुमिरत उठि ध्यावे - १ - ४। (ख) कौन जाति अरु पाँति बिदुर कीताही कैं पग धारत - १ - १२।
संबंधसूचक विभक्ति-प्रत्यय, के।
(क) तजि बैकुंठ, गरुड़ तजि, श्री तजि, निकट दास कैं आयौ–१०१०।
तिरछी रखी हुई तीलियाँ-सलाइयाँ आदि।
मेरी कैंती बिनती करनी–९ - १०१।
कितना (संख्या), किस कदर (परिमाण)।
जैसैं अंधौ अंध कूप मैं गनत न खाल-पनार। तैसेहिं सूर बहुत उपदेसैं सुनि सुनि गे कै बार - १.८४।
(क) राम भक्तबत्सल निज बानौं। जाति, गोत, कुल नाम गनत नहिं रंक होइ कै रानौ - १ - ११। (ख) जन्म सिरानौ ऐसैं ऐसैं। कै घर घर भरमत जदुपति बिनु, कै सोवत, कै बैंसें। कै कहुँ खान-पान रमनादिक, कै कहुँ बाद अनैसैं। कै कहुँ रंक, कहूँ ईस्वरत्ता, नट-बाजीगर जैसे - १.२९३।
सम्बन्ध-सूचक विभक्ति, के, कर।
(क) रोर कै जोर तैं सोर घरनी कियौ चल्यौ द्विज द्वारिका-द्वार ठाढ़ौ - १.५।
(ख) महा मोहिनी मोहि आत्मा अपमारगाहिं लगावै। ज्यों दूती पर-बधू भोरि कै, लै पर-पुरुषदिखावै -१- ४२।
नभ तैं निकट आनि राख्यौ है, जल-पुट जतन जुगै। लै अपने कर काढ़ि चंद कौं, जो भावै सो कै - १० - १९५।
सुनि स्रवन, दस-बदन सदन-अभिमान, कै नैन की सैन अंगद बुलायौ - ९:१२८।
राजा दशरथ की रानी जो भरत की माता थी।
कैकय देश या गोत्र की स्त्री।
राजा दशरथ की रानी जो कैकय देश की राजकुमारी थी।
एक दैत्य जो मधु का छोटा भाई था और विष्णु द्वारा मारा गया था।
विष्णु का एक नाम जो कैटभ दैत्य को मारने के कारण पड़ा था।
बोलत खग-निकर मुखर, मधुर होइ प्रतीति सुनौ, परम प्रान-जीवन-धन मेरे तुम बारे। मनौ बेद-बंदीजन, सूतवृंद मागधगन, बिरद बदत जै जै जै जैति कैटभारे - १० - २०५।
एक अलंकार जिसमें विषय का किसी बहाने से गोपन या निषेध किया जाय।
एक पुरानी लिपि जो अधिकतर बिहार में प्रचलित है।
साचौं सो लिखहार कहावै।...। मन महतौ करि कैद अपने मैं, ज्ञान-जहतिया लावै–१ - १४२।
जेलखाना, कारागार, बंदीगृह।
हारि मानि उठि चल्यौ दीन ह्वै जानि अपुन पै कैदु - ३४६८।
कैधौं तुम पावन प्रभु नाहीं, के कछु मो मैं झोलौ। तौ हौं अपनी फेरि सुधारौं, वचन एक जौ बोलौ - १ - १३६।
चारा जिसमें मादक द्रव्य मिला हो।
चौड़े सिरे के पत्तेवाला कदंब।
कैयो भाँति केरा करि लीने - २३२१।
किरात जाति या देश संबंधी।
[सं. कृत, हिं. ‘केर' का स्त्रीलिंग रूप]
वृक्ष की नयी पतली शाखा, कनखा।
हिमालय की चोटी जिस पर शिव जी का निवास माना जाता है, शिव का निवास स्थान।
एक प्रकार के षट्कोण मंदिर।
मन को बुरा लगनेवाला, कड़ुआ
कै सरनागत कौं नहिं राख्यौ। कै तुमसौं काहू कटू भाख्यौ। - १ - २८६।
छः रसों में से एक, चरपरा, कड़ुआ।
कंचन-काँच कपूर कटु खरी एकहिं सँग क्यौं तोले - ३२६४।
कटा हुआ, टुकड़े - टुकड़े।
(क) मुख जो कही कटुक सब बानी हृदय हमारे नाहीं - ११९१। (ख) एते मान भये बस मोहन बोलत कटुक डराई। दीपक प्रेम क्रोध मारुत छिन परसत जिनि बुझि जाई - १२७५।
सबरी कटुक बेर तजि, मीठे चाखि, गोद भरि ल्याई। जूठनि की कछु संक न मानी भच्छ किए सत-भाई - १ - १३।
अप्रिय, जो चित्त को भला या प्रिय न हो।
लीजो जोग सँभारि आपनो जाहु तहीं तटके। सूर स्याम तजि कोउ न लैहै या जोगहिं कटुके–३१०७।
एक वर्णसंकर जाति, केवट, मल्लाह।
कहा जानै कैवाँ मुवौ, (रे) ऐसे कुमति, कुमीच। हरि सौं हेतु बिसारि कै, (रे) सुख चाहत है नीच - १ - ३२५।
किसी प्रकार का नहीं (निषेधात्मक प्रश्न रूप में)।
किस प्रकार से, किस रीति से।
कहि, जाकौं ऐसौ सुत बिछुरै, सो कैसैं जीवै महतारी - १० - ११।
किस हेतु, किस लिए, क्यों।
कैसेहूँ करि- किसी प्रकार से, बड़े यत्नों से, बड़े भाग्य से, राम-राम करके। उ.- ढोटा एक भयौ कैसेहुँ करि कौन कौन करबर विधि भानी - ३६८।
उनहूँ कैं गृह, सुत, द्वारा हैं, उन्हैं भेद कहु कैसो - २ - १४।
कबहुँ नाहिं इहिं भाँति देख्यौ आजु कैसौ रंग - ४१७।
[हिं. कै= कैसे+हूँ (प्रत्य.)]
सबै कैहैं इहै भली मति तुम यहै नंद के कुँवर दोउ मल्ल मारे - २६०५।
कहयौ तोहिं ग्राह आनि जब गैहै। तू नारायन सुमिरन कैहै - ८ - ९।
जब मैं भक्ति स्याम की कैहौं। जानत नहीं कहा मैं पैहौं–४ - ९।
(क) एक गाँव एक ठाँव को बास एक तुम कैहौ, क्यों मैं सैहों - ८४३। (ख) कबहुक तात तात मेरे मोहन या मुख मोसौं कैहौ–२६५०।
आँचल का भाग जिसमें कुछ बाँधकर कमर में खोंसा जाय।
[सं. कुमुदिनी, प्रा. कुउई]
पक्षी फँसाने की लासा लगी लग्घी।
स्त्रियों के अंचल का छोर या कोना।
स्त्रियों की साड़ी का या मर्दो की बंगाली ढंग से पहनी जानेवाली धोती का आगे का भाग चुनना।
साड़ी या धोती का वह भाग जो चुनकर पेट के आगे खोंसा जाय, नीबी।
एक कोंध ब्रज सुन्दरी एक कोंध ग्वाल-गोविन्द हो। सरस परस्पर गावहीं द नारि गारि बहु वृंद हो - २४४९।
[सं. कोण अथवा कुत्र, पुं. हिं. कोद, कोध]
प्रात-समय रवि-किरनि कोंवरी, सो कहि सुतहिं बतावति है। आउ धाम मेरे लाल कैं आँगन, बाल केलि कों गावति है - १० - ७३।
[हिं. कोहड़ा=कुम्हड़ा+बरी]
उबाले हुए चने या मटर जो छौंक कर खाये जाते हैं।
(क) ऐसी को करी अरु भक्त काजैं। जैसी जगदीस जिय धारी लाजैं - १ - ५। (ख) तू को ? कौन देश है तेरौ, कै छल गहयौ राज सब मेरो - १ - २९०।
कर्म और संप्रदान कारकों की विभक्ति।
सुनि देवता बड़े, जगपावन तू पति या कुल कोई - १० - ५६।
पूरन मुख चंद्र देख नैन-कोइ फूलीं - ६४२।
साग-तरकारी बोने वाली एक जाति।
मथानी में लगी गोल छेददार लकड़ी।
करघी के बगल में लगी करघे की लकड़ी।
कच्चा आम जिस पर कोयल के बैठने से काला सा दाग पड़ जाय।
अनिर्देशित व्यक्ति या वस्तु।
हरि सौं मीत न देख्यो कोई १-१०।
मनुष्य या पदार्थ जो अज्ञात हो।
सूरदास की बीनती कोउ लै पहुँचावै–१ - ४।
गनिका-सुत सोभा नहिं पावत, जाके कुल कोऊ न पिता री - १ - ३४।
[हिं. को+हू (पत्य.) = भी]
एक पेड़ जिसके सब भाग खट्टे होते हैं।
सूरस्याम पर गई बारने निरष कोक जनु कोकी -सा. ११२।
कोकदेव जो रतिशास्त्र के आचार्य थे।
(क) हाव-भाव, कटाच्छ लोचन, कोक-कला सुभाई - ६९०। (ख) कोककला-गुन प्रगटे भारी - - १२१६।
(ग) कोककला वितपन्न भई हौ कान्हरूप तनु आधा - १४३७।
कच्ची सिलाई करना, लंगर डालना।
कोकदेव नामक एक पंडित कृत रति-शास्त्र।
दूर होती है, नष्ट होती है, छँटती है।
हृदय की कबहु न जरनि घटी। बिनु गोपाल बिथा या तन की कैसैं जाति कटी–१ - ६८।
खूब चुभने या गहरा प्रभाव करनेवाला।
बहुत शीघ्र प्रभाव डालनेवाली, गहरा असर करनेवाली, मोहित करनेवाली।
(क) ओढ़े पीरी पावरी हो पहिरे लाल निचोल। भौहें काट कटीलियाँ मोहिं मोल लई बिन मोल - ८९३। (ख) भौहैं काट कटीलियाँ सखि बस कीन्हीं बिन मोल - १४६३।
काँटेदार, काँटों से भरे हुए।
कमल-कमल कहि बरनिए हो पानि पिय गोपाल। अब कवि कुल साँचे से लागे रोम कटीले नाल - पृ० ३४८ (५८)।
(क) जसुमति कोख आय हरि प्रगटे असुर तिमिर कर दूर - सारा. ३९। (ख) धन्य कोख जिहिं तोकौं राख्यौ, धनि घरि जिहिं अवतारी–७०३।
[सं. कुक्षि, प्रा. कुक्खि]
कोख भाग सुहाग भरी- पति-पुत्र का सुख देखनेवाली और भाग्यवती। उ. धनि दिन है, धनि यह राति, धनि-धनि पहर-घरी। धनि धनि महरि की कोख, भाग-सुहाग भरी - १० - २४।
कोख की आँच- संतान का वियोग, संतान की ममता।
[सं. कुक्षि, प्रा. कुक्खि]
पेट के दोनों बगलों का स्थान।
[सं. कुक्षि, प्रा. कुक्खि]
जिसके संतान हुई ही न हो, बाँझ।
(क) याकी कोखि औतरै जो सुत करै प्रान-परिहारा - १०.४। (ख) अहो जसोदा कत त्रासति हौ यहै कोखि कौ जायौ - ३४६।
(ग) तिनमें प्रथम लियो कश्यप गृह दिति की कोखि मँझार - सारा. ४४।
[सं. कुक्षि, प्रा. कुक्खि, हिं. कोख]
जिसकी संतान जीवित न रहे, जिसे संतान का सुख़ न मिले।
पाऊँ कहाँ खिलावन कौ सुख, मैं दुखिया दुख कोखिजरी - १० - ८०।
एक जानवर (सोनहा) जो लोमड़ी के बराबर होता है।
(क) सभा मँझार दुष्ट दुस्सासन द्रौपदि आनि धरी। सुमिरत पट कौ कोट बढ्यौ तब, दुख-सागर उबरी - १ - १६। (ख) जैसे बने गिरिराज जू तैसे अन को कोट–९१२
(ग) दसहूँ दिसि तैं उदित होत हैं दावानल के कोट - २७०३।
स्रवनन सुनत रहत जाको नित सो दरसन भये नैन। कंचन कोट कँगूरनि की छबि मानहु बैठे मैंन - २५५८।
(क) मय, मायामय कोट सँवारो। ता मैं बैठि सुरनि जय करौ। तुम उनके मारे नहिं मरौ - - ७ - ७। (ख) रही दे घूँघट पट की ओट। मनो कियो फिरि मान मवासो मनमथ बिकटे कोट - सा. उ. १६।
(क) राधे आज मदन-मद माती। सोहत सुंदर संग स्याम के षरचत कोट काम कल थाती - सा. ५०।
(ख) भादौं की अधराति अँध्यारी। द्वार-कपाट कोट भट रोके दस दिसि कंत कंस-भय भारी - १० - ११।
एक तीर्थ जो उज्जैन, चित्रकूट आदि अनेक स्थानों पर है।
पांडु-बधू पटहीन सभा मैं, कोटिनि बसन पुजाए। बिपति काल सुमिरत तिहिं अवसर जहाँ तहाँ उठि धाए - १ - १५८।
[सं. कोटि+ हिं. नि (प्रत्य.)]
गोदावरी नदी के सागर संगम समीप एक तीर्थ। प्रसिद्धि है कि इंद्र का अहिल्या संबंधी पाप यहीं स्नान करने से दूर हुआ था।
पद, महत्व या मूल्य के अनुसार श्रेणी-विभाजन करना।
मेली सजि मुख-अंबुज भीतर उपजी उपमा मोटी। मनु बराह भूधर सह पुहुमी धरी दसन की कोटी - १० - १६४।
एक पौधा जिसके बीजों का आटा फलहार रूप में खाया जाता है।
वाणासुर की माता जो पुत्र की श्रीकृष्ण से रक्षा के लिए वस्त्र त्याग कर युद्ध क्षेत्र में आयी थी।
शरीर या मस्तिष्क का भीतरी भाग।
बड़ा और बढ़िया पक्का मकान।
उस धनी या महाजन का मकान जो खूब लेन-देन करता हो या थोक विक्रेता हो।
कोठी खोलि- लेन देन का काम या बड़ा कारबार शुरू करके। उ. - करहु यह जस प्रगट त्रिभुवन निठुर कोठी खोलि। कृपा चितवनि भुज उठावहु प्रेम बचननि बोलि-पृ. ३४२ (१७)।
बाँसों का समूह जो एक साथ उगे हों।
[हिं. कोठी+वाला (प्रत्य.)]
[हिं. कोठी+वाला (प्रत्य.)]
खेत गोड़ने की मजदूरी या काम।
कोड़ने का काम दूसरे से कराना।
कोढ़ की (में) खाज- दुख पर दुख।
कोढ़ नामक भयानक रोग से पीड़ित मनुष्य जो घृणित और अस्पृश्य समझा जाता है।
उल्टी रीति तिहारी ऊधौ सुनै सु ऐसी को है।...। मुडली पटिया पारि सँवारे कोढ़ी लावै केसरि। ...। सो गति होई सबै ताकी जो ग्वारिनि जोग सिखावै - ३०२६।
दो दिशाओं के बीच की दिशा।
एक तीर्थ जो जगन्नाथपुरी में है।
सजा हुआ घोड़ा जिस पर कोई सवार न हो।
पुलिस का एक प्रधान कर्मचारी।
सभा या पंचायत में भोजनादि का प्रबंध करनेवाला कर्मचारी।
[हिं. कोतवाल+ई (प्रत्य.)]
[हिं. कोतवाल+ई (प्रत्य.)]
रूपए रखने की थैली जो कमर में बाँध ली जाती है।
तोरि कोदंड मारि सब जोधा तब बल भुजा निहारयौ - २५८६।
छीज गये, नष्ट हुए, दूर हो गये।
बिप्र बजाइ चल्यौ सुत कैं हित कटे महा दुख भारे - १ - १५८।
कटते हैं, बंधन कटते हैं, मुक्ति पाते हैं।
जरासंध बंदी कटैं नृप-कुल जस गावै–१ - ४।
कटोरी से बड़ा बरतन, प्याले के ढंग का बना धातु का बरतन।
[हिं. काँसा + ओरा (प्रत्य.)= कॅंसोरा]
जोग कटोरे लिए फिरत है ब्रजबासिन की फाँसी - ३१०८।
अँगिया का वह भाग जिसमें स्तन रहते हैं।
अपने विश्वास के अतिरिक्त कुछ न सहन करनेवाला।
(क) आनंदकंद, सकल सुखदायक, निसि दिन रहत केलि रस ओद। सूरदास प्रभु अंबुज लोचन, फिरि चितवत ब्रज-जन-कोद - १० - ११९ (ख) नारि-नर सब देखि चकित भए, दवा लग्यौ चहुँ कोद - - ५९२।
अन्नकूट जैसो गोबर्धन। अरु पकवान धरे चहुँ कोदन - १०२५।
कोदों देकर पढ़ना (सीखना)- बेढंगी शिक्षा पाना।
छाती पर कोदों दलना- दूसरे को बेबस करके कुढ़ाना या जलाना।
(क) नर नारी सब देखि चकित भे दावा लग्यो चहुँ कोध।
(ख) एक कोध गोविंद ग्वाल सब एक कोध व्रजनारि - २३९९।
(क) नैन कोन की अंजन-रेखा पटतर कहूँ न छीजै - २१९७। (ख) तीनि लोक जाकैं उदर-भवन, सो सूप कैं कोन परयौ है (हो) - १० - १२८।
(वस्त्र या इमारत का) छोर या खूँट।
दीवार के कोने पर चीज रखने की पटिया।
मूर्ति आदि के कोनों का सजाना।
नये निकले हुए पत्ते के रंग का, बैंगनी रंग का।
कालापन लिये हुए लाल या बैंगनी रंग।
(क) कोपि कौरव गहे केस जब सभा मैं, पांडु की बधू जस नैंकु गायौ–१ - ५। (ख) कोपि कै प्रभु बान लीन्हौं तबहिं धनुष चढ़ाई - ९ - ६०।
प्रात इन्द्र को कोपित जलधर लै ब्रज मंडल पर छायौ - ३०७७।
कोप करनेवाला, क्रुद्ध, अप्रसन्न।
सब ते परम मनोहर गोपी।…..। बारे कुबिजा के रंगहि राँचे तदपि तजी सोपी। तदापि न तजै भजै निसि-बासर नेकहू न कोपी - ३४८७।
जल के किनारे रहनेवाला एक पक्षी।
साधु-संन्यासियों की लँगोटी, कफनी, काछा।
क्रोधित हुए, क्रुद्ध हुए।
आजु अति कोपे हैं रन राम–१५८।
अरुन अधर दसअवली छबि बरनै कोनी (कौनी) - १८२१।
मदन बान कमान ल्यायौ करषि कोप चढ़ाय - - सा. ३२।
क्रोध में भरी हुई, अप्रसन्न।
वह स्थान जहाँ कोई स्त्रीपुरुष अपने मित्रों-संबंधियों से अप्रसन्न होकर चला जाय।
कुंडेदार बड़ा थाल या परात।
(क) दधि-फल-दूब कनक कोपर भरि साजत सौंज बिचित्र बनाई –९ - १६९। (ख) मनिमय आसन आनि धरे। दधि-मधु-नीर इनक के कोपर आपुन भरत भरे - ९ - १७१।
संगीत में स्वर का एक भेद।
काव्य में एक मधुर वृत्ति।
निश्चय किए मुक्त सब माधव ताते जिये न कोय - २९५ सारा.।
जला हुआ काला पदार्थ जो अंगार बुझाने से बच जाता है।
[सं. कोकिल=जलता हुआ अंगारा]
[सं. कोकिल=जलता हुआ अंगारा]
कटहल के फल की गुठली जिसमें बीज रहता है।
क्रोध करता है, रुष्ट होता है।
कोपै तात प्रहलाद भगत कौ, नामहिं लेत जरै - - - १ ८२।
आजु रन कोपो भीमकुमार - सा. ७४।
(क) जौ सुरपति कोष्यौ ब्रज ऊपर, क्रोध न कछू सरै - १.३७। (ख) इत पारथ कोप्यौ है हम पर, उत भीषम भट राउ - १ - २७४।
परम कुशल कोबिद लीलानट, मुसुकनि मन हरि लेत - १० - १५४।
सूरस्याम कोविदा सुभूषन कर बिपरीत बनावै - सा. ५।
शरीर के अवयवों की वह संधि जहाँ से वे मुड़ सकते हैं; उँगली, कुहनी आदि की संधि, गाँठ, पोर।
इक सखी मिलि हँसति पूछति खैंचि कर की कोर–३३८९।
कँपति स्वास त्रास अति मोकति ज्यों मृग केहरि कोर - २१६२।
सूर स्याम स्यामा भरि कोर अरस परस रीझत उपरै नाहीं मैं समाई–१५६५।
फूल की हरी कटोरी जिसमें फूल रहता है ; कमल की डंडी।
कटता है, खुरचता है, कुरेदा जाता है, कचोटता है।
सूर स्याम पिय मेरे तौ तुम ही जिय तुम बिनु देखे मेरो हिय कोरत - १५२०।
किनारा, सिरा। सिय अंदेस जानि सूरज-प्रभु लियौ करज की कोर - ९२३।
(क) सूरके प्रभु कृपासागर चितै लोचन कोर। बढ़यौ बसन-प्रवाह जल ज्यौं, होत जयजय सोर - १ - २५३। (ख) मन हर लियो तनक चितवनि में चपल नैर की कोर - ३१४३।
कोर दबना- वश, अधिकार या दबाव में होना।
उतते सूत्र न टारत कतहूँ मोसों मानत कोर - पृ. ३३५।
स्रवन ध्वनि सुर नाद मोहत करत हिरदे कोर - ३३३५।
बहुरौ देख्यौ ससि की ओर। तामैं देखि स्यामता कोर - ५ - ३।
लकड़ी छीलछाल कर नुकीली करना।
मन्मथ पीर अधिक तनु कंपित ज्यौं मृग केहरि कोरनि - २८४२।
[सं. क्रोड़, हिं. कोरा+नि प्रत्य.)]
[हिं. कोरा+ हा (प्रत्य.)]
जो काम में न लाया गया हो, अछूता, नया।
जिस (कागज इत्यादि) पर कुछ लिखा न गया हो, सादा।
(क) रुधिरमेद मल मूत्र कठिन कुच उदर गंध - गंधात। तन-धनजोबन ता हित खोवत, नरक की पाछैं बात - २ - २४। (ख) बालक बदन बिलोकि जसोदा कत रिंस करति अचेत। छोरि उदर तैं दुसह दाँवरी डारि कठिन कर बेंत - ३४९.।
तैं ककई कुमंत्र कियो। अपने कर करि काल हँकारयौ, हठ करि नृप अपराध लियौ। श्रीपति चलत रह्यौ कहि कैसें, तेरौ पाहन कठिन हियौ - ९ - ४८।
मुशकिल, दुःसाध्य, दुष्कर।
ग्रह-पति सुत-हित अनुचर को सुत जारत रहत हमेस। जलपति भूषन उदित होत ही पारत कठिन कलेस - सा. २७।
(क) उत बृषभानुसुता उठी वह भाव बिचारै। रैनि बिहानी कठिन सौं मन्मथ बल भारै - १५४१।
(ख) जब जब दीननि कठिन परी। जानत हौं करुनामय जन कौं, तबतब सुगम करी - १ - १६।
(क) महाकष्ट दस मास गर्भ बसि अधोमुख सीस रहाई। इतनी कठिन सही तब निकस्यौ अजहुँ। न तू समुझाई। (ख) कपट-रूप निसिचर तुन धरिकै अमृत पियौ गुन मानी। कठिन परैं ताहू मैं प्रगटे, ऐसे प्रभु सुख-दानी - १ - ११२।
सादी, जिसमें घी न लगा हो।
रोटी, बाटी, पोरी, झोरी। इक कोरी इक घीव चभोरी–३९६।
मधुप करत घर कोरे काठ मैं बँधत कमल के पात - ३३८६।
सूखे, जो पानी, दही या खटाई में भिगोये न गये हों।
मूँग-पकौरा पनौ पतबरा। इक कोरे इक भिजे गुरबरा - ३९६।
नये, जो पहने न गये हों, जो धुले न हों।
काढ़ौ कोरे कापरा (अरु) काढ़ौ घी के मौन। जातिपाँति पहिराइ कै (सब) समदि छतीसौ पौन - १० - ४०।
हिंदुओं में एक छोटी जाति जो कपड़े बुनती है।
(क) ब्रज कहा खोरी। छत अरु अछत एक रख अंतर मिटत नहीं कोई करहु कोरी - २८९०।
(ख) निकसे देत असीस एक मुख गावत कीरति कोरी –१० उ. - १५१।
निसि लौं भरत कोस अभ्यंतर जो हित कहो सु थोरी। भ्रमत भोर सुख और सुमन सँग कमल देत नहिं कोरी–३२४४।
जो काम में न लायी गयी हो, नयी।
(क) जाउ लेहु आरे पर राखो काल्हि मोल लै राखे कोरी।
(ख) कोरी मटुकी दह्यौ जमायौ जाख न पूजन पायौ - ३४६।
जो रँगी, लिखी या चित्रित न हो, सादी।
दिन थोरी भोरी अति कोरी देखत ही जु स्याम भये चाढ़ी
(क) कान्हैं जसुमति कोरा तैं रुचि करि कंठ लगाये - १० - ५३। (ख) नंद उठाइ लिये कोरा करि, अपनैं सँग पौढ़ाई - ५१८।
तुरतहीं तोरि, गनि, कोरि सकटनि जोरि, ठाढ़े भये पौरिया तब सुनाये - ५८४।
हिंदुओं में एक जाति, कोरी जो कपड़ा बुनने का कार्य करते हैं, हिन्दू जुलाहे।
[सं. कोल=सुअर, हिं. कोरी]
ढूँढि़ फिरे घर कोउ न बतायौ स्वपच कोरिया लौं - १ - १५१।
आलिंगन की स्थिति में दोनों भुजाओं के बीच का स्थान।
लकड़ी, पत्थर आदि को बीच से खोखला करना।
सूर स्याम हित जानि कै सब काम कोविद निजकर कुटी सँवारी - २२९६।
वह ग्रंथ जिसमें शब्द और उसके अर्थ संकलित हों।
कोषाधिप, कोषाधिपति, कोषाधीश, कोषाध्यक्ष
स्थान को घेरने की दीवार या लकीर।
बात-बस समृनाल जैसें प्रात पंकज-कोस। नमित मुख इमि अधर सूचत सकुच मैं कछु रोस - ३५०।
कोस द्वादस रास परिमित रच्यौ नंदकुमार - १८३७।
सरयू और घाघरा का तटवर्ती प्रदेश जिसकी प्राचीन राजधानी अयोध्या थी।
अयोध्या जो कौशल की प्राचीन राजधानी थी।
कोशाधिप, कोशाधिपति, कोशाधीष, कोशाध्यक्ष
सूर-मधुप निसि कमल-कोष-बस, करौ कृपा दिन-भान - १ - १००।
काले कोसों- बहुत दूर।
कोसों दूर रहना या भागना- बहुत दूर रहना।
पानी पीकर कोसना- बहुत बुरा मनाना।
कारे कोसनि- काले कोसों-बहुत दूर। उ.- मथुरा हुते गए सखी री अब हरि कारे कोसनि - १० उ. - १८८।
कोशल देश जिसकी राजधानी अयोध्या थी।
सीता करति बिचार मनहिं मन, आजु-काल्हि कोसलपति आवैं - ९.८२।
सुत-पति नेह जगत इहि जान्यौ। ब्रज जुवती तिनका सों मान्यौ। काचो सूत तोरि सो डारयौ। उरग कंचुकी फिरि न निहारयौ-पृ. ३१६।
रनिवास के दासदासियों का अध्यक्ष जो प्रायः विश्वासपात्र बूढ़ा ब्राह्मण होता था।
वह अन्न जो छिलकेदार होता है जैसे चना।
नैना हरि अंग रूप लुब्धै रे माई। लोकलाज कुल की मर्जादा बिसराई। जैसे चन्दा चकोर मृगीनाद जैसे। कंचुरि ज्यों त्यागि फनिक फिरत नहीं तैसे - पृ.३२१।
तब बिलंब नहिं कियौ, सीस दस रावन कट्टे - १ - १८०।
[सं. कर्त्तन, प्रा. कट्टन, हिं. काटना]
करताल नाम का बाजा जो काठ का बना होता है।
कंसताल कटताल बजावत सृङ्ग मधुर मुँहचंग। मधुर, खंजरी, पटह, पणव, मिलि सुख पावत रत भंग।
काठ की कंठी या माला पहननेवाला, वैष्णव।
बच्चों को पहनाने की माला जिसमें सोने - चाँदी की चौकियों के साथ बघनख, ताबीज आदि गुथे रहते हैं।
[सं. कंठ = किनारा+हिं. आरा (प्रत्य.)]
बड़े दीपक की तरह का मिट्टी का पात्र।
कोसने, बुरा चेतने, बुराभला कहने।
गहि-गहि पानि मटुकिया रीतौ, उरहन कैं मिस आवत-जात। करि मनुहार, कोसिबे कैं डर, भरि भरि देत जसोदा मात - १० - ३३२।
कौशल्या जो राजा दशरथ की पत्नी और श्रीराम की माता थी।
कोसूँ, बुरा चेतूँ, बुराभला कहूँ।
जसुदा तू जो कहति ही मोसौं। दिनप्रति देत उरहनै आवति, कहा तिहारैं कोसौं - १० - ३१५।
(क) अब मैं मरौं, सिंधु मैं बूडौं, चित मैं आवै कोह। सुनौ बच्छ, धिक जीवन मेरौ, लछिमन-राम-बिछोह - ९ - ८३। (ख) जानिके मैं रह्यौ ठाढ़ो, छुवत कहा जु मोहिं। सूर हरि खीझत सखा सौं, मनहिं कीन्हो कोह - १० - २१३।
विवाह के अवसर पर कुल देवता की स्थापना का स्थान।
नाट्यशास्त्र के प्रणेता एक मुनि।
नाँद के आकार का मिट्टी का पात्र।
सुर अति छमी, असुर अति कोही–३ - ९।
कृपा करौ, मम प्रोहित होहु। कियौ बृहस्पति मोपर कोहु - ६.५।
कर्म और सम्प्रदान कारकों का विभक्ति-प्रत्यय, को।
(क) जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अंधे कौं सब कुछ दरसाइ - १ - १। (ख) सिव-बिरंचि मारन कौं धाए यह गति काहू देव न पाई - १ - ३।
हीरे या काँच की कनी, किरिच या रेत।
सुन री सखी इहै जिय मेरे भूली न और चितेहौं। अब हठ सूर इहै व्रत मेरो कौंकिर खै मरि जैहौं–२७७६।
बीच नदी, घन गरजत बरषत, दामिनि कौंधति जात - १० - १२।
कारी घटा सधूम देखियत अति गति पवन चलायौ। चारौ दिसा चितै किन देखौ दामिनि कौंधा लायौ।
घन-दामिनि धरती लौं कौंधे, जमुना-जल सौं पागे - १० - ४।
एक सुंदर लाल फल जिसके सम्बन्ध में प्रसिद्ध है कि इसके पास साँप नहीं आता। कवि इससे प्रायः एँड़ी की उपमा देते हैं।
दुर्बासा कौ साप निबारयौ, अंबरीष-पति राखी - १ - १०।
सोते-सोते बड़बड़ाने लगना।
[सं. कपर्दक, प्रा. कवद्दअ, कवडुअ]
कौड़िल्ला पक्षी, किलकिला पक्षी।
तबही नंदराय जू आये कौतुक सुनि यह भारी। बिस्मत भये देव ने राख्यौ बालक यह सुखकारी–सारा. ४१९।
संग गोप गोधन गन लीन्हे नाना गति कौतुक उपजावत - ४८०।
(क) कौतुक करि मतंग तब मारयौ–२६४३। उ. - जहाँ तहाँ कौ कौतुक देखि। मन मैं पावै हर्ष बिसेषि - ४ - ११।
विवाह में पहना जानेवाला सूत्र।
(क) आनँद भरे करत कौतूहल, प्रेम-मगन नर नारी - १० - ४। (ख) बन मैं जाइ करौ कौतूहल यह अपनौ है खेरौ - १० - २१६।
(ग) ग्वाल-बाल सँग करत कौतूहल गवनपुरी मंझार - २५७२।
[सं. कपर्दिका, प्रा. कवड़डिआ]
[सं. कपर्दिका, प्रा. कवड़डिआ]
जंघे, काँख और गले की गिलटी।
[सं. कपर्दिका, प्रा. कवड़डिआ]
[सं. कपर्दिका, प्रा. कवड़डिआ]
खेल, कुतूहल, अद्भूत बात।
एक विषैला साँप जिस पर कौड़ी की तरह की चित्तियाँ होती हैं।
कंजूस धनी जो साँप की तरह रुपए पर बैठा रहे, खर्चे नहीं।
एक समुद्री कीड़े का अस्थिकोष।
[सं. कपर्दिका, प्रा. कवड़डिआ]
कौड़ी का- जिसका कुछ दाम न हो, बहुत मामूली।
कौड़ी के तीन तीन- बहुत सस्ता।
कौड़ी हू न लहै - कौड़ी को न लेना या पूछना, बिलकुल निकम्मा समझना, कुछ भी कदर न करना। उ- सूरदास स्वामी बिनु गोकुल कौड़ी हू न लहै - २७११।
कौड़ी - कौड़ी करि- एक एक कौड़ी (जैसे पाई, पाई), कुछ भी न छोड़ना, जरा भी रियायत न करना। उ- दान लेहुँ कौड़ी कौड़ी करि बैर आपने लैहों - ११२५।
कौड़ी कौड़ी को मुहताज- बहुत ही गरीब।
कौड़ी कौड़ी चुकाना, भरना- पाई पाई अदा कर देना।
कौड़ी फेरा करना- जरा जरा सी बात के लिए दौड़े आना।
कौड़ी भर- बहुत जरा सा।
कानी, झंझी या फूटी कौड़ी- (१) टूटी हुई कौड़ी। (२) बहुत थोड़ा धन।
कौड़ी लगि मग की रज छानत- कौड़ी के लिए मारे मारे फिरना, तुच्छ वस्तु के लिए बहुत परिश्रम करना। उ- सब सुख निधि हरिनाम महामुनि, सो पापहुँ नहिं पहिचानत। परम कुबुद्धि तुच्छ रस लोभी, कौड़ी लगि मग की रज छानत - १ - ११४।
कौड़ी कौड़ी जोड़त- बहुत कष्ट से थोड़ा थोड़ा धन जोड़ता है। उ.- लंपट, धूत, पूत दमरी कौ, कौड़ी कौड़ी जोरै। कृपन, सूम, नहिं खाइ खवावै, खाइ मारि के औरै - १ - १८६।
[सं. कपर्दिका, प्रा. कवड़डिआ]
अधीन राजाओं से लिया जानेवाली कर।
[सं. कपर्दिका, प्रा. कवड़डिआ]
सुर नर मुनि फूले, झूलत देखत नंदकुमार - १० - ८४।
कौन सा ? गणना में किस संख्या या स्थान का।
[हिं. कौन+सं. स्था (स्थान)]
एक प्रश्नवाच सर्व.नाम जिसका प्रयोग व्यक्ति या वस्तु के संबंध में परिचय पाने के लिए किया जाता है।
[सं. कः, किम्, प्रा. कवण]
किस जाति का ? किस प्रकार का ?
ऊधौ जो तुम हमहिं बतायौ। सो हम निपट कठिनई करि-करि या मन कौ समझायौ - ३३८५।
[हिं. कठिन + आई (प्रत्य.)]
बच्चों के गले में पहनाने की एक माला जिसमें चाँदी, सोने की चौकियों के साथ बाघ के नख, नजर से बचाने की ताबीज आदि गुथे रहते हैं। विश्वास है कि इसको पहनाने से बच्चे को नजर नहीं लगती।
कठुला कंठ बज्र केहरि-नख, मसि-बिंदुका सु मृग-मद भाल। देखत देत असीस नारि-नर, चिरजीवौ जसुदा तेरौ लाल - - १० - ८४।
[हिं. कंठ+ला (प्रत्य.) - कठला]
केस ओर निहार फिर फिर तकत उरज कठोर - - सा. ३४।
केस गहे अरि कंस पछरिहौं। असुर कठोर जमुन लै डरिहौं–११६१।
पाँच वर्ष तक की कुमारअवस्था।
नटवर अंग सुभ सजे सजौना। त्रिभुवन में बस कियो न कौना। सूर नन्द सुत मदन-लजौना - २४२१।
कहा करौं कौन भाँति मरौं मन धीरज न धरै–२७८३।
मेरैं संग आइ दोउ बैठे, उन बिनु भोजन कौने काम - १० - २३५।
कौनेहु भाव भजै कोउ हमकौ, तिन तनताप हरै री - ७८७।
उद्यम कहा होत लंका कौं कौनैं कियौ उपाय - - ९ - १२१।
कौपीन से ढके शरीर के भाग।
कौरी भर कर मिलना- सस्नेह आलिंगन करना। उ.- पाछे ते ललिता चन्दावलि हरि पकरे भुज भरि कौरी की - २४०५।
(क) पेठा पाक, जलेबी, कौरी। गोंद पाक, तिनगरी, गिंदौरी - ३९६। (ख) पूरि सपूरि कचौरी कौरी। सदल सु उज्ज्वल सुन्दर सौरी - २३२१।
कौरे लगना- (१) दूसरे की बात सुनने या अन्य किसी घात में छिपकर द्वार के पीछे खड़े होना। उ.- मन जिनि सुनै बात यह माई। कौरे लग्यौ कितहूँ कहि दैहै सो जाई। (२) मुँह फुला कर या रूठकर द्वार के कोने में खड़ा होना।
कुंदरू और ककोरा कौरे। कचरी चार कचेंडा सौरे - २३२१।
कार्तिकी पूर्णिमा का उत्सव।
(क) कौर-कौर कारन कुबुद्धि, जड़, किते सहत अपमान। जहँ-जहँ जात तहीं तहिं त्रासत अस्म, लकुट पदत्रान - १ - १०३। (ख) तब आपुन कर कौर उठायौ - २३२१।
मुँह का कौर छीनना- किसी का हिस्सा मार लेना।
अन्न का वह भाग जो चक्की में पिसने के लिए एक बार में डाला जाय।
कोने-कोने में, कोने की दीवार पर।
कौरनि सथिया चीततिं नवनिधि - १० - ३२।
[हिं. कौरा+ हिं. नि (प्रत्य.)]
कुरु राजा की संतान, दुर्योधन और उसके भाई।
गले की घाँटी, लंगर, ललरी।
मुसलमानी गवैयों की एक जाति।
राजा दशरथ की पत्नी जो राम की माता थी।
सेना की छावनी का मध्य भाग।
[सं. कोल=क्रोड़, गोद ; हिं. कौरा]
कौले लगना- द्वार के कोने में छिपना।
कौला सींचना- पूजा आदि अवसरों पर द्वार के इधर-उधर पानी छिड़कना।
[सं. कोल=क्रोड़, गोद ; हिं. कौरा]
धिक तुम, धिक या कहिबे ऊपर। जीवित रहिहौ कौलौं भूपर - १ - २८४।
[हिं. कौ=कौन या कब + लौं=तक]
कौरैं लागी- पकड़ने की घात में थी, उसके पीछे लगी थी। उ.- माखन - चोर री मैं पायौ। बहुत दिवस मैं कोरैं लागी, मेरी घात न आयौ - १० - २८८।
कोरै लग्यौ होइगो- छाती से लगा होगा, आलिंगित होगा। उ.- मन जिनि सुनै बात यह माई। कौरै लग्यौ होइगो कितहूँ कहि दैहै को जाई - १६६५।
क्यों विस्वास करहिगो कौरौ सुनि प्रभु कठिन क्रीती - ११ - ३।
राजा दशरथ की पत्नी जो राम की माता थी।
राजा दशरथ की बड़ी रानी जो राम की माता थी।
कुशिक राजा के पुत्र गाधि।
कुशिक राजा के वंशज विश्वामित्र।
दै दै दगा बुलाइ भवन मैं भुज भरि भेंटति उरज-कठोरी - - १० - ३०५।
काठ का एक पात्र जो परात से ऊँचा होता है।
कौशल्या जो राजा दशरथ की पत्नी और राम की माता थी।
रामहिं राखौ कोऊ जाइ। जब लगि भरत अजोध्या आवैं, कहति कौसिला माई - ९ - ४७।
राजा दशरथ की पत्नी जो राम की माता थी।
समुद्र से निकला हुआ एक रत्न जिसे विष्णु अपने वक्षस्थल पर धारण किये रहते हैं।
कौस्तुभ मनि को धारण करनेवाले विष्णु का अवतार श्रीकृष्ण।
कंबु कंठ-धर कौस्तुभ-मनि-धर बनमालाधर मुक्त-माल-धर - ५७२।
क्या कहना है- (१) बहुत अच्छा है। (२) बहुत बुरा है (व्यंग्य)।
क्या क्या - बहुत कुछ।
(किसी की) क्या चलाना- बराबरी न कर पाना।
क्या जाता है- क्या हानि होती है।
क्या पड़ना- कुछ गरज न होना।
क्या से क्या हो गया- दशा बिलकुल बदल गयी।
क्या समझते (गिनते) हैं- कुछ नहीं गिनते।
(तो) फिर क्या है- (तो) बड़ा अच्छा हो जाय।
ऐसा क्या- इसकी क्या जरूरत है ?
क्या क्या चले- इतनी जल्दी जाने की क्या जरूरत है ?
क्या आग में डालूँ- यह मेरे किस काम का है ?
बाग या खेतों के मेड़ों की बीच की गहरी जमीन जिसमें पेड़ों की पंक्तियाँ लगायी जाती हैं।
क्योंकर- किस प्रकार।
क्यों नहीं- (१) ठीक है (समर्थन में)। (२) हाँ, जरूर (स्वीकृति सूचक)। (३) ठीक नहीं है (व्यंग्य)। (४) कभी नहीं (व्यंग्य)।
क्यों न हो- (१) बहुत खूब (प्रशंसात्मक)। बहुत बुरा (व्यंग्य)।
वस्तुओं या कार्यों का सिलसिला।
एक क्रम से लिखी हुई संख्या।
एक क्रम से लिखे जानेवाले अंक।
धीरे धीरे किसी रूप को प्राप्त।
जो सदा से होता आया हो, परंपरागत।
धीरे धीरे काम करने की प्रणाली।
क्रम क्रम करके- धीरे धीरे, शनैः शनैः। उ. - (क) लरखरात गिरि परति हैं, चलि घुटुरुनि धावैं। पुनि क्रम-क्रम भुज टेकि कै, पग द्वैक चलावैं - १० - ११२। (ख) जो कोउ दूरि चलन को करै। क्रम क्रम करि डग डग पग धरै। क्रम से, कम क्रम से - - धीरे धीरे।
कार्य-संपादन की व्यवस्था।
अगम सिंधु जतननि सजि नौका, हठि क्रम भार भरत। सूरदास-व्रत यहै, कृष्ण भजि, भव-जलनिधि उतरत - १ - ५५।
क्रम, नियम, पूर्वापर-संबंधी व्यवस्था, सिलसिला।
भ्रम-मद मत्त, काम-तृष्ना-रस-बेग, न क्रमै गह्यौ। सूर एक पल गहरु न कीन्ह्यौ, किहिं जुग इतौ सह्यौ - १ - ४९।
एक कल्पित वृक्ष जिस पर सूर्य पृथ्वी के चारो ओर घूमता जान पड़ता है।
एक स्थिति से दूसरी में परिवर्तन, उलटफेर।
एक वृत्त जिस पर सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करता जान पड़ता है।
एक राजा जो बाहूग्रह का अवतार माना जाता है।
रुक-रुक कर उठनेवाला दर्द, कसक।
ओजपूर्ण प्रशंसात्मक गीत जिन्हें सुनकर युद्ध में जानेवाले वीर उत्तेजित हो जाते हैं।
धातु का गोल छल्ला या कुंडा।
हरि के देखत तजे परान। तासु क्रिया करि सब गृह आए। राजा सिंहासन बैठाए - १ - २८०।
क्रिया के रूप में प्रस्तुत किया हुआ।
संध्या, तर्पण आदि नित्यकर्म विधि-विधान से करनेवाला।
क्रिया पंथ स्रुति ने जो भाख्यौ सो सब असुर मिटायौ। बृहद् भानु ह्वै कै हरि प्रगटे छन में फिर प्रगटायौ।
वह शब्द जिससे क्रिया के काल, भाव या रीति का पता चले।
किरीट नाम का सिर का आभूषण।
क्रीट मुकुट सोभा बनी सुभ अंग बनी बनमाल। सूरदास प्रभु गोकुल जनमे, मोहन मदन गोपाल।
क्रीड़ा करता है, आमोद-प्रमोद में मग्न रहता है।
(क) निकट आयुध बधिक धारे, करत तीच्छन धार। अजा-नायक मगन क्रीड़त, चरत बारम्बार - १ - ३२१।
(ख) सुधा-सर जनु मकर क्रीड़त - ६२७।
खेलना-कूदना, आमोद प्रमोद करना।
एहि थर बनी क्रीड़ा गज-मोचन और अनंत कथा स्रुति गाई - १६
खेल-कूद या लीला का स्थान।
क्रीड़ा या लीला का स्थान।
वह व्यक्ति जिसने क्रीड़ा की हो।
कल्लोलते हैं, आमोद-प्रमोद करते हैं, खेल मचाते हैं।
एक बिरध-किसो बालक, एक जोबन जोग। कृष्न जन्म सु प्रेमसागर, क्रीड़ैं सब ब्रज लोग - १० - २६।
[सं. क्रीड़ा, हिं. क्रीड़न]
सुनौ धौं दै कान अपनी लोक लोकनि क्रीत (क्रीती)। सूर प्रभु अपनी खचाई रही निगमनि जीत - ३४७६।
(क) वै सब परम बिचित्र सयानी अरु सब ही जग क्रीति - ३४७८। (ख) हौं कहा कहौं सूर के प्रभु निगम करत जाकी क्रीति - १० उ. - १७५।
(ग) क्यों विश्वास करहिंगो कौरौ सुनि प्रभु कठिन क्रीती - ११ - ३।
लीला, केलि, खेलकूद, आमोद-प्रमोद।
सूरदास प्रभु की यह लीला। सदा करत ब्रज मैं यह क्रीला - १०२८।
कोपयुक्त, क्रोध में भरा हुआ।
सूर नृप क्रूर अक्रूर क्रूरै भयौ धनुष देखन कहत कपटी महा है - १५०३।
रवि, मंगल, शनि, राहु और केतु ग्रह जिनसे युक्त तिथि या नक्षत्र में शुभ कार्य वर्जित हैं।
अक्रूर जो श्रीकृष्ण के चाचा थे और कंस की आज्ञा से उन्हें मथुरा ले गये थे।
आप क्रूर लै चले स्याम को हित नाही कोउ हरि कै - २५२९।
नीच या कठोर कर्म करनेवाला।
सूर नृप क्रूर अक्रूर क्रूरै भयो धनुष देखन कहत कपटी महा है - २५०३।
दोनों बाहों के बीच का (छाती का) भाग।
सातों द्वीप जे कहे सुक मुनि ने सोई कहत अब सूर। जंबु प्लक्ष क्रौंच शाक शाल्मलि कुश पुष्कर भरपूर - सार.३४।
कठिन, मुश्किल से समझ में आनेवाली।
जो सरलता से सिद्ध या सत्य न हो सके।
गुस्से में भरा हुआ, क्रोधित।
खंभ फारि, गल गाजि मत्तबल, क्रोधमान छबि बरनि न आई। नैन अरुन, बिकराल दसन अति, नख सौं हृदय विदारय्यौ जाई - ७४।
मांडव धर्मराज पै आयौ। क्रोधवन्त यह बचन सुनायौ - ३ - ५।
कोटि कोटि तिनके सँग जोधा। को जीतै तिनके तनु क्रोधा - २४५९।
जो बहुत क्रोध करता हो, जो शीघ्र क्रोध से भर जाता हो।
[सं. कुमार, प्रा. कुवाँर, हिं. कुआर]
जिसका विवाह न हुआ हो, कुआरा।
ओषधियों को उबालकर निकाला हुआ रस, काढ़ा।
जिसको करना सरल न हो, मुश्किल।
शरीर की दस अग्नियों में एक।
काव्य का एक दोष जिससे भाव समझने में कठिनाई हो।
क्षणभंग, क्षणभंगु, क्षणभंगुर
सुख संपति दारा सुत हय गय हठै सर्ब समुदाय। क्षणभंगुर (छनभंगुर) ए सबै स्याम बिनु अंत नाहिं संग जाय।
क्षण भर में (शीघ्र ही) नष्ट हो जाने वाला।
क्षण भर में, या बहुत शीघ्र नष्ट होने का भाव।
एक सिद्धांत जिसमें प्रति क्षण परिवर्तित होते होते वस्तु का नष्ट हो जाना मानते हैं।
भयौ सुरुचि तैं उत्तम क्वार। अरु सुनीति के ध्रुव सुकुमार - ४ - ९।
[सं. कुमार, हिं. क्वार + छल]
जिसका विवाह न हुआ हो, कुआरा।
तू कहाँ या किस स्थान पर है।
चलौ किन मानिनि कुंज कुटीर। तुव बिनु कुँअर कोटि बनिता तजि सहत मदन की पीर। गद्गद सुर पुलकित बिरहानल स्रवत बिलोचन नीर। क्वासि क्वासि बृषभानुनंदिनी बिलपत बिलपन अधीर।
क्षमा करनेवाला, क्षमाशील।
बहुत दिनन के, विरह ताप दुख मिलत क्षणक में मेटे - ८२४ सारा.।
जो तोड़ा-फोड़ा गया हो, जिसे क्षति पहुँची हो, घायल।
शरीर में बहुत घाव लगने पर मालूम होने वाली प्यास।
(युद्ध, दान, रक्षा आदि) क्षत्रियों के कर्म।
ईरानी मांडलिक राजाओं की उपाधि जो भारतीय शासकों ने अपना ली थी।
दियौ उनपै कह्यौ तुम कोउ क्षत्रिआ कपट करि बिप्र कौ स्वाँग स्वाँग्यौ - १० उ. - १५१।
चार वर्णों में दूसरा जिसका काम देश का शासन और उसकी रक्षा माना गया था।
लोहे पीतल आदि का पात्र जिसे चूल्हे पर चढ़ाकर पूरी-मिठाई बनाते हैं।
क्षम अपराध देवकी मेरो लिख्यौ न मेट्यौ जाई। मैं अपराध किये सिसु मारे कर जोरे बिललाई - ३८६ सारा.।
योग्यता, सामर्थ्य, शक्ति।
क्षमा कराकर, दूसरे से क्षमवाकर।
बहुरि बिधि जाय क्षमवाय कै रुद्र को विष्णु बिधि रुद्र तहँ तुरत आये।
दिये हुए कष्ट को सहन करने और कष्ट देनेवाले के प्रति प्रतिकार की इच्छा न रखने की वृत्ति।
क्षमा कराये, क्षमा करवा दिये।
तब हरि उनके दोष क्षमाए - ८९६।
यह सुनि कै अकुलाई चले हरि कृत अपराध क्षमानै–२०५३।
कौरवन मिलि बहुति भाँति बिनती करी दोष तिनको द्विजन मिलि क्षमायौ - १० उ. - १४६।
परी पाँय अपराध क्षमावत सुनत मिलैगी धाय। सुनत बचन दूतिका बदन ते स्याम चले अकुलाय - ९७३ सारा.।
सूर स्याम जुवतिन सौं कहि कहि सब अपराध क्षमाहीं - पृ. ३४१ (७०१)।
सुर हरि भक्त असुर हरि द्रोही। सुर अति क्षमी असुर अति कोही।
अब हमकौ अपराध क्षमैंगे कृपा करौ मुख बोलों जू - १९६१।
धीरे धीरे घटना या कम होना।
औषधियों को जलाकर तैयार किया हुआ नमक।
अमल अकास कास कुसुमिन क्षिति लक्षण स्वाति जनाए - २८५४।
वह वृत्ताकार स्थान जहाँ आकाश और पृथ्वी, दोनों मिले जान पड़ते हैं।
जिसका स्वाद उग्र या तीक्ष्ण हो।
उग्र या तीक्ष्ण स्वभाववाला।
स्वाद में उग्र या तीक्ष्ण लगना।
नींद न आने पर आँख में दर्द होना।
छोटा कड़ा जो बच्चे को हाथ-पैर में पहनाते हैं।
वस्तु को खरादकर ठीक करनेवाला।
नाहिंन कढ़त और के काढ़े सूर मदन के बान - २०५१।
क्षीरोदक घूँघट हातो करि सन्मुख दियो उघारि। मानो सुधाकर दुग्ध सिंधु ते कढ्यौ कलंक पखारि - १६८९।
एक प्रकार का रेशमी कपड़ा जो प्राचीन काल में बनता था।
कहा भयो मेरो गृह माटी को। हौं तो गयो गुपालहिं भेंटन और खरच तंदुल गाँठी को...। नौ तन क्षीरोदक (षीरोदक) जुवती पै भूषन हुते न कहुँ माटी को।
प्रभु कहा निहोरो मानतु रंक त्रास टाटी को।
दूध से बना हुआ, दूध से उत्पन्न।
पसुपति मंडल मध्य मनो क्षीरधि नीरधि नीर के - २५९९।
चंद्रमा जो समुद्र से उत्पन्न होने के कारण उसका पुत्र माना जाता है।
लक्ष्मी जो समद्र से उत्पन्न होने के कारण उसकी पुत्री मानी जाती है।
जो टुकड़े-टुकड़े या चूर चूर हो।
नीच बुद्धिवाला, ओछी बुद्धिवाला।
बरष दिन संयोग देत मोकों भोग क्षुद्र मति ब्रजलोग गर्व कीनो - ९४४।
क्षुद्रघंटिका, किंकिणी, करधनी।
अंग अभूषन जननि उतारति। दुलरी ग्रीव माल मोतिन की लै केयूर भुज स्याम निहारति। क्षुद्रावली उतारति कटि तैं सौंपति धरति मन ही मन वारति।
नीच स्वभाव का, ‘महाशय' का विपरीतार्थक।
[सं. क्षुधा+वंत (प्रत्य.)]
श्री कृष्ण की पत्नी, सत्यभामा का पुत्र।
रुद्रपति, क्षुद्रपति, लोलपति वोकपति, धरनिपति, गगनपति, अगम बानी।
ऊपर या पीछे से मिलाया हुआ अंश।
रेखाओं से घिरा हुआ स्थान।
वर्ग की लम्बाई-चौड़ाई का गुणन फल, वर्ग परिणाम।
निकलती हैं, बाहर आती हैं।
अब वै बातैं इहयाँ रही।........। अब वै सालति हैं उरमहियाँ कैसेहु कढ़ति नहीं - २५४२।
स्त्री का प्रेमी के साथ निकलना।
औटने से दूध का गाढ़ा होना।
मथानी घुमाने की डोरी, नेती।
घसीटना, घसीटकर बाहर करना।
देवनागरी वर्णमाला के कवर्ग का दूसरा अक्षर; स्पर्श, महाप्राण व्यंजन। कंठ्य वर्ण।
बड़े दाँतवाला (पशु), दँतैल।
जिसके दाँत बाहर निकले हों, दँतैल।
खाँसना। खखारकर कफ निकालना।
कुंभकरन तनु खंग लग गई लंक बिभीषन पाई।
चिह्न पड़ना, चिह्नित होना।
आलिंगन दै अधर पान करि खंजन खंज लरै
एक सुंदर पक्षी जो बहुत चंचल होता है और जिसकी उपमा कवि नेत्रों से देते हैं।
डफली की तरह एक छोटा बाजा।
कंसताल कठताल बजावत सृंग मधुर मुँह चंग। मधुर खंजरी पटह प्रणव मिलि सुख पावत रतभंग - १०७५ सारा.।
एक तरह का रेशमी धारीदार कपड़ा।
(क) मनोहर है नैनन की भाँति।….। खंजरीट मृग मीन बिचारति उपमा को अकुलाति - २१४७। (ख) बालभाव अनुसरति भरति दृग अग्र अंशुकन आनै। जनु खंजरीट जुगल जठरातुर लेते सुभष अकुलानै - २०५३। (ग) मनहुँ मुदित मरकत मनि-आँगन खेलत खंजरीट चटकारे।
तासौ सुत निन्यानबै भए।….तिन मैं नव नवखँड अधिकारी–५ - २।
देश, पौराणिक भूगोल के अनुसार प्राचीन द्वीपों के नौ या सात भाग।
अखिल ब्रह्मांड खंड की महिमा दिखराई मुख माँहिं - १० - २५५।
किसी बात का खंडन करनेवाला।
वह काव्य जिसमें कथा की घटना विशेष का वर्णन हो। इसमें काव्य के सब लक्षण नहीं होते।
पूरी जिसमें मेवेमसाले और चीनी भरी हो।
किसी प्रदेश या खंड का नाश।
किसी गिरे हुए भवन का बचा हुआ भाग, खँडहर।
[हिं. खाँड़+हिं. बरा (प्रत्य.)]
टूटा-फूटा, अपूर्ण, असंबद्ध।
असत्य, अशुद्र या अनुचित सिद्ध करना।
(बात या सिद्धांत को) अयुक्त ठहराना।
देश ; पौराणिक द्वीपों के नौ-नौ या सात-सात भाग।
एक एक रोम कोटि ब्रह्मंडा। रवि ससि धरनी, धर नवखंडा - १०७०।
स्यंदन खंडि, महारथि खंडौं, कपि-ध्वज सहित गिराऊँ - १ - २७०।
वह व्यक्ति जो ग्रंथ को खंडश: पढ़े।
निश्चित समय पर अदा किया जानेवाला अंश, किश्त।
(क) चारि मास बरसे जल खूटे हारि समुझ उनमानी। एतेहू पर धार न खंडित इनकी अकथ कहानी - ३४५७। (ख) नैनन निरखि निमेष न खंडित प्रेम-व्यथा न बुझाई - २९७६।
ऐसी नायिका जिसका पति रात में अन्य स्त्री के पास रहकर प्रात:काल लौटे।
नित्य रास जल नित्य बिहार। नित्य मान खंडिताभिसार - २३८०।
दिन दिन इनकी करौं बड़ाई अहिर गये इतराइ। तौ मैं जो वाही सौं कहिकै उनकी खाल कढ़ाई - २५७८।
निकलवायी, बाहर की, खींच ली।
सुनु मैया, याके गुन मोसौं, इन मोहिं लयौ बुलाई। दधि मैं पड़ी सेंत की मौपैं चीटी सबै कढ़ाई - १० - ३२२।
निकालने की क्रिया या मजदूरी।
बूटा-कसीदा काढ़ने की क्रिया या मजदूरी।
निकलवाना, बाहर कराना, खिंचाना।
निकलवाना, बाहर कराना, खिंचाना।
घसीटकर, घसीटकर बाहर करके।
नाहिं काँचौ कृपानिधि हौं, करौ कहा रिसाइ। सूर तबहुँ न द्वार छाँड़ै, डारिहौ कढ़िराइ - १ - १०६।
उबारने या उद्धार करनेवाला।
वर पक्षवालों को भेजा गया जल पान या शरबत।
स्थान जहाँ खाँड़ बनती हो।
टूटे हुए भवन का। शेष, खंडर।
लगान या कर इत्यादि की किश्त।
खंडन करे, तोड़े, न माने, उल्लंघन करे।
पिता-बचन खंडै सो पापी, सोइ प्रहलादहिं कीन्हौ। निकसे खंभ-बीच तैं नरहरि, ताहि अभय पद दीन्हौ - १ - १०४।
स्यंदन खंडि, महारथि खडौं, कपिध्वज-सहित उड़ाऊँ - १ - २७०।
[हिं. खाँड+ओरा (प्रत्य.)]
[सं. कांतार या हिं. अंतरा]
[सं. कांतार या हिं. अंतरा]
[सं. कांतार या हिं. अंतरा]
दुर्ग के चारो ओर की गहरी खाई।
खोदनेवाला, नाश करने वाला।
दैत्य दलन गजदंत उपारन, कंस केसि धरि फंदा। सूरदास बलि जाइ जसोमति सुख के सागर दुख के खंदा।
सेना के रहने की जगह, छावनी।
किसी पदार्थ को पात्र से बाहर निकालना।
कंस परयौ मन इहै बिचारा। राम-कृष्ण बध इहै खंबारा - २४५९।
खलबली, व्याकुलता, घबराहट।
उ. - बहुत अचगरी जिनि करौ, अजहुँ तजौ झवारि। पकरि कंस लै जाइगौ, कालिहि परै खँभारि - ५८९। (ख) जैहै बात दूरि लौं ऐसी परिहै बहुरि खँभारि - १०८८।
देखौ जाइ तहाँ हरि नाहीं, चकृत भई सुकुमारि। कबहुँक इत, कबहूँ उत डोलति, लागी प्रीति-खँभारि - ६७९।
[सं. काश्मरी, प्रा. कम्हरी]
भयभीत कर दी, कँपा दी, विचलित कर दी।
धायौ पवनहुतै अति आतुर धरनी देह खभारी - २५९४।
तब ब्रह्मा करि बिनय कह्यौ, हरि, याहि सँहारौ। तुम हौ लीला करत, सुरनि मन परयौ खँभारौ - ३ - ११।
खत्ता जिसमें अनाज भरा जाय।
जूठा खइए मीठे कारन आपुहि खात लड़ावत - पृ. ३३१।
[सं. खादन, पा. खाअन, खान ; हिं. खाना]
(क) सुत-सनेह-तिय कुटुम्ब मिलि, निसि दिन होत खई - १ - २९९। (ख) त्यौंरी भौंहन मोतन चितवै नैंक रहौ तौ करै खई - १२६१।
(ग) कहतहि पोच सोच मनही मन करत न बनति खई - २७९१।
(घ) भोजन भवन कछू नहिं भावत पलकन मानौं करत खई सी - १६८३।
खरखराहट के साथ कफ खींचना।
चित्त पर असर करती है, मन में बैठती है।
जाही सो लगत नैन ताही खगत बैन नख सिख लौं सब गात ग्रसति - १८६९।
पेड़ के खोखले में बना हुआ घोसला।
प्रफुलित बदन सरोज सुंदरी अति रस नैन रँगे | पुहुकर पुंडरीक पूरन मनो खंजन केलि खगे - पृ. ३५० (६४)।
अटके थे, अड़ रहे थे, उलझे थे।
न्हात रहीं जल में सब तरुनी तब तुम नैना कहाँ खगे -१३१८।
इहै कोऊ जानै री। वाकी चितवनि मैं कि चंद्रिका मैं किधौं मुरली माँझ ठगोरी। देखत सुनत मोहि जा सुर नर मुनि मृग और खगो री-२३६१।
जब दधि-रिपु हरि हाथ लियौ। खगपति-अरि डर, असुरनि संका, बासरपति आनंद कियौ - १० - १४३।
[सं. खगपति=गरुड़+अरि= शत्रु]
सेमर-फूल सुरँग अति निरखत, मुदित होत खगभूप। परसत चोंच तूल उघरत मुख, परत दुःख कैं कूप -१-१०२।
यह सुनि धावत धरनि चरन की प्रतिमा खगी पंथ में पाई।
बेसन को पतला करके और आग पर गाढ़ा करके बनाया जानेवाला एक प्रकार का सालन या भोजन।
(क) दाल-भात घृत कढ़ी सलोनी अरु नाना पकवान। आरोगत नृप चारि पुत्र मिलि अति आनन्द निधान। (ख) खाटी कड़ी बिचित्र बनाई। बहुत बार जेंवत रुचि आई - २३२१।
सूर निरखि मुख हँसति जसोदा, सो सुख उर न कढ़ै - १० - १७४।
[सं. कर्षण, पा. कड्ढ्न, हिं. कढ़ना]
(तब) लादि पंकज कढ़यौं बाहिर, भयौ ब्रज-मन-भावना–५७७।
[सं. कर्षण, पा. कडढन, हिं. कढ़ना]
[सं. खाद्य, प्रा. खाज्ज]
[सं. खाद्यान्न, प्रा. खज्जाज्ज]
खजला या खाजा नाम की मिठाई।
दोना मेलि धरे हैं खजुआ। हौंस होय तौ ल्याऊँ पूआ।
शरीर को नाखून आदि से सहलाना या रगड़ना।
अपनी खचाई- अपनी ही बात ऊपर रखी, दूसरे का तर्क न सुना। उ.- सुनौ धौं दै कान अपनी लोक लोकन क्रीति। सूर प्रभु अपनी खचाई रही निगमन जीति।
पटली बिच बिद्रुम लागे हीरा लाल खचावन-२२८०।
(क) कंचन-खंभ, मयारि, मरुवा-ड़ाडी, खचि हीरा बिच लाल प्रबाल-१०-८४। (ख) किधौ बज्रकनि लाल नगनि खचि तापर बिद्रुम पाँति-१४१०।
(ग) विद्रुम स्फटिक पची कंचन खचि मनिमय मंदिर बने बनावत-१०-उ.-५।
(घ) हम सर-घात ब्रजनाथ सुधानिधि राखे बहुत जतन करि सचि सचि। मन मुख भरि भरि नैन ऐन ह्वै उर प्रति कमल कोस लौं खचि खचि-२९०२।
(क) कनक खचित मनिमय आभूषन, मुख स्रम-कन सुख-देत ६२८। (ख) चारु चक्र मनि खचित मनोहर चंचल चमर पताका-२५६६।
देत भाँवरि कुंज मंडप पुलिन में बेदी रची। बैठे जो स्यामा स्याम बर त्रैलोक की सोभा खची।
चौकी हेम चंद्र मनि लागी हीरा रतन जराय जरी-पृ. ३४५ (४१)।
नैना पंकज पंक खचे। मोहन मदन स्याम मुख निरखत भ्रुवन बिलास रचे - पृ. ३२५।
रम गया, अड़ गया, मग्न हो गया।
(क) आजु हरि ऐसे रास रच्यौ। ........। गत गुन मँद अभिमान अधिक रुचि लै लोचन मन तहँइ खच्यौ-पृ. ३५० (६६)। (ख) एक दिन बैंकुठबासी रास बृन्दाबन रच्यौ। सोई स्वरूप बिलोकि माधौ आइ इन बिधि तनु खच्यौ - ३२६०।
अनिष्ट या अपकार की आशंका होना।
काल्हि मैं कैसे निदरति ही मेरे चित पर टरति न खटकी - १३०१।
टकराने या ठोंकने पीटने का शब्द।
मधुरी अति सरस खजूरी। सद परसि धरी घृत पूरी - १८३।
टूटने, टकराने या ठोंकने-पीटने का शब्द।
बल मोहन खटकट वाकैं मन, आजु कही यह बात-५२७।
किसी चीज के गड़ने, चुभने या आ पड़ने से पीड़ा होना
तरकारी बेचनेवाली एक जाति।
जो कुछ खट्टा हो और कुछ मीठा।
खट्टा, मीठा, कड़ाआ,तीखा अदि छः रस।
कान का छेद जिसमें स्त्रियाँ बालियाँ पहनती हैं।
(क) भरता भँटा खटाई दीनी - २३२१।
वह पदार्थ जिसका स्वाद खट्टा हो।
निर्वाह होता है, निभता है।
मधुकर कह कारे की न्याति। ज्यों जल मीन कमल मधुपन कौ छिन नहिं प्रीति खटाति - ३१६८।
(किसी वस्तुका) खट्टा हो जाना।
[सं. स्कभू, स्कब्ध; प्रा. खडु=ठहरा हुआ]
[सं. स्कभू, स्कब्ध; प्रा. खडु=ठहरा हुआ]
कंजई रंग की आँख का घोड़ा।
कहि राधा किन हार चोरायो। ब्रज जुवतिन सबहिन मैं जानति घट - घट लै लै नाम बतायो। अमला अवला कंजा मुकुता हीरा नीला प्यारि - १५८० |
एक ऋषि जिन्होंने शकुन्तला को पाला था।
(क) सूरदास भगवंत भजन बिनु धरनी जननि बोझ कत मारी ? - १ - ३४। (ख) काल-ब्याल, रज-तम-बिष-ज्वाला कत जड़ जंतु जरत - १ - ५५। (ग) छये पति कत जात खेलत कान मेरे प्रान - सा० ९३।
ऊँचा--नीचा, जो समतल न हो।
[हिं.खड्ड+सं. विघट, प्रा. बिहड़]
बहुत तीक्ष्ण सान जिस पर तलवार उतारी जाती है।
शूद्रराज इहि अन्तर आयौ। वृषभ-गाइ कौं पाइ चलायौ। ताहि परीछित खंग उठाइ। बहुरौ बचन कह्यौ या भाइ -१ २९०।
एक वृक्ष जो यमराज के यहाँ है और जिसमें पत्तियों की जगह तलवारें कटारें आदि लगी हैं। पापियों को इसपर चढ़ने का दंड दिया जाता है।
टूटा-फूटा मकान, मन्दिर आदि।
समकोण उठा हुआ, दंड की तरह सीधा।
खड़े खड़े- झटपट।
खड़ा जवाब- साफ इन्कार।
खड़ा होना- सहायता करना।
खड़ी पछाड़ें खाना- बहुत क्षोभ से पृथ्वी पर गिरना।
[हिं. काठ+पाँव; या खटपट अनु.]
एक तरह की सफेद मिट्टी, खड़ी।
खड़िया में कोयला- बेमेल बात।
फली-पत्ती रहित अरहर का पेड़ या डंठल।
आधुनिक हिंदी का वह रूप जिसका प्रचार सारे भारत में है। इसमें संस्कृत के साथ साथ अरबी, फारसी के भी प्रचलित शब्द घुले-मिले हैं।
घाव की सुखी हुई ऊपरी पपड़ी, खुरंड।
खाते में लिखा जाना, खतियाया जाना।
प्रतिदिन का आय-व्यय अलग-अलग खातों या मदों में लिखना।
प्रति दिन की आय-व्यय आदि खातों में यथानुसार लिखता है।
साँचौ सो लिखहार कहावै।....। बट्टा काटि कसूर भरम कौ, फरद तले लै डारे। निहचै एक असल में राखै, टरैं न कबहूँ टारै। करि अवारजा प्रेम प्रीति कौ, असल तहाँ खतियावै। दूजे करज दूरि करि दैयत, नैंकु न तामैं आवै–२-१४२।
[सं. क्षत्री+वट (प्रत्य.)]
सूरदास चरननि की बलि-बलि, कौन खता तैं कृपा बिसारी-१-१६०।
किसी चीज को इतना उबालना कि ‘खदबद' शब्द होने लगे।
खान जिसमें से खनिज पदार्थ निकलते हैं।
किसी औजार या कैंची से कतरना।
वह व्यक्ति जो बीच में बात काट देता हो।
बधिक, हत्यारा, मारनेवाला।
एक प्रकार की मिठाई या पकवान।
ऋण लेकर व्यापार करनेवाला।
हाथ से काते सूत का हाथ से बुना कपड़ा।
क्षण, पल भर का समय, लमहा।
खन भीतर, खन बाहिर आवति, खन आँगन इहिं भाँति-५४०।
खन गोपी कै पाँइँ परै धन सोई है नेम -३४४३।
खनने को प्रेरित करना, खुदवाना।
खोदते हैं, खोदकर, खोदने (से)।
वे हरि रत्न रूप सागर के क्यों पाइए खनावत घूरे (धूरे) -३०४२।
(क) परम गंग कौं छाँड़ि पियासौ दुरमति कूप खनावै-१-१६८। (ख) बसत सुरसरी तीर मंदमति कूप खनावै-२-९।
(क) कूप खनि कह जाइ रे नर, जरत भवन बुझाइ। सूर हरि कौ भजन करि लै, जनम-मरन नसाइ -१-३१५। भरत भवन खनि कूप सूर त्यौं मदन अगिनि दहि जैहै-२०३४।
द्रुम साखा अवलंब बेलि गहि नख सों भूमि खनोवति -१८००।
खपड़ैल में लगाये जानेावले मिट्टी के पके हुए टुकड़े।
खबर उड़ना (फैलना)- चर्चा होना।
खबर लेना- (१) समाचार जानना। (२) ध्यान देना, दया दिखाना। (३) दंड देना।
खप्पर, टूटा हुआ पात्र जो भिखारियों के पास रहता है।
गोपालहिं पावौं धौं किहिं देस। सृंगी मुद्रा कनक खपर करिहौं जोगिन भेष-२७५४।
खपड़े से छायी छाजन या छत।
स्वारथ करना, समाप्त करना।
मैना मेघनायक रितु पावस बान बृष्टि करि सैन खपायौ।
मिट्टी का चौड़ा पात्र जो भिखारियों के पास रहता है।
हृदय सींगी टेर मुरली नैन खप्पर हाथ - ३१२६।
गाते समय स्वर में लोच लाने के लिए लिया जाने वाला विश्राम।
सड़ा कर तैयार किया हुआ पदार्थ
दुबला, जिसके हड्डियाँ निकली हों।
मिलाना, (एक वस्तु में दूसरी का) मेल करना।
कैसेहुँ ये बालक दोउ उबरैं, पुनि पुनि सोचति परी खभारे। सूर स्याम यह कहत जननिसों, रहि री मा धीरज उर धारे - ५९५।
खम खाना- (१) दब जाना। (२) हारना।
खम ठोकना (बजना)- (१) ताल ठोककर लड़ने को ललकारना। (२) दृढ़ होना।
ममता-घटा मोह की बूँदैं, सरिता मैन अपारौ ! बूड़त कतहुँ थाह नहिं पावत, गुरुजन ओट अधारौ - १ - २०९।
(क) किंधौं सूर कोई ब्रज पठयो, आजु खबरि के पावत हैं - २९४६। (ख) द्वारावति पैठत हरि सों सब लोगन खबरि जनाई - १० उ. - २७।
(क) क्यों जू खबरि कहौ यह कीन्हीं करत परस्पर ख्याल - २४२७। (ख) कूदि परयौ चढ़ि कदम तैं खबरि न करौ सबेर - ५८९।
ज्ञान बुझाइ खबरि दै आवहु एक पंथ द्वै काज - २९२५।
अपने कुल की खबरि करौ धौं सकुच नहीं जिय आवति - ११७४
खबरि करि- ध्यान देकर, खबरदारी से पता लगाकर, समझ-बूझकर। अपनी बात खबरि करि देखहु न्हात जमुन के तीर - ११४०।
समाचार लाने या ले जानेवाला, दूत।
धरोहर का कुछ भाग दबा लेना।
अंचल उड़त मन होत गहगहो फरकत नैन खये - १० उ. - १०७।
रावण का भाई जिसे राम ने मारा था।
पशुओं के रखने का बाड़ा जो प्रायः आड़ी-सीधी बल्लियाँ खंभे गाड़कर तैयार किया जाता है।
हाहा चल प्यारा तेरो प्यारो चौंकि चौंकि परै पातकी खरक पिय हिय में खरक रही - २२३६।
चल देना, भाग जाना, सरक जाना।
ननदी तौन दिए बिनु गारी नैकहु रहति सासु सपनेहू में आनि गोउति काननि में लए रहै मेरे पाँइन को खरकौ - १४९२।
घास-फूल भक्षण करनेवाली अग्नि।
सूरदास कछु खरच न लागत, राम नाम मुख लेत - १ - २९६।
खाई न सकै, खरचि नहिं जानै, ज्यौं भुवंग-सिर रहत मनी - १ - ३९।
यामें कछू खरचियतु नाही अपनो मतो न दीजै - २९७२।
खरचै लाख, लिखै नहिं एक - ४ - १३।
खर और दूषण नामक दो राक्षस जो रावण के भाई थे।
संख्या का बारहवाँ स्थान, सौ अरब की संख्या।
(क) तब मैं डरवि कियौ छोटौ तनु, पैठ्यौ उदर मँझारि। खरभर परी, दियौ उन पैडों, जीती पहिली रारि - ९ १०४।
(ख) कटक अगिनित जुरयौ, लंक खरभर परयौ, सूर कौ तेज धर-धूरि ढाँप्यो - ९ - १० ६।
चंचल या व्याकुल होकर खरभराने लगा।
तब जलनिधि खरभरयौ त्रास गहि, जंतु उठे अकुलाइ - ९-१२१।
पूस-चैत मास जिसमें शुभ कार्य करना मना है।
पत्थर या लोहे को गोल या लंबोतरा पात्र जिसमें डालकर ओषधियाँ कूटी जाती हैं।
पूस-चैत मस जिनमें शभ कार्य वर्जित हैं।
एक प्रकार की तीक्ष्ण सान जिस पर तीर, तलवार आदि की धार तेज की जाती है।
झलमलात रति रैनि जनावत अति रस मत्त भ्रमत अनियारे। मानहु सकल जगत जीतन को कामबान खरसान सँवारे - २१३२।
खरा खोटा- भला-बुरा।
जी खरा खोटा होना- नियत बुरी हो जाना।
नकद और उचित (मूल्य या वेतन)।
रुपया खरा होना- रुपया मिलने की बात पक्की हो जाना।
स्पष्ट और निष्पक्ष बात कहनेवाला।
स्पष्ट और सच्ची बात जो सुनने में चाहे कितनी ही अप्रिय लगे।
खरी सुनाना- सच्ची सच्ची बातें कहना पर यह ध्यान न देना कि ये भली लगेंगी या बुरी।
एक अँधेरो हिये की फूटी दौरत पहिरि खराऊँ - ३४६६।
एक औजार जिस पर चढ़ाकर लकड़ी, धातु आदि की वस्तुएँ सुडौल, चिकनी और चमकीली की जाती हैं।
पालनौ अति सुंदर गढ़ ल्याउ रे बढ़ैया। सीतल चंदन कटाउ, धरि खराद रंग लाउ, बिबिध चौकरी बनाउ, धाउ रे बनैया - १० - ४१।
खराद पर चढ़ना (उतरना)- (१) सुधर जाना। (२) व्यवहार में कुशल होना।
खराद पर चढ़ाना (उतारना)- सुधारना, ठीक करना।
खरादने की क्रिया या भाव। बनावट, गढ़न।
खराद के सहारे किसी वस्तु को चिकना या सुडौल करना।
खरा या शद्ध, होने का भाव।
बुरा, हीन, जिसकी दशा बिगड़ जाय।
खर दैत्य को मारनेवाले श्री रामचन्द्र।
धेनुकासुर को मारनेवाले बलराम।
ऊख जो खरीफ के बाद बोई जाय।
पशुओं के चरने या रहने का स्थान, बाड़ा।
अहो सुबल श्रीदामा भैया ल्यावहु जाय खरिक के नेरे।
[सं. खड़क=स्थाणु, हिं. खरक]
खरिक दाख अरु गरी चिरारी। पिंड बदाम लेहु बनवारी - ३९६।
पशुओं के रहने या चरने का स्थान।
जो सुख मुनिगन ध्यान न पावत, सो सुख करत नंदसुत खरिकौ - १० - १८१।
[सं. खड़क=स्थाणु, हिं. खरक]
राँभति गौ खरिकनि मैं, बछरा हित धाई - १० - २०२।
पतली रस्सी की जाली जिसमें घास, भूसा जैसी चीजें बाँधते हैं।
खेत के पास का स्थान जहाँ फसल काटकर रखी और माड़ी जाती है।
माँड़ि माँड़ि खरिहान क्रोध कौ, पोता-भजन भरावै - १ - १४२।
(क) आनँद-प्रेम उमँगि जसोदा खरी गुपाल खिलावै - १० - १३०। (ख) माखन दधि हरि खात प्रेम सौं निरखति नारि खरी - ११७७।
[सं. खड़क=खम्भा, थूनी ; हिं. पुं. खड़ा]
तेज, तीखी, तीव्र स्वर की।
त्राहि त्राहि द्रोपदी पुकारी, गई बैकुंठ अवाज खरी - १ - २४९।
[सं. खर=तीक्षण, हिं. पुं. खरा]
अच्छी, प्रिय, कल्याणकारिणी।
इक बदन उघारि निहारि देहिं असीस खरी - १० - २४।
[सं. खर=तीक्षण, हिं. पुं. खरा]
पूर्ण, बिलकुल, बहुत अधिक।
(क) मैं जु रह्यौं राजीवनैन दुरि पाप-पहार-दरी। पावहु मोहिं कहाँ तारन कौं, गूढ़-गँभीर खरी- १ - १३०। (ख) प्रभु जागे अर्जुन तन चितयौ, कब आये तुम कुसल खरी - १ - २६८।
(ग) ठाढ़ीं जल माहिं गुसांई खरी जुड़ाई नीर की - ३३०३।
[सं. खर=तीक्षण, हिं. पुं. खरा]
[सं. खर=तीक्षण, हिं. पुं. खरा]
कपट हेतु कियौ हरि हमसे खोटे होंहि खरी - २७४१।
[सं. खर=तीक्षण, हिं. पुं. खरा]
(क) जैसे खरी कपूर दोउ यक सम यह भई ऐसी संधि - २९१२। (ख) सब बिधि बानि ठानि करि राख्यौ खरी कपूर को रेहु - ३०४०।
सरसों इत्यादि की खली जो पशुओं को खिलायी जाती है।
असाढ़ से आधे अगहन के बीच में कटनेवाली फसल जिसमें धान, बाजरा, उर्द, मूँग आदि होते हैं।
कामधेनु खरु लेइ काल अमृत उपजावै–१० उ. - - ८।
ऐसौ अंध, अधम, अबिबेकी, खोटनि करत खरे - - १ - १९८।
ऐठने या रूठनेवाले, जिद पकड़ लेनेवाले।
पठवति हौं मन तिन्हैं मनावन निसि दिन रहत अरे री। ज्यों ज्यों मान करति उलटावन त्यों त्यों होत खरे री - १४४२
लागो या बदन की बलाई। खंजन तेरे खरे कटाक्षनि न्याउ गुपाल बिकाई - २२२७।
(क) सूरदास भगवन्त भजन बिनु जम के दूत खरे हैं द्वार - २ - ३। (ख) त्रास भयौ अपराध आपु लखि, अस्तुति करत खरे - ४८३।
सूरदास अब धाम दोहरी चढि़ सकत हरि खरेई अमान।
बालविनोद खरो जिय भावत - १० - १०२।
शरीर के किसी भाग के छिलना का हलका चिन्ह।
एक लिपि जो भारत की पश्चिमोत्तर सीमा पर अशोक के समय में प्रचलित थी।
नख या खरोंच लगने से छिलने का हलका चिन्ह।
विशुद्ध, बिना मिलावट का, 'खोटा' का उलटा।
इक लोहा पूजा मैं राखत, इक घर बधिक परौ। सो दुबिधा पारस नहिं जानत, कंचन करत खरौ - १ - २२०।
[सं. खर=तीक्ष्ण, हिं. खरा]
कारौ कहि कहि तोहिं खिझावत, बरजत खरो अनेरो - १० - २१६।
[सं. खर=तीक्ष्ण, हिं. खरा]
भरत पंथ पर देख्यौ खरौ - ५ - ४०।
कहा भयौ मेरो गृह माटी को। हौं तो गयो हुतो गुपालहिं भेंटन और खर्च तंदुल गाँठी को - १० उ. - ७१।
खर्च उठाना- खर्च करना। खर्च निर्वाह करना।
धन जिसे व्यय करके काम चलाया जाय।
तसले की तरह का भिक्षापात्र।
काली देवी का पात्र जिसमें वे रुधिर पान करती हैं।
लंबा कागज जिस पर बहुत विस्तार से लेख लिखा जा सके।
सोते समय नाक से होनेवाला खर खर का शब्द।
यहि अन्तर यमुना तट आए स्नान दान कियौ खरय्यौ - २५५२।
[सं. खर=तीक्ष्ण, हिं. खरा]
अधम, दुष्ट, दुर्जन, पापी।
कातने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
पगड़ी जो बटकर पहनी जाती है।
खल भई- पिस गयी, चूर चूर हुई। उ. - खल भई लोक लाज कुल कानी।
इहै मान यह सूर महा सठ हरि नग बदलि महा खल आनत।
डोलत महि अधीर भयौ फनिपति कुरम अति अकुलान। दिग्गज चलित, खलित मुनि आसन, इंद्रादिक भय मान - ९ - २६।
स्थान जहाँ फसल रखी और माँड़ी जाय।
फुलेल में मिला हुआ खली जैसे पदार्थों का वह अंश जो छानने पर निकलता है।
वह वृद्ध जिसका चमड़ा झूल गया हो।
एक रोग जिसमें सिर के बाल गिर जाते हैं।
एक रोग जस में सिर के बाल गिर जाते हैं।
गंजा, जिसके सिर के बाल गिर गये हों।
संग खाइ खवाइ अपने सोच तो इतनों दियो - ३२६०
खिलाने पर, खिलाने के पश्चात।
पोषै ताहि पुत्र की नाई। खाहिं आप तब, ताहि खवाई - ५ - ३।
नैन देखि चकृत भई क्यों पान खवाए - २७३९।
माखन खाइ, खवायो ग्वालनि, जो उबरयौ सो दियो लुढ़ाइ - १० - ३०३।
खिलाते हैं, भोजन कराते हैं।
(क) कबहुँ चितै प्रतिबिंब खंभ मैं लौनी लिए खवावत - १० - ११७। (ख) जाको राजरोग कफ बाढ़त दह्यौ खवावत ताहि - ३१४६।
माखन मॉंगि लियौ जसुमति सौं। माता सुनत तुरत लै आई, लगी खवावन रति सौं - १० - ३१२।
कनक-खंभ प्रतिबिंबित सिसु इक लवनी ताहि खवावहु - १० - १७९।
खिलाता है, भोजन कराता है।
कृपन, सूम, नहिं खाइ खवावै, खाइ मारि कै औरे - १० - १८६।
तब तमोल रचि तुमहिं खवावौं - १० - २११।
राजाओं-रईसों का खिदमतगार।
मोदी लोभ, खवास मोह के, द्वारपाल अहँकार - १ - १४१।
कहि खवास कौं सैन दै सिरपाँव मँगायौ - २४७६।
इंद्रादिक की कौन चलावै संकर करत खवासी - ३०८९।
तुम हौ निपट निकट के बासी सुनियत हुए खवास्यौ।
खाटी मही कहा रुचि मानो सूर खवैया घी को - ३२५१।
[हिं. खाना+वैया (प्रत्य.)]
गढ़वाल प्रदेश का प्राचीन नाम।
इस प्रदेश की एक प्राचीन जाति।
गाँडर घास की जड़ जो बहुत सुगंधित होती है।
खस की टट्टियों से घिरा स्थान।
पोस्ते के फूल का हल्का असमानी रंग।
पोस्ते के फूल की तरह हल्के असमानी रंग का।
खिसकते हैं, सरककर गिरते हैं।
फूल खसत सिर ते भए न्यारे सुभग। स्वाति-सुत मानो - पृ. ३४६ (४३)।
खिसकती है, सरककर गिरती है।
बिहँसि बोले गोपाल सुनि री ब्रज की बाल उछंग लेत कत धरनि खसति - १८६९।
वे जो गाने-बजाने का पेशा करते हों।
खैर की लकड़ियों को उबाल कर निकाला हुआ रस जो पान में लगाकर खाया जाता है।
(क) बेनु बजाय रास बन कीन्हो अति आनँद दरसायौ। लीला कथत सहस मुख तौऊ अजहूँ पार न पायौ। (ख) हमतौ निपट अहीरि बावरी जोग दीजिए जानन। कहा कथत मौसी के आगे जानत नानी-नानन - ३३२६।
(ग) ए अलि चपल मोद रस लंपट कटु संदेस कथत कत कूरे - ३०४२।
दिवस बितवति सकल जन मिलि कथति गुन बलबीर - ३४७९।
(क) जियत खसम किन भसम रमायो। (ख) गुप्त प्रीति तासौं करि मोहन, जो है तेरी दैया। सूरदास प्रभु झगरो सीख्यौ, ज्यौं घर खसम गुसैयाँ - ७३४।
रुद्र कौ बीर्य खसि कै परयौ धरनि पर, मोहिनी रूप हरि लिया दुराई - ८ - १०।
(क) खसि मुद्रावलि चरन अरुझी गिरी धरनि बलहीन - ३४५१।
(ख) खसि खसि परत कान्ह कनियाँ तैं सुसुकि सुसुकि मन खीझै - १० - १९०।
इस पहाड़ी का समीपवर्ती प्रदेश।
जिसके अंडकोश निकाले गये हों, बधिया।
खसु दीन्ह्यौ - हटा लिया, खिसका लिया।
सूर स्याम देख्यौ अहि ब्याकुल खस दीन्ह्यौ, मेटे त्रय ताप - ५५९।
भूषन खसे सुरत बस दोऊ केसन आपु सँवारे - १०११ सार.।
वार न खसै- बाल बाँका न हो, जरा भी अनिष्ट न हो। उ. - न्हात बार न खसै इनको कुसल पहुँचै धाम - २५६५।
केस खसै- अनिष्ट या अमंगल हो। उ.- जाकौं मनमोहन अंग करै। ताकौ केस खसै नहिं सिर तैं जौ जग बैर परै - १ - ३७।
दूर हो जाय, समाप्त हो जाय।
तन-मन-धन-जोबन खसै (रे) तऊ न माने हार - १ - ३२५।
बार खसो- अनिष्ट हो, अमंगल हो। उ. - हम दिन देत असीस प्रात उठि बार खसो मत न्हातै–३०२४।
बहुत मुलायम, जो जरा से दबाव से टूट जाय।
अपने स्थान से हटा, खिसका, गिरा, नष्ट हुआ।
(क) जैसे सुखहीँ तन बढ़यौ, (रे) तैसें तनहिं अनंग। धूम बढ़यौ, लोचन खस्यौ, (रे) सखा न सूझत अंग - १-३२५। (ख) जननी मधि, सनमुख संकर्षन, खैंचत कान्ह खस्यौ सिर-चीर - १० - १६१।
गैंडे के मुंह पर का सींग।
दो वस्तुओं के बीच को संधि।
[सं. कर्षण या कसन=खींचना, अथवा खचन=बैठाना]
खींच खींच कर (कसते हुए कोई वस्तु) बनाना।
[सं. कर्षण या कसन=खींचना, अथवा खचन=बैठाना]
[सं. कर्षण या कसन=खींचना, अथवा खचन=बैठाना]
खीचकर अंकित करके, चिह्नित है, खिची है।
(क) सूरदास भगवंत भजत जे तिनकी लीक चहूँ जुग खाँची - १-१८। (ख) जाके हृदय जौन कहै मुख ते तौन कैसे हरि को न कहि लीक खाँची–१२८८।
कहति लीक मैं खाँची- लीक खींच कर कहती हूँ, प्रतिज्ञापूर्वक कहती हूँ जो कहती हूँ, वह सत्य है, अटल है। उ.- सूर स्याम तेरे बस राधा कहति लीक मैं खाँची - १४७५।
अंकित करता है, खींचता है, चिह्न बनाता है, विचलित करता है।
सीत-उष्न, सुख-दुख नहिं मानै, हर्ष-सोक नहिं खाँचै-१-८१।
(क) रस लै लै औटाई करत गुर, डारि देत है खोई। फिरि औटाए स्वाद जात है, गुर तैं खाँड़ न होई -१-६३। (ख) घेवर अति घिरत चभोरे। लै खाँड सरस रस बोरे-१०-१८३।
एक प्राचीन वन जिसे अर्जुन ने जलाया या और जिसके स्थान पर इंद्रप्रस्थ नगर बसाया गया था।
खड्ग की तरह का एक अस्त्र।
चबाऊँगी, (दाँत से) काटूँगी।
मेरे इनके कोउ बीच परौ जिनि अधर दसन खाँडौंगी -१५११।
[सं. खंड या खंडन, हिं. खाँडना]
नैन नासिका मुख नहीं चोरि दधि कौने खाँध्यो-३४४३।
लिफाफे या थैली में बंद करना।
कफ आदि निकालने के लिए वायु को झटके के साथ कंठ से बाहर निकालना।
(क) खाइ न सकै, खरच नहिं जानैं, ज्यौं भुवंग- सिर रहत मनी - १-३९।
(ख) प्रभु-वाहन डर भाजि बच्यौ अहि, नातरु लेतौ खाइ - ५७३।
धाइ धाइ खाइ- खाने दौड़ता है। उ. - भूमि मसान बिदित ए गोकुल मनहु धाइ धाइ खाइ - २७००।
मैया एक मन्त्र मोहिं आवै। बिषहर खाइ मरै जो कोऊ मोसौं मरन न पावै–७५६।
पाँचौ देखि प्रगट ठाढ़े ठग, हठनि ठगौरी खाई - १-१८७।
विषैले कीड़े (जैसे सर्प) ने काट लिया, डस लिया।
(क) ताकी माता खाई कारैं। सो मरि गई साँप के मारैं–७ - ८।
(ख) गई मुरछाइ, परी धरनी पर मनौं भुअंगम खाई - १०-५२।
(ग) लागे हैं बिसारे बान स्याम बिनु जुग जाम घायल ज्यौं घूमैं मनौं विषहर खाई हैं - २८२७।
किले, महल आदि के चारों ओर रक्षा के उद्देश्य से खोदी गयी नहर।
(क) लंका फिरि गईं राम दुहाई।….दस मस्तक मेरे बीस भुजा हैं सौ जोजन की खाई - ९ - १४०। (ख) पश्चिम देस तीर सागर के कंचन कोट गोमती सी खाई - १०उ. - ९२।
जरा भी नहीं, नाम को भी नहीं।
तुच्छ, अकिंचन (नम्रतासूचक)।
खाका उड़ाना- (१) नकल बनाना। (२) निंदा करना। (३) खर्च के अनुमान का ब्योरा। (४) कच्चा चिट्ठा।
साधु जो सारे शरीर में राख मलते हैं।
मृगमद मिलै कपूर कुमकुमा केसनि मलया खाक - ३३२१।
खाउँ खाउँ करै- खाने के लिए रिरियाता है। उ.- मचला, अलकैं-मूल, पातर, खाउँ खाउँ करै भूखा - १-१८६।
कहौ तो गन समेत ग्रसि खाऊँ, जमपुर जाहिं न राम - ९ - १४८।
‘खाना' का भूत., बहु., भोजन किये, भक्षण किये।
पट कुचैल, दुर-बल द्विज देखत, ताके तंदुल खाए (हो) - १ - ७।
सूर मिटे अज्ञान-मूरछा, ज्ञान-सुभेषज खाएँ - ९ - १३२।
खाक उड़ना- उजाड़ होना, नाश होना।
खाक उड़ैहै- (१) खाक उड़ेगी, नाश होगा, उजाड़ हो जायगा। (२) धूल बनकर उड़ जायगा। उ.- या देही कौं गरब न करिये, स्यार काग गिध खैहैं। तीननि मैं तन कृमि, कै बिष्ठा, कै ह्वै खाक उड़ैहै - १ - ८६।
खाक उड़ाना- (१) मारे मारे फिरना। (२) (दूसरे की) हँसी उड़ाना।
खाक करना- नाश कर देना।
खाक चाटना- खुशामद करना।
खाक छानना- (१) मारे मारे फिरना। (२) बहुत ढूँढ़ना।
खाक डालना- (१) छिपाना। (२) भूल जाना।
खाक सिर पर डालना- रोना-पीटना।
खाक बरसना- बरबाद हो जाना।
खाक में मिलना- नाश होना।
कहने या वर्णन करने योग्य।
चिथड़े-गुदड़ों से बनाया हुआ बिछौना, गुदड़ी।
[सं. कंथा + री (प्रत्य.)]
नाहक मैं लाजनि मरियत है, इहाँ आइ सब नासी। यह तौ कथा चलैगी आगै, सब पतितनि मैं हाँसी - १ - १९२।
(क) सूरदास बलि जात दुहुन की लिखि-लिखि हृदय-कथा चित पाती-सा. ५०। (ख) सुनहु महरि, तेरे या सुत सौं हम पचि हार रहीं। चोर अधिक चतुरई सीखी जाइ न कथा कही - १० - २९१।
नासा तिलक प्रसून पदबि पर चिबुक चारु चित खाग। दाड़िम दसन मंदकति मुसकनि मोहत सुर नर नाग - १३१४।
पूरे चीर भीरु-तन-कृष्ना, ताके भरे जहाज। काढ़ि काढ़ि थाक्कौ दुस्सासन, हाथनि उपजी खाज - १ - २५५।
कोढ़ की खाज- दुख या विपत्ति को अधिक बढ़ानेवाली वस्तु।
बातैं पै रहि रहति कहन कौ सब जगजात काल की खाज़ी।
खाजी खाना- मुँह की खान, बुरी तरह लज्जित होना।
एक मिठाई जो बारीक मैदे की बनती है।
खाट-खटोला - बोरिया- बँधना, कपड़ा-लत्ता।
खाट (पर) पड़ना- बीमार होना।
खाट (से) लगना- लंबी बीमारी से बहुत दुबला हो जाना।
खाट से उतारना- मरणकाल निकट आ जाना।
(क) सूर निरखि नँदरानि भ्रमित भई, कहति न मीठी खाटी - १० - २५४।
(ख) आई उघरि प्रीति कलई सी जैसी खाटी आमी - ३०८०।
भिल्लिनि के फल खाए, भाव सौं खाटे-मीठे- खारे - १ - २५।
अति उन्मत्त मोह-माया-बस नहिं कछु बात बिचारौ। करत उपाव न पूछत काहू, गनत न खाटौ खारौ - १ - १५५।
पुनि कमंडल धरयौ, तहाँ सो बढ़ि गयौ, कुंभ धरि बहुरि पुनि माट राख्यौ। धरयौ खाड़, तालाब मैं पुनि धरयौ, नदी मैं बहुरि पुनि डारि दीन्हौ - ८ - १६।
समुद्र का भाग जिसके तीन ओर पृथ्वी हो।
अंतिम बार निकाला हुआ रंग।
खी, खार, घृत, लावनि लाड़ू। ऐसे होहिं न अमृत खाँड़ू - ३९६।
पतली लकड़ियाँ जिनपर खपड़े रखे जाते हैं।
नीची जमीन जिसमें वर्षा का पानी कुछ दिनों तक भरा रहे।
जा दिना तैं जनम पायौ, यहै मेरी रीति। बिषय-बिष हठि खात नाहीं, डरत करत अनीति - १ - १०६।
[सं. खादन, पा. खाअन, खान; हिं. खाना]
सहता है, प्रभाव पड़ता है।
भव-सागर मैं पैरि न लीन्हौ।…..। अति गंभीर, तीर नहिं नियरैं, किहि बिधि उतरयौ जात ? नहीं अधार नाम अवलोकत, जित तित गोता खात - १ - १७२।
[सं. खादन, पा. खाअन, खान; हिं. खाना]
धाइ धाइ खात- खाने दौड़ती है। उ.- अब ए भवन देखियत सूनो धाइ धाई व्रज खात - २७७९।
वह स्थान जहाँ मद्य तैयार करने के लिए महुआ रखा जाता है।
खोदने का काम करनेवाली जाति।
साँच-झूठ करि माया जोरी, आपुन रूखौ खातौ। सूरदास कछु फिर न रहैगौ, जो आयौ सो जातौ - १ - ३०२।
आजु सबनि धरिकै वह खातौ धनि तुम हमहिं बचाये - २३६९।
खानेयोग्य, भोज्य, भक्ष्य।
खाद-अखाद न छाँड़ै अब लौं, सब मैं साधु कहावै–१ - १८६।
तीनि लोक बिभव दियौ तंदुल के खाता - १ - १२३।
खाता खोलना- नया संबंध होना।
खाता डालना- लेन-देन शुरू करना।
पदार्थ जिसके डालने से खेत की उपज बढ़ती है, पाँस।
धातु की भस्म जो खायी जाती है।
मेघ परस्पर यहै कहत हैं धोय करहु गिरि खादर।
खाने योग्य पदार्थ, खाद्य वस्तु।
हाथ के सूत का बना मोटा कपड़ा।
नयन नासिका मुख न चोरि दधि कौने खाधे - ३४४३।
(क) सूरदास प्रभु कौं घर तैं लै, दैहौं माखन खान - १० - २७२।
(ख) गोपालहिं माखन खान दै - १० - २७४।
कै कहुँ खान पान रमनादिक, कै कहुँ बाद अनैसै–१ - २९३।
खाने के लिए, निगल जाने को, मार डालने के लिए।
भूत प्रेत बैताल रच्यो बहु दौरे विधि कौ खान - ६५ सारा.।
लगत खान- खाने लगता है, खाने दौड़ता है, कोटे खाता है। उ.- जिनि धरनि वह सुख बिलोक्यो ते लगत अब खान - २७४६।
आधार-स्थान, उत्पत्ति-स्थान
कुटिल-खान चंपक चंचल मति सबही ते जु निनारी–३३५६।
तहँ ते गये जु चित्रकूट को जहाँ मुनिन की खान २४४ सारा.।
वाद-विवाद, कहा-सुनी, झगड़ा।
नाटक, उपन्यास आदि की कहानी।
सुनत बचन प्रिय रसाल, जागे अतिसय दयाल, भागे जंजाल-जाल दुख-कदंब हारे - १ - २०५।
अति रमनीक कदंब-छाँह-रुचि परम सुहाई- ४९२।
कुलपरंपरा से चला आनेवाला, पैतृक।
अन्न जल, भोजन और पानी, खाना-पीना।
स्याम सुंदर मदन मोहन, मोहिनी सी लाई। चित्त चंचल कुँवरि राधा, खानपान भुलाई - ६७८।
खाने-पीने का प्रचार व्यवहार।
(किसी काम में) रुपया खर्च करा देना।
(बीच बीच में) कुछ छोड़ देना।
मुँह की खाना- (१) बुराई के बदले में नीचा देखना। (२) बुरी तरह हार जाना।
अलमारी, मेज आदि का विभाग।
जिसका खाना उसे आँख दिखाना (गुर्राना)- उपकार या अहसान न मानना।
खाने के दाँत और दिखाने के और- करना कुछ दिखाना कुछ।
खाना न पचना- जी न मानना, चैन न मिलना।
शिकार पकड़ना और भक्षण करना।
(कच्चा) खा जाना- मार डालना।
खाने दौड़ना- बहुत झल्लाना और क्रुद्ध होना।
जो घर में पैदा हुआ या पाला-पोसा गया हो।
मन विगरयौ ये नैन बिगारे।......। ए सब कहौ कौन हैं मेरे खानाजाद चिचारे - पृ. ३२०।
सूर एक ते एक आगरे वा मथुरा की खानि–३०५१।
वह स्थान या व्यक्ति जहाँ या जिसमें किसी वस्तु की अधिकता हो, खजाना।
(क) जहाँ न काहू कौ गम, दुसह दारुन तम, सकल बिधि बिषम, खलमल-खानि–१ ७७।
(ख) उघरि आये कान्ह कपट की खानि–३२५०।
आलस भरे नैन, सकल सोभा की खानी - १०-४४१
मिट्टी, आटे या मैदा से पात्र का मुँह बन्द करना।
[सं. स्कंभ=मूँदना, रोकना, प्रा. खंभन]
[सं. स्कंभ=मूँदना, रोकना, प्रा. खंभन]
भोजन किया, भक्षण किया, खाया।
काम-क्रोध-मद-लोभ-ग्रसित ह्वै, विषय परम बिष खायौ - १ - १११।
विषैले कीट का काटना या डसना।
माया बिषम भुजंगिनि कौ बिष, उतरयौ नाहिंन तोहिं। …...। बहुत जीव देह अभिमानी, देखत ही इन खायौ–२ - ३२।
खारी, क्षार या नमक के स्वाद का।
जमुना तोहिं बह्यौ क्यौं भावै। तो मैं हेलुवा खेलै सो सुरत्यौ नहिं आवै। तेरो नीर सुची जो अब लौं खार पनार कहावै–५६१।
कहौं तौ परबत चाँपि चरन तर नीर खार मैं गारौं - ९ - १०७
(क) दई न जात खार उतराई चाहत चढ़न जहाज।
(ख) पुनि पाछे अघ-सिंधु बढ़त है सूर खार किन पाटत।
खार खाना- जलना, बुरा लगना।
खारि समुद्र छाँड़ि किन आवत निर्मल जल जमुना को पीजो - १०उ. ९५।
खारिक, दाख, खोपरा, खीरा। केरा, ग्राम, ऊख, रस सीरा - १०-२११।
निर्मल जल जमुना को छाँड़यो सेवत समुद्र जल खारी - १० उ. - ९७।
नमकीन। नमक के स्वाद का, खारी।
(क) मधुमेवा पकवान मिठाई, ब्यंजन खाटे, मीठे, खारे - १० - २९६।
(ख) जेहि मुख सुधा स्याम रस अँचवत अब पीवै जल खारे - ३ - ६८।
भिल्लिनि के फल खाए भाव सौं खाटे-मीठे-खारे - १ - २५।
याकौ कहा परेखौ-निरखौ, मधु छीलर, सरितापति खारौ - ९ - ३६।
कहौं कहा कछु कहत न आवै, औ रस लागत खारौ री - १० - १३५।
करत उपाव न पूछत काहू, गनत न खाटो, खारौ - १ - १५२।
खाल उड़ाना (उधेड़ना, खीचना)- बहुत मारना-पीटना।
खाल कढ़ाइ- खाल उधड़ाना या खिचवाना, कड़ा दंड दिलवाना। उ. - दिन दिन इनकी करौं बड़ाई, अहिर गए इतराइ। तौ मैं जो वाही सों कहिकै इनकी खाल कढ़ाई - २५७८।
कहि तू अपने स्वारथ सुख को रोकि कहा करिहै खलु खालहि - १० - ८०२।
परै भहराइ भभकंत रिपु घाई सौं, करि कदन रुधिर भैरौं अघाऊँ–९ - १२९।
किसी चीज का मिला-जुला आवरण।
जिस पर एक ही का अधिकार हो।
खाली हाथ होना- पास में धन, अस्त्र-शस्त्र या काम न होना।
खाली पेट- बिना कुछ खाये।
पुनि लछमी हित उद्यम करै। अरु जब उद्यम खाली परै। तब वह रहै बहुत दुख पाई - ३ - १३।
निशाना (वार) खाली जाना- लक्ष्य चूक जाना।
बात खाली जाना- वादा झूठा होना।
खाली दिन- वह दिन जब कोई शुभ कार्य प्रारंभ करना मना हो।
हंस उज्ज्ल, पंख निर्मल, अंग मलि-मलि न्हाहिं। मुक्ति-मुक्ता अनगिने फल, तहाँ चुनि चुनि खाहिँ १ - ३३८। (ख) बारम्बार सराहिँ सूर प्रभु साग-बिदुर घर खाहीं - १ - २४१।
बहुत भुजनि बल होइ तुम्हारे, ये अमृत फल खाहु–९-८३।
जो किसी काम में न लगा हो।
खाली बैठना- (१) काम न करना। (२) बेरोजगार होना।
जिससे काम न लिया जा रहा हो।
वह ताल जो खाली छोड़ दिया जाय।
मैसूर के आसपास किष्किंधा देश की एक पर्वत श्रेणी।
खिचड़ी पकाना- गुप्त सलाह करना।
ढाई चावल की खिचड़ी अलग पकाना- बहुमत से अलग होकर काम करना।
खिचड़ी खाते पहुँचा उतरना- बहुत नाजुक होना।
मिले हुए एक या अधिक पदार्थ।
मकर संक्रांति जब खिचड़ी दान दी जाती है।
भभके से अर्क आदि तैयार होना।
कछुक खिझी कछु हँसि कह्यौ अति बने-कन्हाई - २४४१।
शीघ्र ही चिढ़ने या खीझनेवाला।
चले जाना, चल देना, उठ भागना।
खिझाते हैं, झुँझलाते हैं।
(क) जबहिं मोहिं देखत लरिकन संग तबहिं खिझत बल भैया। (ख) जाहु घर तुरत जुबतिजन खिझत गुरुजन कहि डरवाई - पृ. ३४० (९७) (ग) मैया जब मोहिं टहल कहति कछु खिझत बबा वृषभान - ७२४।
कहत जननी दूध डारत खिझत कछु अनखाइ।
[सं. खिद्यते, प्रा. खिज्जइत]
वह अन्न जिसका खाना मना हो।
एक बड़ा पेड़ जिसमें पीले फूल और हरे फल लगते हैं।
(क) सीतल कुंज कदम की छहियाँ छाक छहूँ रस खैए - ४४५। (ख) कहि धौं कुंद कदम बकुल बट चंपक लता तमाल - १८०८।
यह कहति जसोदा रानी। कौ खिझवै सारँगपानी - १०.१८३।
हमहिं खिझाइ आपु मति खोवत या मैं कहा कहौ तुम पावत - ३२६६।
चिढ़ाया (है), परेशान किया (है)।
कहा करौं हरि बहुत खिझाई। सहि नहिं सकी, रिस ही रिस भरि गई, बहुतै ढीठ कन्हाई - ३७७।
मैया, मोहिं दाऊ बहुत खिझायौ - १०-२१५।
खिझाते हैं, चिढ़ाते हैं, दिक करते हैं।
(क) ऐसैं कहि सब मोहिं खिझावत, तब उठि चल्यौ खिसैया - १० - २१७। (ख) और ग्वाल सँग कबहुँ न जैहौं, वै सब मोहिं खिझावत - ४२४।
(ग) सूर स्याम जहँ तहाँ खिझावत जो मनभावत दूरि करो लंगर सगरी - १०४५।
चिढ़ाने के लिए, दिक करने की क्रिया।
ऊधो तुम यह मत लै आए। इक हम जरैं खिझावन आए मानौं सिखे पठाए - ३२१०।
सूरदास खिझि कहति ग्वालिनी, मन मैं महरि बिचारि - १० - ७९।
रही ताड़ि खिझिलाई लकुट लै एकहु डर न डरे - पृं. ३३१।
जो सेवा के बदले में प्राप्त हुआ हो।
नंदगाम संकेत खिदरबन और कामबन धाम - १०८९ सारा.।
निरखत सून भवन जड़ ह्वै रहे, खिन लोटत धर, बपु न सँभारत - ९ - ६२।
खिन मुँदरी, खिन हीं हनुमति सों, कहति बिसूरि बिसूरि - ९ - ८३।
ढरकी या नार जिसमें बाने का सूत रहता है।
राँभी गौ खिरकन मैं बछरा हित धाई।
[हिं. खेल+कौरी (प्रत्य.)]
खिलखिल करके जोर से हँसना।
वस्त्र आदि जो सम्मान-रूप में राजा की ओर से दिये जायँ।
प्रसन्न होना, प्रमुदित होना।
सूरदास प्रभु की सुन अरी आली तेरे अंग अंग भयो उदोत वह हिलनि मिलनि खिलन की तेरे प्रेम प्रीति जनाई–२१०७।
खिरलाडु लवंगनि लाए। ते करि बहु जतन बनाए - १० - १८३।
सूरदास प्रभु बैठि कदम तर, खात दूध की खिरियाँ - ४७०।
[हिं. खैर= कत्था+और (प्रत्य.)]
खेल या खिलवाड़ करने वाला।
राजा की ओर से सम्मान-रूप में दी जानेवाली पोशाक आदि।
खेलने की चीज, प्रिय वस्तु।
दंपति होड़ करत आपुस मैं स्याम खिलौना कीन्हौ री - १० - ९८।
[हिं. खिलना=प्रसन्न होना]
सरकना, एक स्थान से दूसरे को जाना।
किसी स्थान से गिरना, हटना।
कौरव पासा कपट बनाए। धर्मपुत्र कौं जुआ खिलाए - १ - ९४६।
[हिं. खेल+आड़ी (प्रत्य.)]
कुश्ती, पटा आदि के खेल दिखानेवाला।
[हिं. खेल+आड़ी (प्रत्य.)]
[हिं. खेल+आड़ी (प्रत्य.)]
धनिया और ककड़ी आदि के भुने हुए बीज जो भोजन के बाद खाये जाते हैं।
केसरि चीर पर अबीर मानो परयो खेलत फाग डारय्यौ खिलारी - २५९५।
बच्चों या पक्षियों को खिलाता है।
नाहिंन मोर बकत पिक दादुर ग्वाल मंडली खगन खिलावत - ३४८५।
(खेल आदि) खिलाती है, खेलने में लगाती है।
जाकौ ब्रह्मा पार न पावत, ताहि खिलावत ग्वालिनियाँ - १० - १३२।
पाऊँ कहाँ खिलावन कौं सुख मैं दुखिया, दुख कोखि जरी - १० - ८०।
(बच्चे को) खिलाती और हँसाती है, खेल में नियोजित करती है।
(क) गुन गन अगम, निगम नहिं पावै। ताहि जसोदा गोद खिलावै।
(ख) आनँद-प्रेम उमँगि जसोदा खरी गुपाल खिलावै - १० - १३०।
छोटी मूर्ति या इसी प्रकार की चीज जिससे बच्चे खेलते हैं।
जिसकी आँख गहरे खाकी रंग की हो।
धन होने पर भी जो उसे खाये-खरचे नहीं, कृपण, सूम।
द्रु मनि चढ़े सब सखा पुकारत, मधुर सुनावत बैनु। जनि धावहु बलि चरन मनोहर, कठिन कंट मग ऐनु - ५०२।
वह जो विघ्न या बाधा डाले।
कमल ऊपर सरस कदली कदलि पर मृगराज - —सा० १४।
केले का छीलन, केले के छिलके।
प्रेम-बिकल, अति आनँद उर-धरि, कदली-छिकुला खाये - १ - १३।
खिसिया जाते हैं, लजाते हैं।
बर्षत घन गिरि देखि खिसाहीं - १०५९।
तब खिसिआइ के काल यवन अपने सँग ल्यायौ - १० उ. - ३।
रघुपति कह्यौ, निलज निपट तू, नारि राच्छसी ह्याँ तैं जाई। सूरदास प्रभु इक पत्नीब्रत, काटी नाक गई खिसिआई–९.५६।
लाज गये प्रभु आवत नाहीं ह्वै जो रहे खिसिआने।
खिसियानेवाला, खिसियाया हुआ।
(क) हौं तौ जाति गँवार, पतित हौं, निपट निलज खिसिआनौ - १ - १९६।
(ख) लाज गए प्रभु आवत नाहीं ह्वै जो रहे खिसिआनो (खिसिआने) - ३३४२।
[हिं. खिसिआना+हट (प्रत्य.)]
(क) यह सुनि दूत चले खिसियाइ - ६ - ४।
(ख) यासों हमरौ कछु न बसाइ। यह कहि असुर रह्यौ खिसियाइ–७ - ७।
कहां चलत उपरावटे अजहूँ खिसी न गात। कंस सौंह दै पूछिये जिन पटके हैं सात - ११३७।
तन मन धन जोबन खिसै तऊ न मानै हार।
खिसै न बार- बाल बाँका न हो। उ.- इहै असीस सूर प्रभु सों कहि न्हात खिसै जनिं बार - ३१००।
ऐसैं कहि सब मोहिं खिझावत तब उठि चल्यौ खिसैया– १० - २१७।
(क) दुर्योधन यह रीति देखि कै मन में रह्यौ खिसाई - १० उ. - ५५।
(ख) बहुरि भगवान सिसुपाल को छाँड़ि दियौ गयो निज देस को सो खिसाई–१० उ. - २१।
खिसिया जाना, लज्जित होना।
केती कही नेकु नहिं बोली फिरी आइ तब हमहिं खिसानी - १२८४।
(क) सखा कहत हैं स्याम खिसाने। आपुहि आपु बलकि भए ठाढ़े, अब तुम कहा रिसाने - १० - ११४। (ख) जब हरि मुरली अधर धरी।….। दुरि गये कीर, कपोत, मधुप, पिक, सारँग सुधि बिसरी। उडुपति, बिद्रुम, बिंब, खिसाने, दामिनि अधिक डरी - ६५९।
खिसिया गये, लज्जित हो गये।
कछु नहिं चलत खिसाय गये सब रहे बहुत पचि हार - २१८ सारा.।
खिसिया जाती हैं, लज्जित होती हैं।
तरुनिन की यह प्रकृति अनैसी थोरेहि बात खिसावैं - ११५२।
हाथ खींचना- (१) काम बन्द करना। (२) उदासीन हो जाना।
मिलाकर पकाया हुआ दाल-चावल।
खीर, खाँड़ खीचरी सँवारी - २३२१।
ऐसी बात जो चिढ़ाने के लिए कही जाय।
[सं. खिद्यते, प्रा. खिज्जइ]
खसि खसि परत कान्ह कनियाँ तैं, सुसुकि सुसुकि मन खीजै - १० - १९०।
झुँझलाते हैं, खिजलाते हैं।
खीझत जात माखन खात। अरुन लोचन, भौंह टेढ़ी, बार-बार जँभात - १० - १००।
नंद बबा तब कान्ह गोद करि खीझन लागे मोको - २९२७।
खीजेंगी, नाराज होंगी, अप्रसन्न होंगी, झुँझलायँगी।
भली भई तुम्हैं सौंपि गए मोहिं जान न दैहौं तुमकौं। बाँह तुम्हारी नैंकु न छाँड़ौं, महर खीझिहैं हमकौं - ६८१।
प्रात गई नीकैं उठि घर तैं। मैं बरजी कहँ जाति री प्यारी, तब खीझी रिस झर तैं - ७४४।
उन नहिं मान्यौ, तब चतुरानन खीझे क्रोध उपाय - ६४ सारा.।
[हिं. खिसियाना+औहाँ (प्रत्य.)]
सुरपति ताकैं रूप लुभायौ। बहुरि कुबेर तहाँ चलि आयौ। पै तिन तिहिं दि सि देख्यौ नाहिं। गए खिस्याइ दोउ मन माहिं - ९ - ३।
अस्वत्थामा बहुरि खिस्याइ। ब्रह्म-अस्त्र को दियौ चलाइ - १ - २८९।
रहे पचिहारि, नहिं टारि कोऊ सक्यौ, उठ्यौ तब आपु रावन खिस्याई–९ - १३५।
आवत नहिं लाज के मारे मानो कान्ह खिस्यानो।
खीजती है, झुँझलाती है, रुष्ट होती है।
(क) तू मौंहीं कौं मारन सीखी दाउहिं कबहुँ न खीझै - १० - २१५। (ख) बाँह गहे ढूँढ़िति फिरै डोरी। बाँधौ तौहिं सकै को छोरी। बाँधौ तौहिं सकै को छोरी। बाँधि पची डोरी नहिं पूरै। बार-बार खीझै, रिस झूरै - ३९१।
कोऊ खीझो; कोऊ कितनो बरजो जुवतिन के मन ध्यान–८७०।
चित्रकूट तैं चले खीन तन मन बिस्राम न पायौ - ९ - ५५।
(क) भयौ बलहीन खीन तनु कंपित तज्यौ बयारि बस पात - २६५७।
(ख) यहै अपूर्व जानि जिय लघुता खीन इन्दु एहि दुख भाज्यौ–२३००।
देखिकै उमा कौं रुद्र लज्जिन भए, कह्यौ मैं कौन यह काम कीनौ। इंद्रिजित हौं कहावत हुतौ, आपु कौं समुझि मन माहिं ह्वै रह्यौ खीनौ - ८ - १०।
खीर खाँड़ खीचरी सँवारी - २३११।
ए दोउ नीर-खीर निवारत इनहिं बँधायो कंस - ३०४९
एक फल जो ककड़ी की जाति का होता है।
(क) खारिक, दाख, खोपरा, खीरा। केरा, आम, ऊख-रस, सीरा - १० - २११। (ख) खीरा रामतरोई तामें। अरुचि न रुचि अंकुर जिय जामें - २३२१।
थन का ऊपरी भाग जिसमें दूध रहता है।
भूमि जो बहुत दिन बाद जोती बोई जाय।
कील लगाना, कील की तरह तिनके खोंसना।
मेरे माई स्याम मनोहर जीवनि। निरखि नयन भूले ते बदन छबि मधुर हँसनिपै खीवनि।
डारत खीस- नष्ट करता है। उ.- काहे को निर्गुन स्थान गनत हौ जित तित डारत खीस - ३१३०।
खीस काढ़ना- (१) दाँत बाहर निकाल कर हँसना। (२) दीनता दिखाकर माँगना। (३) मर जाना।
गाय का दूध जो ब्याने के सात दिन तक निकलता है।
दाँत जो ओंठ के बाहर निकले हों।
कान में पहने का एक गहना, कर्णफूल।
खुँटिला सुभग जराइ के मुकुता मनि छबि देत। प्रगट भयो घन मध्य ते ससि मनु नखत समेत - २०६५।
(एक ही स्थान पर घोड़ा) कुदाना।
[सं. कदन + हिं. मस (प्रत्य.)]
[हिं. कादर + ई. (प्रत्य.)]
कायर बनते हो, कचियाते हो, खिन्न होते हो, मन छोटा करते हो।
स्याम भुज गहि दूतिका कहि मृदुबानी। काहे को कदरात हौ मैं राधा आनी - १८६०।
कायरता दिखाना, कचियाना, पीछे हटना।
बुरा, व्यर्थ, बेकार, कुत्सित।
[सं. शुष्क या तुच्छ, प्रा. छुच्छ]
दोष निकालने की क्रिया या प्रकृति।
[सं. कुचर=दूसरे के दोष निकालनेवाला]
खुजली मिटाने के लिए रगड़ना या सहलाना।
खुजलाने की इच्छा, अनुभव या रोग।
(क) मन में खुटक जनि राखहु। दीन बचन मुख ते तुम भाखहु - १०२६।
(ख) अपने जिय की खुटक मिटाऊँ - १४४९।
(ग) भटक अति सब्द भयो खुटक नृप के हिए अटक प्रानन परयौ चटक करनी - २६०९।
(ऊपरी भाग) खुटकना या तोड़ना।
[हिं. खुटचाल+ई (प्रत्य.)]
[हिं. खुटचाल+ई (प्रत्य.)]
[हिं. खुटचाल+ई (प्रत्य.)]
सम्बन्ध छोड़ देना, अलग होना।
[हिं. खोटा+पन, पना (प्रत्य.)]
कान में पहनने का फूल या गहना।
(क) नकबेसरि खुटिला तरिवन को गरह मेल कुच जुग उतंग को - १०४२।
(ख) ससि मुख तिलक दियो मृगमद को खुटिला खुभी जरायज री - पृ. ३४५ (४१)।
सामयिक राजा की प्रशंसा-घोषणा।
अनाज कट जाने पर पृथ्वी में गड़ा रहनेवाला पेड़ का भाग।
जिसपर किसी का दबाव न हो, स्वच्छन्द।
खुदा न ख्वास्ता [फा. ख़ुदा न ख्वास्ता] ईश्वर न करे कि कहीं ऐसा (बुरा, अनिष्ट) हो।
खुदा खुदा करके- बड़ी कठिनता से।
खुदा की मार- ईश्वरीय कोप।
खुनखुनाकर हँसत हरि, हर नचत डमरु बजाइ - १० - १७०।
सूर इते पर खुनसनि मरियत ऊधो पीवत मामी - ३०८०।
कौन करनी घाटि मोसौं, सो करौं फिरि काँधि। न्याइ के नहिं खुनुस कीजै, चूक पल्लै बाँधि - १ - १९९।
एक प्रकार का मेवा, जरदालू, कुश्मालू।
श्रीफल मधुर, चिरौंजी आनी। सफरी चिउरा, अरुन खुबानी - १० - २११।
कान में पहनने का एक गहना जो लौंग की तरह का होता है और ‘लौंग' ही कहलाता है।
ससि मुख तिलक दियो मृगमद को खुटिल खुभी जरायज री - पृ. ३४५ (४१।
पीतल, सोने या चाँदी का छल्ला या खोल जो हाथी के दाँत पर चढ़ाया जाता है।
मोतिनहार जलाजल मानो खुभी दंत झलकावै।
(क) जब जान्यौ ब्रजदेव सुरारी। उतर गई तब गर्व खुमारी। (ख) तरुनी स्यामरस मतवारि। प्रथम जोबन रस चढ़ायो अतिहि भई खुमारि।
एक छोटा पौधा जो पत्र पुष्प रहित होता है।
सोने की कील जो दाँतों में जड़ी जाती है।
धातु का पोला छल्ला जो हाथी के दाँत पर चढ़ाया जाता है।
गति गयंद कुच कुंभ किंकिनी मनहु घंट झहनावै। मोतिनहार जलाजल मानो खुमी दंत झलकावै।
कबहूँ इत कबहूँ उत डोलन लागी प्रीति खुम्हारि।
सींगवाले चौपायों के पैर का निचला भाग जो बीच से फटा होता है।
(क) मनहु चलत चतुरंग चमू नभ बाढ़ी है खुर खेह - २८२० (ख) माधौ, नैकुँ हटकौ गाइ। …...। भुवन चौदह खुरनि खूंदति, सु धौं कहाँ समाइ - १ - ५६।
चारपाई, चौकी, कुर्सी के पाए का निचला भाग जो भूमि से लगा रहता है।
खुरच कर निकाली हुई वस्तु।
धुरवा धूरि उड़त रथ पायक घोरन की खुरतार - २८२६।
भोजन के लिए दिया जाने वाला धन।
कश्यप की एक स्त्री कद्रू के पुत्र, सर्प, नाग।
इभ टूटत अरु असन पंक भये बिधिना प्रान बनाइ। कद्रुज पठि पताल दुरे रहे खगपति हर-बाह्न भये जाइ - २२२४।
कश्यप की एक स्त्री जिससे सर्प पैदा हुए थे।
(क) जौ लौ मन-कामना न छूटे। तौ कहा जोग-जज्ञ-ब्रत कीन्हैं, बिनु कन तुस कौं कूटै - २ - १९। (ख) ऐसी को ठाली वैसी है तोसौं मूड़ लड़ावै। झूठी बात तुसी सी बिन कन फटकत हाथ न आवै - ३२८७।
कौने रंक संपदा बिलसी सोवत सपने पाई…….। अरु कन के माला कर अपने कौने गूँथ बनाई - ३३४३।
किसी वस्तु का बहुत छोटा टुकड़ा, कण।
ते सब तजि अलि कहत मलिन मुख उज्वल भस्म खुली - ३२२१।
मुक्त, खुल रहे, बंद न रहे, जुड़े या उड़के न रहे।
बंदि-बेरी सबै छूटी, खुले बज्र कपाट - १० - ५।
प्रकट या प्रत्यक्ष रूप से, खुले आम।
मालिक की सब तरह से सेवा करनेवाला।
कान में पहनने का एक बड़ा गहना, बिरिया, ढार।
लपेटा हुआ वस्त्र जिसे शरीर के ऊपरी भाग की रक्षा के लिए सिर पर बाँधते हैं।
(क) नीलांबर गहि खूँट चूनरी हँसि हँसि गाँठि जुराइ हो - २४३९। (ख) हा हा करति सबनि सों मैं ही कैसेहु खूँट छँड़ावति - ८६५।
(ग) नैना झगरत आइ कै मोसौं री माई। खूँट धरत हैं धाइ कै चलि स्याम दुहाई - पृ. ३३३ (२८)।
लकड़ी का छोटा टुकड़ा जो कुछ अटकाने के लिए किसी भीत में जड़ा या लगाया जाता है।
थोड़ी जगह में घोड़े को धीरे धीरे चलना या पैर पटकना।
पैरों से रौंदती है, उछल-कूद कर खराब करती है।
भुवन चौदह खुरनि खूँदति सु धौं कहाँ समाइ - १ - ५६।
दोना मेलि धरे हैं खुआ। हौंस होइ तौ ल्याऊँ पुआ - १० - ३९६।
फल का रेशेदार भाग जो बेकार समझा जाता है।
उलझा हुआ लच्छा जो काम न आ सके।
खूझा मरुआ कुंद सों कहै गोद पसारी। बकुल बहुलि बट कदम ठाढ़ीं ब्रजनारी - १८२२।
खूझो मरबो मोगरो मिलि झूमकहो - २४४५ (३)।
प्रभु जू, हौं तौ महा अधर्मी।…..। चुगुल, ज्वारि, निर्दय अपराधी, झूठौ, खोटौ, खूटा - १ - १८६।
(क) कागज गरे मेघ मसि खूटी सर दौ लागि जरे। सेवक सूर लिखैते आधो पलक कपाटअरे। (ख) तुम्हरेदेस कागर मसि खूटी - १० उ. - ८०।
मिट गयी, नष्ट हो गयी, निश्चित न रही।
सुरवासुर छल बोलवारी गढ़ अत्र अवधि भिति खूटी - २७५०।
चरि मास बरसे जल खूटे हारि समुझ उनमानी। एतेहू पर धार न खंडित इनकी अकथ कहानी—३४५७।
जिसे आमोद प्रमोद व रुचै, अरसिक।
मो देखत पाहन तरै, मेरी काठ की नाई। मैं खेई ही पार कौं, तुम उलटि मँगाई–९ - ४२।
[सं. क्षेपण, प्रा. खेवण, हिं. खेना]
द्रुम चढ़ि काहे न हेरौ कान्हा, गैयाँ दूरि गईँ।…..। छाँड़ि खेड़ सब दौरि जात हैं, बोलौ ज्यौं सिखई। सूरदास प्रभु-प्रेम समुझि कै, मुरली सुनि आई गई - ६१२।
खेड़े की दूब- दुर्बल, तुच्छ। उ.- नंद नँदन ले गए हमारी सब ब्रज कुल की ऊब। सूरस्याम तजि औरै सूझै ज्यों खेड़े की दूब - ३३६१।
कान का संक्षिप्त रूप जो यौगिक शब्दों के आदि में जुड़ता है।
गिरिजा-पतिपतिनी पति ता सुत गुन गुन गनन उतारै। तन-सुत-कन से धन-बिचार के तुरत भूमि पै डारै–सा० - ५।
[सं. कनीयान, हिं. कानी+उँगली]
करौं मनोरथ पूरन सबके इहि अंतर इक खेद उपायो - पृ. ३४० (९६)।
फूले द्विजसंत-बेद, मिटि गयौ कंस-खेद, गावत बधाई। सूर भीतर बहर के - १० - ३४।
हिंसक पशुओं को घेरकर निर्दिष्ट स्थान पर लाना।
उबरै खेत- सुधर जाय, उद्धार हो जाय। खूब फूले-फले। उ.- रे मन, राम सौं करि हेत। हरि-भजन की बारि करिलै, उबरै तेरौ खेत–१ - ३११।
खेत करना- भूमि बराबर करना।
खेत रखना- रखवाली करना।
(क) मूर्छित सुभट हो नहीं राखिये खेत में, जानि यह बात मैं इहाँ ल्यायो - १० उ.५६। (ख) जैसे सुभट खेत चढ़ि धावै - पृ. ३१९।
तापर बैठ कृष्न संकर्सन जीते हैं सब खेत - ५९९ सारा.।
खेत आना- युद्ध में मारा जाना।
खेत करना- लड़ना।
खेत छोड़ना- युद्ध से भागना।
खेत रखना- युद्ध जीतना।
खेत रहना- मारे जाना।
ऊँचे चढ़ि दसरथ लोचन भरि सुत मुख देखे लेत। रामचन्द्र से पुत्र बिना मैं भूँजब क्यों यह खेत - ९३९।
नील को खेत- ऐसा स्थान जहाँ दोष, पाप और कलंक का भागी बनना पड़े। उ. - भजन बिनु जीवत जैसे प्रेत…...। सेवा नहिं भगवंत चरन की भवन नील कौ खेत - २ - १५।
जन के उपजत दुख किन काटत। जैसे प्रथम असाढ़-आँजु-तृन, खेतिहर निरखि उपाटत - १ - १०७।
एक बार लादा जाने वाला बोझ।
आयो घोष बड़ो ब्योपारी। लादि खेप गुन ज्ञान जोग की ब्रज में आनि उतारी।
नाव, गाड़ी की एक बार की यात्रा।
बालापन खेलत हीं खोयौ–१ - ५७।
खेलत-खात रहे- आनन्द से जीवन बिताया, निश्चिंत रहकर दिन बिताये। उ.- खेलत खात रहे ब्रज भीतर। नान्ही जाति तनिक धन ईतर - १०४२। (ख) बाद-बिबाद सबै दिन बीते खेलत ही अरु खात - २-२२।
(क) नृप-कन्या तहँ खेलन गई - ९ - ३। (ख) बीरा खाय चले खेलन को मिलिके चारों बीर–१८९ सारा.।
अबहीं नैकु खेलन सीखे हैं, यह जानत सब लोग - ७७४।
खेरे के देवन- निर्जन स्थान के देवी देवता। उ.- जो ऊजर खेरे के देवन को पूजै को मानै। तो हम बिनु गोपाल भए ऊधो कठिन प्रीति की जानै - ३४०६।
(क) बन मैं जाइ करौ कौतूहल, यह अपनौ है खेरौ - १० - २१६। (ख) इक उपहास त्रास उठि चलते तजि कै अपनो खेरो - १० उ. - १२४।
(ग) बिलुरत भेंट देहु ठाढ़े ह्वै निरखौ घोष जन्म को खेरो - २५३२।
खाँड या मिसरी का लड्डू, ओला।
मन बहलाने या व्यायाम के उद्देश्य से किया गया काम, क्रीड़ा, लीला।
कोटि ब्रह्मांड करत छिन भीतर, हरत बिलम्ब न लावै। ताकौं लिए नंद की रानी नाना खेल खिलावै - १० - १२६।
खेल जम्यो- अच्छी तरह खेल होने लगा। उ.- बटा धरनीडारि दीनौ लै चले ढरकाइ। आपु अपनी घात निरखत खेत जम्यौ बनाइ - १० - २४४।
मन बहलाने के लिए दौड़ना-कूदना आदि।
मन-बहलाव के साथ-साथ हार-जीत के विचार से कोई क्रिया करना।
[हिं. खेलवाड़+ई प्रत्य.)]
[हिं. खेलवाड़+ई प्रत्य.)]
नवल आपुन बनी नवेली नागर रही खेलाइ - २६७६।
[हिं. खेल+अड़ी (प्रत्य.)]
[हिं. खेल+अड़ी (प्रत्य.)]
कर लिए डफहि बजावे हो हो सनाक खिलार होरी की—२४०१।
सूरदास भगवंत भजनु बिनु, चले खेलि फागुन की होरी - १ - ३०३।
आवहु हिलि मिलि खेलिये - १८१४।
साँझ भई घर आवहु प्यारे। दौरत कहीं चोट लगिहै कहुँ, पुनि खेलिहौ सकारे - १० - २२६।
प्रान जात हैं खेली -प्राणों पर आ बनी है, प्राण निकलने ही वाले हैं। उ.- बिरह ताप तन अधिक जरावत जैसे दव द्रुम-बेली। सूरदास प्रभु बेगि मिलावौं, प्रान जात हैं खेली - ९ - ९४।
खेलता है, क्रीड़ा करता है।
सब रस कौ रस प्रेम है, (रे) बिषयी खेल सार। तन-मन-धन-जोबन खसै, (रे) तऊ न मानै हार - १ - ३२५।
खिलौना, खेलने की चीज या साधन।
पुनि जब षष्ठ बरस कौ होइ। इत उत खेल्यौ चाहै सोई - ३ - १३।
खेलना ही, खेल में लगे रहना ही।
रुहठि करै तासौं को खेलै, रहे बैठि जहँ तहँ सब ग्वैयाँ। सूरदास-प्रभु खेल्यौई चाहत, दाउँ दियौ करि नंद-दुहैया - १० - २४५।
खेवनहार न खेवट मेरैं, अब मो नाव अरी - १ - १८५।
[हिं. खेना+हार (प्रत्य.)]
[हिं. खेना+हार (प्रत्य.)]
दई न जाति खेट उतराई, चाहत चढ़यौ जहाज - १ - १०८।
जुग जुग बिरद यहै चलि आयौ, सत्य कहत अब होरे। सूरदास प्रभु पहिले खेवा, अब न बनै मुख मोरे - ४८८।
(क) सरवर नीर भरै, भरि उमड़ै, सूखै, खेह उड़ाहि - १ - २६५। (ख) भई देह जो खेह करम-बस जनु तट गंगा अनल दढ़ी - ९ - १७०।
(ग) लेहु सँभारि सुखेड् देह की को राखै इतने जंजालहिं - ८०२।
बैरिन के मुख खेह- स्त्रियों की एक गाली। उ.- तनक तनक कछु खाहु लाल मेरे ज्यों बढ़ि आवै देह। सूर स्याम अब होहु सयाने बैरिन के मुँह खेह - १००४।
खेह खाना- (१) धूल फाँकना, व्यर्थ समय खोना। (२) बुरी दशा होना।
जलके हेतु अस्व यह लेहु। पितर तुम्हारे भए जु खेहु सुरसरि जब भुव ऊपर आवै।….। तबहीं उन सब की गति होइ- ९-९।
सखी री वह देखो रथ जात…...। छत्र पत्र कनकदल मानो ऊपर पवन बिहात।
जो जरा सा जोर लगने से टूट जाय।
(क) कोउ न समरथ अघ करिबे कौं खैंचि कहत हौं लीकौ-१-१३८। (ख) रेखा खैचि, बारि बंधनमय, हा रघुबीर कहाँ हौ भाई -९-५९।
मंत्र आदि का प्रभाव लौटा ले, प्रभाव दूर कर दे। उ.-इन द्योसनि रूसनो करति हौ करिहौ कबहिं कलोलै। कहा दियो पढि सीस स्याम के खैंचि आपनो सो लै-२२७५।
सीतल कुंज कदम की छहियाँ, छाक छहूँ रस खैऐ--४४५।
जननि कहति उठो स्याम, जानत जिय रजनि ताम, सूरदास प्रभु कृपालु तुमको कछु खैबे-२३२०।
कत्था जो पान में डालकर खाया जाता है।
एक छोटा पक्षी जो जमीन से सटाकर अपना झोपड़ा बनाता है।
कुछ परवाह नहीं, कुछ चिंता नहीं।
पियरी, मौरी, गैनी, खैरी, कजरी, जेती। दुलही, फुलही,भौंरी, भूरी हाँकि ठिकाई तेती--४४५।
या देही कौ गरब न करियौ, स्यार-काग-गिध खैहैं-१-८६।
इतनो भोजन सब वह खैहै - १०१०।
(आघात आदि) सहेगा, (प्रभाव आदि) पड़ने देगा, (कसम, गम आदि) खायगा।
(क) नर-बपु धारि नाहिं जन हरि कौं, गम की मार सो खैहै-१-८६। (ख) बड़े गुरू की बुद्धि पढ़ी वह काहू को न पत्यैहै। एकौ बात मानिदै नाहीं सबकी सौहैं खैहै-१२६३।
(क) लागी भूख, चंद मैं खैहौं, देहि देहि रिस करि बिरुझावत -१०-१८८। (ख) मैया मैं अपने कर खैहौं धरि दे मेरैं हाथ -१०-३१२।
टूटे कंध अरु फूटी नाकनि, कौलौं धौं भुस खैहौ -१-३३१।
कत्थई रंग का घोड़ा, कबूतर या बगला।
किसी चीज से रगड़ कर शरीर छिलना।
किसी चीज से फँसकर कपड़ा फटना।
एक मुट्ठी में जो पदार्थ आ जाय।
वह बाँस जिसके सिरे पर लासा लगाकर पक्षियों को फँसाया जाता है।
(साग आदि वस्तुओं का) ऊपरी भाग नोचना।
पेड़ का पोला या खोखला भाग।
जिसके अंग (विशेषत: आगे के दाँत) टूटे हों।
नुकीली वस्तु में फँसने से कपड़े का फटा हुआ भाग।
वस्त्र का कील आदि से फटा हुआ भाग।
हल की लकड़ी जिसमें फाल लगता है।
अटकाते हैं, घुसेड़ते हैं, खोंसते हैं।
सखी री, मुरली तीजै चोरि।…….। छिन इक घर-भीतर, निसि बासर, धरत न कबहूँ छोरि। कबहूँ कर, कबहूँ अधरनि, कटि कबहू खोंसत जोरि - ६५७।
किसी वस्तु को सुरक्षित रखने के विचार से जेब, टेंट या अंटी अथवा अन्य किसी वस्तु में घुसेड़ना, अटकाना या लपेटना।
धँसाना, चुभाना, घुसेड़ना।
दूध से बना एक पदार्थ, खोवा, मावा।
रंक सुदामा कियौ इन्द्र-सम, पांडव-हित कौरव दल खोइ–१-९५।
याकैं मारैं हत्या होइ। मनि लै छाँड़ौ सोभा खोइ-१-२८९।
जात खोइ-खो जाता है, दूर होता है, मिट जाता है।
नंद कौ लाल उठत जब सोइ।….। मुनि मन हरत, जुवति जन केतिक, रति-पति मान जात सब खोइ -१०-२१०।
रे मन, जनम अकारथ खोइसि। हरि की भक्ति न कबहूँ कीन्हीं, उदर भरे परि सोइसि -१-३३३।
ऊखदंडों के वे डंठल जो रस पेल लिये जाने पर कोल्हू में रह जाते हैं, छोई।
(क) रस लै लै ओटाइ करत गुर, डारि देत है खोई-१-६६। (ख) हरि-सरूप सब घट यौं जान्यौ। ऊख माहिं ज्यौं रस है सान्यौ। खोई तन, रस आतम-सार। ऐसी विधि जान्यौ निरधार-३-१३।
भुने हुए धान की खील, लाई।
जो रस सिव सनकादिक दुर्लभ सो रस बैठे खोई—२८८१।
कछु दिन जैसे तैसे खोऊँ दूरि करौं पुनि डर कौं–७३८।
व्यर्थ कर दिये, बिता दिये, नष्ट कर दिये।
किते दिन हरि-सुमिरन बिनु खोए-१.५२।
खोज मिटाना- ऐसा नाश करना कि चिह्न तक न रहे।
ये सब मेरेहि खोज परी। मैं तो स्याम मिली नहिं नीके आजु रही निसि संग हरी -१६१७।
परयौं है खोज हमारे- हमारी खोज में है, हमारे पीछे पड़ा है। उ.- (क) नन्द घरनि यह कहति पुकारे। कोउ बरखत, कोउ अगिनि जरावत दई परय्यौ है खोज हमारे -५९५। (ख) स्वर्गहि गए कंस अपराधी परय्यौ हमारे खोज। दृष्टि से टारि ध्यानहु ते टारत वाऊ सबको चोज-३३४८।
खोज मारना- पृथ्वी पर पड़े चिह्न इस तरह नष्ट करना जिससे उनके सहारे कोई कुछ पता न लगा सके।
(क) खोजत जुग गए बीति, नाल कौ अन्त न पायौ -२-३६। (ख) खोजत नाल कितौ जुग गयौ-२-३७।
एक राग जो दिन के पहले पहर में गाया जाता है।
जिस वस्तु के भीतर कुछ न हो,जो वस्तु पोली हो।
[हिं. खुक्ख+ला (प्रत्य.)]
जिस बात या कथन में कुछ सार न हो।
[हिं. खुक्ख+ला (प्रत्य.)]
वह हुंडी जिसका रुपया चुका दिया गया हो।
(बातों का) घाव, आघात, चोट।
धृग वै मात पिता धृग भ्राता दंत रहत मोहिं खोचन। सूर स्याम मन तुमहिं लुभानों हरद चून रँग रोचन -१५१७।
(क) हम तिहुँ लोक माहिं फिरि आए। अस्व खोज कतहु नाहि पाए–९-९। (ख) राखौं नहिं काडू सब मारौं। ब्रज गोकुल को खोज निवारौं-१०४३।
कै प्रभु हारि मानि कै बैठो, कै करौ बिरद सही। सूर पतित जौ झूठ कहत है, देखौ खोजि बही-१-१३।
राखौं नहिं काहू सब मारौं। व्रज गोकुल को खोजि (खोजु) निवारौं-१०४३।
छिन मैं बरषि प्रलय जल पाटौं खोजु रहै नहिं चीनो-९४५।
जद्यपि सूर प्रताप स्याम कौ दानव दूरि दुरात। तद्यपि भजन भाव नहिं ब्रज बिनु खोजो दीपै सात-३३५१।
कनकनाने या चुभचुनानेवाला।
जो जरा सी बात में चिढ़ जाय।
भलैं राम कों सीय मलाई, जीति कनकपुर गाउँ - ९ - ७५।
(क) सौ जोजन बिस्तार कनकपुरी, चकरी जोजन बीस। मनौं विश्वकर्मा कर अपुनैं, रचि राखी गिरि-सीस - ९ - ७४। (ख) सुनौ किन कनकपुरी के राइ। हौं धि-बल-छल करि पचि हारी, लख्यौ न सीस उचाई–६ - ७८।
(ग) लुटत सक्र के सीस चरन तर जुग गत समए। मानहु कनकपुरी-पति के सिर रघुपति फेरि दए - ९८४।
रसना जुगल रसनिधि बोलि। कनकबेलि तमाल अरुझी सुभुज बंध अखोलि - सा . उ. ५।
(क) पतित जानि तुम सब जन तारे, रह्यो न कोऊ खोट–१-१३२।
(ख) सूरदास पारसके परसैं मिटति लोह की खोट-१-२३२।
अच्छी चीज में बुरी का मिलाया जाना।
बुरी चीज जो अच्छी में मिलायी जाय।
हरि पटतर दै इमहिं लजावत सकुच नहिं आवत खोट कवि-१२९५।
अमरापति चरनन पर लोटत। रही नहीं मनमें कछु खोटत-१०६९।
बुरों को, दुष्टों या पापियों को।
ऐसौ अँध अधम, अबिबेकी, खोटनि करत खरे–१-१९८।
खोटा-खरा– बुरा-भला।
खोटा खाना- अनुचित उपायों से कमाकर खाना।
खोटा-खरा कहना- बहुत डाँटना-फटकारना।
(क) जो चाहौ सो लेहु तुरत हीं, छाँड़ौ यह मति खोटी-१०-१६३। (ख) खोटी करनी जाहि मेरे की सोई करे उपादि-३१३२।
बुरी, दुष्ट प्रकृति या स्वभाववाली।
(क) बन भीतर जुवतिन कौं रोकत हम खोटी तुम्हरे ये हाल-१०१२। (ख) जे छोटी तेई हैं खोटी साजति माजति जोरी-१६२१।
बुरे, दुष्ट, जिसमें कोई दोष हो, दूषित, 'खरा' का उलटा।
हरि कौ नाम, दाम खोटे लौं, झकि झकि डारि दयौ- १-६४। (ख) सूरदास प्रभु वै अति खोटे यह उनहीं ते अति ही खोटी-१४७९।
(ग) परम सुसील सुलच्छन नारी तुमहिं त्रिभंगी खोटे हौ--२०६१।
(घ) सबै खोटे मधुबन के लोग - ३०५२।
अंजलि के जल ज्यौं तन छीजत खोटे कपट तिलक अरु मालहिं-१-७४।
(क) चुगुल, ज्वार, निर्दय, अपराधी, झूठौ, खोटो-खूटौ-१-१८६। (ख) सूरदास गथ खोटो काते पारखि दोष धरे-पृ.३३१।
खोटौ खायौ है- बेईमानी या बुरी तरह से कमाकर खाया है। उ.- फाटक दै कै हाटक माँगत भोरो निपट सुधारी। धुर ही ते खोटौ खायौ है, लिए फिरत सिर भारी-३३४०।
छेद जो लकड़ी सड़ने पर वृक्ष में हो जाता है।
एैवी या अज्ञात शक्तियों का कोप।
छेद जो सड़ने पर वृक्ष की लकड़ी में हो जाता है।
मिट्टी हटाना, गड़हा करना, खनना।
कहौ तौ मृत्युहिं मारि डारि कै खोदि पतालहिं पाटौं–९-१४८।
खोदने से, गड्ढा करने से।
आज्ञा होइ जाहिं पाताल। जाहु, तिन्हैं भाष्यौ भूपाल। तिनके खोदैं सागर भए - ९-९।
खराब या नष्ट करना, बिगाड़ना।
सूर स्याम गारी कहा दीजै इही बुद्धि है घर खोना-१०३७।
किसी वस्तु का छूट या निकल जाना।
खोया जाना- हक्का-बक्का होना।
बड़ा थाल जिसमें बेचने के लिए चीजें सजायो जायँ।
खप्पर जो भिखारियों के पास रहता है।
अंधी (औंधी) खोपड़ी- मूर्ख।
खोपड़ी खाना- बहुत बात करके परेशान करना।
खोपड़ी चटकना- धूप या पीड़ा से सिर दुखना।
खोपड़ी खुजलाना- मार खाने की इच्छा होना।
खारिक, दाख, खोपरा, खीरा। केरा, आम, ऊख-रस सीरा-१०-२११।
गड़ने या ठोकर लगनेवाली चीज।
गरमाकर गाढ़ा किया हुआ दूध, मावा, खोआ।
‘खोना' के भूत. 'खोया' का व्रज, प्र., व्यर्थ कर दिया, गँवा दिया।
(क) नारद मगन भए माया मैं, ज्ञान-बुदिध-बल खोयो-१-४३। (ख) चोरी करी, राजहूँ खोयौ, अल्प मृत्यु तव आइ तुलानी-९-१६०।
दई को खोयो- स्त्रियों की एक गाली। उ.- सूर इते पर समुझत नाहीं निपट दई को खोयो-३०२१।
प्रभु मोहिं राखिये इहि ठौर।…….। पाँच पति हित हारि बैठे, राक्रैं हित मोर। धनुष-बान सिरान कैंधौं, गरुड़ बाहन खोर-१-२५३।
लखहिं साँचे नर को खोर-१२-३।
लूट लूट दधि खात साँवरो जहाँ साँकरी खोर–८६४ सारा.
आतुर चली जमुन-जल खोरन काहू संग न लाई -२१७०।
खोलना, प्रकट करना, बताना।
लँगड़ा-लूला, अंग-भंग। बुरा, खोटा।
खोराक के लिए दिया जानेवाला धन।
जिसकी खोराक बहुत अच्छी हो।
(क) नृपतिं कह्यौ मारग सम आह। चलत न क्यौं तुम सूधै राह। कह्यौ कहारनि, हमैं न खोरि। नयो कहार चलत पग झोरि-५-४। (ख) मेरे नैनन ही सब खोरि। स्याम बदन छबि निरखिं जु अटके बहुरे नहीं बहोरि-पृ. ३३३।
(क) भीर भई बहु खोरि जहाँ तहाँ -१०३७।
छोटी बिंदियाँ जो माथे पर लगायी जाती हैं।
(क) सूरदास प्रभु सकुचि निरखि मुख, भजे कुंज की खोरी-१०-२६७। (ख) प्रथम करी हरि माखन चोरी। ग्वालिनि मन इच्छा करि पूरन, आपु भजे हरि व्रज-खोरी-१०-२६८।
(ग) जाकर हेतु निरंतर लीये डोलत ब्रज की खोरी–१० उ.-१५।
मस्तक पर लगा चंदन का आड़ा या धनुषाकार टीका।
सुभग कलेबर कुमकुम खोरी - ३३४५।
स्नान करती हैं, नहाती हैं, स्नान करें, नहायें।
(क) रवि सौं बिनय करति कर जोरे। प्रभु अंतरजामी, यह जानी, हम कारन जल खोरैं- ७६८। (ख) ब्रज-बनिता रवि कौं कर जोरैं। सीतभीति नहिं छहौं रितु, त्रिविधि काल जल खोरैं ७८२। (ग) कह्यौ, चलौ जमुना-जल खोरैं - ७९९।
किसी वस्तु के ऊपर से चढ़ाया हुआ आवरण, गिलाफ।
मोटी चादर जो ओढ़ने के काम आती है।
मिले या जुड़े भागों को अलग करता है।
तुम बिनु भूलोई भूलो डोलत। लालच लागी कोटि देवनि के, फिरत कपाटनि खोलत-१-१७७।
[हिं. ‘खुलना' का स. ‘खोलना']
जुड़े हुए भागों को अलग करना।
दूसरों की दृष्टि बचाकर देखना।
[हि.कानी+अँगुरी या अँगुरिया]
एक संस्कार जो प्रायः मुंडन के साथ होता है और जिसमें बच्चों के कान छेदे जाते हैं।
कान्ह कुँवर कौ कनछेदन है हाथ सोहारी भेली गुर की - १० - १८०।
हाटकपुरी कठिन पथ, बानर, आए कौन अधार ? राम प्रताप, सत्य सीता कौ, यहै नाव-कनधार। तिहिं अधार छिन मैं अवलंघ्यौ, आवत भई न बार - ९ - ८९।
(गुप्त बात को) प्रकट या स्पष्ट करके।
सूर बिनती करै, सुनहु नँद-नंद तुम, कहा कहौं खोलि कै अँतरजामी -१-२१४।
मुख तौ खोलि सुनौं तेरी बानी भली-बुरी कैसी घर कैहै -११९२।
बन्धनमुक्त कर दी, उन्नति का आरभ्भ कर दिया, उत्थान का द्वार खोल दिया।
सोच निवार करो मन आनन्द मानौ भाग्यदशा बिधि खोली-१० ३.१०६।
तकिए, लिहाफ या गद्दे का गिलाफ अथवा खोल।
सुरपतिहिं बोलि रघुबीर बोले। अमृत की वृष्टि रन-खेत ऊपर करौ, सुनत तिन अमिय भंडार खोले-९-१६३।
संदूकन भरि धरे ते न खोलै री-१५४९।
जागे हो जु रावरे है नैना क्यों न खोलौ -१९५९।
तन-धन-जोबन ता हित खोवत, नरक की पाछैं बात-६१२४।
सूरदास रावन कुल-खोवन, सोवत सिंह जगायौ–९.८८।
खोना, गँवाना, हाथ से निकल जाने देना।
(क) बिनु रति-काल नगन नहिं होवहु। अरु मम मैंढनि कौं मति खोवहु-९-२। (ख) बृथा जनम जग मैं जिनि खोवहु ह्माँ अपनौं नहिं कोई-७६५।
खोने वाली, नष्ट करनेवाली, मिटानेवाली।
सुता बड़े बृषभानु की कुल खोवनहारी -१२४५।
[हिं.खोना+हारी (प्रत्य.)]
गरमाकर गाढ़ा किया हुआ दूध, खोया, मावा।
खोवा-मय मधुर मिठाई। सो देखत अति रुचि पाई -१०-१८३।
(क) निद्रा-बस जो कबहूँ सोवै। मिलि सो अविद्या सुधि-बुधि खोवै-४.१२। (ख) देखिकै नारि मोहित जो होवे। आपनौ मूल या बिधि सो खोवै–८.११।
(ग) कबहुँ अजिर ठाढ़े ह्वै ऐसे निसि खोवै-२४७४।
दो पहाड़ों के बीच का तंग रास्ता, दर्रा।
खोह में, निर्जन स्थान में, एकांत में।
सूर सुबस घर छाँड़ि हमारो क्यों रति मानत खोहनि -२०१४।
सूर सुवस्तुहिं छाँड़ि अभागे हमहिं बतावत खोहि -३०२० |
वर्षा या शीत से बचने के लिए सिर पर लपेटा हुआ कंबल आदि।
वस्त्र का सिर या कंधे पर पड़ा हुआ भाग।
सुरंग केसरि खौरि कुसुम की दाम अभिराम कंठ कनक की दुलरी झलकत पीतांबर की खोही-८३८।
गहरा गढ़ा जिसमें अन्न जमा किया जाय।
वृक्ष का वह भाग जहाँ टहनी या पत्ती निकलती है।
नोचने-खसोटने का शरीर पर चिह्न, खरोट।
(क) और बेस को कहै बरनि सब अंग अंग केसरि खौर–३०३१।
(ख) खौर केसरि अति विराजत तिलक मृगमद को दियौ-१० उ.-२४।
एक गहना जो स्त्रियाँ माथे पर पहनती हैं।
तिलक लगाना, चंदन का टीका लगाना।
जिस (पशु) के बाल झड़ गये हों।
जिस (पशु) को बाल झाड़ने की खुजली का रोग हो।
भयानक खुजली जिसमें पशुओं के बाल झड़ जाते हैं।
मस्तक पर लगा हुआ चन्दन का आड़ा तिलक।
(क) फिरत बननि बृन्दावन, बंसीबट, सँकेतबट, नागर कटि काछे, खौरि केसरि की किए-४६०। (ख) चन्दन खौरि, काछनी काछे, देखते ही मन भावत-४७९।
(ग) चंदन की खौरि किये नटवर काछे काछनी बनाइ री-८८२।
[सं. क्षौर या क्षुर, हिं. खौर]
मस्तक पर लगा चंदन का आड़ा या धनुषाकार तिलक।
बरन बरन सिरपाग चौतनी कछि कटि छबि चन्दन खौरी की -२४०२।
[सं. क्षौर या जुर, हिं. खौर]
औरे कहति और कहि आवति मन मोहन के परी ख्याल -११८३।
ख्याल करना- याद करना।
ख्याल (पर चढ़ना)- याद आना।
ख्याल रखना- ध्यान रखना, देखभाल करते रहना।
ख्याल रहना- याद बनी रहना।
ख्याल से उतरना (उतर जाना)- भूल जाना।
ख्याल परी हैं- पीछे पड़ गयी हैं, परेशान करने पर उतारू हैं। उ.- राधा मन में यहै बिचारति। ये सब मेरे ख्याल परी हैं अब ही बातन लै निरुवारति-१३०८।
ख्याल बाँधना- अनुमान लगाना।
ख्याल करना- रियायत करना।
ख्याल में लाना- (१) रियायत करना। (२) ध्यान देने योग्य समझना।
(क) आनंदित ग्वाल-बाल करत बिनोद ख्याल, भुज भरि भरि धरि अंकम महर के - १०-३०। (ख) सूर प्रभुनंदलाल, मारयौ दनुज ख्याल, मेटि जंजाल ब्रज जन उबारयौ -१०-६२।
(ग) कूदि पड़े चढ़ि कदम तैं, तुम खेलत यह ख्याल -५८६ !
(घ) हरि छबि अंग नट के ख्याल-पृ. ३२८।
(ङ) अंतर्धान भये रचि ख्याल-१८११।
अनुचित करनी, करतूत, अद्भुत चरित्र।
(क) मोकौं जनि बरजौ जुवती कोउ, देखौ हरि के ख्याल - ३४५। (ख) ऐसे ख्याल करे इन बहु बिधि कहत जु आवै लाज - ७४२ सारा.।
(क)यह सुनि रुकमिनि भई बेहाल। जानि परयौ नहिं हरि कौं ख्याल - १० उ.-३२। (ख) सुनहु सूर वह करनि कहनि यह, ऐसे प्रभु के ख्याल - ५९८।
(ग) जीव परयौ या ख्याल में अरु गये दसादस -११७७।
खेल, हँसी, क्रीड़ा, दिल्लगी।
चकृत भये नन्द सब महर चकृत भये चकृत नर नारि करत ख्याला–९४५।
करनी, करतूत, अद्भूत या अनुचित कृत्य।
(क) नन्द महर की कानि करत हैं छाँड़ि देहु ऐसे ख्याला-१०३४।
(ख) जोबन रूप देखि ललचाने अब हीं ते ये ख्याला - १०३८।
साँझ गये कहि आइ हैं मोसौं री आली। अनत बिरमि कतहूँ रहे बहु नायक ख्याली–२१७८।
ख्वाब होना (हो जाना)- पुन: प्राप्त न होना।
छल कियौ पांडवनि कौरव कपट-पासा ढरन। ख्वाय बिष, गृह लाय दीन्हौ, तउ न पाए जरन-१-२०२।
कवर्ग का तीसरा व्यंजन | इसका प्रयत्न अद्योष अल्पप्राण है। इसका उच्चारण-स्थान कंठ है।
गंग प्रवाह माहिं जो न्हाइ। सो पवित्र ह्वै सुरपुर जाइ–९-९।
वह भूमि जो नदी की धार या बाढ़ के हटने पर निकल आती है।
[हिं. गंगा+ फा. बरार= बाहर या ऊपर लाया हुआ]
गंगा उठाना- गंगाजल छूकर कसम खाना।
गंगा पार करना- देश से निकालना।
गंगा नहाना- छुट्टी पाना।
गंगा दुहाई- गंगा की कसम।
गंगा कैसो पानी- बहुत पवित्र और निर्मल, शुद्ध आचरणवाला। उ.- तुम जो कहति हौ, मेरौ कन्हैया गंगा कैसो पानी। बाहिर तरुन किसोर बयस बर,बाट घाट का दानी -१०-३११।
सुनहले रुपहले तारों का बना हुआ।
अरहर-उर्द की मिली-जुली दाल।
कान फूँकने वाला, दीक्षा देनेवाला।
फूल की तरह का एक गहना जो कान में पहना जाता है।
धीरे से या कान में कही हुई बात।
थोड़ी-बहुत चेष्टा करना, हाथ-पैर हिलाना।
सुनहले रूपहले तार का काम।
सुराही या पात्र जिसमें गंगाजल भरा हो।
गंगाजली उठाना- गंगाजल से भरा पात्र हाथ में लेकर कसम खाना।
मछुओं का जाल जो घास से बनता है।
चन्द्र चूड़, सिखि-चन्द सरोरुह, जमुना प्रिय, गंगाधारी -१०-१७१।
एक तरह के ब्राह्मण जो घाट पर दान लेते हैं।
गंगा-प्राप्ति, गंगा-किनारे मृत्यु।
गंगा का स्वर्ग से पृथ्वी पर आना।
एक तीर्थ जहाँ गंगा समुद्र में गिरती है।
यह तनु त्यागि मिलन यों बनिहै गंगा सागर संग-२९०१।
एक तरह की मोटी जनानी धोती।
एक रोग जिसमें सर के बाल गिर जाते हैं।
हिमालय का एक तीर्थ जहाँ गंगा ऊपर से गिरती है।
अवज्ञा, तिरस्कार, निरादर।
(क) वृषभ-गंजन मंथन-केसी हने पूँछ फिराइ-४९८। (ख) कालीबिष गंजन दह आए-५७८।
एक खेल जो ९६ पत्तों से खेला जाता है।
[हिं. गाँजा+एड़ी (प्रत्य.)]
विवाह की एक रीति जिसमें वर के दुपट्टे से वधू के आँचल का छोर बाँधा जाता है।
दो व्यक्तियों का हर समय का साथ।
अछत-दूब-दल बँधाइ, लालन की गँठि जुराइ, इहै मोहि लाहौ नैननि दिखरावौ -१०-९५।
ताने-बाने के टूटे हुए तागों को जोड़ना।
कनपटी, कान के नीचे गरदन का भाग।
(क) स्याम सुभग तनु, चुअत गंड मद बरषत्त थोरे थोरे -२७९३। (ख) रत्न जटित कुंडल स्रवनन बर गंड कपोलनि झाईं–३० ३१ !
एक रोग जिसमें बहुत फोड़े निकलते हैं।
एक नदी जो नैपाल में हिमालय से निकलकर पटने के पास गंगा में गिरती है। सालग्राम की बहुत सी बटियाँ इसमें मिलती हैं। जड़ भरत ने इसी के किनारे आश्रम में तप किया था और यहीं हिरनी के बच्चे के प्रति मोह उनमें उत्पन्न हुआ था।
[सं. गंड या गँडासा+फ़ा. दार (प्रत्य.)]
गाँडर घास जिसकी जड़ ‘खस' कहलाती है।
गरजि घुमरात मद भार गंडनि स्रवत, पवन ते बेग तेहि समय चीन्हौ-२५९१।
(क) चलित कुंडल गंडमंडल, मनहुँ निर्तत मैन-१-३०७।
(ख) चलित कुंडल गंडमंडल झलक ललित कपोल -६२७।
एक तरह का रोग जिसमें गले में बहुत से फोड़े निकलते हैं।
[हिं. काँसा+आर (प्रत्य.)]
[सं. कर्णधार, प्रा. कण्णहार]
कपड़े का ऊँचा परदा जिससे दीवार की तरह कोई स्थान घेरते हैं।
बटे हुए तागे का जंतर जिसमें मंत्र पढ़कर गाँठ लगायी जाती है।
[सं. गंडक=गले में पहनने का जंतर]
मंत्र पढ़कर बाँधा जानेवाला तागा।
[सं. गंडक=गले में पहनने का जंतर]
पशुओं के गले में पहनाने का पट्टा।
[सं. गंडक=गले में पहनने का जंतर]
गिनने के लिए चार-चार की संख्या।
चारा या घास काटने का औजार या हथियार।
एक रोग जिसमें पैर बहुत मोटा हो जाता है।
सूरदास प्रभु भलैं परे फँद, देउँ न जान भावते जी कैं। भरि गंडूष, छिरकि दै नैननि, गिरिधर भाजि चले दै कीकै-१०-२८७।
ईख या गन्ने का छोटा टुकड़ा।
गेहुँआँ, ललाई लिये भूरे रंग का।
सफेदी लिये हल्का पीला रंग।
चाहत गंध बैरी बैरी। अपनो हित चहत अनहित होत छोड़त तीर –सा. २८।
गेहूँ या उसके आटे का बना पदार्थ।
चाहत गंध बैरी बीर-सा. २८।
माधौ नैंकु हटकौ गाइ।...।छहौं रस जौ धरौं आगैं, तउ न गंध सुहाइ–१-५६।
गंधक के हल्के पीले रंग वाला।
हल्के बादलों से ढका चंद्रमंडल।
पश्चिम में संध्या की लाली।
मानसरोवर के निकट माना हुआ एक नगर जिसकी रक्षा गंधर्व करते थे।
वह विवाह जो वर-वधू माता पिता की आज्ञा लिये बिना कर लें।
[सं. गंधर्व+हिं. इन (प्रत्य.)]
गंधर्व जाति की सुन्दर स्त्री।
जो तुम मेरी रच्छा धरो। गंधर्विन के हित तप करो।
[सं. गंधर्व+हिं. इन (प्रत्य.)]
अति ब्याकुल भईं गोपिका दूँढ़ति गिरधारी। बूझति हैं बन बेलि सौं देखे बनवारी। जाहीजूही सेवती करना कनिआरी। बेलि चमेली मालती बूझति द्रुम डारी - १८२२।
षटरस ब्यंजन को गनै बहुभाँति रसोई। सरस कनिक बेसन मिलै रुचि रोटी षोई - १५५५।
मुख आँसू अरु माखन कनिका (कनुका) निरखि नैन छबि देत। मानौ स्रवत सुधानिधि मोती उडुगन अवलि समेत - ३४६।
मान-मर्यादा और कीर्ति का ध्यान रखनेवाला।
(क) नैंकु गोपालहि मोंकों दै री। देख बदन कमल नीकैं करि, ता पाछैं तू कनियाँ लै री - १० - ५५। (ख) हरि किलकत जसुदा की कनियाँ - १० - ८१। (ग) इहि आँगन गोपाल लाल को कबहुँक कनियाँ लेहौं - २५५०।
कतराकर या बच कर निकल जाना।
जच्छ, भृतु, बासुकी नाग, मुनि, गंधरब, सकल बसु, जीति में किए चेरे-९-१३०।
देवताओं की एक जाति जो गाने में निपुण मानी गयी है।
स्त्रियों की वह अवस्था जब उनका स्वर विशेष मधुर होता है।
धृतराष्ट्र की स्त्री जो दुर्योधन आदि कौरवों की माता थी। गांधार देश के राजा सुबल इनके पिता थे। पति को अंधा देखकर ये आजीवन अपनी आँखों पर पट्टी बाँधे रहीं।
आठ गंध द्रव्यों से बना हुआ एक गंध।
गंधी या अत्तार की स्त्री।
दुलह देखौंगी जाय उतरे सँकेतबट केहि मिस देखन पाऊँ…..। चन्दन अरगजा सूर केसरि धरि लेऊँ। गंधिनि ह्वै जाउँ निरखि नैन सुख देऊँ -पृ. ३४९ (६१)।
गंधवाहपूत बांधव तासु पतनी भाइ
गंधबाहन-पूत-बांधव तासु पतिनी भाई। कबै द्रग भर देखबो जू सबै दुख बिसराइ-सा. २२।
[सं. गंधवाह (=वायु, पवन) + पुत्र (पवन का पुत्र, भीम) + बांधव (=भाई, भीम का भाई=अर्जुन) तासु पतिनी (= उसकी पत्नी=अर्जुन की पत्नी=सुभद्रा) + भाइ (=भाई=सुभद्रा का भाई=श्रीकृष्ण)]
मतवाला हाथी जिसके मस्तक से मद बहता हो।
दुर्गंध करता है, गँधाता है।
रुधिर-मेद, मल-मूत्र, कठिन कुच उदर गंध-गंधात-२-२४।
तेल, इत्र आदि बेचने वाला।
गंध्रव ब्रह्मा-सभा मँझारि। हँस्यौ अप्सरा ओर निहारि -७ ८।
गंधर्बनि कैं हित तप करौ। तप कीन्हैं सो दैहैं आग। ता सेती तुम कीनौ जाग। जज्ञ कियैं गंध्रबपुर जैहो। तहाँ आइ मोकौं तुम पैहो -९-२।
कुंजर कूल रमित अति राजत तहँ सोनित सलिल गँभीर--१० उ.-२।
प्रभु कौ देखौ एक सुभाइ। अति गंभीर उदार-उदधि हरि, जान-सिरोमनि राइ -१-८।
बलशाली, सशक्त, भारी, दृढ़।
लै लै स्रौन हृदय लपटावति, चुँबति भुजा गँभीर-१-२९।
तब ऊधो कर लै लिखी हरि जू की पाती। पढ़ी परत नहिं नेक रहे गंभीर करि छाती-३४४३।
बड़ कुल, बड़े भूप दसरथ सखि, बड़ौ नगर गंभीर-९-४४।
गँवँ से- (१) ढङ्ग से, उपाय से। (२) धीरे से, चुपके से।
गँवारों की कहावत या उक्ति।
(समय) गँवा देना, खो देना।
जैहै गँवाइ-व्यर्थ हो जायगा |
सूरदास भगवंत भजन बिनु जहै जनम गँवाइ-१-३१७।
(क) सूरदास उद्धार सहज गनि, चिंता सकल गँवाई-१-२०७। (ख) रंच काँच-सुख लागि मूढ़-मति, कंचन रासि गँवाई-१-३२८।
(ग)....भली करी हरि गेंद गँवाई-५२५।
इतना मस्त हाथी कि अंकश की मार से भी वश में न हो।
(क) बाँह पकरि तू ल्याई काकौं अति बेसरम गँवारि -१०-३१४। (ख) वारौं लाज भई मोकों बैरिनि मैं गँवारि मुख ढाक्यौ-२५४६।
(समय) बिताते या व्यर्थ खोते हैं।
मैं-मेरो करि जनम गँवावत, जब लगि नाहिं परत जम-डोरी-१-३०३।
(समय) बिताता या काटता है।
व्यर्थ खो देता है, नष्ट कर देता है।
(क) आन देव हरि तजि भजे, सो जनम गँवावै–२-९।
(ख) हरि की कृपा मनुष-तन पावै। मूरख विषय-हेतु सो गँवावै -४-१२।
(समय) बितावेगा या काटेगा।
सूरदास भगवंत भजन बिनु बृथा सुजनम गँवैहै-१-८६।
मो देखत मो दास दुखित भयौ, यह कलंक हौं कहाँ गँवहौं - ७-५।
(समय) नष्ट करोगे या व्यर्थ खोओगे।
सूरदास भगवन्त-भजन बिनु, मिथ्या जनम गँवैहौ-१-३३१।
(क) मरौ वह कंस, निरवंस वाकौ होइ, कन्यौ यह गंस तोकौं पठायौ- ५५१। (ख) अपने घर के तुम राजा हौ सबके राजा कंस। सूर स्याम हम देखते ठाढ़े अब सीखे ये गंस -१०९२।
चुभने या लगने वाली चुटीली बात, आक्षेप, व्यंग्योक्ति।
चलत सो मोहित गति राजहंस। हँसत परस्पर गावत गंस -१८२७।
बिने हुए तागों को इस तरह कसना कि छेद न रह जाय।
(क) पहुँचे आइ विपिन घन बंदा, देखत द्रुम दुख सबनि गँवाए-४४७। (ख) मुरली कौन सुकृति-फल पाए। अधर-सुधा पीवति मोहन कौ, सबै कलंक गँवाए-६६१।
सूरदास भगवंत-भजन-बिनु, नाहक जनम गँवायौ-१-७९।
(क) इहि तन छन-भंगुर के कारन, गरबत कहा गँवार।
(ख) एकहुँ आँक न हरि भजे, (रें) रै सठ सूर गँवार -१-३२५।
[हिं. गँवार+ता (प्रत्य.)]
एक कँटीला पेड़ जिस की लकड़ी यज्ञ- पात्र बनाने के काम आती थी।
‘पिन' की तरह लोहे-पीतल का पतला काँटा।
जिसमें काँटे लगे हों, काँटेदार।
[हिं. काँटा + ईला (प्रत्य)]
वह रंगीन रेखा जो तोते,पंडुक जैसे पक्षियों के गले में युवावस्था में पड़ जाती है।
नव विवाहिता छोटी पत्नी जिसपर पति का प्रेम कम हो।
ठसाठस भर जाना, अच्छी तरह छा जाना।
कस गयी, जकड़ गयी, खूब गँठ गयी।
बृन्दावन की माल कलेवर लता माधुरी गंसी। सूरदास लै भुज बीच राखी माधव मदन प्रसंसी-१६८५।
जिसकी बुनावट गँठी हुई हो।
डसी री माई स्याम भुअङ्गम कारे।…..। फुरै न जंत्र मंत्र गइनाही चले गनी गुन डारे।
जाना' क्रिया का भूत. स्त्री. बहु. रूप, प्रस्थानित हुईं।
जाना' क्रिया का भूत. स्त्री. रूप, प्रस्थान किया। इसका प्रयोग संयोजक क्रिया के रूप में भी होता है।
गई करना- छोड़ देना, ध्यान न देना।
मुरछि परी तन-सुधि गई, प्रान रहे कहुँ जाई -५८९।
खोई या बिगड़ी हुई वस्तु को फिर पाने या बनानेवाला।
जाना क्रिया के भूतकालिक बहुवचन या आदरसूचक एक वचन रूप, प्रस्थानित हुए, जाने पर।
सरन गए को को न उबारयौ-१-१४।
बीते, व्यर्थ ही व्यतीत हुए।
(क) सब दिन गए अलेखे। (ख) कछु दिन घटि षट मास गए-१०८८।
गए राज का दुख नहिं कोइ-१-२८९।
चले जाने पर, खो जाने पर, नष्ट होने पर।
हरि रस तौ अब जाइ कहुँ लहिये। गऐ सोच आऐ नहिं आनँद, ऐसो मारग गहिये-२-१८।
बीतने पर, समाप्त होने पर।
दिन दस गऐ विषय के हेतु...। -१०.४।
आकाश में चलनेवाले पक्षी आदि।
केतकी या केवड़े के फूल की धूल।
[सं. गर्गर=दही मथने का बर्तन]
रुद्रपति, छुद्रपति, लोकपति, वोकपति, धरनिपति, गगनपति,अगमबानी- १५२२।
एक चिड़िया जो पानी के किनारे रहती है।
बारबार संकर्षन भाषत लेत नहीं ह्याँ ते गज टारी–२५८९।
श्रीराम की सेना का एक बंदर।
बैलगाड़ी के पहिये की लकड़ी।
[सं. गर्गरी=दही मथने की हाड़ी]
किसी नरम वस्तु में पैनी वस्तु के धँसने का शब्द।
चूने, सुरखी आदि का मसाला।
इस मसाले से बनी पक्की जमीन।
[हिं. गच+ फ़ा. गर=बनानेवाला]
घोड़ा जिसके दाँत मुँह के बाहर निकले हों
हाथीदाँत का बना हुआ, हाथी दाँत का।
कर कंकन चूरी गजदंती नख मनिमानिक मेटति देती।
बड़ी तोप जिसे हाथी खींचें।
जो राजत तिहिं काल लाल ललना रसाल रस रंग। मानहु नहात मदन बधु सजनी गज गजनी गज संग २४५०।
(क) कहा काँच संग्रह के कीने हरि जो अमोल मनी। बिष सुमेरु कछु काज न आवै, अमृत एक कनी - ८९४।
(ख) ससि सम सुन्दर सरस अँदरसे। ऊपर कनी अमी जनु बरसे - २३२१।
सजल चपल कनीनिका पल अरुन ऐसैं डोर (ल)। रस भरे अंबुजनि भीतर, भ्रमत मानों भौंर - ३६४।
(किसी वस्तु का) छोटा टुकड़ा या थोड़ा अंश, कण।
मुख आँसू अरु माखन कनुका, निरखि नैन छबि देत। मानौ स्रवत सुधानिधि मोती, उड्डुगन, अवलि समेत - ३४६।
एक पेड़ जिसमें लाल या सफेद फूल लगते हैं। यह पेड़ बड़ा विषैला होता है।
हाथी की सी मंदमस्तानी चाल।
हाथी की सी मंद-मस्तानी चालवली।
हाथी की सी मंद और मस्तानी चाल।
खंजन मीन मराल हरन छबि भान भेद गजगामिनि-पृ. ३४४ (३४)।
जिसकी चाल मंद और मस्तानी हो।
गजब का- अद्भुत, बहुत अधिक।
पहुँची करनि, पदिक उर हरि-नख, कठुला कंठ, मंजु गजमनियाँ-१०-१०६।
मोती जो हाथी के मस्तक से निकलता माना गया है।
वह बड़ा हाथी जिसे ग्राह ने पकड़ लिया था और जिसको छुड़ाने के लिए भगवान विष्णु गरुड़ छोड़कर नंगे पैर दौड़े थे।
वह राजा जिसके पास बहुत हाथी हों।
कलिंग देशीय-राजाओं की उपाधि।
क्रोध गजराज गजपाल कीन्हो -२५९१।
धातुओं के फूँकने की रीति।
गज को संकट से छुड़ाने की क्रिया।
एहि थर बनी क्रीड़ा गजमोचन और अनंत कथा स्रुति गाई–१-६।
विष्णु का वह रूप जो उन्होंने ग्राह से गज को छुड़ाने के लिए धारण किया था।
गजमोचन ज्यों भयो अवतार। कहौं सुनौ सो अब चितधार।
[सं. गजमौक्तिक, प्रा. गजमोत्तिय]
प्रात:काल-सूचक घंटे का शब्द।
बोले तुमचुर चारो याम को गजर मारयौ पौन भयौ सीतल तम तमता गई -१६०८।
[सं. गज+ई (प्रत्य.) अथवा गजिन्]
(क) धाए गजराज-काज, केतिक यह बाता-१-१२३। (ख) ज्यों गजराज-काज के औसर औरै दसन दिखावत -३०९३।
पतली कमर या कटि जिसकी उपमा हाथी के शत्रु सिंह की पतली कमर से दी जाती है।
एक कमल पर धारे गजरिपु एक कमल पर ससि-रिपु जोर -सा. उ. ४७।
पग रिपु ता महँ परत गजल के को तन तैं सुरझावै- सा. ८५।
वह स्थान जहाँ हाथी बाँधे जाते हैं।
वह लकड़ी जिससे दूध मथकर फेना या मक्खन निकालते हैं।
विष्णु जिन्होंने गदा सुर की हड्डियों से बनी गदा धारण की थी।
पदार्थों या प्राणियों की मिलावट।
पानी में छेटे छोटे बुलबुलों का समूह।
कनेर के फूल के रंग का, श्यामता लिये हुए लाल रंग का।
[हिं. काना+औड़ा (प्रत्य.)]
जिसका कोई अंग टूटा या हीन हो।
[हिं. काना+औड़ा (प्रत्य.)]
[हिं. काना+औड़ा (प्रत्य.)]
[हिं. काना+औड़ा (प्रत्य.)]
[हिं. काना+औड़ा (प्रत्य.)]
[हिं. काना+औड़ा (प्रत्य.)]
कृतज्ञ, उपकृत, एहसानमंद, दबैल।
अति आधीन सुजान कनौड़े, गिरधर नार नवावति। आपुन पौढ़ि अधर सज्जा पर, कर-पल्लव पलुटावति - ६५५।
[हिं. कनौड़ा=काना+औड़ा (प्रत्य.)]
लटकि निरखन लग्यो मटक सब भूलि गयौ हटक ह्वै कै गयौ गटकि सिल सों रह्यौ मीचु जागी -२६०९।
(क) अपनी रुचि जित-ही-जित ऐंचति इंद्रिय-कर्म-गटी। हौं तित हीं उठि चलत कपट लगि, बाँधे नैन-पटी -१-६८।
[सं. ग्रंथ, प्रा. गंठ, हिं. गाँठ]
पैर और तलुए के बीच की गाँठ।
[सं. ग्रंथ, प्रा. गंठ, हिं. गाँठ]
[सं. ग्रंथ, प्रा. गंठ, हिं. गाँठ]
[सं. ग्रंथ, प्रा. गंठ, हिं. गाँठ]
[सं. ग्रंथ, प्रा. गंठ, हिं. गाँठ]
गाड़ने का काम (दूसरे से) कराना।
गड़हा खोदना- बुराई करना।
गड़हा भरना (पटना)- (१) घाटा पूरा करना। (२) रूखी-सूखी खाकर पेट भरना।
गड़हे में पड़ना- कठिनाई या असमंजस होना।
अति संकट मैं भरत भँटा लौं, मल मैं मूड़ गड़ाए-१-३२०।
धोखा देकर रुपया ठग लेनेवाला।
[सं. ग्रंथन, प्रा. गंठन, हिं, गाँठना का अक. रूप]
[सं. ग्रंथन, प्रा. गंठन, हिं, गाँठना का अक. रूप]
ऐसी बनावट होना जिसमें छेद न रहे।
[सं. ग्रंथन, प्रा. गंठन, हिं, गाँठना का अक. रूप]
गुप्त कार्य या विचार में सम्मिलित होना।
[सं. ग्रंथन, प्रा. गंठन, हिं, गाँठना का अक. रूप]
[सं. ग्रंथन, प्रा. गंठन, हिं, गाँठना का अक. रूप]
[सं. ग्रंथन, प्रा. गंठन, हिं, गाँठना का अक. रूप]
[सं. ग्रंथन, प्रा. गंठन, हिं, गाँठना का अक. रूप]
चरखी के बीच का भाग जिस पर रस्सी रहती है।
पांडव-सुत अरु द्रौपदी कौं मारि गड़ावौ-१-२३८।
बिनु गुण गड़ि माला रही ठाहिं कहुँ बिहराने-२१३८।
हमरौ यौवन रूप आँखि इनके गड़ि लागत-१०२५।
कठिन कठिन कली बीनि करत न्यारी प्यारी के चरन कोमल जानि सकुच अति गड़िबेहि डराति -१०६८।
इहि उर माखन चोर गड़े-३१५१।
एक जाति जो भेड़ें पालती है।
[सं. गड्डरिक, पा. गड्डरिअ]
निरभय देह, राजगढ़ ताकौ, लोक मनन-उतसाहु-१-४०।
गढ़ तोड़ना (जीतना)- कठिन काम करना।
काँट-छाँट करना, रचना, बनाना।
गढ़ गढ़ कर बातें करना- झूठ-मूठ की बातें गढ़ना।
प्रस्तुत या उपस्थित करना।
किले का अधिकारी या स्वामी।
रक्षित स्थान में पहुँचना।
किले का अधिकारी या स्वामी।
(भयभीत होकर) किले में आश्रय लिया।
गढ़वै भयौ नरकपति मोसौं, दीन्हें रहत किवार। सेना साथ बहुत भाँतिन की, कीन्हें पाप अपार-१-१४१।
बनाने या सुडौल करने का काम।
गढ़वाऊँ, बनाऊँ, तैयार कराऊँ।
मैं निरबल बित-बल नहीं, जो और गढ़ाऊँ-६-४२।
कंचन कलस गढ़ाये कब हम देखे धौं यह गुनिये -११३०।
गढ़ि गढ़ि ल्यायौ बाढ़ई, धरती पर डोलाइ, बलि हालरु रे-१०-४७।
गढ़ि गढ़ि बात बनावत (बानति)- झूठमूठ की कल्पना करना, नमक-मिर्च लगाकर कोई बात कहना। उ.- (क) उनके चरित कहा कोउ जानै, उनहीं कही तु मानति। कदम तीर तें मोहिं बुलायौ, गढ़ि गढ़ बातैं बानति। (ख) जो जैसो तैसौ त्यों चलिये हरि आगे गढ़ि बात बनावत -पृ. ३२९।
लीन होकर, पगकर, मग्न होकर।
यह चतुराई अधिकाई कहाँ पाई स्याम वाके प्रेम की गढ़ि पढ़े हौ पटी-२००८।
सुघटित की, रची, ठीकठाक की।
(क) भई देह जो खेह करम-बस जनु तट गंगा अनल दढ़ी। सूरदास प्रभु दृष्टि कृपानिधि, मानौ फेरि बनाई गढ़ी-९-१७०।
(ख) हौं अपराधिनि चतुर बिधाता काहे को बनाइ गढ़ी-२७९४।
गढ़ का स्वामी या अधिकारी।
गढ़ता है, सोचता है, कल्पना करता है।
जिय जिय गढ़ै, करै बिस्वासहिं, जौन लंका लोग-९-७५।
गढ़नेवाला, बनानेवाला, रचनेवाला।
आनि धरयौ नन्दद्वार, अति हीं सुन्दर सुढार। ब्रज बधू कहँ बार-बार धन्य रे गढ़ैया १०-४१-।
कनक-रतन-मनि पालनौ, गढ़यौ काम सुतहार-१०-४२।
फरुखाबाद जिले का एक नगर जो किसी समय बड़े विस्तृत साम्राज्य की राजधानी थी।
[सं. कान्यकुब्ज, प्रा. कण्णउज्ज]
चोवा नामक सुगंधित द्रव्य।
शासन के प्रबंधकों का संघ या मंडल।
गणना या हिसाबकिताब करनेवाला।
प्रजा के प्रतिनिधियों का शासन, जनतंत्र, प्रजातंत्र।
वह राज्य जो प्रजा के प्रतिनिधियों द्वारा चलाया जाता हो।
धन के लोभ से प्रेम करने वाली स्त्री।
मात्रा, संख्या और परिमाण की विद्या।
गणित शास्त्र का जानने वाला।
एक देवता जिनका शरीर मनुष्य का और सिर हाथी का सा है। इनके चार हाथ, एक दाँत और तीन आँखे हैं। इनकी सवारी चूहा है। इनके हाथों में पाश, अंकुश, पद्म और परशु हैं। ये महादेव के पुत्र माने जाते हैं।
गणों का स्वामी या अधिकारी।
व्यतीत हुये, बीत गये,अतीत हुए।
इहिं बिधि भ्रमत सकल निसि दिन गत कछु न काज सरत -१ ५५।
जनु रबि गत संकुचित कमल जुग निसि अलि उड़न न पावै–१०-६५।
गत का- ठीक, काम का।
गत बनाना- (१) दुर्गति करना। (२) मारना-पीटना। (३) हँसी उड़ाना।
गत बनाना- (१) विचित्र वेश या धजा बनाना। (२) आकृति बिगाड़ना। (३) काम या उपयोग में लाना। (४) दुर्गति, दुर्दशा। (५) मृतक का क्रिया-कर्म। (६) नृत्य में शरीर का संचालन।
जिसमें सद्गुण न रहे हों, गया-बीता, निकम्मा।
चाल, जाने की क्रिया, गमन।
(क) ग्राह गयौ गज-बल बिनु ब्याकुल बिकल गात, गति लंगी। धाइ चक्र लै ताहिं उबारयौ मारयौ-ग्राह-बिहंगी-१-२१। (ख) मधु मराल जुग पद पंकज के गति-बिलास जल मीन-३०३८।
हिलने-डोलने की क्रिया या शक्ति।
स्रवन न सुनत चरन-गति थाकी, नैन भए जलधार- ११ १८।
(क) सूर स्यामसुन्दर जौ सेवै क्यों होवै गति दीन-१-४६। (ख) ज्यों भुवंग तजि गयौ केंचुली सो गति भई हमारी-३०५९।
गतिकीनी- दुर्दशा की,बुरी दशा को पहुँचा दिया। उ.- अजामील तौ बिप्र तिहारौ हुतौ पुरातन दास। नैंकु चूक तैं यह गति कीनी पुनि बैकुंठ निवास - १-१३२।
गति नाहीं काहू की जहाँ-१० उ.-१२८।
प्रयत्न या युक्ति की सीमा।
मेरी तौ गति पति तुम अनतहिं कहँ सुख पाऊँ
जेतिक अधम उधारे प्रभु तुम तिन की गति मैं नापी-१-१४०।
(क) अबिगत गति कछु कहत न आवै–१-२।
(ख) दयानिधि तेरी गति लखि न परै-१-१०४।
(ग) या गति की माई को जानै-२८८७।
स्रवन न सुनत देहगति भूली गई बिकल मति बौरी-८८३।
जोग की गति सुनत मेरे अंग आगि बई-३१३१।
जीवात्मा का एक शरीर से दूसरे में प्रवेश।
मृत्यु के बाद जीवात्मा की दशा।
कपट-हेत परसैं बकी जननीगति पावै–१-४।
ताल-स्वर के अनुसार शरीर-संचालन।
काम का रंग-ढंग या चाल-ढाल।
पूँजी, गाँठ का, धन, धन संपत्ति।
(क) घर मैं गथ नहिं भजनत तिहारौ, जौन दियैं मैं छुटौं। धर्म-जमानत मिल्यौ न चहैं, तातैं ठाकुर लूटौ-१-१८५।
(ख) अति मलीन बृषभानु कुमारी।.....। अधोमुख रहति उपर नहिं चितवति ज्यों गथ हारे थकित जुआरी-३४२५।
व्यापार का सामान,पण्य द्रव्य।
(क) तुम्हरो गथ लादो गयंद पर हींग मिरच पीपरि कहा गावति।
(ख) सूरदास गथ खोटो काहे पारखि दोष धरे- पृ. ३३१।
एक चीज को दूसरे में जोड़ना या गूँथना।
ज्यों जुवारि रस- बींधि हारि गथु, सोचति पटक चितो-११-१।
झीनी कामरि काज कान्ह ऐसी नहिं कीजै। काच पोत गिर जाइ नंद घर गथौ न पूजै–११२७।
फुरै न मंत्र, जंत्र, गद नाहीं, चले गुनी गुन डारे। प्रेम-प्रीति बिष हिरदै पारयौ, डारत है तनु जारे-७४७।
श्रीराम की सेना का एक बानर।
गुलगुली वस्तु पर कड़ी या गुलगुली वस्तु के आघात का शब्द।
[सं. गदा या गदक, हिं. गतका]
[सं. गदा या गदक, हिं. गतका]
श्रद्धा, हर्ष आदि के आवेग से पूर्ण।
गदगद बचन नयन जल पूरित बिलख बदन कृस गातैं-सा. उ. ४६।
सब कन्यनि सौभरि कौं बरयौ - ९ - ८।
(नंद जू) आदि जोतिषी तुम्हरे घर को पुत्र-जन्म सुनि आयौ। लगन सोधि सब जोतिष गनिकै, चाहत तुम्हहिं सुनायौ….। पचऎं बुध कन्या कौ जौ है, पुत्रनि बहुत बढ़ैहैं - १० - ८६।
कंधे पर डाला जाने वाला दुपट्टा।
रुई की बगलबंदी जो जाड़े में ठाकुर जी को पहनाते हैं।
जो अच्छी तरह पका न हो, अधपका।
युवावस्था में शरीर का पुष्ट होने लगना।
लोढ़ जो गदा के आकार का होता है।
[फ़ा. गदा=फकीर+ई (प्रत्य.)]
[फ़ा. गदा=फकीर+ई (प्रत्य.)]
गदासुर की हड्डियों की बनी गदा धारण करनेवाले विष्णु।
(पानी का) गंदा या मैला होना।
अनुभवहीनता की उम्र जो १६ से २५ वर्ष तक मानी जाती है।
लोहे का एक प्राचीन शस्त्र जिसमें डंडे के एक सिरे पर लट्टू होता था।
अधिक हर्ष प्रेम, श्रद्धा आदि के आवेग से ऐसा युक्त कि अपनी स्थिति का उसे ज्ञान न रहे।
अधिक हर्ष, प्रेम, श्रद्धा आदि के आवेग के कारण रुका या अस्पष्ट।
गद्गद सुर पुलक रोम, अंग प्रेम भीजै–१-७२।
मुलायम या गुदगुदी जगह पर किसी चीज के गिरने का शब्द।
किसी चीज के हजम न होने पर पेट का भारीपन।
एक कल्पित जादू की लकड़ी जिसका स्पर्श करके मनुष्य मूर्ख हो जाता है।
गद्द मारना- वश में करना।
गद्द मारा जाना- मूर्ख हो जाना।
मोटा बिछौना जिसमें रुई या पयाल भरा हो।
हाथी की पीठ को मोटा बिछौना जिस पर हौदा कसा जाता है।
गुदगुदी चीज की पोली-पोली मार।
घोड़े, ऊँट आदि की काठी रखने की गद्दी।
किसी बड़े पदाधिकारी का पद।
राजवंश या शिष्यवंश-परंपरा।
हाथ-पैर की हथेली या गदेली।
वह रचना जिसमें वर्णमात्रा आदि का नियम न हो, पद्य का उलटा।
काव्य का एक भेद जिसमें छंद-वृत्त का नियम न हो।
गद्य का, गद्य में रचा हुआ।
[हिं. गधी+एड़ी (प्रत्य.)]
(क) श्रीपति जू अरि-गन-गर्व प्रहारयौ-१-३१।
(ख) मदन रिस के आदि ते मिल मिली गुनगन ऐन–सा. ६६।
गनन समेत सती तहँ गयी। तासौं दक्ष बात नहीं कही।
चोवा नामक सुगंधित द्रव्य।
सुनि आनंदे सब लोग, गोकुल-गनक-गुनी-१०-२४।
चैत्र के शुक्ल पक्ष की तीज जब गणेश और गौरी की पूजा होती है।
गिनते हैं, मानते हैं, समझते हैं।
तिनका-सौं अपने जन कौ गुन मानत मेरु-समान। सकुचि गनत अपराध-समुद्रहिं बूँद- तुल्य भगवान-१-८।
ध्यान में लाते हैं,महत्व को समझते हैं।
राम भक्तबत्सल निज बानौं। जाति, गोत, कुल, नाम गनत नहिं, रंक होइ कै रानौं-१-११।
न गनत काहूँ- किसी को कुछ नहीं समझते, बदते या मानते हैं, बहुत तुच्छ समझते हैं। उ.- एक एक न गनत काहूँ, इक खिलावत गाय -१०-२६।
गिनते-गिनते, हिसाब लगाते लगाते, जोड़ते-जोड़ते।
अँखियाँ हरि दरसन की भूखी।….।अवधि गनत इकटक मग जोवत तब एती नहीं झूँखी-३० २९।
(क) गाइ-गनती करन जैहैं, मोहि लै नँदराइ–६७६। (ख) गनती करत ग्वाल गैयनि की, मोहिं नियरैं तुम रैहौ-६८०।
[सं. गणना, हिं. गणना, गिनती]
कौने गनती- किस हिसाब में, बिलकुल तुच्छ, नगण्य। उ.- तुम हरता करता प्रभु जू, मातु-पिता कौने गनती-१२२८।
गिनती करना या हिसाब लगाना।
गिनते हैं, समझते हैं, मानते हैं।
सूरदास प्रभु सदा भक्तबस रंक न गनहिं न राइ -२६३६।
[सं. गण+ हिं. हिं (प्रत्य.)]
बहुत विनय करि पाती पठई, नृप लीजैं सब पुहुप गनाइ–५८२।
सूर कहो मुसुकाय प्रानप्रिय मो मन एक गनायौ - सा. ९५
बकी कपट करि मारन आई, सो हरिजू बैकुंठ पठाई - १ - ४।
कपट हीन न मीन एरी मरत बिछुरत प्यार - सा० २४।
(२) चुपके से किसी चीज का कुछ अंश निकाल लेना।
भँवर कुरंग काग अरु कोकिल कपटिन की चटसार - २६८७।
साधु निंदक, स्वाद-लंपट, कपटी, गुरु-द्रोही। जेते अपराध जगत, लागत सब मोही - १ - १२४।
[सं. कर्पट, प्रा. कप्पट, कप्पड़]
[सं. कर्पट, प्रा. कप्पट, कप्पड़]
कँपकँपी, काँपना, थरथराहट।
चारि चारि दिन सबै सुहागिनि री ह्वै चुकी मैं स्वरूप अपनी। कोउ अपने जिय मान करै माई हो मोहि तौ छुटति अति कपनी - १६६२।
गिनाते हैं, गिनती कराते हैं, महत्व समझाते हैं।
मेंढा मढ़ी मगर गुडरारो मोर आपु मनवाह गनावत-९७८।
गणना कराने (के लिए), हिसाब लगवाने (के उद्देश्य से)।
कस्यप रिषि सुर तात, सु लगन गनावन रे-१०-२८।
बता रही है, संकेत कर रही है।
सूरज प्रभु मिलाप हित स्यानी अनमिल उक्ति गनावै -सा. १५।
अब मिथ्या तप, जाप, ज्ञान सब प्रगट भई ठकुराई। सूरदास उद्धार सहज गनि, चिंता सकल गँवाई-१-२०७।
सूर-प्रभु चरित अनगित, न गनि जाहिं -४-११।
एक वेश्या जिसका उद्धार तोते को राम नाम पढ़ाते समय हो गया था।
गनिका-सुत सोभा नहिं पावत जाके कुल कोऊ न पिता री-१-३४।
धन के लोभ से प्रेम करनेवाली स्त्री।
गिनकर, गणना करके, हिसाब लगाकर।
(नंद जू) आदि जोतिसी तुम्हरे घर कौ, पुत्र-जन्म सुनि आयौ। लगन सोधि सब जोतिष गनिकै, चाहत तुमहिं सुनायो-१०-८६।
गिनते हैं, गणना करते हैं।
कुसुमित धर्म-कर्म कौ मारग जउ कोउ करत बनाई। तदपि बिमुख पाँती सो गनियत, भक्ति हृदय नहिं आइ–१-९३।
मानते हैं, ध्यान देते हैं।
तुम्हरी प्रीति हमारी सेवा गनियत नाहिन कातें-२५२८।
गिनिए, गणना कीजिए, शुमार लगाइए।
कहा कृपिन की माया गनियै, करत फिरत अपनी अपनी-१-३९।
अर्थ, धर्म अरु काम, मोक्ष फल, चारि पदारथ देत गनी- १-३९।
कहा गनी- क्या गिनती है, क्या समझा जाता है, तुच्छ या नगण्य है। उ.- इन्द्र समान हैं जिनके सेवक नर बपुरे की कहा गनी-१-३९।
हिन्दुओं के पाँच प्रधान देवताओं में एक जिनको महादेवजी का पुत्र माना गया है और जो उनके गणों के अधिपति हैं।
गौरि गनेस्वर बीनऊँ (हो) - १० - ४०।
समझे, माने, महत्व का जाने।
(क) यह ब्रत धारे लोक मैं बिचरै समकरि गनै महामनि-काँचै - २०११। (ख) चरनसरोज बिना अवलोक, को सुख घरनि गनै- ९ - ५३।
(ग) रुक्म बरबस ब्याहि दैहै गनै पितहि न माई - १० उ.११३।
भूमि रेनु कोउ गनै, नक्षत्रनि गनि समुझावै। कह्मौ चहै अवतार, अन्त सोऊ नहिं पावै - २ - ३६।
जेइ निरगुन गुनहीन गनैगो सुनि सुन्दर अलसात - २२८२।
दधिसुत-बाहन मेखला लैके बैठि अनईस गनौ री - सा. उ. ५२।
गिन लूँ, अनुमानूँ, शुमार लगाऊँ।
जिह्वा रोम रोम प्रति नाहीं, पौरुष गनौं तुम्हार - ९ - १४७।
समझो, मानों, स्वीकार करो।
मोहिं बिधि, बिष्नु, सिव, इन्द्र, रवि ससि गनौ, नाम मम लेइ आहुतिनि डारौ - ४ - ११।
रीहा घास आदि से बना कपड़ा।
इधर-उधर की सत्य-असत्य बात।
खाने या निगलने की क्रिया।
[हिं. गपोड़=बातचीत + चौथ]
व्यर्थ की बात या बकवाद करता है।
व्यर्थ की बात या बकवाद करना।
चुप्पी साधनेवाला, काम टालनेवाली, मट्टर।
[हिं. गोबर+ हा (प्रत्य.)]
[सं. गर्भ, पा गब्भ+आर या वार (प्रत्य.)]
जिसके जन्म-काल के बाल न कटे हों, जिसका मुंडन न हुआ हो।
[सं. गर्भ, पा गब्भ+आर या वार (प्रत्य.)]
[सं. गर्भ, पा गब्भ+आर या वार (प्रत्य.)]
गर्भ-काल की (बालों की लटें)।
(क) प्रगट कपाट बिकट दीन्हे हे, बहु जोधा रखवारे। तैंतिस कोटि देव बस कीन्हे, ते तुम सौं क्यौं हारे - ९ - १०५। (ख) काजर कुलफ मेलि मैं राखे पलक कपाट दये री–सा० उ० ७। (ग) नसुत कील कपाट सुलच्छन दै दृग द्वार अकोट–सा० उ० १६।
तुम बिनु भूलोइ भूलौ डोलत। लालच लागि कोटि देवनि के, फिरत कपाटनि खोलत - १ - १७७।
गभुआरे सिर केस हैं, बर घूँघरवारे - १० - १३४।
(किसी स्थान या विषय में) प्रवेश, पहुँच, पैठ।
(क) जहाँ न काहू कौ गम, दुसह दारुन तम, सकल बिधि बिषम, खल मल खानि - १ - ७७। (ख) असुरपति अति ही गर्व धरयौ। तिहूँ भुवन भरि गम है मेरो मो सन्मुख को आउ १ (ग) स्वर्ग-पतार माहिं गम ताको - ९ - ७४।
जो जानी जा सकें, जो ज्ञात हो सके।
प्रभु की लीला गम नहीं, कियो गब अति अंग - ४९२।
गम खाना- क्षमा करना, ध्यान न देना।
गम गलत- दुख भुलाने का प्रयत्न।
सूचक, बतलानेवाला (व्यक्ति)।
एक स्वर से दूसरे पर जाने का एक भेद (संगीत)।
[हिं. गमक + ईला (प्रत्य.)]
जाना, चलने की क्रिया, यात्रा करना।
अस्व-निमित उत्तर दिसि कैं पथ गमन धनंजय कीन्हौं - १ - २९।
तिहूँ भुवन भरि गमि है मेरो मो सम्मुख को आउ - २३७७।
तन-रिपु काम चित रिपु लीला ज्ञान गम्य नहिं याते - ३११५।
तिहूँ भुवन भरि गम्य है जाकौ नर नारी सब गाउ - ११५८।
गहन, जिसको पार करना कठिन हो।
आठ रवि लें देख तब तें परत नाहिं गम्हीर - सा. ४४।
[सं. गजेंद्र, प्रा. गयिंद, गइन्द्र]
[सं. गजेंद्र, प्रा. गयिंद, गइन्द्र]
(क) जो बनिता सुत-जूथ सकेले, हय गय-बिमन घनेरो। सबै समर्पौ सूर स्याम कौं, यह साँचौ मत मेरो - १ - २६६। (ख) अमरा सिव रबि ससि चतुरानन हय गय बसह हंस मृग जावत।
छोटे पौधे लगाने का पात्र।
तृतीय पहर जब रैनि गमाई - १०७२।
(क) इंद्र ढीठ बलि खाइ हमारी देखौ अकल गमाई - ९८५। (ख) बार बार कहै कुँवर राधिका मोतिसरी कहाँ गमाई–१५४४।
(ग) लोक लाज की कानि गमाई फिरत गुडीबस डोरी - १४७२।
(घ) हरि-ग्रह जननी हित न सरस कह सुरभी सुतर गमाई –सा. १६।
कीन्ही प्रीति प्रगट मिलिबे की अँखिया सर्म गमाए।
श्री रामकी सेना का एक बानर सेनापति
ना करु बिलँब, भूषन करत दूषन,चिहुर बिहुर ना ना करत गयन - २२१४।
गया के समीप एक पर्वत जो गय नामक असुर के सिर पर माना जाता है।
बिहार या मगध देश का एक पुण्य स्थान जो प्राचीन समय में प्रधान यज्ञस्थल था। यह तीर्थ श्राद्ध और पिंडदान के लिए बहुत प्रसिद्ध है।
अस्व-जज्ञहु जौ कीजै, गया, बनारस अरु केदार–२- ३।
गया तीर्थ में की जानेवाली पिंडोदक आदि क्रियाएँ।
‘जाना’ क्रिया का भूतकालिक रूप, प्रस्थानित हुआ।
गया-गुजरा (बीता)- बुरा, नष्ट-भ्रष्ट।
वह जायदाद जिसका कोई मालिक न हो।
चक्की के चारो ओर का घेरा जिसमें पिसा आटा गिरता है।
(क) कंचन मनि खोलि डारि, काँच गर बँधाऊँ - १ - १६६। (ख) लोचन सजल, प्रेम-पुलकित तन, गर-अंचल, कर माल - १ - १८९।
(ग) सूर परस्पर करत कुलाहल गर-सृग पहिरावैनी–९ - ११।
(घ) मुंड-माला मनौ हर-गर - १० - १७०।
प्रीति के बचन बाँचे बिरह अनल आँचे अपनी गरज को तुम एक पाँइ नाचे - २००३।
गरज का बावला- बहुत अधिक जरूरतमंद, जो अपनी इच्छा पूरी करने के लिए भला-बुरा सभी कुछ करने को तैयार हो।
गंभीर और तुमुल शब्द करता है।
गरजत क्रोध-लोभ कौ नारौ, सूझत कहुँ न उतारौ - १ - २०९।
कहा कहौं हरि केतिक तारे, पावन पद परतंगी। सूरदास यह बिरद स्रवन सुनि, गरजत अधम अनंगी - १ - २१।
चटकता है, तड़कता है, कड़कता है।
साधु जो हाथ में नर-कपाल लिये रहते हैं और शैव मत मानते हैं।
शिव, महादेव जो मनुष्य की खोपड़ियों की माला पहनते हैं।
साधु जो मनुष्य की खोपड़ी लिये रहते हैं और भैरव या शक्ति को बलि चढ़ाते हैं।
जा परसैं जीतैं जग-सैनी, जमन, कपालिक, जैनी–९ - ११।
किले की दीवारों पर तोपों लिए बना बुर्ज।
ऊँचा टीला जहाँ युद्ध-सामग्री रखी जाती थी।
तुम्हरी प्रीति ऊधो पूरब जनम की अब जु गये मेरे तनहु के गरजी - ३१६२।
[सं. ग्रन्थ, पा. गंठ, हिं. गट्ठ]
अब सुनि सूर कान्ह केहरि के बिन गरत गात जैसे ओरे - २८१८।
तुम गुन की जैसे मिति नाहिंन, हों अघ कोटि बिचरतौ। तुम्हैं-हमैं प्रतिबाद भए तैं गौरव काकौ गरतौ - १ - २०३।
गरद समोयौ- धूल में मिला दिया, नष्ट हो गये। उ.- सौ भैया दुरजोधन राजा, पल मैं गरद समोयौ - १-४३।
धड़ और सिर के बीच का अंग, ग्रीवा।
गरदन उठाना- विरोध या विद्रोह करना।
गरदन ऐंठना (मरोड़ना)- (१) गला दबाकर मार डालना। (२) कष्ट पहुँचाना।
गरदन काटना - (१) सिरकाटना (२) हानि पहुँचाना।
गरदन झुकना - (१) नम्र या अधीन होना। (२) लज्जित होना। (३) बेहोश होना। (४) मरना।
गरदन न उठाना- (१) चुपचाप सहन करना। (२) लज्जित होना। (३) दुख या बीमारी से पड़े रहना।
गरदन नापना- अपमान करना।
गरदन पर- जिम्मे, ऊपर।
गरदन पर बोझ रखना- भारी काम सौंपना।
गरदन पर बोझ होना- (१) बुरा लगना। (२) भार होना।
गरदन मारना - (१) मार डालना। (२) बहुत हानि पहुँचाना।
जुलाहों की एक लकड़ी, साल।
बरतन आदि का ऊपरी पतला भाग।
गरदन पर लगनेवाला झटका या थप्पड़।
गरदन में हाथ डालने की क्रिया।
[हिं. गरदन+इयाँ (प्रत्य.)]
गरजनेवाला, जोर से बोलनेवाला।
गंभीर शब्द करने लगी, जोर से बोली।
धर-अम्बर लौं रूप निसाचरि गरजी बदन पसारि - ९ - १०४।
मतलब गाँठनेवाला, प्रयोजन रखनेवाला।
[हिं. गर्व+गहना=ग्रहण करना]
गर्व करता है, घमंड या अभिमान दिखाता है।
इहिं तन छन-भंगुर के कारन, गरबत कहा गँवार - १ - ८४।
रूप जोबन सकल मिथ्या, देखि जनि गरबाइ। ऐसे हीं अभिमान-आलस, काल ग्रसिहै आइ - १ - ३१५।
मागधपति बहु जीति महीपति, कछु जिय मैं गरबाए। जीत्यौ जरासंध, रिपु मारयौ, बल करि भूप छुड़ाए - १ - १०९।
जब हिरनाच्छ जुद्ध अभिलाष्यौ, मन मैं अति गरबाऊ। धरि बाराह रूप सो मारयौ, लै छिति दंत अगाऊ - १० - २२१।
घमंड में आया, अभिमान किया।
भक्ति कब करिहौ जनम सिरानौ। बालापन खेलत ही खोयौ, तरुनाई गरबानौ - १ - ३२९।
गले में बाँह डालने की क्रिया।
घूम फिरकर एक ही स्थान पर आ जानेवाला।
एक तरह का कबूतर जो घूम फिर कर अपने स्थान पर आ जाता है।
आवेशयुक्त, उत्साहपूर्ण, जोश से भरा हुआ।
शरीर में गरमी आना, उष्ण होना।
टेंट (हाथ) गरमाना- पास में रुपया पैसा आना या होना।
दाउँ परयौ अहि जानि कै, लियौ अंग लपटाइ। काली तब गरबित भयौ, दियौ दाउँ बताइ - ५८९।
अभिमानिनी, गर्व करनेवाली।
दधि लै मथति ग्वालि गरबीली - १० - २९९।
गरभ-बास दस मास अधोमुख, तहँ न भयौ बिस्राम - १ - ५७।
गेहूँ आदि के पौधों में बाल लगना।
कपास के फूल की तरह बहुत हल्के रंग का।
काकी ध्वजा बैठि कपि किलकिहि, किहिं भय दुरजन डरिहै - १ - २६।
कुछ परिश्रम करने के बाद पशुओं का तेजी पर आना।
टेंट (हाथ) गरमाना- (१) रुपया देना। (२) रिश्वत या इनाम देना।
बुरी तरह से पकड़ने या कष्ट पहुँचानेवाला।
नटखट चौपायों के गले में बँधा हुआ काठ का टुकड़ा, कुंदा।
भीष्ण ध्वनि करता हुआ, गरजता हुआ।
सुनत मेघवर्तक साजि सैन लै आए।….। घहरात तरतरात गररात हहरात पररात झहरात माथ नाए - ९४४।
गरजना, गड़गड़ाना, गंभीर या भीषण ध्वनि करना।
एक चिड़िया जिसका दर्शन अथवा लड़ना अशुभ माना जाता है। इसे किलँहटी, गलगलिया या सिरोही भी कहते हैं।
फटकत स्रवन स्वान द्वारे पर, गररी करत लराई। माथे पर ह्वै काग उड़ान्यौ, कुसगुन बहुतक पाई - ५४१।
अहि मयंक मकरंद कंद हति दाहक गरल जिवाए - २८५४।
घास का मुट्ठा, अँटिया या पूला।
घमंड करना, अभिमान या गर्व करना।
घमंड या अभिमान में आ गये।
कहि कुसलातैं, साँची बातैं आवन कह्यौ हरि नाथै। कै गरवानै राजसभा अब जीवत हम न सुहाथै - ३४४१।
गर्व में चूर, अभिमान में भरा हुआ।
हँसे स्याम मुख हेरि कै धोवत गरवानो - २५७५।
काठ या लोहे की चरखी जो कुएँ में घड़े की रस्सी डालने के लिए लगायी जाती है, घिरनी, चरखी।
[सं. कुंडली या हिं. गड़गड़ (अनु.)]
प्रबल, प्रचंड, गर्वीला, उद्धत।
[सं. गव, पुं. हिं. गारो+आर (प्रत्य.)]
गरगर शब्द करके कुल्ली करना।
जाउ गरि-गल जाय, सड़ जाय, नष्ट हो जाय।
पापी जाउ जीभ गरि तेरी, अजुगुत बात बिचारी - ९७९।
गए गरि- नष्ट हो गये, दूर हो गये।
गज-गीध-गनिका-ब्याध के अघ गए गरि गरि गरि–१- ३०६।
आठ सिद्धियों में एक जिससे साधक अपने को जितना चाहे भारी कर सकता है।
[हिं. गारी+आना (प्रत्य.)]
अपनी सीतलता नहिं तजई जद्यपि बिधु भयो राहु गरासी - ३३१५।
स्याम गरीबनि हूँ के गाहक। दीनानाथ हमारे ठाकुर, साँचे प्रीति-निबाहक - १ - १९।
दीन का दुख हरनेवाला, दयालु।
लीजै पार उतारि सूर कौं महाराज ब्रजराज। नई न करन कहत प्रभु, तुम हौ सदा गरीबनिवाज - १ - १०८।
पक्षियों का राजा और विष्णु का वाहन। इसके पिता कश्यप थे और माता विनता थी। यह सर्पौ का शत्रु समझा जाता है।
[हिं. गड़ना-एक जगह रुकना]
नारियल के भीतर का गूदा, गोला।
[सं. गुलिका, प्रा. गुडिया]
बीज की गूदी, गिरी, मींगी।
[सं. गुलिका, प्रा. गुडिया]
अर्जुन जिनके रथ की ध्वजा पर हनुमान जी थे।
अर्जुन जिसकी ध्वजा में कपि का चिह्न था।
स्यंदन खंडि महारथि खंडौं, कपिध्वज सहित गिराऊँ - १ - २७०।
इहिं गिरि पर कपिपति सुनियत है, बालि-त्रास कैसैं दिन जात - ९ - ६९।
कैसैं पुरी जरी कपिराइ। बड़े दैत्य कैसैं कै मारे, अंतर आप बचाई - ९ - १०५।
एक ऋषि जिन्होंने राजा सगर के साठ हजार पुत्रों को भस्म कर दिया था।
एक सफेद पक्षी जो पानी के किनारे रहता है।
सेना के एक व्यूह की रचना।
(क) नाथ सारंगधर, कृपा करि मोहिं पर, सकल अघ-हरन हरि गरुड़गामी–१ - २१४। (ख) इहाँ औ कासौं कैहौं गरुणगामी।
घंटा जिस पर गरुड़ की मूर्ति हो।
वह स्तंभ जिस पर गरुड़ की आकृति बनी हो।
गरुड़ के उपासक भक्त जो भारत में लगभग दो हजार वर्ष पूर्व रहते थे।
जिन स्रवननि जन की बिपदा सुनि, गरुड़ासन तजि धावै (हो) - १० - १२८।
गरू भए महि मैं बैठाये, सहि न सकी जननी अकुलानी - १० - ७८।
हरि सरि कटि तटि लरकि जाइ जिनि बिसद नितम्ब गरूर - २११९।
ओषधि बैद गररूरियो हरि नहिं मानै मंत्र दोहाई - २८३९।
बिच बिच हीरा लगे (नन्द) लाल गरे को हार - १० - ४०।
गरे परी- अनिच्छित वस्तु, अनचाही चीज। उ.- सूरदास गाहक नहिं कोऊ दिखिअत गरे परी - ३१०४।
वह व्यक्ति जो भेड़ें पालता हो।
मुकुट सिर धरैं, बनमाल कौस्तुभ गरैं - ४ - १०।
राजा कौन बड़ौ रावन तैं गर्बहिं गर्व गरै - १ - ३५।
दोहरी रस्सी जो पशुओं के गले में डाली जाती है, पगहा।
एक वैदिक ऋषि जो आंगिरस भरद्वाज के वंशज और ऋग्वेद, छठे मंडल के सैंतालीसवें सूक्त के रचयिता माने जाते हैं।
नंद जी के पुरोहित का नाम।
गर्ग निरूपि कह्यौ सब लच्छनु, अबिगत हैं अबिनासी - १० - ८७।
मनहुँ सिंह की गर्ज सुनत, गोबच्छ दुखित तनु डोलत - ३४२०।
मोहिं बर दियो देवनि मिलि, नाम धरयौ हनुमंत। अंजनि कुँवर राम कौ पायक, ताकैं बल गर्जत–९-८३।
गरजता है, गंभीर शब्द करता है।
गर्जन औ तरपन मानो गो पहरक में गढ़ लेइ - १० उ. - १६८।
गर्जन-तर्जन - तड़प। डाँटडपट।
[सं. गर्जन+हिं (प्रत्य.)]
मतलब, काम, स्वार्थ कामना।
या रथ बैठ बंधु की गर्जहिं पुरवै को कुरु-खेत १ - १ - २९।
गंभीर ध्वनि करके, भीषण रूप से गरज कर।
इतने में मेघन गर्जि बृष्टि करि तनु भीज्यो मों भई जुड़ाई - २८८५।
गर्द उड़ाना- नष्ट करना।
गर्द झड़ना- मार की परवाह न करना।
गर्द फाँकना- मारे मारे घूमना।
गर्द को पहुँचना- बराबरी न कर सकना।
गर्द होना- (१) तुच्छ ठहरना। (२) नष्ट होना।
हय गयंद उतरि कहा गर्दभ-चढ़ि धाऊँ - १ - १६६।
सूरदास लै जाउँ तहाँ जहँ रघुपति कंत तुम्हार - ६ - ८६।
छीर सिंधु अहि सयन मुरारी। प्रभु स्रवननि तहँ परी गुहारी। तब जान्यौ कमला के कंता। दनुज भार पुहुनी में भंता - २४५६।
(क) सीस सेली कंस मुद्रा कनक बीरी बीर। बिरह भस्म चढ़ाइ बैठी सहज कंथा चीर - ३१२६।
(ख) सृ गी मुंद्रा कनक खपर करिहौं जोगिन भेष। कंथा पहिरि विभूति लगाऊँ जटा बँधाऊँ केस - २७५४।
(ग) वे मारे सिर पटिया पारे कंथा काहि उढ़ाऊँ - ३४६६।
दक्षप्रजापति की एक कन्या।
पुरइन कपिस निचोल बिबिध सँग बिहँसत सचु उपजावै। सूरस्याम आनंन-कंद की सोभा कहत न आवै।
भक्ति के बस स्याम सुन्दर देह धरे आवैं। नंदघरनि बाँधि बाँधि कपी ज्यौं नचावैं - ३९४।
गर्ब प्रहारयौ- घमंड चूर कर दिया, गर्व तोड़ दिया। उ. - ग्वालनि हेत धरयौ गोबर्धन, प्रगट इंद्र कौ गर्ब प्रहारयौ - १ - १४।
जिसका गर्व नष्ट हो गया हो, गर्वरहित, गर्वहीन।
करुनामय जब चाप लियौ कर, बाँधि सुदृढ़ कटिचीर। भूभृत सीस नमित जो गर्बगत, पावक सींच्यौ नीर - ९ - २६।
[सं. गर्व+गत=रहित (प्रत्य.)]
गर्व का नाश करनेवाला, अभिमान तोड़नेवाला, गर्वनाशक।
जाको बिरद है गर्बप्रहारी, सो कैसैं बिसरैं - १ - ३७।
गर्व ही गर्व, बहुत अधिक घमंड।
[सं. गर्व+हिं=(प्रत्य.) + गर्व]
ब्रह्म बाण तैं गर्भ उबारयौ, टेरत जरी जरी - १ - १६।
पति या प्रेमी जिससे गर्भ रहे।
वह काल जब स्त्री गर्भवती हो।
फूलों के पतले सूत जिनसे पराग का मेल होने पर फल और बीज पुष्ट होते हैं।
मंदिर की वह कोठरी जिसमें मुख्य प्रतिमा हो।
जन्मकाल से साथ रहनेवाला (रोग आदि)।
फूल के भीतरी पत्ते जिनमें गर्भकेसर हो।
नाटक के अंक का वह भाग जिसमें केवल एक दृश्य होता है।
पेट का वह स्थान जिसमें बच्चा रहता है।
काव्य में अतिरिक्त वाक्य-दोष।
एक संचारी भाव जिसके अनुसार अपने को दूसरों से बड़ा समझा जाता है।
गर्ववंत सुरपति चढ़ि आयो। बाम करज गिरि टेकि दिखायौ।
[सं. गर्ववान का बहु. गर्ववंतः]
गर्व या अभिमान करना, घमंड दिखाना।
गर्व करने लगी, घमंड दिखाने लगी।
कहा तुम इतनेहि को गर्वानी। जोबन रूप दिवस दसही को ज्यों अँजुरी को पानी।
गर्व किया, घमंड दिखाने लगा।
यह सुनि हर्ष भयो गर्वानो जबहिं कही अक्रूर सयानी—२४६९।
(क) हस्ती देखि बहुत मन-गर्वित, ता मूरख की मति है थोरी–१-३०३। (ख) सूर सरस सरूप गर्वित दीपकावृत चाइ-सा. १८।
वह नायिका जिसे रूप, गुण आदि का गर्व हो।
जिनि वह सुधा पान मुख कीन्हों वे कैसें कटु देखत। त्यों ए नैन भए गर्वीले अब काहे हम लेखत।
[सं. गर्व+हिं. ईला (प्रत्य.)]
गगन शिखर उतरै चढ़ै गर्वै जिय धरई -२८६१।
जिसकी निंदा की जाय, निंदित।
[सं. गल+यंत्र या पं. जंदरा]
[सं. गल+यंत्र या पं. जंदरा]
वह रस्सी जिससे दो बैलों के गले बाँधे जायँ।
गले का हार, सदा साथ रहनेवाला व्यक्ति।
गल गाजना- हर्षित होना।
गल गाजै- गरजते हैं। उ.- ध्वजा बैठि हनुमत गल गाजै, प्रभु हाँकैं रथ यान - १ - २७५।
गल गाजि- (१) हर्षित होकर। उ. - धाये मब गलगाजि कै ऊधो देखो जाइ - ३४ ४३। (२) क्रोध से गरज कर। उ.- खंभ फारि, गल गाजि मत्त बल, क्रोधमान छबि बरन न आई - ७ - ४।
गाय के गले का निचला भाग, झालर।
जोर से बोलना, भारी शब्द करना।
लोहे की झूल जो युद्ध में हाथियों को पहनायी जाती है।
ऐसे व्यक्ति की सम्पत्ति जिसके कोई सन्तान न हो।
चक्कर मारता या लुढ़कता हुआ।
गलबल सब नगर परयौ प्रगटे जदुबंसी। द्वारपाल इहै कहै जोधा कोउ बच्यौ नहीं, काँधे गजदंत धारे सूर ब्रह्म अंसी - २६१०।
गले में बाह डालना, कंठालिंगन।
शिवभक्तों को गालबजाने की मुद्रा।
जीभ की तरह का मांस का टुकड़ा जो जिह्वा की जड़ के पास रहता है।
छोटा तकिया जो गाल के नीचे रखा जाता है।
बकरियों के गले के थन जो व्यर्थ होते हैं।
सफेद रंग का जमा हुआ एक सुगन्धित द्रव जो जलाने से जलता है और खुला रहने पर हवा में उड़ जाता है।
[सं. कर्पूर, पा. कप्पूर, जावा कापूर]
कबूतर की तरह अत्याचार सहन करना।
नृत्य या अभिनय में कपोल की क्रिया अथवा चेष्टा।
बकरी के गले के स्तन या थन जिनमें दूध नहीं होता।
[सं. गलस्तन, पा, गलत्थन, गलथन]
व्यर्थ हानि होना, बेकार हो जाना, कुछ स्वार्थ न निकलना।
गला काटना- (१) मार डालना। (२) बहुत दुख देना। (३) अन्याय से माल हड़प लेना। (४) बुराई करना।
गला घुटना- (१) दम घुटना। (२) बड़े कष्ट का जीवन व्यतीत करना।
गला छूटना- झंझट से पीछा छूटना।
गला दबाना (घोटना)- (१) गला दबाकर मार डालना। (२) अनुचित दबाव डालना।
गला फाड़ना- बहुत जोर से चिल्लाना।
गला बँधना- मजबूर हो जाना।
गले का हार- बहुत प्यारा।
गले पड़ना- (१) न चाहने पर भी कोई भार माथे मढ़ा जाना। (२) भोगने या सहने को तैयार होना।
गले मढ़ना- (१) इच्छा के विरुद्ध देना या सौंपना। (२) इच्छा के विरुद्ध विवाह कर देना।
गले लगाना—(१) आलिंगन करना। (२) इच्छा के विरुद्ध सौंपना।
कपड़े का भाग जो कंठ पर रहता है।
बर्तन का भाग जो उसके मुँहड़े के नीचे होता है।
पिघलाना, नरम या द्रव करना।
पिघलाकर धीरे धीरे लुप्त या क्षय करना।
(रुपया) व्यर्थ खर्च करना।
दुख या पछतावे की लज्जा या खिन्नता।
प्रयोग या उपयोग के कारण जो चुस्त या कठिन न हो, जिसका बहुत उपयोग हो चुका हो।
दान लैहौं सब अंगनि कौ। अति मद गलित तालफल ते गुरु जुगल उरोज उतंगनि कौ।
बिखरा हुआ, अस्तव्यस्त साज-शृंगारवाला।
छूटी लट छूटी नकबेसरि मोतिन की दुलरी। अरुन नैन सुख सरद निसा-कर कुसुम गलित कबरी–२१०६।
सुधि न रही अति गलित गात भयो जनु डसि गयौ अह्यौ–२५६७।
वह स्त्री जिसका यौवन ढल गया हो।
सो रस गोकुल-गलिनि बहावैं - १० - ३।
आजु मेरी गली होके करत बंसी सोर - सा. ६१।
गली गली फिरना- (१) जीविका के लिए भटकना। (२) बहुत साधारण होना।
ऊन या सूत का मोटा बिछौना जिस पर रंग - बिरंगे बेल-बूटे हों।
मैला-कुचैला, बुरी दशा को प्राप्त।
[अ. ग़लीफ़ा=मैला या अशुद्ध]
डींग, बढ़ बढ़कर बातें करना।
[हिं. गाल या गल्प अथवा फ़ा. गिला]
अन्न जो एक बार चक्की में पिसने के लिए डाला जाय, मुट्ठी भर अन्न, कौरी।
गवँ से- (१) घात या अवसर देखकर। (२) चुपचाप, धीरे से।
एक बंदर जो श्रीराम की सेना में था।
अब हरि क्यौं बसैं गोकुल गवई–३३०४।
एक बंदर जो श्रीराम चंद्र की सेना में था।
नल-नील-द्विविद-केसरि गवच्छ। कपि कहे कछुक, हैं बहुत लच्छ - ९ - १६६।
तहाँ गवन प्रभु सूरज कीन्हो - २६४३।
वधू का पहिली बार पति के घर जाना, गौना।
छाँड़ि सुखधाम अरु गरुड़ तजि साँवरौ पवन के गवन तैं अधिक धायौ - १ - ५।
वधू का पति के घर पहली बार जाना, गौना।
वधू का पहली बार पति के घर जाना।
प्रस्थान किया, (अन्य स्थान को) गयीं।
(क) गृह-गृह तैं गोपी गवनीं जब - १० - ३२। (ख) मुरली सब्द सुनत बन गवनी पति सुत गृह बिसराये - ३०६०।
गये, चले गये, यात्रा की, प्रस्थान किया।
(क) पठवौ दूत भरत कौं ल्यावन, बचन कह्यौ बिलखाई। दसरथ-बचन राम बन गवने, यह कहियौ अरथाइ - ९ - ४७। (ख) जब तैं तुम गवने कानन कौं भरत भोग सब छाँडे–९ - १५४।
एक बानर जो श्रीराम की सेना में था।
सूरदास तेहिं बनिज कवन गुन मूलहु माँझ गवाँए–३२०१।
बचन कठोर कहत कहि दाहत अपनो महत गवाँवत - ३००८ |
सखियनि संग गवाइ, बहु बिधि बाजे बजाइ - १० - ४१।
एक बानर जो श्रीराम की सेना में था।
गवाकर, गाने के लिए प्रेरित करके।
गावत हँसत गवाय हँसावत, पटकि पटकि करतालिका -९०९।
गवाह का बयान, साक्षी का कथन, साक्ष्य।
कई व्यक्तियों के पास भेजा जानेवाला (पत्र आदि।
गठी हुई बुनावट का (कपडा)।
[सं. ग्रास, प्रा. गास, गस्स]
(क) मकराकृत कुंडल छबि राजति लोल कपोलै - ३१२९।
(ख) चंदन मिटाये तनु अति ही अलसात नागरी की पीक लगी तो कपोलो - १९५९।
खाँसने-थूकने से निकलने वाली लसदार चीज, बलगम।
परमारथ उपचार करत हौ बिरह-बिथा है जाहि। जाकौ राजरोग कफ बाढ़त दह्यौ खवावत ताहि - ३१४५।
लोहे का टुकड़ा जो चकमक से आग झाड़ने के काम आता है।
वस्त्र जो शव पर लपेटा जाता है।
साधुओं के पहनने का बिना सिला कपड़ा, जिसमें सिर डालने के लिए एक बड़ा छेद होता है।
(क) पारथ बिमल बभ्रुबाहन कौं सीस-खिलौना दीनौ। इतनी सुनत कुंति उठि धाई, बरषत लोचननीर। पुत्र-कबंध अंक भरि लीन्हौ, धरति न इक छिन धीर - १ - २९। (ख) परि कबंध भहराइ रथनि तैं, उठत मनौ झर जागि - ९ - १५८।
एक राक्षस जिसके पेट में मुँह था। यह श्रीरामचन्द्र जी द्वारा दंडकारण्य में पराजित हुआ था। हाथ, पैर काट कर इन्होंने उसे जीता ही भूमि में गाड़ दिया था।
मारग में कबंधरिपु मारयौ सुरपति काज सँवारयौ - सारा. - २७१।
[हिं. गाना+ऐया (प्रत्य.) अथवा गावना]
[हिं. गाँव+ऐहा (प्रत्य.)]
[हिं. गाँव+ऐहा (प्रत्य.)]
गाय से प्राप्त दूध, दही, घी, गोबर आदि पदार्थ।
पंचगव्य - गाय से मिलनेवाले पाँच पदार्थ–दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र।
उत्साह या उमंग से भरा हुआ।
पकड़ता, रोकता या ग्रहण करता है, थामता है।
चिरजीवौ सुकुमार पवन-सुत, गहति दीन ह्वै पाइ - ९८३।
पकड़ने अथवा ग्रहण करने (के लिए), धरने या थामने (के लिए)।
क) इंद्र-मय मानि, हय गहन सुत सौ कह्यौ, सो न लै सक्यौ, तब आप लीन्हौं - ४-११ (ख) सकल भूषन मनिनि के बने सकल आँग, बसन बर अरुन सुंदर सुहायौ। देखि सुर असुर सब दौरि लागे गहन, कह्यौ मैं बर बरौं आप भायौ-८८
प्रफुल्लित होकर, उमंग से भरा हुआ।
बायस गहगहत सुभ बानी बिमल पूर्व दिसि बोलै। आजु मिलाओ स्याम मनोहर तू सुनु सखी राधिके भोले - १० उ. - १०६।
खूब घिरता हुआ, बड़ी धूमधाम और जोरशोर के साथ।
गहगहात किलकिलात अंधकार आयौ। रवि कौ रथ सूझत नहिं, धरनि गगन छायौ - ९-१३९।
बड़ी प्रफुल्लता या उमंग के साथ, अच्छी तरह।
बाजन बाजैं गहगहे (हों), बाजैं मंदिर भेरि - १० - ४०।
सानंद, प्रफुल्लित, उत्साहित।
माधव जू आवनहार भये। अंचल उड़त मन होत गहगहो फरकत नैन खये।
पकड़ते, रोकते या ग्रहण करते ही, थामते ही।
रिपु कच गहत द्रुपदतनया जब सरन सरन कहि भाषी। बढ़ै दुकूल-कोट अंबर लौं, सभा माँझ पति राखी - १२७।
(क) छवि तरंग सरितागन लोचन ए सागर जनु प्रेम धार लोभ गहनि नीके अवगाही।
(ख) हरि पिय तुम जिनि चलन कहो। यह जिनि मोहिं सुनावहु। बलि जाउँ जिनि जिय गहनि गहो - २४५५।
तुम जानकी, जनकपुर जाहु। कहा आनि हम संग भरमिहौ, गहबर बन दुख-सिंधु अथाहु - ९ - ३४।
(क) कत हौ गहर करत बिन काजैं, बेगि चलौ उठि धाइ - १० - २०।
(ख) गहर जनि लावहु गोकुल जाइ। तुमहिं बिना ब्याकुल हम होइहैं यदुपति करी चतुराई।
(ग) गहर करत हमको कहा मुख कहा निहारत - २५७६।
[हिं. घड़ी, घरी ; अथवा सं. ग्रह ; अथवा फ़ा. गाह=समय]
देहो दधि कौ दान नागरी गहर न लाओ चित्त-सारा. ८७९।
[हिं. घड़ी, घरी ; अथवा सं. ग्रह ; अथवा फ़ा. गाह=समय]
जिसकी थाह सरलता से न मिले।
बड़ो पर्व रवि गहन कहा कहौं तासु बड़ाई - १० उ. - १०५।
एकै गहन धरी उन हठ करि मेटि बेद बिधि नीति - ३४७८।
गहरा असामी- बड़ा धनी।
गहरा हाथ मारना- (१) पूरा वार करना। (२) बहुत धन पा जाना। (३) बड़े मूल्य या काम की चीज पाना। (४) मजबूत, दृढ़। (५) गाढ़ा, जो पतला न हो।
गहरी घुटना (छानना)- (१) बहुत मेल-जोल होना। (२) घुलघुल कर बातें होना।
नाराज हुई, रूठ गयी, अप्रसन्न हुई।
अधर कंप, रिस भौंह मरोरयौ, मन ही मन गहरानी - १८६५।
झगड़ा करके, रूठ कर, खीझकर।
तुम सौं कहत सकुचत महरि। स्याम के गुन नहीं जानति जात हम सों गहरि - ८६०
(क) सूर एक पल गहरु न कीन्हयौ किहिं जुग इतौ सह्यौ - १ - ४९।
(ख) माखन बाल गोपालहिं भावै। भूखे छिन न रहत मन मोहन, ताहि बदौं जो गहरु लगावै–१० - २३५।
(ग) ऊधौ ब्रज जिनि गहरु लगावहु - २९२६।
(घ) नव और सात बीस तोहिं सोभित काहे गहरु लगावति - सा. उ. - ११।
[हिं. घड़ी, घरी अथवा फा. गाह=समय]
निज पुर आइ, राइ भीषम सौं, कही जो बातैं हरि उचरी। सूरदास भीषम परतिज्ञा, अस्त्र गहावन पैज करी - १ - २६८।
[हिं. 'गहना' का प्रे. गहाना]
गहाती है, पकड़ाती है, थमाती है।
कबहुँक पल्लव पानि गहावै, आँगन माँझ रिंगावै–१० - १३०।
[हिं. ‘गहन'=पकड़ना का प्रे.]
रोककर, टेककर, पकड़कर, थामकर।
गहि सारँग, रन रावन जीत्यौ, लंक बिभीषन फिरी दुहाई - १ - १४।
जो तुम जोग सिखावन आए निर्गुन क्यों करि गहिए।—२९८७।
चित गहिबो- ध्यान में लाना, ख्याल करना, विचार में रखना। उ. - धोष बसत की चूक हमारी कछू न चित गहिबो - ३३१५।
फिरि फिरि वहइ अवधि अवलंबन बुड़त ज्यौं तृन गहियत - ३३००।
ग्रहण कीजिए, पकड़िए, अपनाइए, स्वीकारिए।
(क) दुख, सुख, कीरति, भाग आपनैं आइ परै सो गहियै - १ - ६२।
(ख) गऐं सोच आऐं नहिं आनँद ऐसौ मारग गहियै - २ - १८।
ये सब बचन सुने मनमोहन यहै राह मन गद्दियौ-१०-३१३।
कहौ तौ ताकौं तृन गहाइ कै, जीवत पाइनि पारौं–६-१०८।
पकड़ने का कार्य या भाव, पकड़।
(क) आजु जौ हरिहिं न सस्त्र गहाऊँ। तौ लाजौं गंगा जननी कौं, सांतनु सुत न कहाऊँ - १ - २७०। (ख) जो तुमरे कर सर न गहाऊँ गंगा-सुत न कहाऊँ - सारा. ७८०।
[हिं. ‘गहना' को प्रे. गहाना]
पकड़ने या थामने को प्रेरित करना।
पकड़ाया, धरने को प्रेरित किया।
अति कृपालु आतुर अबलनि कौं व्यापक अंग गहायौ - २९९८।
(क) सिखवति चलन जसोदा मैया। अरबराई कर पानि गहावत डगमगाई धरनी धरै पैया - १० - ११५।
(ख) सुफलकसुत ए सखि ऊधौ मिली एक परिपाटी। उनतौ वह कीन्ही तब हमसौं, ए रतन छँड़ाइ गहावत माटी–३०५६।
[हिं. गहना=पकड़ना का प्रे. ‘गहाना’]
सफेद रंग पर काले-पीले-लाल या काले-पीले-लाल रंग पर सफेद दाग वाला, चितकबरा।
अति सुदेस मृदु चिकुर हरत चित गुँथे सुमन रसालहि। कबरी अति कमनीय सुभग सिर राजति गोरी बालहि - पृ. ३४५ (४१)।
(क) कबहुँक तृन बूड़ै पानी मैं, कबहुँक सिला तरै - १ - १०५। (ख) इहिं आँगन गोपाल लाल कौ कबहुँक कनियाँ लैहौं–२५५०। (ग) कबहुँक कर करताल बजावत नाना भाँति नचावत - सारा. ४३८।
एक ढीला-ढाला कपड़ा जो प्रायः संत पहनते हैं।
जिसकी थाह सरलता से न मिले, अथाह।
जहाँ पानी ज्यादा हो, गहरा।
आगैं जाउँ जमुन-जल गहिरौ, पाछैं सिंह जु लागे-१०-४।
(क) दुस्सासन जब गही द्रौपदी, तब तिहिं बसन बढ़ायौ-१ ३२। (ख) भृकुटी सूर गही कर सारँग निकर कटाछनि चोट–सा. उ. १६।
घमंड में चूर रहनेवाली, अभिमानिनी।
(क) राधा हरि के गर्व गहीली–१३०९। (ख) हम तैं चूक कहा परी जिय गर्व गहीली-१७१५।
(ग) यह तौ जोबन रूप गहीली संका मानत हर की -पृ. ३१७ (६८)।
चित्र गुप्त सु होत मुस्तौफी, सरन गहूँ मैं काकी-१-१४३।
दूसरे के माल की रक्षा की मजदूरी।
क्रोध-दुसासन गहे लाज यह, सर्व. अंधगति मेरी-१-१६५।
किसी के द्वारा पकड़े या ग्रसे जाने पर।
ग्राह गहे गजपति मुकरायौ १-१०।
ऐसौ को जु न सरन गहे तैं कहत सूर उतरायौ -१-१५।
[हिं. गहना=पकड़ना+ एला (प्रत्य.)]
[हिं. गहना=पकड़ना+ एला (प्रत्य.)]
[हिं. गहना=पकड़ना+ एला (प्रत्य.)]
[हिं. गहना=पकड़ना+ एला (प्रत्य.)]
गहते हैं, रोकते हैं, पकड़ते हैं।
(क) गहैं दुष्ट द्रुपदी कौ सारँग, नैननि बरसति नीर - १ - ३३।
(ख).....चंद्र गहैं ज्यौं केत - १ - २९६।
सूरदास सब सुखदाता-प्रभु-गुन बिचारि नहिं चरन गहै - १ - ५३।
ग्रहण करता है, प्राप्त करता है।
और कछू विद्या नहिं गहै - ५ - ३।
[हिं. गहना+ऐया (प्रत्य.)]
मानने या स्वीकार करनेवाला।
[हिं. गहना+ऐया (प्रत्य.)]
बाबा नंदहिं पालागन कहि पुनि पुनि चरन गहोगे - २९३२।
सूरदास-प्रभु भक्त-कृपानिधि, तुम्हरे चरन गहौं - १ - १६१।
मैया री मैं चंद लहौंगो। कहा करौं जलपुट भीतर कौं, बाहर ब्यौंकि गहौंगौ - १० - १९४।
(क) सूर पतित तुम पतितउधारन, गहौ बिरद की लाज - १ - १०२।
(ख) अजहूँ सूर देखिबौ करिहौ, बेगि गहौ किन बाँह - १ - १७५।
अब तुम नाम गहौ मन नागर - १ - ९१।
पकड़ा, थामा, अंगीकार किया।
(क) स्याम गहयौ भुज सहज हीं क्यों मारत हमकौं–२५७७। (ख) सार कौ सार, सकल सुख कौ सुख, हनूमान-सिव जानि गहयौ - २ - ८।
सक्र कौ दान-बलि, मान ग्वारनि लियौ गहयौ गिरि पानि जस जगत छायौ–१ - ५।
कटि तट तून, हाथ सायक-धनु, सीता-बंधु-समेत। सूर गमन गह्वर कौ कीन्हौ जानत पिता अचेत - ९ - ३९।
अंधकारमय और अनजाना गूढ़ स्थान।
अति गह्वर मैं जाइ परी हम - २४३३।
गाँठ खुलना- समस्या या उलझन दूर होना।
गाँठ खोलना (छोरना)- उलझन मिटाना।
मन की गाँठ खोलना- (१) जी खोलकर बात करना (२) इच्छा पूरी करना।
मन में गाँठ करना (पड़ना)- बुरा मानना।
गाँठ पर गाँठ- (१) उलझन बढ़ना। (२) द्वेष बढ़ना।
कपड़े में कुछ लपेटकर लगायी हुई गिरह।
गाँठ काटना- (१) गाँठ काट लेना। (२) सौदे में ठगे जाना।
गाँठ करना- (१) अपने पास इकट्ठा करना। (२) याद रखना।
गाँठ का- अपना, अपने पास का।
गाँठ का पूरा- धनी।
गाँठ खोलना- अपने पास का धन खरचना।
(बात) गाँठ बाँधना- ध्यान रखना।
गाँठ में- पास में।
गाँठ से- पास से।
गाँठ की बनावट की चीज आदि।
डंठल या लकड़ी की तले ऊपर लगा हुआ ढेर।
मतलब गाँठना- काम निकालना।
गाँठ, गिरह, ग्रंथि, फंदा।
(क) बचन बाँह लै चलौं गाँठि दै, पाऊँ सुख अति भारी-१-१४६। (ख) अंचल गाँठि दयी दुख भाज्यौ सुख जु आनि उर पैठयौ-९-१६४।
कहा गाँठि को लागत- पास का क्या खर्च होता है, क्या जमा जथा खर्च होती है। उ. -इतनो कहा गाँठि को लागत जो बातनि जस पाइए-१६८८।
गाँठि परी- और जकड़ गयी, मामला पेचीदा हो गया। उ.-कठिन जो गाँठि परी माया की तोरी जाति न झटकैं -१-२९३।
गाँठि को- अपने पास की। उ.- सूर सुगंध गँवाइ गाँठि को रही बौरई मानि-१५७२।
किसी कपड़े में लपेटकर लगायी हुई गाँठ।
होतौ नफा साधु की संगति, मूल गाँठि नहिं टरतौ-१-२९७।
मुरली कौन सुकृत फल पाये।.....। मन कठोर तन गाँठि प्रगट ही, छिद्र बिसाल बनाये-६६१।
बटपारी, ठग, चोर, उचक्का गाँठिकटा, लाठबाँसी - १-१८६।
मेरो जिव गाँठी बाँधो पीतांबर की छोर -८८०।
गाँठी को- अपना, अपने पास का। उ.- हौं तो गयौ गुपालहिं भेंटन और खर्च गाँठी कौ-१० उ.-८७।
गाँठि दै राखति-छिपा कर या बंद करके रखती है। उ.–दधि माखन गाँठी द राखति करत फिरत सुत चोरी -१०-३२४
हाथ की कोहनी में पहनने का एक गहना।
तौ जानौं जौ मोहिं तारिहौ, सूर कूर कबि-ठोट - १ - १३२।
(२) एक प्रकार के अश्लील गीत जो होली में गाये जाते हैं।
सिंधु नद का पश्चिमी प्रदेश।
[सं. ग्राम, पा. गाम, प्रा. गावँ]
गँवई-गाँव - देहात। गाँव-गिराव - जमींदारी। गाँव मारना - डाका डालना।
अजहूँ नाहिं डरात मोहन, बचे कितने गाँस - १०-४२७।
जोबन दान लेहिंगे तुम सौं। चतुराई मिलवति है हम सौं। इनकी गाँस कहा री जानौ। इतनी कही एक जिय मानौ-११६१।
इतने सबै तुम्हारे पास। निरखि न देखहु अंग अंग अब चतुराई की गाँस -११३२।
नुकीला हथियार, छुरी, बर्छी।
भुजा धरे रज अंग चढ़ायौ, गाँस धरे हरि ऊपर आयौ-२६०६।
धृतराष्ट्र की पत्नी जो गांधार देश के राजा सुबल की पुत्री थी।
हरे रंग का एक बरसाती कीड़ा।
इत्र तेल बेचनेवाला, गंधी।
गुजराती वैश्यों की एक जाति।
गाँस करि राखी - ध्यान में रखी, मन में बैठा ली। उ.- तुम वह बात गाँस करि राखी, हम कहूँ गई भुलाई।
देखरेख में रखना, वश में करना, दबोचना।
सूरदास सोई पै जानैं जा उर लागै गाँसी- ३१३३।
प्रार्थना करने लगीं, स्तुति की।
राजरवनि गाईं ब्याकुल ह्वै, दै दै तिनकौं धीरक। मागध हति राजा सब छोरे, ऐसे प्रभु पर पीरक - १ - ११२।
एहि थर बनी क्रीड़ा गज-मोचन और अनंत कथा स्रुति गाई - १ - ६
प्रभु जू , यौं किन्ही हम खेती। बंजर भूमि, गाँउ हर जोते, अरु जेती की तेती - १ - १८५।
द्याऊँ तोहिं राज-धन-गाँऊँ - ४ - ९।
भलैं राम कौं सीय मिलाई, जीति कनकपुर गाउँ - ९ - ७५।
गा रहे हैं, मधुर स्वर से बोल रहे हैं।
कुसुमसर रिपु नंद बाहक हहर हरषित गाउ–सा. उ. - ४०।
प्रशंसता हूँ, बखानता हूँ, स्तुति करता हूँ।
सूर कूर, आँधरौ, मैं द्वार परयौ गाऊँ - १ - १६६।
सूरदास प्रभु की यह लीला निगम नेति नित गाऊ - १० - २२१।
गाये गये, सविस्तार वर्णित किये गये।
दीनबंधु हरि, भक्तकृपानिधि, बेद-पुराननि गाए (हो) - १.७।
जोर करैगो गाँसी- जबरदस्ती वश में करेगा, हठपूर्वक अधिकार या शासन जमायगा। उ.- पावैगो पुनि कियौ आपनो जोर करैगो गाँसी।
पारथ के सारथि हरि आप भए हैं। भक्त-बछल नाम निगम गाइ गये हैं-१-२३।
(क) माधो जू, यह मेरी इक गाइ। अब आज तैं आप आगैं दई, लै आइए चराइ-१-५१। (ख) माधो सखा स्याम इन कहि कहि अपने गाइ-ग्वाल सब घेरो-२५३२।
प्रशंसा या बड़ाई कीजिए, बखानिए।
हरि सुमिरत सुख होइ, सु हरि-गुन गाइयै - उ. - ३ - ११।
जन मन भयो सूर आनँद हरषि मंगल गाइबो - १० उ. - २४ (८)।
गाने से, वर्णन करने या बखानने से।
जो सुख होत गुपालहिं गाऐँ - २ - ६।
गागर, गागरा, गागरि, गागरी
(क) पुलकित सुमुखी भई स्याम-रस ज्यौं जल मैं काँची गगरि गरि - १० - १२०। (ख) ज्यौं जल माँह तेल की गागरि बूँद न ताको लागी - ३३३५।
(ग) मटकति गिरी गागरी सिर तैं अब ऐसी बुधि ठानति।
[सं. गर्गर, पा, गग्गर, हिं. गगरा]
बोरा या गद्दा जो पशुओं की पीठ पर रखा जाता है।
गाज पड़ना- बिजली गिरना, वज्रपात होना।
(किसी पर) गाज पड़ना- आफत आना।
(किसी बात पर) गाज पड़ना- समूल नष्ट होना।
गाज मारना- (१) वज्रपात होना। (२) आफत आना।
जिय गाज- जी में भय उत्पन्न होना, भयानक संकट पड़ना। उ.- चक्र धरे हरि आवहीं सुनि असुरन जिय गाज - १० उ.- ८।
(प्रसन्न होकर) हुंकारते हैं।
जिहिं जल तृन, पसु, दारु बूड़ि, अपनैं सँग औरनि पारत। तिहिं जल गाजत महावीर सब, तरत आँखि नहिं मारत - ९ - १२३
(क) रावन तब लौं ही रन गाजत। जब लौं सारँगधर कर नाहीं सारँग-बान बिराजत। तैसें सूर असुर आदिक सब सँग तेरे हैं गाजत - ९ - १३०। (ख) निसि दिन कलमलात सुन सजनी सिर पर गाजत मदन अर - २७६४।
गाजति बाजति-धूमधाम के साथ।
मुरली मोहे कुँवर कन्हाई।…...। गाजति-बाजति, चढ़ी दुहूँ कर, अपनैं शब्द न सुनत पराई–६५४।
गर्जन, हुंकार, जोर का शब्द, ध्वनि।
सुनत बन मुरली धुनि की बाजन। पपिहा गुंज कोकिल बन कूँजत, अरु मोरनि कियौ गाजन - ६२२।
आए गाजन- गरजने आये हैं, भयंकर ध्वनि करके डराने आये हैं।
ब्रज पर बदरा आये गाजन - २८१७।
लागे गाजन - गरजने लगे हैं।
ब्रज पर बहुरो लागे गाजन - १० उ. - ९९।
गलगाजना- (१) प्रसन्न होकर हुंकारना या किलकारी मारना। (२) क्रोध से गरजना।
सूरदास नागर बिन अब यह कौन सहै सिर गाजनु - २८७२।
धर्मयुद्ध करनेवाले इस्लामी वीर।
कमल कोस मैं आनि दुरायौ बहुरि दरस धौं होइ कबै—१३००।
साधु-संतों का जल पात्र जो दरियाई नारियल या तुमड़ी आदि का होता है।
उतै देखि धावै, इत आवै, अचरज पावै, सूर सुरलोक ब्रजलोक एक है रह्यो। बिबस ह्व हार मानी, आपु आयौ नकबानी, देखि गोप मंडली कमंडली चितै रह्यौ - ४८४।
[सं. कमंडलु + ई (प्रत्य.)]
साधु-संन्यासियों की जलपात्र जो प्रायः धातु, मिट्टी, तुमड़ी, दरियाई नारियल आदि का होता है।
रेशम, सूत या चमड़े का फंदा।
सबहिनि के सिर गाजी- सबको परास्त करके हर्षित हुई, सबको चुनौती देकर किलकारी भरी। उ.- सुफल भयो पछिलो तप कीन्हो देखि सुरूप काम-रति भाजी। जगत के प्रभु बस किये सूर सुनि सबहिं सुहागिन के सिर गाजी - ३०९४।
गरजा कर, चिल्लाया कर, बकाकर।
राखौ रोकि पाई बंधन कै, अरु रोकौ जल नाजु। हौं तौ तुरत मिलौंगी हरिकौं, घर बैठौ गाजु - ८०८।
(क) बिप्र सुदामा कों निधि दीन्हीं, अर्जुन रन मैं गाजैं - १ - ३६।
(ख) माई री ए मेघ गाजैं - २८१६।
गल गाजै- हर्षित होकर किलकारता है।
(किसी पर) गाजै- परास्त कर सकता है, चुनौती देता है, बहुत बढ़कर है। उ.- तेजप्रताप राइ केसो कौ तीनि लोक पर गाजै - २६३२।
प्रभु कब देखिहौ मम ओर। जान आपुन आपु ते गिरनाथ गाठी छोर - सा. उ. ४२।
साँप का विष झाड़ने वाला व्यक्ति।
सीधो बहुत सुरासुर नंदै गाड़ा भरि पहुँचायौ।
[सं. गर्त्त, प्रा. गड्ड]
[सं. गर्त्त, प्रा. गड्ड]
(क) भैया-बंधु कुटुंब घनेरे, तिनतैं कछु न सरी।…..। मरती बेर सम्हारन लागे, जो कछु गाड़ि धरी - १ - ७१। (ख) कबहूँ पाप करैं पावत धन, गाड़ि धूरि तिहिं देत - २ - १५।
(ग) सूर जोग-धन राख मधुपुरी कुबिजा के घर गाड़ि - ३००४।
[हिं. गाड़=गड्ढा, गाड़ना]
गढ़े में दबा दीजिए, तोपिए।
ये पांडव क्यौं गाड़िए, धरनीधर डोलैं - १ - २३८।
सवारी जिसे घोड़े या बैल खींचते हैं।
मोको बैरी भए कुटुँब सब फेरि फेरि ब्रज गाड़ी। जो हौं, कैसेहुँ जान पावती तौ कत आवत छाड़ी - २७०१।
कछु पढ़ि-पढ़ि कर, अंग परसि करि, विष अपनौ लियौ झारि। सूरदास प्रभु बड़े गारुड़ी, सिर पर गाड़ू डारि - ७५९।
[सं. गर्त्त, प्रा. गड्ड]
[सं. गर्त्त, प्रा. गड्ड]
[सं. गर्त्त, प्रा. गड्ड]
[सं. गर्त्त, प्रा. गड्ड]
गड्ढा खोद कर किसी चीज को मिट्टी आदि से दबा देना, तोपना।
गड्ढा खोद कर किसी चीज को इस तरह खड़ा करना कि वह मजबूती से जमी रहे।
किसी चीज को उसके नुकीले भाग की तरफ से धँसाना।
(किसी बात या रहस्य को) छिपाना या प्रकट न करना।
गाँडर घास जो मूज की तरह होती है।
गृह गृह प्रति द्वार फिरयौ, तुमकौं प्रभु छोड़े। अंध अंध टेकि चलै, क्यों न परै गाड़े - १ - १२४।
[सं. गर्त. प्रा. गड्ड, हिं. गाड़]
(क) उलटी गाढ़ परी दुर्बासैं दहत सुदरसन जाकौं - १ - ११३। (ख) डसी री माई स्याम भुजंगम कारे।...सूरस्याम गारुड़ी बिना को जो सिर गाढ़ उतारै।
(ग) जहँ-जहँ गाढ़ परै तहँ आवै - ९७०।
(घ) जब-जब गाढ़ परति है। हमकौ तहँ करि लेत सहैया - २३७४।
जिसके सूत खूब घने मिले हों।
हाथ के सूत को मोटा कपड़ा।
एती करबर हैं टरी, देवनि करी सहाय। तब तैं अब गाढ़ी पड़ी, मोकौं कछु न सुझाइ–५८९।
धेनु दुहत अतिहीं रति बाढ़ी। मोहन कर तैं धार चलति, परि मोहनि मुख अति ही छबि गाढ़ी–७३६।
मानहु मेघ घटा अति गाढ़ी - १० - उ. - २।
बढ़े-चढ़े, घोर, कठिन, विकट।
सूर उपँग-सुत बोलत नाहीं अति हिरदै हैं गाढ़े - २९६९।
गाढ़े की कमाई- मेंहनत से कमाई हुई दौलत।
गाढ़े के मीत, साथी या संगी- संकट समय के मित्र, विपत्ति में साथ देनेवाले। उ.- गोबिंद गाढ़े दिन के मीत। गज अरु ब्रज, प्रहलाद, द्रौपदी, सुमिरत ही निहचीत - १ - ३१।
गाढ़े दिन- संकट के दिन, विपत्ति-काल।
गाढ़े में- विपत्ति या संकट के दिनों में।
(क) पहुँची आइ जसोदा रिस भरि, दोउ भुज पकरे गाढ़े - ४१३। (ख) हार सहित अँचरा गह्यो गाढ़े एक कर गह्यौ मटुकिया मेरी।
हमारे निर्धन के धन राम। चोर न लेत, घटत नहिं कबहूँ, आवत गाढ़ैं काम - १.९२।
दृढ़ता से, जोर से, मजबूती से।
(क) इक कर सौं भुज गहि गाढ़ै करि, इक कर लीन्ही साँटी - १० २५५। (ख) दोउ भुज धरि गाढ़ै कर लीन्हें, गई महरि के आगैं - १० - ३१७।
(ग) लिए लगाइ कठिन कुच कौं बिच, गाढ़ैं चापि रही अपनैं कर - १० - ३०१।
अच्छी तरह, भली भाँति, खूब, ऊँचे (स्वर) से।
बरजति है घर के लोगनि कौं हरुऐ लै लै नामहिं। गाढ़ैं बोलि न पावत कोऊ डर मोहन बलरामहिं –५१५।
गहरा, गूढ़, बहुत अधिक, खूब बढ़ा हुआ।
(क) गाढ़ो मान दूरि करि डारयौ हरष भई मन बाम–२१५१। (ख) बहुरि सखी सुफलक सुत आयौ परयौ संदेह जिय गाढ़ौ - २९७१।
(ग) नाम सुदामा कहत नाथ जो दुखी अहि अति गाढ़ो - १० उ. - ७७।
(क) सुनियत हैं, तुम बहु पतितनि कौं, दीन्हौ है सुखधाम। अब तौ आनि परयौ है गाढ़ौ सूर पतित सौं काम - १ - १७९।
(ख) इत पारथ गांगेय बली उत जुरो जुद्ध अति गाढ़ौ - सारा. ७८१।
(क) ग्राह गह्यौ गज बल बिनु ब्याकुल, बिकल गात गति लंगी। धाइ चक्र लै ताहि उबारयौ, मारयौ ग्राह बिहंगी - १ - २१। (ख) सूरदास प्रभु बोलि न आयौ प्रेम पुलकि सब गात - २५३१।
पाये जानि सकल सुनि मधुकर जे गुन साँवरे गातन - ३०२५।
नैन अलसात अति, बार-बार जमुहात, कंठ लगि जात, हरषात गाता - ४४०।
चद्दर जो शरीर या गले में बाँधी-लपेटी जाय।
सारी सुभग काछ सब दिये। पाटंबर गाती सब दिये।
गाती या चादर शरीर के चारो ओर लपेटकर गले में बाँधने का ढंग।
(हरि) पतित-पावन, दीनबन्धु अनाथनि के नाथ। संतत सब लोकनि स्रुति, गावत यह गाथ - १ - १८२।
तब बोले जगदीस जगतगुरु सुनो सूर मम गाथ। तू कृत मम जस जो गावैगौ सदा रहै मम साथ - सारा.११०४।
रचना जिसमें दान, यज्ञ आदि का वर्णन हो।
एक प्राचीन भाषा जिसमें पाली और संस्कृत के विकृत शब्द-रूप रहते थे।
गदगद बचन नैन जल पूरित बिलखि बदन कृस गाते - ३४६१ और सा. उ. - ४६।
पोषे नहिं तुव दास प्रेम सौं, पोष्यौ अपनो गात्र - १ - २१६।
हाथी के अगले पैरों का ऊपरी भाग।
सूर स्याम हौं ठगी महानिसि पढ़ि जु सुनाये प्रात के गाथ - २७३६।
तरल पदार्थ की निचली गाढ़ी चीज, तलछट।
[सं. कातर या कदर्य, प्रा. कादर]
(क) राधे सो रस बरनि न जाई। जा रस को सुर भान सीस दियो सो तैं पियौ अकुलाई। पचि हारे सब बाल कमलमुख चंद्र बदन ठहराई। अजहुँ कमंध फिरत तेहि लालच सुंदरि सैन बुझाई - १२३५। (ख) मन हठ परयौ कमंध जोधा लौं हारेहु नाहीं जीति–३२३७।
प्राय: नहीं, बहुत थोड़ा, कदाचित ही।
(क) बासुकी नेति अरु मंदराचल रई, कमठ मेँ अपनी पीठ धारौं–२ - ८।
(ख) मथि समुद्र सुर असुरन के हित मंदर जलधि धसाऊ। कमठ रूप धरि धरयौ पीठि पर तहाँ न देखे हाऊ - १० - २२१।
पुराने ढंग का एक बाजा जिस पर चमड़ा मढ़ा जाता था।
विश्वामित्र के पिता जो कुशिक राजा के पुत्र थे।
गाधितनय, गाधिपुत्र, गाधिसुत
[सं. कातर या कदर्य, प्रा. कादर]
[सं. कातर या कदर्य, प्रा. कादर]
परे रहत द्वारे सोभा के वोई गुन गनि गानत - पृ. ३२८।
ग्वालन संग रहत जे माई, यह कहि कहि गुन गानति - १८०५।
ताल, स्वर के ध्यान से मधुर ध्वनि निकालना।
विस्तार के साथ वर्णन करना।
अपनी गाना- (१) अपन दुखड़ा रोना। (२) अपनी बात कहना।
अपनी ही गाना- अपने मतलब की कहना।
पेड़ के डंठल के बीच का भाग या हीर।
लिहाफ आदि से निकली हुई पुरानी रुई।
मादा पशु जिसके पेट में बच्चा हो।
[सं. गर्भिणी, पा. गब्भिणी]
सुभ दिन हरि आये निज धाम। तौलों घर घर प्रति दुर्गा कौ पूजन कियौ सब गाम - सारा - ६५१।
तेहि समय सुख स्याम स्यामा सूर क्यों कहै गानि - पृ. ३४३ (१२)।
वर्णन की, गायी, सविस्तार कही।
(क) तब पठयौ ब्रज-दूत, सुनी नारदमुख-बानी। बार-बार रिषि-काज, कंस अस्तुति मुख गानी - ५८९। (ख) जो तुम अंग अंग अवलोक्यौ धन्य धन्य मुख अस्तुति गानी–१३१९।
ताही के जाहु स्याम जाके निसि बसे धाम मेरे गृह कहा काम सूरदास गाने - १९५२।
बार बार स्याम राम अक्रूरहि गानै। अबहिं तुम हरष भए तबहिं मन मारि रहे, चले जात रथहिं बात, बूझत हैं बानै - २५५७।
गाया, बखान किया स्तुति की।
गुरु की कृपा भई जब पूरन तब रसना कहि गान्यौ - पृ. ३५० (५७)।
तिनको कौन परेखो कीजै जे हैं गरुड़ के गामी - ३०८०।
गाय की तरह काँपना- बहुत डरना, थर्राना।
गाय का बछिया और बछिया का गाय के तले करना- थोड़े में काम चलाने के लिए हेरा-फेरी करना |
बहुत सीधा आदमी, दीन मनुष्य।
नंद महर को गारी गाय - २४०९।
निकम्मा, बेकार, गया-गुजरा, रद्दी।
तिन गायत्री सुने गर्ग सों प्रभु गति अगम अपार - २६२९।
स्तुति की, बखान किया, प्रशंसा की।
(क) कोपि कौरव गहे केस जब सभा मैं, पाँडु की बधू जस नैंकु गायौ। लाज के साज मैं हुती ज्यौं द्रौपदी, बढ़यौ तन-चीर नहिं अंत पायौ - १ - ५। (ख) सरन गए राखि लेत सूर सुजस गायौ १ - २३।
गायौ-घृत भरि धरी कटोरी - ३९५।
पानी या रस निकालना या निचोड़ना।
गायन घर घर घेर चरावत लोभ नचावन हारे - सा. उ. - ८।
चुपके से, धीरे धीरे, अनुपस्थिति में।
तन [देह या शरीर] गारना- तप करना जिससे शरीर गले या कष्ट हो।
फालसे की जाति का एक जंगली फल।
गाढ़ा चूना या मिट्टी जो जोड़ाई या पलस्तर के काम आता है।
नीची भूमि जिसमें पानी न टिके।
निकालना, त्यागना, दूर करना।
तन (तनु) गारि- तप द्वारा शरीर को कष्ट देकर या गला कर। उ.- (क) तब तन गारि बहुत स्रम कीन्हो सो फल पूरन दैन। (ख) सरद ग्रीसम डरत नाहीं, करति तप तनु गारि - ७८१।
नष्ट करके, खोकर मिटाकर, समाप्त करके।
ससि-गन गारि रच्यौ बिधि अनन, बाँके नैननि जोहै - १० - १५८।
कामना करने या चाहने योग्य।
[फ़ा. कमान+हिं. ऐत (प्रत्य.)]
तीर चलाने की कला या विद्या, धनुर्विद्या।
एक पेड़ जिसके फल खटमिट्टे होते हैं, कमरंग।
[सं. कर्मरंग, पा. कम्मरंग]
बंस निर्बस करि डारिहौं छिनक मैं गारि दै दै ताहि त्रास दीन्हो - २६०२।
उत्सवों में गाये जाने वाले गीत जिनमें दी हुई गाली प्रिय लगती है।
(क) गावत नारि गारि सब दै दै - ९ - २५।
(ख) सजन प्रीतम नाम लै लै दै परस्पर गारि - १० - २६।
गीत जो उत्सवों में गाये जाते हैं जिनमें दी हुई गाली प्रिय लगती हैं, उत्सवों में गायी जानेवाली गालियाँ।
आईं जुरि जुवती दूहूँ दिसि मनों देति आनँद गारियाँ - पृ. ३४८ (४)।
(क) गारी देहि प्रात उठि मोकौ सुनत रहत यह बानी - २९३६। (ख) नारी गारी बिनु नहिं बोलै पूत करै कलकानी। घर में आदर कादर कोसौं खीझत रैन बिहानी।
क) सूर स्याम इहिं बरजि कै मेट्यो अब कुल-गारी हो - १ - ४४। (ख) खीझ कह्यो ताहि क्यों इहाँ ल्यायौ मुझे मम पिता-मात कौ लगै गारी - १० उ. - ५६।
गारी आवै (पड़े, लगे)- कलंक लगता है, लांछन लगता है। उ.- लोचन लालच भारी। इनके लए लाज या तन की सबै स्याम सौं हारी। बरजत मात पिता पति बांधव अरु आवै कुल गारी। तदपि रहत न नंद नँदन बिनु कठिन प्रकृति हठ धारी।
हाथ रहेगी गारी- गाली देकर व्यर्थ ही पछताना होगा। उ.- अब दुख मानि कहा धौं करिहौ हाथ रहैगी गारी-२९३८।
गारी लाना- कलंक या दाग लगाना।
एक गीत जो उत्सवों में स्त्रियाँ गाती हैं जिनमें दी हुई गालियाँ प्रिय लगती हैं।
निर्भय अभय-निसान बजावत, देत महर कौं गारी-१०-४।
कीन्हो तनु गारी- तप करके या कष्ट सहकर, सारा शरीर गला कर। उ.- (क) ब्रतसाधति नीकैं तन गारी–७९९। (ख) षटरितु तप कीन्हो तनु गारी-१००५।
मंत्र जिसका देवता गरुड़ हो, साँप का विष उतारने का मंत्र
आवति लहर मदन बिरहा की को हरि बेगि हँकारै। सूरदास गिरिधर जौ आवहिं हम सिर गारुड़ डारै-३२५४।
मंत्र से साँप का विष उतारनेवाला, साँप झाड़नेवाला।
(क) कृष्न सुमंत्र जियावन मूरी जिन जन मरत जिवायौ। बारंबार निकट स्रवनन ह्वै गुरु गारुड़ी सुनायौ-२-३२। (ख) औरै दसा भई छिन भीतर, बोले गुनी नगर तैं। सूर गारुड़ी गुन करि थाके, मंत्र न लागत थर तैं- ७४४।
(ग) चले सब गारुड़ी पछिताइ। नैकुहूँ नहिं मंत्र लागत समुझि काहु न जाइ–७४५।
(घ) डसी री स्याम भुअंगम कारे।…..। सूर स्याम गारुड़ी बिना को, जो सिर गाढ़ उतारे-७४७।
मंत्र से साँप पकड़नेवाला, सँपेरा।
उ. - डसी री माई स्याम भुअंगम कारे।….। आनहु बेगि गारुरी गोबिंदहिं जो यहि बिषहिं उतारै।
तनु गारै- शरीर गलाती या क्षीण करती हैं। उ.- नैनन ते बिछुरी भौहैं भ्रम ससि अजहूँ तन गारै - ३१८९।
(क) छुद्रु पतित तुम तारि रमापति, अब न करौ जिय गारौ - १ - १३१। (ख) बिदुर दास के भोजन कीन्हौ, दुरजोधन कौ मेट्यो गारौ - १ - १७२।
(ग) देखत बल दूरि करयौ मेघनाद गारौ।
(घ) हमको नँदनंदन को गारो - ६८७।
(ङ) बात सुनत रिस भरयौ महावत तुमहि कहा इतनो रे गारो २५९०।
जो मेरो लाल खिझावै। सौ अपनो कियो फल पावै। तेहि दैहौं देस-निकारो। ताको ब्रज नाहिंन गारो - १०-१८३।
गलाओ, गलाकर समाप्त करो, तप द्वारा क्षीण करो।
(क) राम-नाम सरि तऊ न पूजैं, जौ तन गारौ जाइ हिवार - २ - ३। (ख) जप-तप करि तनु अब जनि गारौ - ७९७।
कहौ तौ परबत चाँपि चरन तर, नीर-खार मैं गारौं–९-१०७।
गर्ग गोत्र की एक प्रसिद्ध विदुषी।
याज्ञवल्क्य की एक स्त्री।
नष्ट किया, खोया, बरबाद किया।
आछौ जनम अकारथ गारयौ। करी न प्रीति कमल-लोचन सौं, जन्म जुवा ज्यौं हारयौ - १ - १०१।
गाल फुलाना- (१) गर्व प्रकट करना। (२) रूठकर बोलना।
गाल बजाना- (१) बढ़ बढ़ कर बातें करना। (२) व्यर्थ बकबाद करना।
गाल बजैहै- बड़ बढ़कर बातें करेगी, डींग मारेगी। उ.- देखहु जाइ चरित तुम वाके जैसे गाल बजैहै - १२६३।
गाल में जाना- मुँह में जाना।
काल के गाल में जाना- मृत्यु के मुख में पड़ना, मरना।
गाल मारना- (१) डींग डाकना। (२) व्यर्थ की बकवाद करना।
बड़बड़ाने या मुँहजोरी करने का स्वभाव।
गाल करना- (१) मुँहजोरी करना, निसंकोच अंडबंड बकना। (२) बहुत बढ़ बढ़ कर बातें करना, डींग हाँकना।
बहुत करत हैं गाल- निसंकोच अंडबंड बकते हैं। उ.- आई हँसत कहति हरि एई बहुत करत हैं गाल - २४२७।
करि करि गाल- बहुत बढ़ बढ़कर बातें करके, खूब डींग हाँककर।
उ.- बेगि करो मेरों कह्यौ पकवान रसाल। वह मघवा बलि लेत है नित करि करि गाल।
गाल मारना- कौर मुँह में रखना।
अन्न जो एक बार में चक्की में डाला जाय।
व्यर्थ की गपशप, अंडबंड बात।
(क) अरु तैसियै गालमसूरी। जो खातहिं मुख-दुख दूरी - १० - १८३। (ख) दूध बरा, उत्तम दधिबाटी, गालमसूरी की रुचि न्यारी - १० - २२७।
कपास की डोंड़ी से निकली हुई रुई।
रुई का गाला (गाला सा)- बहुत सफेद।
बड़बड़ाने या मुँहजोरी का स्वभाव।
गाली की अदला-बदली, तू-तू मैं-मैं।
[हिं. गाली+फ़ा. गुफ्तार=कहना]
[हिं. गाली+फ़ा. गुफ्तार=कहना]
बढ़ बढ़कर बातें करनेवाला, गाल बजानेवाला।
डींग हाँकनेवाला, डींगिया।
प्रशंसा करते हैं, बखानते हैं।
(क) कमल नैन की लीला गावत कटत अनेक विकार - २ - २।
(ख) बारंबार ग्यान गीता को ब्रज बनितनि आगे गावत - २९८९।
अति अनुराग परस्पर गावति, प्रफुल्लित मगन होति नँदघरनी - १० - ४४।
कबहुँक काहू भाँति चतुर चित अति ऊँचै सुर गावते–२७३५।
(क) द्वारैं ठाढ़े हैं द्विज बावन। चारौ बेद पढ़त मुख आगर, अति सुकंठ-सुर-गावन - ८-१३। (ख) सूरदास निस्तरिहैं यह जस करि-करि दीन-दुखित जन गावन–९ - १३१।
(ग) अमर-नगर उत्साह अपसरा-गावन रे - १० - २८।
(घ) बेनु पानि गहि मोको सिखावत मोहन गावन गौरी - २८७७।
सूर स्याम सुप्रेम उमँग्यौ हरि जस सु लीला गावनो - २२८०।
प्रशंसा करता है, बखानता है।
जो गावहि ताकी गति होइ - २ - ५।
तैसेइ मोर पिक करत कुलाहल हरषि हिंडोला गावहिंगे - २८८९।
बलि-बलि जाउँ मधुर सुर गावहु - १० - १७९।
स्वर निकालते हैं, बखानते हैं।
भक्त बछल है बिरद हमारौ, बेद सुमृति हूँ गावैं - १ - २४४।
स्तुति करता है, प्रशंसा करता है।
जरासंध बंदी कटैं नृप कुल जस गावै - १ - ४।
गायगा, पढ़ेगा, पाठ करेगा।
तू कृत मम जस जो गावैगो सदा रहै मम साथ - सारा. ११०४।
गाओ, मधुर स्वर निकालो, आलापो।
गावौ हरि कौ सोहिलौ (हो) - १० - ४०।
अजहूँ नाहिं डरात मोहन बचे कितने गास।
सिंधु-सुत-धर सुहित सुत गुन गहक गोपी गास - सा, उ. ४२।
गहन स्थान में विचरनेवाला मनुष्य।
खरीदनेवाला, मोल लेनेवाला।
सूरदास गाहक नहिं कौऊ दिखिअत गरे परी–३१०४।
चाहने वाल, अभिलाषी, प्रेमी, इच्छुक।
(क) स्याम गरीबन हूँ के गाहक। दीनानाथ हमारे ठाकुर, साँचे प्रीति निबाहक - १ - १९।
(ख) हम तौ प्रेम-प्रीति के गाहक - १ - २३९।
(ग) सुर नर सब स्वारथ के गाहक - ८ - ६।
(घ) तुम अलि सब स्वारथ के ग्राहक नेह न जानत आधो - ३२४४।
कहि राधा किन हार चुरायौ।...सुखमा सीला अबधा नंदा बृंदा यमुना सारि। कमला तारा बिमला चंदा चंदावलि सुकुमारि - १५८०।
चलि सखि तिहिं सरोवर जाहिं। जिहिं सरोवर कमल-कमला, रवि बिना बिकसाहिं - १ - ३३८।
सूर कछू यह ह्याँरी अद्भुत लीला कमलाकंत - २२२२।
[सं. कमला=लक्ष्मी+कांत= पति]
झाड़ता है, ओहने में लगा है।
झारि झूरि मन तौ तू लै गयो बहुरि पयारहिं गाइत - ३०६५।
गिनने का एक मान जो पाँच पाँच का होता है।
झाड़ने से, ओहने की क्रिया से।
यह भ्रम तौ अब हीं भजि जैहै ज्यों पयार के गाहे - ३०६७।
कपड़े आदि का सिकुड़ जाना, गींजा जाना।
नीके देहु न मेरी गिंडुरी - ८५४।
गलाकर बड़े पेड़े के आकार में ढाली हुई शकर।
गला कर बड़े पेड़े के आकार में जमाई हुई चीनी।
पेठा पाक जलेबी कौरी। गोंदपाक तिनगरी, गिंदौरी - ३९६।
[हिं. पुं. गिदौड़ा, गिंदौरा]
गिचपिच, गिचरपिचर, गिचिरपिचिर
गिचपिच, गिचरपिचर, गिचिरपिचिर
[हिं. गेरू+ड़ा (प्रत्य.)]
[हिं. गेरू+ड़ा (प्रत्य.)]
[हिं. गेरू+ड़ा (प्रत्य.)]
बहुत दीनता से किसी बात के लिए प्रार्थना करना।
दीनता से युक्त प्रार्थना।
एक मांसाहारी बड़ा पक्षी जिसकी दृष्टि बहुत तेज होती है।
जटायु जिसे भगवान ने तारा था।
जटायु जिसे भगवान ने तारा था।
जटायु जिसे भगवान ने तारा था।
लुब्ध हुए, परच गये, रीझ गये।
सारँगरिपु के रहत न रोके हरि स्वरूप गिधए री - पृ. ३३५ और सा. उ. ७।
महत्व देते हैं, मान करते हैं, कुछ समझते हैं, मानते हैं।
ऊँच-नीच हरि गिनत न दोइ - ७ - २।
[हिं. गिनना+ती (प्रत्य.)]
गिनती में आना (होना)- कुछ समझा जाना, कुछ महत्व का होना।
किहिं गिनती मैं आऊँ- किस काम या महत्व का समझा जाऊँ। उ.- रजनीमुख आवत गुन गावत, नारद तुंबुर नाऊँ। तुमही कहौ कृपानिधि रघुपति, किहिं गिनती मैं आऊँ - ९ - १७२।
गिनती कराना- किसी विशेष कोटि या वर्ग में समझा जाना।
गिनती कराने (गिनाने) के लिए- नाम मात्र के लिए।
गिनती होना- कुछ समझा जाना।
[हिं. गिनना+ती (प्रत्य.)]
[हिं. गिनना+ती (प्रत्य.)]
[हिं. गिनना+ती (प्रत्य.)]
गिनगिन कर सुनाना (गालियाँ देना)- बहुत अधिक और चुभती हुई गालियाँ देना।
गिनगिन कर लगाना (मारना)- खूब मारना।
गिनगिन कर दिन काटना- बहुत कष्ट के दिन बिताना।
दिन गिनना- (१) आशा या सुख के दिनों की प्रतीक्षा बेचैनी से करना। (२) बेचैनी से समय काटना।
मान या प्रतिष्ठा के योग्य समझना।
अपने को या अन्य किसी को गिनती में शामिल कराना।
चार पसार दिसानि, मनोरथ घर, फिरि फिर गिनि आनै - १ - ६०।
चक्कर, चक्कर देने की क्रिया।
छिपकली की जाति का एक जंतु जो कई रंग बदल सकता है, गिरदौना।
(क) नृगतें गिरगिट कीन्हे ताको को करि सकै बखान १० - उ. - ३६।
(ख) कृष्न भक्ति बिन बिप्र साप तैं गिरगिट की गति पाये - सारा. ८२२।
गिरगिट की तरह रंग बदलना- बात, नियम या सिद्धांत से जल्दी जल्दी हट जाना।
एक खिलौना जो चिकारे की तरह का होता है।
फूले बजावत गिरगिरी गार मदन भेरि घहराई अपार संतन हित ही फूल डोल।
गिरजापति-पतनी पति जा सुत-गुन
गिरजापति-पतनी-पति-जा-सुत-गुन गुनगनन उतारै–सा. ६।
[सं. गिरिजा (पार्वती जी)+पति (पार्वती के पति=शिवजी)-पत्नी (शिव की पत्नी=गंगा)+पति (गंगा का पति = समुद्र)+जा=पुत्री (समुद्र की पुत्री शुक्ति या सीप)+सुत (शुक्ति का पुत्र मोती)+गुण (मोती का गुण–प्रातःकाले शीतल हो जाना)]
गिरजापति पितु पितु से दोऊ कर-बर देख बिचारो - सा. १०३।
[सं. गिरिजा=पार्वती + पति (पार्वती के पति शिव) + पितु (शिव के पिता ब्रह्मा) + पितु (ब्रह्मा का पिता कमल)]
गिरजापति पितु पितु पितु ही ते सौ गुन सी दरसावै - सा. १५।
[सं. गिरिजा पति= शिव जी+पितु (शिव के पिता ब्रह्मा)+ पितु (ब्रह्मा का पिता कमल)+ पितु (कमल का पिता समुद्र)]
(क) गिरजापति भूषन पै मानहु मुनि भष पंक प्रकासी - सा. १३ (ख) गिरजापति भूषन जिन देखे ते कह देखत हैं नभ तारो–सा. १११।
[सं. गिरिजा = पार्वती+पति (पार्वती के पति शिव) + भूषण (शिव का भूषण=चंद्रमा)]
जरत ज्वाला, गिरत गिरि तैं, स्वकर काटत सीस - १ - १०६।
गिरत-परत- गिरता-पड़ता, उतावली से, हड़बड़ी में। उ.-व्रजवासी नर-नारि सब गिरत-परत चले धाइ-५८९।
गिरतनयापति-भूषन जैसे बिरह जरी दिन रातें -सा. उ. ४६।
[सं. गिरि+तनया=पुत्री (पर्वत की पुत्री पार्वतीजी) + पति (पार्वती के पति शिव) + भूषण (शिव का भूषण विभूति =राख-विभूति का अर्थ 'आग' भी होता है)]
श्रीकृष्ण जिन्होंने गोवर्द्धन उठाया था।
जो तिय चढ़त सीस गिरधर के सो अब कंठ गहोरी–सा. उ. ५२।
खड़ा न रह सकना, जमीन पर पड़ जाना।
जलधारा (नाली, नदी आदि) का बड़े जलस्थान में मिलना।
प्रतिष्ठा, शक्ति आदि कम होना।
गिरे दिन- दुर्दशा का समय।
अपने स्थान से हटना या झड़ना।
प्रभु कब देखिहौ मम ओर। ज्ञान आपुन आप ते गिरनाथ गाठी छोर -सा.उ.४२।
[सं. गिरि+नाथ (शंकर=भव=संसार)]
[सं. कर्मरंग, पा. कम्मरंग]
(क) काँध कमरिया, हाथ लकुटिया, बिहरत बछरनि साथ - ४८७।
(ख) बन बन गाय चरावत डोलत काँध कमरिया राजै - सारा, ७४१।
पानी में होने वाले एक पौधे का फूल जो अधिकतर लाल, सफेद या नीले रंग का होता है।
कमल के समान नेत्र हैं जिसके वह श्रीकृष्ण।
कमलनैन काँधे पर न्यारो पीत बसन फहरात - २५३६।
जो पकड़ा या कैद किया गया हो।
अंगे या कुरते का गला या कालर।
गिराने का काम कराना, गिराने की प्रेरणा देना।
दो पोरों के जुड़ने का स्थान।
कलाबाजी, उलटने की क्रिया।
एक कबूतर जो उड़ते उड़ते कलाबाजी खा जाता है।
देखि नृप तमकि हरि चमकि तहाँई गये दमकि लीन्हों गिरहबाज जैसे -२६१५।
गिरनेवाला, अवनति की ओर बढ़ता हुआ।
[हिं. गिरना+हर (प्रत्य.)]
गिरा-रहित बृक ग्रसित अजा लौं अंतक आनि ग्रस्यौ-१-२०१।
(क) अमृत गिरा बहु बरषि सूर प्रभु भुज गहि पार्थ उठाए–१-२९।
(ख) गदगद गिरा सजल अति लोचन हिय सनेह-जल छायो-९-५५।
किसी ऊँचे स्थान से फेंक कर।
देहु गिराइ- ऊपर से फेंक दो।
पर्वत सों इहिं देहु गिराइ -७-२।
दियौ गिराइ- फेंक दिया, गिराया।
असुरनि गिरि तैं दियौ गिराइ-७-२।
नीचे डाल दूँ, पतित कराऊँ।
स्यंदन खंडि, महारथि खंडौं, कपिध्वज सहित गिराऊँ—१-२७०।
खड़ी चीज को तोड़ कर जमीन पर गिरा दिया।
नगर-द्वार तिन सबै गिराए-४-१२।
गिराया, फेंका, डाल दिया, छोड़ दिया।
लगत त्रिसूल इंद्र मुरझायौ। कर तैं अपनौ बज्र गिरायौ-६-५।
गिरने की क्रिया या भाव, पतन।
[हिं. गिरना+आव (प्रत्य.)]
भक्षण करना, खा जाना, ग्रस लेना।
गिरते हैं, पतित होते हैं।
बहुरि कह्यौ सुरपुर कछु नाहिं। पुन्य-छीन तिहिं ठौर गिराहिं-१-२९०।
(क) सक्र कौ दान-बलि मान ग्वारनि लियौ, गह्यौ गिरि पानि, जस जगत छायौ - १-५। (ख) गोपी-ग्वाल-गाय-गोसुत-हित सात दिवस गिरि लीन्ह्यौ १-१७।
धरनि पत्ता गिरि परे तैं फिरि न लागै ड़ार-१-८८।
हिमाचल कन्या पार्वती, गौरी।
गिरिजापति-भष बीच को न सो ह्वैगै मोंको माई-सा. ६३।
[सं. गिरिजा+पति (गिरिजा के पति शिव)+भष=भक्ष्य (शिव का भक्षण विष)]
गिरिजापति-रिपु नख सिख ब्यापतु बसत सुधा पिय कथा सुनाई–सा. उ. ३०।
[सं. गिरिजा+पति (शिव)+रिपु (शिव का शत्रु कामदेव)]
श्रीकृष्ण जिन्होंने गोवर्द्धन को उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की थी।
सूरदास ए रीझे गिरिधर मनमाने उनही के- सा. उ. ८।
गोवर्द्धन पर्वत को उठानेवाले श्रीकृष्ण।
कबहुँ न रिझए लाल गिरिधरन, बिमल बिमल जस गाइ - १-१५५।
जौ गिरिपति मसि घोरि उदधि मैं, लै सुरतरु बिधि हाथ। मम कृत दोष लिखैं बसुधा भरि, तऊ नहीं मिति नाथ -१-१११।
दो पर्वतों के बीच का मार्ग, दर्रा।
गोपनि सत्य मानि यह लीनो बड़े देव गिरिराजा -९१६।
गोवर्द्धन को उठानेवाले श्रीकृष्ण।
[सं. गिरिवर+धारी =धारण करनेवाले]
भानु अंस गिरीस आखर आदि अंग प्रकास-सा. उ.४१।